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मई, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

छ्द्मासन,Baba Ramdev IMA

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 पॉलिटिक्सवाला पोस्ट                         दिल्ली के डॉ.अनस मुजाहिद की उम्र महज 26 साल थी। उनकी अभी शादी भी नहीं हुई थी। पिछले साल से लगातार डॉ.अनस कोविड से प्रभावितों का इलाज कर रहे थे , किंतु वे भी दुर्भाग्य से इसके शिकार हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। इस महामारी कि विभीषिका में भारत के विभिन्न इलाकों में काम करने वाले कई डॉक्टर्स की सेवाएं अभिभूत कर देती है , उनका जीवन हर दिन चुनौतियों से घिरा हुआ है। किसी ने दरवाजे   के बाहर खड़े होकर अपनी बेटी का जन्मदिन मनाया तो कई डॉक्टर्स कई महीनों से अस्पताल से अपने घर ही नहीं लौटे है। दिल्ली के ही एक ख्यात डॉक्टर अपनी कार में खड़े होकर माईक से यह अपील करते हुए अक्सर दिखते है कि , लोग बेहद आवश्यक होने पर ही घर से बाहर निकलें और यदि उन्हें खांसी बुखार के लक्षण हो तो बिना परेशान हुए कैसा इलाज करें। ऐसे कई डॉक्टर्स है जो कोविड से प्रभावित लोगों कि लगातार बड़ी संख्या में मौत से दुखी होकर फूट फूट कर रोएं भी होंगे। यह वह जानलेवा और कठिन दौर है जब लोग अपने घरों में कैद है और पड़ोसी के यहां जाने के भी महीनों बीत चूके होंगे। अपने पड़ोस और परिजनों के

राजीव हत्याकांड पर रहम की राजनीति rajiv gandhi murder

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दबंग दुनिया                        भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के 30 साल पूरे होने के 48 घंटे पहले तमिलनाडू के मुख्यमंत्री स्टालिन ने इस हत्याकांड से जुड़े मुख्य दोषी पेरारिवलन को जेल से तीस दिन की छुट्टी देने का आदेश जारी कर दिया। लिबरेशन टाइगर्स तमिल ईलम के पेरारिवलन ने राजीव गांधी की हत्या में उपयोग में लाये गए बेल्ट बम के लिए शिवरासन को 9-बेल्ट बैटरी उपलब्ध करायी थी। 20 वी सदी के इस सबसे सनसनीखेज हत्याकांड पर दुनिया भर की नजर रही है लेकिन भारत में इसके दोषी राजनीतिक प्रश्रय और क्षेत्रीय राजनीति के बूते अब तक जीवित है। दरअसल भारत में एक पूर्व प्रधानमंत्री की निर्मम हत्या से जुड़े दोषियों को उच्च स्तर पर राजनीतिक और कानूनी मदद से बचाव की कोशिशें हैरान करने वाली है।   मुरुगन , संथन और पेरारीवालन की निचली अदालत ने 1997 में और सर्वोच्च अदालत ने 11 मई 1999 को राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी मानते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद साल 2000 में इस मामले में फांसी की सजा पाए दोषियों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर की। यह याचिका साल 2000 और 2005 में तत्काली

भारत का फिलिस्तीन पर दांव India support Palestine in UN

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  राष्ट्रीय सहारा                           अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में कूटनीति का बेहद अहम योगदान होता है जिसके जरिए किसी भी देश के द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति की जाती है। बीसवी सदी के महान कूटनीतिक विचारक हंस मोर्गेंथाऊ ने कहा था कि कूटनीति यह वह कला है जिसके द्वारा राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्वों को अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में उन मामलों में अधिक से अधिक प्रभावशाली रूप में प्रयोग में लाया जाए जो कि हितों में सबसे स्पष्ट रूप से सम्बन्धित हैं। दरअसल इस्राइल और फिलिस्तीन विवाद में भारत ने फिलिस्तीन के पक्ष में आवाज बुलंद करके सभी को हैरत में डाल दिया। ऐसा भी नहीं है कि भारत ने पहली बार फिलिस्तीन का समर्थन किया है , लेकिन भारत में 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह माना जा रहा था कि भारत इस्राइल के साथ खड़ा होगा। इस समय इस्राइल और फिलिस्तीन के बीच गहरा तनाव है और भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को देखते हुए फिलिस्तीन का समर्थन करने से गुरेज नहीं किया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत टीएस तिरूमूर्ति ने कहा कि भारत फिलिस्तीन की जायज़ मांग का समर्थन करता है और

दांव पर येरूशलम israel and palestine

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  जनसत्ता                                                                                                           प्रसिद्ध जर्मन सैन्य विशेषज्ञ क्लाजविट्ज ने कहा था कि राज्य अपनी नीतियों को क्रियान्वित करने के लिए युद्ध का सहारा लेता है। मध्यपूर्व में इसराइल और फ़लस्तीन कि नीतियां बेहद साफ है। इसराइल का अस्तित्व यहूदियों के लिए जीवन मरण का प्रश्न है वहीं फ़लस्तीनी और अरब के नज़रिए से इसराइल का खत्म होना जरूरी है। दुनिया के बेहद अशांत माने जाने वाले मध्यपूर्व के इसराइल और फ़लस्तीन के कई इलाके इस समय दोनों ओर से आक्रामक कार्रवाइयों का सामना कर रहे है जिससे मध्यपूर्व में हिंसा बढ्ने की आशंका गहरा गई है। इस विवाद को दो प्रमुख सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में प्रचारित किया जाता है और इसीलिए   पूरी दुनिया में इसका असर होता है।      पूर्वी भूमध्य सागर के आख़िरी छोर पर स्थित इसराइल उत्तर में लेबनान,उत्तर-पूर्व में सीरिया,पूर्व में जॉर्डन और पश्चिम में मिस्र से घिरा है । 1967 में जब जार्डन , सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुस्लिम देशों ने एक साथ इसराइल पर हमला किया तो उसने पल

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

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  सुबह सवेरे            मसला ये नहीं की दर्द कितना है , मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही है किसी को खबर नहीं लेकिन यह भी हकीकत है की पतवार थामने वाले बेखबर भी नहीं।   दरअसल चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के हाल ही में जो चुनाव परिणाम आएं है वह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के   लिए बहुत निराशाजनक है। यह देखा गया है कि उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत , पूर्व से लेकर पश्चिम तक कांग्रेस विरोधियों से ज्यादा गुटीय राजनीति से परेशान है। आपसी कलह और   अंतर्द्वंद से जूझती कांग्रेस के लिए स्थायी अध्यक्ष का न होना मुश्किलें बढ़ा रहा है और इसका सीधा असर पार्टी के परंपरागत वोटरों पर पड़ा है। जनाधार लगातार खिसकता जा रहा है , कार्यकर्ता हताश हो रहे है , राज्यों की राजनीति क्षेत्रीय नेताओं के हित में उलझ गई है और अंतत: इसका असर चुनावों परिणामों पर भी देखना को मिल रहा है। केंद्र हो या राज्य , कांग्रेस सत्ता से दूर होती जा रही है।       नेतृत्व का मसला राहुल गांधी कहते है की कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव कांग्रेस के कार्यकर्ता करेंगे। लेकिन