बुधवार, 19 मई 2021

भारत का फिलिस्तीन पर दांव India support Palestine in UN

 राष्ट्रीय सहारा




                         

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कूटनीति का बेहद अहम योगदान होता है जिसके जरिए किसी भी देश के द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति की जाती है। बीसवी सदी के महान कूटनीतिक विचारक हंस मोर्गेंथाऊ ने कहा था कि कूटनीति यह वह कला है जिसके द्वारा राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्वों को अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में उन मामलों में अधिक से अधिक प्रभावशाली रूप में प्रयोग में लाया जाए जो कि हितों में सबसे स्पष्ट रूप से सम्बन्धित हैं। दरअसल इस्राइल और फिलिस्तीन विवाद में भारत ने फिलिस्तीन के पक्ष में आवाज बुलंद करके सभी को हैरत में डाल दिया। ऐसा भी नहीं है कि भारत ने पहली बार फिलिस्तीन का समर्थन किया है,लेकिन भारत में 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह माना जा रहा था कि भारत इस्राइल के साथ खड़ा होगा। इस समय इस्राइल और फिलिस्तीन के बीच गहरा तनाव है और भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए फिलिस्तीन का समर्थन करने से गुरेज नहीं किया।


संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत टीएस तिरूमूर्ति ने कहा कि भारत फिलिस्तीन की जायज़ मांग का समर्थन करता है और दो-राष्ट्र की नीति के ज़रिए समाधान को लेकर वचनबद्ध है। इसके साथ ही तिरूमूर्ति ने भारत की यह मांग भी रखी की,  “दोनों पक्षों को एकतरफ़ा कार्रवाई करके मौजूदा यथास्थिति में बदलाव की कोशिश नहीं करनी चाहिए,इसमें यरुशलम में किसी भी तरह का बदलाव न करना शामिल है।”


इस समय इस्राइल पूर्वी येरूशलम से फिलिस्तीनीयों को बाहर करने की नीति पर काम कर रहा है और ऐसे में भारत ने फिलिस्तीन को लेकर जिस प्रकार खुलकर समर्थन दिया उसे कूटनीतिक हलकों में अप्रत्याशित समझा जा रहा है। आपको याद होगा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2017 में इस्राइल की यात्रा की थी। आज़ाद भारत के किसी प्रधानमंत्री की यह 70 सालों में पहली इस्राइल यात्रा थी,जहां हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी के लिए इस्राइल के प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित थे और यह भारत के लिए अभूतपूर्व था। इसके पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फिलिस्तीन की जमीन पर 14 मई 1948 को अस्तित्व में आएं नए देश इस्राइल का कडा विरोध किया था और भारत की इस्राइल को लेकर दूरी की यह नीति कई वर्षों तक जारी रही। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी और बाद में नरसिम्हा राव ने इस्राइल से दूरी को दूर कर इसे नियंत्रण और संतुलन के आधार पर स्थापित किया।


  

इन सबके बीच फिलिस्तीन को लेकर भारत की वैदेशिक नीति बेहद सकारात्मक रही है और वैश्विक मंचों पर भारत की लगभग सभी सरकारों ने इसका इजहार भी किया है। फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को फिलीस्तीनी लोगों के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में समकालीन रूप से मान्यता देने वाला भारत पहला गैर-अरब देश था। इसके पहले 1975 में भारतीय राजधानी में एक पीएलओ कार्यालय स्थापित किया गया था। इस प्रकार अरब देशों के बाद भारत ही वह राष्ट्र था जिसने फिलिस्तीन का लगातार अभूतपूर्व समर्थन किया था। 2018 में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी फिलिस्तीन  की यात्रा की थी जहां उन्हें फिलिस्तीन के सर्वोच्च सम्मान ग्रैंड कॉलर से नवाजा गया था।


किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी वैदेशिक नीति का सबसे अहम उसके राष्ट्रीय हित होते है। भारत का फिलिस्तीन के समर्थन का यह एक महत्वपूर्ण कारण है। अरब देशों को  इस्राइल का मध्य पूर्व में अस्तित्व अस्वीकार्य रहा है और 1967 में यह युद्द के रूप में उभर कर सामने आया था। 1967 में जब जार्डन, सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुस्लिम देशों ने एक साथ इस्राइल पर हमला किया था तब उसने पलटवार करते ही मात्र छह दिनों में इन सभी को धूल चटा दी थीउस घाव से अरब देश अब भी नहीं उबर पाएं है यह युद्ध 5  जून से 11 जून 1967 तक चला और इस दौरान मध्यपूर्व संघर्ष का स्वरूप ही बदल गया इतिहास में इस घटना को सिक्स वॉर डे के नाम से जाना जाता है। इस्राइल ने मिस्र को ग़ज़ा से,सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट और पूर्वी यरुशलम से धकेल दिया थाइसके कारण करीब पांच लाख फ़लस्तीनी बेघरबार हो गए थे।  युद्द में जीते गये इलाके अब इजराइल के कब्जे में है और खाड़ी देशों के लाख प्रयासों के बाद भी इस्राइल इन इलाकों को छोड़ने को तैयार नहीं है



सऊदी अरब के पूर्व विदेशमंत्री प्रिंस साउद अल फैसल ने एक बार कहा था कि इजराइल किसी भी तरह के कानून,नियम या धार्मिक मान्यताओं और मानवीय पक्षों को धता बताते हुए अपने लक्ष्य की और अग्रसर रहता है। सऊदी अरब इस्लामी सहयोग संगठन 57 देशों के प्रभावशाली समूह का अगुवा है। संयुक्त राष्ट्र के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संगठन है। यह संगठन इस्राइल का मुखरता से विरोध करता रहा है। ओआईसी का पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण सदस्य है और वह कश्मीर का भ्रामक प्रचार करके इस संगठन का भारत के खिलाफ उपयोग करने को लगातार प्रयासरत रहता है।


2019 में जब भारत ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर राज्य के पुनर्गठन की घोषणा की थी तब पाकिस्तान ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया करते हुए इस पर ओआईसी की आपात बैठक बुलाने की मांग की थी। इस समय भारत के पक्ष में सऊदी अरब आया था और उसकी प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही थी। यही नहीं जब भारत के विरोध में तुर्की और मलेशिया जैसे देशों ने नकारात्मक बयान दिये तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी भी दी थी।  इसके पहले 2016 में मोदी की पहली सऊदी यात्रा के दौरान सऊदी अरब के बादशाह सलमान ने उन्हें सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया था। बाद में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भारत की यात्रा भी की थी। सऊदी अरब में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की संख्या सबसे ज़्यादा है,वहां 26 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं।  भारत के इस समय सऊदी अरब से मजबूत संबंध है और इसका राजनीतिक,सामरिक और आर्थिक फायदा भारत को लगातार मिल रहा है। सऊदी अरब के लिए भारत विश्व की आठ बड़ी शक्तियों में से एक है,जिसके साथ वो अपने विज़न 2030 के तहत रणनीतिक साझेदारी करना चाहता है।



इस समय दुनिया बड़े बदलावों से गुजर रही है और भारत को पड़ोस के देशों से कड़ी रणनीतिक चुनौतियां मिल रही है। भारत,अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध लगातार मजबूत हुए है वहीं पाकिस्तान,चीन,रूस और ईरान जैसे देश भी लामबंद हुए है। भारत के इस्राइल से मजबूत सामरिक संबंध तो है लेकिन भारत की भू रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियां यह इजाजत नहीं देती की भारत खुलकर इस्राइल का समर्थन करें,ऐसे में सऊदी अरब समेत खाड़ी के कई देशों से भारत के संबंध खराब हो सकते है,जबकि इन देशों में भारत के लाखों लोग काम करते है और तेल को लेकर भी भारत इन देशों पर निर्भर है। जाहिर है भारत ने हालिया तनाव में फिलिस्तीन का समर्थन करके न केवल अरब देशों को सकारात्मक संदेश दिया है बल्कि ओआईसी में पाकिस्तान के भारत विरोध की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है।

 

 

 

 

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