शनिवार, 15 मई 2021

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

 सुबह सवेरे      

    

मसला ये नहीं की दर्द कितना है,मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही है किसी को खबर नहीं लेकिन यह भी हकीकत है की पतवार थामने वाले बेखबर भी नहीं।  दरअसल चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के हाल ही में जो चुनाव परिणाम आएं है वह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के  लिए बहुत निराशाजनक है। यह देखा गया है कि उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत,पूर्व से लेकर पश्चिम तक कांग्रेस विरोधियों से ज्यादा गुटीय राजनीति से परेशान है। आपसी कलह और  अंतर्द्वंद से जूझती कांग्रेस के लिए स्थायी अध्यक्ष का न होना मुश्किलें बढ़ा रहा है और इसका सीधा असर पार्टी के परंपरागत वोटरों पर पड़ा है। जनाधार लगातार खिसकता जा रहा है,कार्यकर्ता हताश हो रहे है,राज्यों की राजनीति क्षेत्रीय नेताओं के हित में उलझ गई है और अंतत: इसका असर चुनावों परिणामों पर भी देखना को मिल रहा है। केंद्र हो या राज्य,कांग्रेस सत्ता से दूर होती जा रही है।


   

नेतृत्व का मसला

राहुल गांधी कहते है की कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव कांग्रेस के कार्यकर्ता करेंगे। लेकिन यह इंतजार बहुत लंबा हो गया है,जिसका खामियाजा पार्टी भोगने को मजबूर है। यह इंतजार जितना लंबा होता जा रहा है उतना ही उसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे है। कांग्रेस का वोट बैंक खिसकता रहा है और अनिर्णय कि स्थिति से क्षुब्ध और प्रभावित नेता पलायन करने को मजबूर हो रहे है। भारत में यह किस्सा मशहूर रहा है की राजनीति का ककहरा सीखना है तो कांग्रेस में आइये और जब मन करें,चले जाइये। आपको कोई रोकेगा नहीं। तीन दशक पहले जब कांग्रेस मजबूत थी तब तक न रोका जाता था,वह चल जाता था। लेकिन अब जब वह मैदान में बने रहने के लिए खुद ही संघर्षरत है,फिर भी कार्यकर्ताओ और नेताओं को न रोक पाना आत्मघाती साबित हो रहा है।    

 



पश्चिम बंगाल में फुरफुरा शरीफ से बेड़ा गर्क करवाया

पिछले विधानसभा चुनावों में 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी का इस बार पश्चिम बंगाल में खाता भी नहीं खुला है जबकि इसकी ज़िम्मेदारी अधीर रंजन चौधरी को दी गई थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय है और मालदा,मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।  राहुल गांधी की सिर्फ दो सभाएं करवाई गई और अब परिणामों से साफ हो गया है की राज्य से कांग्रेस का जनाधार कितनी तेजी से सिमट गया है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी को इस बार सिर्फ़ 3.02 प्रतिशत वोट ही मिल सके,जबकि पिछले चुनावों में पार्टी को यहाँ 12.25 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस ने इस बार के चुनाव लेफ्ट और  एक नए  राजनीतिक संगठन इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इंडियन सेकुलर फ्रंट का संबंध बंगाल की फुरफुरा शरीफ दरगाह से है। इस गठबंधन को लेकर कांग्रेस की खूब आलोचना हुई और उसे सांप्रदायिक बताया गया। चुनाव परिणामों से साफ है की इस गठबंधन पर मुस्लिमों ने भी भरोसा नहीं जताया और कांग्रेस के पास की सारी सीटें भी  चली गई। 


 

असम में बदरुद्दीन के सहारे कश्ती डूबोई

असम की सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी का माहौल बताया जा रहा था,लेकिन कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ से गठबंधन करके अपनी बनती उम्मीदों को ध्वस्त कर दिया। असम में एआईयूडीएफ़ को बंगलादेशी घुसपैठियों का हिमायती माना जाता है और कांग्रेस यह जानने के बाद भी उसके साथ चुनावी मैदान में कूद पड़ी। नतीजा चारो खाने चित्त हो गई और पिछले चुनावों के मुक़ाबले पार्टी का वोट शेयर कम हो गया। घुसपैठियों को लेकर समूची पूर्वोत्तर की राजनीति में उबाल आता रहता है जाहिर है अब कांग्रेस के लिए उत्तर पूर्व की राजनीति की डगर ही मुश्किल में पड़ गई है।

 



केरल में सीएम चेहरा न दे पाने की नाकामी

केरल में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा टूट गई और इसके साथ ही एलडीएफ ने सत्ता बरकरार रखते हुए इतिहास रच दिया। दरअसल कोरोना काल में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की मुस्तैदी और लोगों से सीधा संवाद का तरीका जनता को खूब पसंद आया। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के गठबंधन वाली यूडीएफ ने पिनराई विजयन की लोकप्रियता को नजरअंदाज किया। पिनराई विजयन से मुकाबले के लिए विपक्ष का कोई लोकप्रिय चेहरा मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए जरूरी था। लेकिन केरल कांग्रेस में ओमान चांडी कैंप और रमेश चेन्नीथला कैंप दोनों एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे रहते है और ऐसे में किसी एक चेहरे पर कोई एक फैसला हो ही न सका। अंतत: इसका खामियाजा यही हुआ कि हाथ में आती हुई सत्ता छिटक गई।


  

 तमिलनाडू में जूनियर हैसियत

तमिलनाडु में कांग्रेस ने जीत तो हासिल की है लेकिन वह इस अहम दक्षिण भारत के राज्य में द्रमुक गठबंधन के जूनियर सहयोगी के तौर पर ही पहचानी जाएगी। द्रमुक के साथ कांग्रेस का साथ बहुत पुराना रहा है लेकिन कांग्रेस के स्वयं के बल पर खड़ा करने के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा कांग्रेस के पास नहीं है।   



 

पांडिचेरी में पूराने कांग्रेसियों की सरकार

दक्षिण भारत के छोटे से राज्य पांडिचेरी में कांग्रेस पार्टी का आंतरिक कलह इतना बढ़ गया है की पार्टी का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है।   इस साल की शुरुआत में चार विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस में दरार की शुरुआत मंत्री ए नमास्सिवयम और ई थीप्पैनजान से शुरू हुई। उसके बाद दो और विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी जिसके बाद वी. नारायणसामी की सरकार अल्पमत में आ गई थी। इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक जीत कर आएं है और कांग्रेस को हराने वाले अधिकांश उम्मीदवार कांग्रेस से ही टूट कर आएं है। 


 

 

राज्य स्तर पर टूट को न रोक पाने की कांग्रेस की नाकामी  

मध्यप्रदेश,गुजरात,महाराष्ट्र,तेलंगाना,असम,मिजोरम,नागालैंड से लेकर गोवा तक में कांग्रेस छोड़कर जाने वाले विधायकों की लंबी फेहरिस्त है। इसका एक प्रमुख कारण कांग्रेस के स्थायी अध्यक्ष का न होना रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर एकमत,निर्णय और त्वरित कदम न उठा पाने से देश भर में पार्टी टूट रही है। इसका असर पार्टी की नीतियों और योजनाओं पर भी लगातार पड़ रहा है। संगठनात्मक तौर से पार्टी कैडर खड़ा करने में नाकाम रही है। अधिकांश राज्यों में क्षेत्रीय स्तर पर नेतृत्व का अभाव देखा जा रहा है। नए और युवा नेतृत्व को ज़िम्मेदारी न देने का असर यह हो रहा है की पार्टी जमीनी स्तर पर कमजोर होकर सत्ता से दूर जाती दिख रही है और निकट भविष्य में कोई आस न दिखने पर कार्यकर्ता और नेता पाला बदलने में ही भलाई समझने लगे है।


कई राज्यों में कांग्रेस अभी भी बेहतर स्थिति में है और वहां संगठनात्मक बदलाव से बेहतर रास्ते निकल सकते है। देश और राज्यों में सत्ता से लगातार दूर होती कांग्रेस बूरी तरह से अनिर्णय की स्थिति से जूझती नजर आती है और इससे संकट बढ़ता जा रहा है। क्षेत्रीय दल जिस भी राज्य में विकल्प बने वहां कांग्रेस का लौटना मुश्किल रहा है। जाहिर है कांग्रेस को रीति,नीति,निर्णय और नेतृत्व में अतिशीघ्र बदलाव करना ही होगा नहीं तो इसके अंतिम किले भी ढहने में ज्यादा वक्त न लगेगा। 

 

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