छ्द्मासन,Baba Ramdev IMA

 पॉलिटिक्सवाला पोस्ट                       


दिल्ली के डॉ.अनस मुजाहिद की उम्र महज 26 साल थी। उनकी अभी शादी भी नहीं हुई थी। पिछले साल से लगातार डॉ.अनस कोविड से प्रभावितों का इलाज कर रहे थे, किंतु वे भी दुर्भाग्य से इसके शिकार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। इस महामारी कि विभीषिका में भारत के विभिन्न इलाकों में काम करने वाले कई डॉक्टर्स की सेवाएं अभिभूत कर देती है,उनका जीवन हर दिन चुनौतियों से घिरा हुआ है। किसी ने दरवाजे  के बाहर खड़े होकर अपनी बेटी का जन्मदिन मनाया तो कई डॉक्टर्स कई महीनों से अस्पताल से अपने घर ही नहीं लौटे है। दिल्ली के ही एक ख्यात डॉक्टर अपनी कार में खड़े होकर माईक से यह अपील करते हुए अक्सर दिखते है कि,लोग बेहद आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलें और यदि उन्हें खांसी बुखार के लक्षण हो तो बिना परेशान हुए कैसा इलाज करें। ऐसे कई डॉक्टर्स है जो कोविड से प्रभावित लोगों कि लगातार बड़ी संख्या में मौत से दुखी होकर फूट फूट कर रोएं भी होंगे।


यह वह जानलेवा और कठिन दौर है जब लोग अपने घरों में कैद है और पड़ोसी के यहां जाने के भी महीनों बीत चूके होंगे। अपने पड़ोस और परिजनों के गुजर जाने के बाद भी कोविड के डर से लोग अंत्येष्टि में भी शामिल नहीं हो रहे है। उस समय हजारों डॉक्टर अपनी जान को जोखिम में डालकर पूरी मुस्तैदी से कोविड मरीजों के बीच है और ऐसा करते हुए भारत समेत दुनिया में हजारों डॉक्टर्स की मौत हो गई है। ऐसे समय में एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति और आधुनिक डॉक्टर्स को निशाना बनाने की कोई भी कोशिश किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं की जा सकती। फिर चाहे वह योगगुरु बाबा रामदेव ही क्यों न हो।


दरअसल बाबा रामदेव का समूचा जीवन दर्शन भारतीय जीवन पद्धति कि श्रेष्ठता के प्रदर्शन से आगे बढ़कर व्यवसायिक और भौतिकवादी अभिलाषाओं की ओर तत्पर नजर आता है और यह उनके व्यक्तित्व और कार्यों से प्रतिबिंबित भी होता है। कुछ दिनों पहले बाबा रामदेव ने कहा था कि एलोपैथिक दवाएँ खाने से लाखों लोगों की मौत हुई है। उन्होंने एलोपैथी को 'स्टुपिड और दिवालिया साइंस' भी कहा था। कोरोना महामारी में जब लोग ऑक्सीज़न कि तलाश में दर दर भटक रहे थे और देशभर में हजारों लोगों कि  ऑक्सीज़न कि कमी से मौत हो रही थी,उस समय बाबा रामदेव का यह बयान बेहद शर्मनाक था कि,ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है,वातावरण में भरपूर ऑक्सीजन है लेकिन लोग बेवजह सिलेंडर ढूँढ रहे हैं। एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति को अक्सर निशाना बनाने वाले रामदेव पर यह भी आरोप है कि उन्होंने एक अभ्यास शिविर में जनता के सामने कहा था की आधुनिक चिकित्सा का अभ्यास करने वाले डॉक्टर बीमारियों के प्रचारक हैं और मरीज़ों की बीमारियों को भुना रहे हैं। बाबा रामदेव के इस प्रकार के विचारों में उनकी व्यवसायिक प्रतिबद्धताएं ज्यादा दिखाई देती है। 


गौरतलब है कि बाबा रामदेव ने योग गुरु की पहचान से आगे बढ़ते हुए 2006 में पतंजलि आयुर्वेद के नाम से एक कंपनी शुरू की थी जो डेढ़ दशक बाद भारत की प्राकृतिक और हर्बल की एक बड़ी कंपनी के तौर पर पहचान बना चूकी है,इसका टर्नओवर दस हजार करोड़ के करीब पहुँच गया है। भारत के हर्बल बाज़ार पर उनकी कंपनी ने अपनी अच्छी पकड़ बनाई है और उनका सपना इसे दुनिया की सबसे बड़ी आयुर्वेद कंपनी बनाने का है। ब्रिटेन समेत कई देशों में उनकी कंपनी का कारोबार है। बाबा रामदेव किसी व्यवसायी कि तरह ही आगे बढ़े तो इसमें कोई परेशानी नहीं है लेकिन वे अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए कभी धर्म की आढ़ लेते है,कभी भारतीय सभ्यता का हवाला देते है तो कभी कभी उग्र राष्ट्रवाद को उभार कर खुद को नायक कि तरह प्रस्तुत करने की कोशिशें भी करते है। इन सब में वे योग  की  पूर्णता और पवित्रता को भूला बैठे है। वास्तव में योगगुरु की ही उनकी असल पहचान रही है।


 दूसरी तरफ एलोपैथी या आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने अपने अनुसंधानों,तकनीक और प्रयोगों से उल्लेखनीय सफलताएं अर्जित की है तथा फौरी राहत देने के लिए यह दुनियाभर के करोड़ों लोगों का विश्वास अर्जित कर चूकी है। खासकर महामारी और गंभीर बीमारियों का इलाज कर मानव जाति का अस्तित्व बचाने में एलोपैथी की भूमिका अतुलनीय है। शल्य चिकित्सा पद्धति में इसका कोई जवाब नहीं है। जहां तक बाबा रामदेव के हर्बल उत्पादों की बात की जाएं तो उनकी गुणवत्ता पर सवाल उठते रहे है और नेपाल में तो कई दवाओं पर प्रतिबंध भी लगाया जा चूका है। ऐसा विश्वास किया जाता है की हर्बल और प्राकृतिक उत्पादों की शुद्धता सदैव बरकरार रहना चाहिए,लेकिन बाबा रामदेव की कंपनी अपनी विश्वसनीयता को असंदिग्ध रखने में सफल नहीं हुई है।  


योग सूत्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि ने योग को समाधि से जोड़ते हुए कहा था कि यह ऐसी स्थिति है जिसमें बाहरी चेतना विलुप्त हो जाती है। महर्षि पतंजलि को अपने आदर्श के रूप में प्रस्तुत कर करोड़ों भारतीयों का ध्यान आकर्षित करते बाबा रामदेव के आचरण और व्यवहार में अधीरता और अनंत भौतिक अभिलाषाएं प्रकट होती है। वे अक्सर भारतीय दर्शन,धर्म ग्रन्थों और आदर्शों कि बात तो करते है जबकि स्वयं उपनिषद कि उस नसीहत को भूला बैठे है जिसके अनुसार योग कि उच्च अवस्था प्राप्त करने के लिए  संयमित वाणी,संयमित शरीर और संयमित मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। योग और आयुर्वेद को हमारी सभ्यता और संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान हासिल है। इस उपचार पद्धति कि स्वीकार्यता भी बहुत है लेकिन बाबा रामदेव ने अन्य उपचार पद्धतियों को व्यवसायिक दृष्टिकोण से निशाना बनाकर आयुर्वेद की सार्वभौमिक मान्यताओं और मूल्यों को बड़ी क्षति पहुंचाई है। उनका अपने व्यवसाय को बढ़ाने के लिए लोगों को भ्रमित करने जैसे कृत्य कोरोना जैसी महामारी के रोकथाम में बड़ी रुकावट बन सकते है। अत: इन्हें हर हाल में रोका जाना चाहिए।   

 

 

 

राजीव हत्याकांड पर रहम की राजनीति rajiv gandhi murder

दबंग दुनिया


 

                    

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के 30 साल पूरे होने के 48 घंटे पहले तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस हत्याकांड से जुड़े मुख्य दोषी पेरारिवलन को जेल से तीस दिन की छुट्टी देने का आदेश जारी कर दिया।लिबरेशन टाइगर्स तमिल ईलम के पेरारिवलन ने राजीव गांधी की हत्या में उपयोग में लाये गए बेल्ट बम के लिए शिवरासन को 9-बेल्ट बैटरी उपलब्ध करायी थी। 20 वी सदी के इस सबसे सनसनीखेज हत्याकांड पर दुनिया भर की नजर रही है लेकिन भारत में इसके दोषी राजनीतिक प्रश्रय और क्षेत्रीय राजनीति के बूते अब तक जीवित है।


दरअसल भारत में एक पूर्व प्रधानमंत्री की निर्मम हत्या से जुड़े दोषियों को उच्च स्तर पर राजनीतिक और कानूनी मदद से बचाव की कोशिशें हैरान करने वाली है।  मुरुगन, संथन और पेरारीवालन की निचली अदालत ने 1997 में और सर्वोच्च अदालत ने 11 मई 1999 को राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद साल 2000 में इस मामले में फांसी की सजा पाए दोषियों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। यह याचिका साल 2000 और 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे कलाम के पास आई लेकिन उनके द्वारा इस पर कोई निर्णय नहीं लिया गया। भारत में यह कानूनी अधिकार है कि दया याचिका पर राष्ट्रपति के निर्णय न होने तक दोषियों को सजा नहीं दी जा सकती।


अब यह याचिका राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के पास आई और उन्होने चार साल के इंतजार के बाद 12 अगस्त 2011 को दया याचिका खारिज कर दी। अब दोषियों का फांसी चढ़ना तय था लेकिन राजनीतिक हस्तक्षेप ने कानूनी न्याय को मात दे दी। 26 अगस्त 2011 को तीनों दोषियों को फांसी देने कि तारीख 9 सितंबर 2011 बताया गया। अब यहीं से तमिल राजनीति के अगुवा अपने वोट बैंक के लिए लामबंद हुए। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता डीएमके नेता एम करुणानिधि,एमडीएमके महासचिव वाइको,द्रविदड कझगम प्रमुख के वीरमानी, पीएमके नेता डॉ.एस.रामदोस,राज्य के सीपीआई और सीपीएम नेता,तमिल नेशनल मूवमेंट के नेता पी नेदूमारन, नाम थमिझार के नेता और फिल्म डायरेक्टर सीमान ने दोषियों की सजा माफ कर उनकी सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की। 30 अगस्त 2011 को तमिलनाडु विधानसभा ने अभूतपूर्व तरीके से एक प्रस्ताव पास करके राष्ट्रपति से फांसी कि सजा को रोकने का आग्रह किया।


तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव भारत कि संघीय और एकल प्रभुसत्ता को चुनौती देने वाला था। यह राज्य कि स्वायत्ता कि कोशिशों के तौर पर भी देखा गया। राजनीतिक हस्तक्षेप और क्षेत्रीय राजनीति के प्रभाव के कारण फांसी कि तारीखें फिर टल गई। बाद में 18 फरवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने दया याचिका पर देरी के आधार पर फांसी कि सजा पर रोक लगा दी।  साथ ही यह शर्त भी लगा दी कि तमिलनाडु सरकार उन्हें रिहा न करें तो उन्हें पूरी जिंदगी जेल मे बितानी पड़ेगी।  

इसके बाद तमिलनाडू कि जयललिता सरकार ने ज़ोर शोर से यह प्रयास किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े सभी अभियुक्तों को जेल से रिहा कर दिया जाएं। इसके साथ ही वे तमिल प्रेम का प्रदर्शन करके तमिल वोट पर अपनी पार्टी का दावा मजबूत कर सके। 19 फरवरी 2014 को मुख्य मंत्री जय ललिता ने एलान किया कि राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े इन तीन अभियुक्तों के साथ अन्य चार जल्द ही खुली हवा में सांस लेंगे।


इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी हत्यारों को छोड़ने कि तमिलनाडु सरकार कि पहल को नाजायज ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल नाडु सरकार को नोटिस जारी कर इस पर रोक नहीं लगाई होती तो तमिलनाडु कि सरकार इन हत्यारों को रिहा कर चुकी होती। राजीव गांधी की हत्या के मामले की जांच करने वाली स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम के प्रमुख पुलिस अफसर डीआर कार्तिकेयन ने अपनी किताब सत्य की विजय:राजीव गांधी की हत्या एक अन्वेषणमें इस हत्याकांड के कई अहम पहलू उजागर किए है। जांच में यह सभी तथ्य सामने आयें जिसके अनुसार राजीव गांधी को मारने की साजिश नवंबर 1990 में श्रीलंका के जाफना में बनी थी। इस दौरान घने जंगलों में लिट्टे चीफ प्रभाकरण और उसके चार साथी बेबी सुब्रह्मण्यम,मुथुराजा,मुरूगन और शिवरासन इस साजिश में शामिल रहे थे और यहीं पर राजीव गांधी की हत्या के लिए मानवबम धनू का सहारा लेने का फैसला हुआ लिया गया था।  


जांच अधिकारी डी. आर कार्तिकेयन के मुताबिक महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी की हत्या से भी ज्यादा राजीव गांधी मर्डर जटिल था क्योंकि इसमें हत्यारे और उसके इरादे के बारे में जानकारी तलाशना बहुत टेढ़ी खीर था। साथ ही यह मामला एक अन्य राष्ट्र से भी जुड़ा था। एसआईटी ने इस कार्य में बड़ी तेजी दिखते हुए सीबीआई,रॉ,कैबिनेट सचिवालय से मिले इंटेलीजेंस इनपुट पर चर्चा के साथ हत्या से पहले तमाम कोड वाले संदेशों के आदान-प्रदान को भी समझने की कोशिश की।  ज्यादातर संदेशों का आदान-प्रदान तमिलनाडु के आतंकी संगठनों के बीच हो रहा था। इसके लिए एक कंट्रोल रुम बनाया गया जो 24 घंटे काम करता था। 10 हजार लोगों के बयान लिए गए जबकि 1 लाख से ज्यादा  तस्वीरों की स्क्रूटनी भी की. 1477 दस्तावेजों को कोर्ट में सुबूत के तौर पर पेश किया गया। जांच कि दृष्टि से यह बेहद जटिल केस था लेकिन  एसआइटी ने एक साल के भीतर 20 मई 1992 को चार्जशीट पेश कर दी थी। इस आत्मघाती बम हमले में कुल 18 लोगों की मौत हो गई। इसमें राजीव गांधी के निजी सुरक्षा अधिकारी,एसपी,पत्रकार और कई अन्य लोग शामिल थे। इसके दोषी सरकारों  की रहम पर जेल से बाहर आते रहते है। इन्हें राजनीति के साथ सामाजिक प्रश्रय भी मिलता है।


राजीव गांधी के साथ 17 अन्य जो लोग मारे गए थे,उनका न तो किसी को चिंता है न ही परवाह। जबकि नलिनी की बेटी लंदन में रहकर आराम का जीवन यापन कर रही है। राजनीतिक पार्टियां इन्हें अब भी निर्दोष कहती है जबकि राजीव गांधी के पुत्र और सांसद राहुल गांधी की बात उतनी ही प्रासंगिक लगती है ने कि अगर प्रधानमंत्री के हत्यारे छूट सकते है तो आम आदमी न्याय की कैसे उम्मीद कर सकता है। वहीं भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कहा था कि, ये सभी कट्टर आतंकवादी है। यह कहना बेतुका है की देरी से फैसले के कारण उन्हें मानसिक प्रताड्ना हुई। जो लोग उनके द्वारा मारे गए,उनके अधिकारों के बारे में क्या कहेंगे।

 

भारत का फिलिस्तीन पर दांव India support Palestine in UN

 राष्ट्रीय सहारा




                         

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कूटनीति का बेहद अहम योगदान होता है जिसके जरिए किसी भी देश के द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति की जाती है। बीसवी सदी के महान कूटनीतिक विचारक हंस मोर्गेंथाऊ ने कहा था कि कूटनीति यह वह कला है जिसके द्वारा राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्वों को अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में उन मामलों में अधिक से अधिक प्रभावशाली रूप में प्रयोग में लाया जाए जो कि हितों में सबसे स्पष्ट रूप से सम्बन्धित हैं। दरअसल इस्राइल और फिलिस्तीन विवाद में भारत ने फिलिस्तीन के पक्ष में आवाज बुलंद करके सभी को हैरत में डाल दिया। ऐसा भी नहीं है कि भारत ने पहली बार फिलिस्तीन का समर्थन किया है,लेकिन भारत में 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह माना जा रहा था कि भारत इस्राइल के साथ खड़ा होगा। इस समय इस्राइल और फिलिस्तीन के बीच गहरा तनाव है और भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए फिलिस्तीन का समर्थन करने से गुरेज नहीं किया।


संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत टीएस तिरूमूर्ति ने कहा कि भारत फिलिस्तीन की जायज़ मांग का समर्थन करता है और दो-राष्ट्र की नीति के ज़रिए समाधान को लेकर वचनबद्ध है। इसके साथ ही तिरूमूर्ति ने भारत की यह मांग भी रखी की,  “दोनों पक्षों को एकतरफ़ा कार्रवाई करके मौजूदा यथास्थिति में बदलाव की कोशिश नहीं करनी चाहिए,इसमें यरुशलम में किसी भी तरह का बदलाव न करना शामिल है।”


इस समय इस्राइल पूर्वी येरूशलम से फिलिस्तीनीयों को बाहर करने की नीति पर काम कर रहा है और ऐसे में भारत ने फिलिस्तीन को लेकर जिस प्रकार खुलकर समर्थन दिया उसे कूटनीतिक हलकों में अप्रत्याशित समझा जा रहा है। आपको याद होगा कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2017 में इस्राइल की यात्रा की थी। आज़ाद भारत के किसी प्रधानमंत्री की यह 70 सालों में पहली इस्राइल यात्रा थी,जहां हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी के लिए इस्राइल के प्रधानमंत्री स्वयं उपस्थित थे और यह भारत के लिए अभूतपूर्व था। इसके पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फिलिस्तीन की जमीन पर 14 मई 1948 को अस्तित्व में आएं नए देश इस्राइल का कडा विरोध किया था और भारत की इस्राइल को लेकर दूरी की यह नीति कई वर्षों तक जारी रही। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी और बाद में नरसिम्हा राव ने इस्राइल से दूरी को दूर कर इसे नियंत्रण और संतुलन के आधार पर स्थापित किया।


  

इन सबके बीच फिलिस्तीन को लेकर भारत की वैदेशिक नीति बेहद सकारात्मक रही है और वैश्विक मंचों पर भारत की लगभग सभी सरकारों ने इसका इजहार भी किया है। फिलिस्तीन मुक्ति संगठन को फिलीस्तीनी लोगों के एकमात्र वैध प्रतिनिधि के रूप में समकालीन रूप से मान्यता देने वाला भारत पहला गैर-अरब देश था। इसके पहले 1975 में भारतीय राजधानी में एक पीएलओ कार्यालय स्थापित किया गया था। इस प्रकार अरब देशों के बाद भारत ही वह राष्ट्र था जिसने फिलिस्तीन का लगातार अभूतपूर्व समर्थन किया था। 2018 में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी फिलिस्तीन  की यात्रा की थी जहां उन्हें फिलिस्तीन के सर्वोच्च सम्मान ग्रैंड कॉलर से नवाजा गया था।


किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी वैदेशिक नीति का सबसे अहम उसके राष्ट्रीय हित होते है। भारत का फिलिस्तीन के समर्थन का यह एक महत्वपूर्ण कारण है। अरब देशों को  इस्राइल का मध्य पूर्व में अस्तित्व अस्वीकार्य रहा है और 1967 में यह युद्द के रूप में उभर कर सामने आया था। 1967 में जब जार्डन, सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुस्लिम देशों ने एक साथ इस्राइल पर हमला किया था तब उसने पलटवार करते ही मात्र छह दिनों में इन सभी को धूल चटा दी थीउस घाव से अरब देश अब भी नहीं उबर पाएं है यह युद्ध 5  जून से 11 जून 1967 तक चला और इस दौरान मध्यपूर्व संघर्ष का स्वरूप ही बदल गया इतिहास में इस घटना को सिक्स वॉर डे के नाम से जाना जाता है। इस्राइल ने मिस्र को ग़ज़ा से,सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट और पूर्वी यरुशलम से धकेल दिया थाइसके कारण करीब पांच लाख फ़लस्तीनी बेघरबार हो गए थे।  युद्द में जीते गये इलाके अब इजराइल के कब्जे में है और खाड़ी देशों के लाख प्रयासों के बाद भी इस्राइल इन इलाकों को छोड़ने को तैयार नहीं है



सऊदी अरब के पूर्व विदेशमंत्री प्रिंस साउद अल फैसल ने एक बार कहा था कि इजराइल किसी भी तरह के कानून,नियम या धार्मिक मान्यताओं और मानवीय पक्षों को धता बताते हुए अपने लक्ष्य की और अग्रसर रहता है। सऊदी अरब इस्लामी सहयोग संगठन 57 देशों के प्रभावशाली समूह का अगुवा है। संयुक्त राष्ट्र के बाद यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा संगठन है। यह संगठन इस्राइल का मुखरता से विरोध करता रहा है। ओआईसी का पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण सदस्य है और वह कश्मीर का भ्रामक प्रचार करके इस संगठन का भारत के खिलाफ उपयोग करने को लगातार प्रयासरत रहता है।


2019 में जब भारत ने जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाकर राज्य के पुनर्गठन की घोषणा की थी तब पाकिस्तान ने इसकी तीखी प्रतिक्रिया करते हुए इस पर ओआईसी की आपात बैठक बुलाने की मांग की थी। इस समय भारत के पक्ष में सऊदी अरब आया था और उसकी प्रतिक्रिया बेहद सकारात्मक रही थी। यही नहीं जब भारत के विरोध में तुर्की और मलेशिया जैसे देशों ने नकारात्मक बयान दिये तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी भी दी थी।  इसके पहले 2016 में मोदी की पहली सऊदी यात्रा के दौरान सऊदी अरब के बादशाह सलमान ने उन्हें सऊदी अरब का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया था। बाद में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भारत की यात्रा भी की थी। सऊदी अरब में रहने वाले भारतीय प्रवासियों की संख्या सबसे ज़्यादा है,वहां 26 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं।  भारत के इस समय सऊदी अरब से मजबूत संबंध है और इसका राजनीतिक,सामरिक और आर्थिक फायदा भारत को लगातार मिल रहा है। सऊदी अरब के लिए भारत विश्व की आठ बड़ी शक्तियों में से एक है,जिसके साथ वो अपने विज़न 2030 के तहत रणनीतिक साझेदारी करना चाहता है।



इस समय दुनिया बड़े बदलावों से गुजर रही है और भारत को पड़ोस के देशों से कड़ी रणनीतिक चुनौतियां मिल रही है। भारत,अमेरिका और सऊदी अरब के संबंध लगातार मजबूत हुए है वहीं पाकिस्तान,चीन,रूस और ईरान जैसे देश भी लामबंद हुए है। भारत के इस्राइल से मजबूत सामरिक संबंध तो है लेकिन भारत की भू रणनीतिक और आर्थिक चुनौतियां यह इजाजत नहीं देती की भारत खुलकर इस्राइल का समर्थन करें,ऐसे में सऊदी अरब समेत खाड़ी के कई देशों से भारत के संबंध खराब हो सकते है,जबकि इन देशों में भारत के लाखों लोग काम करते है और तेल को लेकर भी भारत इन देशों पर निर्भर है। जाहिर है भारत ने हालिया तनाव में फिलिस्तीन का समर्थन करके न केवल अरब देशों को सकारात्मक संदेश दिया है बल्कि ओआईसी में पाकिस्तान के भारत विरोध की संभावनाओं को कमजोर कर दिया है।

 

 

 

 

दांव पर येरूशलम israel and palestine

 

जनसत्ता


                                

                                                                        

प्रसिद्ध जर्मन सैन्य विशेषज्ञ क्लाजविट्ज ने कहा था कि राज्य अपनी नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए युद्ध का सहारा लेता है। मध्यपूर्व में इसराइल और फ़लस्तीन कि नीतियां बेहद साफ है। इसराइल का अस्तित्व यहूदियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न है वहीं फ़लस्तीनी और अरब के नज़रिए से इसराइल का खत्म होना जरूरी है। दुनिया के बेहद अशांत माने जाने वाले मध्यपूर्व के इसराइल और फ़लस्तीन के कई इलाके इस समय दोनों ओर से आक्रामक कार्रवाइयों का सामना कर रहे है जिससे मध्यपूर्व में हिंसा बढ्ने की आशंका गहरा गई है। इस विवाद को दो प्रमुख सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में प्रचारित किया जाता है और इसीलिए  पूरी दुनिया में इसका असर होता है।    


पूर्वी भूमध्य सागर के आख़िरी छोर पर स्थित इसराइल उत्तर में लेबनान,उत्तर-पूर्व में सीरिया,पूर्व में जॉर्डन और पश्चिम में मिस्र से घिरा है1967 में जब जार्डन, सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुस्लिम देशों ने एक साथ इसराइल पर हमला किया तो उसने पलटवार करते ही मात्र छह दिनों में इन सभी को धूल चटा दी थीउस घाव से अरब देश अब भी नहीं उबर पाएं है यह युद्ध 5 जून से 11 जून 1967 तक चला और इस दौरान मध्यपूर्व संघर्ष का स्वरूप बदल गया इतिहास में इस घटना को सिक्स वॉर डे के नाम से जाना जाता है इसराइल ने मिस्र को ग़ज़ा से,सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम से धकेल दियाइसके कारण करीब पांच लाख फ़लस्तीनी बेघरबार हो गए थे। जीते गये इलाके अब इसराइल के कब्जे में है। खाड़ी देशों के द्वारा लगातार दबाव बनाने के कई प्रयासों के बाद भी इसराइल इन इलाकों को छोड़ने को तैयार नहीं है इसराइल पूर्वी यरुशलम के इलाके समेत पूरे येरूशलम शहर को अपनी राजधानी मानता है। फ़लस्तीनी पूर्वी येरूशलम को भविष्य के एक आज़ाद मुल्क की राजधानी के तौर पर देखते है। इन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसा कर इसराइल अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहता है वहीं फ़लस्तीनी अपने घरों को किसी भी हालात में छोड़ने को तैयार नहीं है।


अंतराष्ट्रीय राजनीति में एक यथास्थितिवाद का सिद्धान्त होता है जो शक्ति संतुलन के साथ शांति की स्थापना को भी सुनिश्चित करता है। लेकिन यथास्थितिवाद को लेकर अनिश्चितता बरकरार रहती है और यह किसी भी समय शक्ति संघर्ष का कारण बन  जाती है। इसराइल और फ़लस्तीन को लेकर दुनिया के कई देश यथास्थितिवाद को पसंद करते है वहीं मध्यपूर्व की भूराजनीतिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती।

येरूशलम न केवल राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। यहां मुस्लिमों कि पवित्र अल-अक़्सा मस्जिद है जिसे यहूदी टेंपल माउंट कहते है। 2016 में यूनेस्को ने कहा था कि यरूशलम में मौजूद ऐतिहासिक अल-अक्सा मस्जिद पर यहूदियों का कोई दावा नहीं है जिसे मानने से इसराइल ने इंकार कर दिया था। अल-अक़्सा मस्जिद में बड़ी संख्या में मुस्लिम आना चाहते है,इसराइल बलपूर्वक इन्हें रोकता रहा है। मुस्लिमों के पवित्र त्योहार ईद पर बड़ी संख्या में मुस्लिम अल-अक्सा मस्जिद में नमाज पढ़ना चाहते थे। इस क्षेत्र में ताजा विवाद यहीं से उठ खड़ा हुआ। इसराइल और फ़लस्तीन के विवाद का एक बड़ा पक्ष इस क्षेत्र में प्रभावी आतंकी संगठन हमास भी है। फ़लस्तीन कि सरकार हमास को लेकर खामोश रहती है जबकि असल में हमास फ़लस्तीन की सैन्य इकाई की तरह काम करती है।


हमास का गठन 1987 में मिस्र तथा फ़लस्तीन के मुसलमानों ने मिलकर किया था जिसका उद्धेश्य क्षेत्र में इसरायली प्रशासन के स्थान पर इस्लामिक शासन की स्थापना करनी थी। हमास का प्रभाव गजापट्टी में अधिक है। यह फलस्तीन कि राजनीतिक पार्टी भी है।  हमास का अपना घातक सैनिक दस्ता है जो इसरायल को निशाना बनाने के लिए कुख्यात है। हमास को ईरान समेत कई इस्लामिक देशों का समर्थन हासिल है और उसके पास बड़े हथियारों के जखीरे के साथ बड़ी संख्या में मिसाइले भी है। पिछले कुछ दिनों में हमास ने इसरायल पर कई बार मिसाइल से हमले किए है। हमास का फलस्तीन के लोगों पर बड़ा प्रभाव है और वह इसरायल के खिलाफ इसका लगातार प्रयोग भी करता रहा है। हमास के कार्यालय रिहाइशी इलाकों में है,जहां से वह अपनी अपनी गतिविधियां संचालित करता है। इसरायल जब भी हमास के खिलाफ कोई कार्रवाई करता है तो उसल्की जद में आम नागरिक भी आ जाते है और इससे विवाद बढ़ जाता है। अल-अक्सा मस्जिद में विवाद के बाद हमास ने इसरायल पर  बड़ी संख्या में मिसाइल से हमले किए और इसके बाद इसरायल ने गजा पट्टी में स्थित हमास के कई ठिकानों को निशाना बनाते हुए इसे आत्मरक्षा के लिए उठाया गया कदम बताया।


इस समूचे घटनाक्रम पर इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसरायल कि आलोचना की है। वही इसरायल ने वैश्विक दबावों को नजरअंदाज करते हुए हमास को लेकर बेहद आक्रामक रवैया अपनाया है। अपनी आक्रामक सामरिक नीति  की बदौलत ही यह देश मजबूती से खड़ा है। मध्यपूर्व में इसरायल का सामरिक सामर्थ्य अरब राष्ट्रवाद को चुनौती देता रहा है और इस्लामिक नेतृत्व की विभिन्न अरब राष्ट्रों की आपसी प्रतिद्वंदिता से उसका काम आसान हो गया है।


इसरायल को रणनीतिक रूप से घेरने वाले देश आंतरिक अशांति और राजसत्ता की अपनी मजबूरियों से जूझ रहे हैइसरायल के उत्तर में लेबनान और पूर्व में सीरिया है। यह दोनों देश गृहयुद्द से बूरी तरह से प्रभावित है। जबकि उसके दूसरे पड़ोसी जार्डन और मिस्र 1967 के इसरायल अरब युद्द के बाद यहूदी राष्ट्र के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर खामोश है। इन सबके बीच इसरायल को मध्य पूर्व से खत्म कर अरब राष्ट्रवाद की अगुवाई का स्वप्न ही इस्लामिक दुनिया को दो भागों में बांट गया हैइसरायल-फ़लस्तीन विवाद की परछाई में शिया बाहुल्य ईरान ने लेबनान के आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला को भारी संख्या में हथियार और गोला बारूद देकर इसराइल पर हमला करने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया,वहीं सुन्नी बाहुल्य सऊदी अरब ने फ़लस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास को हथियार देकर इसरायल को निशाना बनाने की कोशिश कीइस्लामिक दुनिया में बादशाहत कायम रखने के लिए ईरान और सऊदी अरब इसरायल को निशाना बनाते  बनाते आपसी हितों के लिए कालांतर में एक दूसरे के ही प्रतिद्वंदी बन गए है 


 

ओआईसी के कई सदस्य देशों के साथ इसरायल के बेहतर संबंध है वहीं शिया सुन्नी विवाद का साया भी ओआईसी पर पड़ता रहा है। तुर्की और सऊदी अरब के बीच इस समय इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने की होड़ मची हुई है।  तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन इसरायल की आलोचना तो कर रहे है लेकिन वे इसरायल की राजनीतिक,सामरिक और आर्थिक शक्ति को भलीभांति जानते है। अर्दोआन की नीतियां अमेरिका के निशाने पर है और उन्हें अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए अमेरिका से बेहतर सम्बन्धों की जरूरत है जिसमें उनका बड़ा मददगार इसरायल हो सकता है। तुर्की के लिए कुर्द बड़ी समस्या है और अर्दोआन के इसरायल विरोधी रुख से यह बढ़ सकती है। जिसके नतीजे तुर्की की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते है।


कुर्द मध्यपूर्व के चौथे सबसे बड़े जातीय समूह है और इनकी संख्या करीब साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा है। वर्तमान में मध्यपूर्व का यह बेहद प्रभावशाली समुदाय है जो नस्ल,भाषा और संस्कृति के आधार पर विभिन्न देशों में एक दूसरे का सहयोग कर रहे है। कुर्दों का अभी कोई एक देश नहीं है। ये तुर्की में अपनी स्वायत्तता के लिए लड़ रहे हैं तो सीरिया और इराक़ में अपनी अहम भूमिका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये इस्लामिक स्टेट का भी प्रतिरोध करते रहे हैं। दक्षिणी-पूर्वी तुर्की,उत्तरी-पूर्वी सीरिया,उत्तरी इराक़,उत्तर-पूर्वी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया तक कुर्द फैले हुए है और इनके प्रति अमेरिका की उदारता रही है। जाहिर है अर्दोआन ऐसी किसी भी हिमाकत से बचेंगे जिससे अमेरिका और इसरायल नाराज हो जाएं और कुर्द समस्या तुर्की की एकता और अखंडता के लिए बड़ी चुनौती पेश करने लगे। अर्दोआन जानते है कि लीबिया और सीरिया में तुर्की को मिस्र,सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात और फ़्रांस के अलावा रूस के विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है। अर्दोआन रूस कि ओर देख रहे है लेकिन पुतिन इसरायल से नियंत्रण और संतुलन के सम्बन्धों के पक्षधर रहे है। रूसी भाषा बोलने वाले रूस के कई यहूदी इसरायल में रहते है और इनका रूस में भी बड़ा प्रभाव है। पुतिन के लिए तुर्की सामरिक रूप से अहम हो सकता है लेकिन आर्थिक तौर पर मजबूती के लिए यहूदी व्यापरिक प्रभाव को वे नजरअंदाज नहीं कर सकते।


यूरोप के कई देशों के लिए मध्यपूर्व में  अशांति बने रहना उनके हित में नजर आती है। इसका प्रमुख कारण यह भी है कि यदि इस इलाके में शांति स्थापित हो जाए तो अरब राष्ट्रवाद मजबूत होकर यूरोप को चुनौती दे सकता है। और यदि यूरोप को मध्यपूर्व से तेल प्राप्त होना बंद हो जाये तो उसके अधिकांश उद्योग धंधे बंद हो जाएंगे और इस प्रकार दुनिया के सबसे बड़े विकसित यूरोप महाद्वीप की औद्योगिक और सामरिक क्षमता बर्बाद हो जाएगी। यही कारण है कि पश्चिमी देश मध्यपूर्व पर अपना नियंत्रण बनायें रखना चाहते है और वे मध्य-पूर्व में एक ठिकाने के रूप में इजराइल को सबसे सुरक्षित देश मानते हैं


मध्यपूर्व में बड़ी प्रतिद्वंदिता ईरान और सऊदी अरब की रही है। ईरान लेबनान के आतंकी संगठन हिज्बुल्ला और गजा पट्टी में हमास को हथियार देता रहा है। मध्यपूर्व के कई देशों में शिया सुन्नी नेतृत्व को लेकर दोनों देश एक दूसरे के सामने रहे है। ईरान को रोकने के लिए सऊदी अरब इसरायल को बेहतर विकल्प मानता है और इन दोनों देशों के बीच गोपनीय भागीदारी भी सामने आई है। सऊदी अरब अपने पारंपरिक और सामरिक मित्र अमेरिका की मध्यपूर्व की नीतियों का एकतरफा विरोध नही कर सकता। अत: सऊदी अरब का इसरायल विरोध शब्दों से आगे जाएं,ऐसी कोई संभावना नहीं है,इसके साथ ही सऊदी अरब कोई ऐसा कदम उठाने से भी बचना चाहेगा जिससे उसके कड़े प्रतिद्वंदी ईरान को किसी भी प्रकार से मजबूती मिल सके।  


बहरहाल इसरायल और फ़लस्तीन के विवाद में जटिल संतुलन का सिद्धान्त हावी है। जिसमें राष्ट्र या राष्ट्र समूह एक दूसरे को संतुलित करते है और फिर संतुलनों के भीतर संतुलन होता है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में वैश्विक प्रयासों की बदौलत आधे अधूरे समझौतों पर आधारित शांति एक बार स्थापित हो जाएगी। इस विवाद से विश्व के कई ताकतवर देशों के व्यापक आर्थिक और सामरिक हित संबद्ध है अत: फ़लस्तीन के नए राष्ट्र का सपना पूरा होने की संभावना दूर दूर तक कहीं नजर नहीं आती है।

 

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

 सुबह सवेरे      

    

मसला ये नहीं की दर्द कितना है,मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही है किसी को खबर नहीं लेकिन यह भी हकीकत है की पतवार थामने वाले बेखबर भी नहीं।  दरअसल चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के हाल ही में जो चुनाव परिणाम आएं है वह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के  लिए बहुत निराशाजनक है। यह देखा गया है कि उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत,पूर्व से लेकर पश्चिम तक कांग्रेस विरोधियों से ज्यादा गुटीय राजनीति से परेशान है। आपसी कलह और  अंतर्द्वंद से जूझती कांग्रेस के लिए स्थायी अध्यक्ष का न होना मुश्किलें बढ़ा रहा है और इसका सीधा असर पार्टी के परंपरागत वोटरों पर पड़ा है। जनाधार लगातार खिसकता जा रहा है,कार्यकर्ता हताश हो रहे है,राज्यों की राजनीति क्षेत्रीय नेताओं के हित में उलझ गई है और अंतत: इसका असर चुनावों परिणामों पर भी देखना को मिल रहा है। केंद्र हो या राज्य,कांग्रेस सत्ता से दूर होती जा रही है।


   

नेतृत्व का मसला

राहुल गांधी कहते है की कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव कांग्रेस के कार्यकर्ता करेंगे। लेकिन यह इंतजार बहुत लंबा हो गया है,जिसका खामियाजा पार्टी भोगने को मजबूर है। यह इंतजार जितना लंबा होता जा रहा है उतना ही उसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे है। कांग्रेस का वोट बैंक खिसकता रहा है और अनिर्णय कि स्थिति से क्षुब्ध और प्रभावित नेता पलायन करने को मजबूर हो रहे है। भारत में यह किस्सा मशहूर रहा है की राजनीति का ककहरा सीखना है तो कांग्रेस में आइये और जब मन करें,चले जाइये। आपको कोई रोकेगा नहीं। तीन दशक पहले जब कांग्रेस मजबूत थी तब तक न रोका जाता था,वह चल जाता था। लेकिन अब जब वह मैदान में बने रहने के लिए खुद ही संघर्षरत है,फिर भी कार्यकर्ताओ और नेताओं को न रोक पाना आत्मघाती साबित हो रहा है।    

 



पश्चिम बंगाल में फुरफुरा शरीफ से बेड़ा गर्क करवाया

पिछले विधानसभा चुनावों में 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी का इस बार पश्चिम बंगाल में खाता भी नहीं खुला है जबकि इसकी ज़िम्मेदारी अधीर रंजन चौधरी को दी गई थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय है और मालदा,मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।  राहुल गांधी की सिर्फ दो सभाएं करवाई गई और अब परिणामों से साफ हो गया है की राज्य से कांग्रेस का जनाधार कितनी तेजी से सिमट गया है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी को इस बार सिर्फ़ 3.02 प्रतिशत वोट ही मिल सके,जबकि पिछले चुनावों में पार्टी को यहाँ 12.25 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस ने इस बार के चुनाव लेफ्ट और  एक नए  राजनीतिक संगठन इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इंडियन सेकुलर फ्रंट का संबंध बंगाल की फुरफुरा शरीफ दरगाह से है। इस गठबंधन को लेकर कांग्रेस की खूब आलोचना हुई और उसे सांप्रदायिक बताया गया। चुनाव परिणामों से साफ है की इस गठबंधन पर मुस्लिमों ने भी भरोसा नहीं जताया और कांग्रेस के पास की सारी सीटें भी  चली गई। 


 

असम में बदरुद्दीन के सहारे कश्ती डूबोई

असम की सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी का माहौल बताया जा रहा था,लेकिन कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ से गठबंधन करके अपनी बनती उम्मीदों को ध्वस्त कर दिया। असम में एआईयूडीएफ़ को बंगलादेशी घुसपैठियों का हिमायती माना जाता है और कांग्रेस यह जानने के बाद भी उसके साथ चुनावी मैदान में कूद पड़ी। नतीजा चारो खाने चित्त हो गई और पिछले चुनावों के मुक़ाबले पार्टी का वोट शेयर कम हो गया। घुसपैठियों को लेकर समूची पूर्वोत्तर की राजनीति में उबाल आता रहता है जाहिर है अब कांग्रेस के लिए उत्तर पूर्व की राजनीति की डगर ही मुश्किल में पड़ गई है।

 



केरल में सीएम चेहरा न दे पाने की नाकामी

केरल में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा टूट गई और इसके साथ ही एलडीएफ ने सत्ता बरकरार रखते हुए इतिहास रच दिया। दरअसल कोरोना काल में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की मुस्तैदी और लोगों से सीधा संवाद का तरीका जनता को खूब पसंद आया। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के गठबंधन वाली यूडीएफ ने पिनराई विजयन की लोकप्रियता को नजरअंदाज किया। पिनराई विजयन से मुकाबले के लिए विपक्ष का कोई लोकप्रिय चेहरा मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए जरूरी था। लेकिन केरल कांग्रेस में ओमान चांडी कैंप और रमेश चेन्नीथला कैंप दोनों एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे रहते है और ऐसे में किसी एक चेहरे पर कोई एक फैसला हो ही न सका। अंतत: इसका खामियाजा यही हुआ कि हाथ में आती हुई सत्ता छिटक गई।


  

 तमिलनाडू में जूनियर हैसियत

तमिलनाडु में कांग्रेस ने जीत तो हासिल की है लेकिन वह इस अहम दक्षिण भारत के राज्य में द्रमुक गठबंधन के जूनियर सहयोगी के तौर पर ही पहचानी जाएगी। द्रमुक के साथ कांग्रेस का साथ बहुत पुराना रहा है लेकिन कांग्रेस के स्वयं के बल पर खड़ा करने के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा कांग्रेस के पास नहीं है।   



 

पांडिचेरी में पूराने कांग्रेसियों की सरकार

दक्षिण भारत के छोटे से राज्य पांडिचेरी में कांग्रेस पार्टी का आंतरिक कलह इतना बढ़ गया है की पार्टी का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है।   इस साल की शुरुआत में चार विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस में दरार की शुरुआत मंत्री ए नमास्सिवयम और ई थीप्पैनजान से शुरू हुई। उसके बाद दो और विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी जिसके बाद वी. नारायणसामी की सरकार अल्पमत में आ गई थी। इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक जीत कर आएं है और कांग्रेस को हराने वाले अधिकांश उम्मीदवार कांग्रेस से ही टूट कर आएं है। 


 

 

राज्य स्तर पर टूट को न रोक पाने की कांग्रेस की नाकामी  

मध्यप्रदेश,गुजरात,महाराष्ट्र,तेलंगाना,असम,मिजोरम,नागालैंड से लेकर गोवा तक में कांग्रेस छोड़कर जाने वाले विधायकों की लंबी फेहरिस्त है। इसका एक प्रमुख कारण कांग्रेस के स्थायी अध्यक्ष का न होना रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर एकमत,निर्णय और त्वरित कदम न उठा पाने से देश भर में पार्टी टूट रही है। इसका असर पार्टी की नीतियों और योजनाओं पर भी लगातार पड़ रहा है। संगठनात्मक तौर से पार्टी कैडर खड़ा करने में नाकाम रही है। अधिकांश राज्यों में क्षेत्रीय स्तर पर नेतृत्व का अभाव देखा जा रहा है। नए और युवा नेतृत्व को ज़िम्मेदारी न देने का असर यह हो रहा है की पार्टी जमीनी स्तर पर कमजोर होकर सत्ता से दूर जाती दिख रही है और निकट भविष्य में कोई आस न दिखने पर कार्यकर्ता और नेता पाला बदलने में ही भलाई समझने लगे है।


कई राज्यों में कांग्रेस अभी भी बेहतर स्थिति में है और वहां संगठनात्मक बदलाव से बेहतर रास्ते निकल सकते है। देश और राज्यों में सत्ता से लगातार दूर होती कांग्रेस बूरी तरह से अनिर्णय की स्थिति से जूझती नजर आती है और इससे संकट बढ़ता जा रहा है। क्षेत्रीय दल जिस भी राज्य में विकल्प बने वहां कांग्रेस का लौटना मुश्किल रहा है। जाहिर है कांग्रेस को रीति,नीति,निर्णय और नेतृत्व में अतिशीघ्र बदलाव करना ही होगा नहीं तो इसके अंतिम किले भी ढहने में ज्यादा वक्त न लगेगा। 

 

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खालिस्तान का खेल khalistan panjab rashtriya sahara

  राष्ट्रीय सहारा                                                                                                         रॉकेट प्...