शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

यूक्रेन का संकट ukraine rusia

 जनसत्ता


                                         

                                                                                  

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को सोवियत संघ के बिखराव का बड़ा दर्द रहा है। इस बिखराव के तीन दशक बीत चूके है लेकिन अलग हुए देशों की स्वतंत्र नीतियों को लेकर पुतिन अक्सर असहज हो जाते है। यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामक नीतियों में पुतिन की अधिकनायकवादी विचारधारा प्रभावी रही है,जिसके अनुसार रूस के पड़ोसियों की नीतियां रूस के हितों से अलग नहीं हो सकती और जब भी कोई देश ऐसा करने की मंशा दर्शाता है,पुतिन आक्रामक हो जाते है। इस समय रूस यूरोप से लगे अपने पड़ोसी यूक्रेन की सीमा पर अपनी फौजों का जमावड़ा बड़ा रहा है और पुतिन ने साफ कहा है कि यदि यूक्रेन ने अपने देश में रह रहे रूसी समर्थित नागरिकों को निशाना बनाने कि कोशिश की तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। 


दरअसल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन को बनाएं रखने के लिए हस्तक्षेप को एक प्रमुख साधन माना जाता है। यह देखा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रों के महत्वपूर्ण हितों के लिए या तो खतरा  विद्यमान रहता है या खतरा उत्पन्न होने कि संभावना बनी रहती है। इसलिए राष्ट्र उनकी रक्षा के लिए सतत सजग और प्रयत्नशील रहते है। शक्ति संतुलन को बनाएं रखने के लिए विभिन्न राज्यों के साथ गठबंधन अथवा मैत्री संधियों कि नीति एक प्रमुख साधन रही है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के नेतृत्व में सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक हितों के प्रति एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ाने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र  संगठन सीआईएस  का गठन 8 दिसम्बर 1991 को किया गया था जिसे मिंस्क समझौता कहा जाता है। सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये राज्यों की  सीआईएस के अंतर्गत सामूहिक नीतियां बनाई गई। यह संगठन मुख्य रूप से व्यापार,वित्त,कानून निर्माण,सुरक्षा तथा सदस्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने जैसे कार्य करता है। इस संगठन की स्थापना में यूक्रेन का भी अहम योगदान माना जाता है। यूक्रेन सोवियत संघ से अलग हुआ एक बड़ा देश है जो यूरोप में आता है और इसे  सामरिक रूप से एक शक्तिशाली देश माना जाता है। इसका  एक कारण यह भी है कि अविभाजित सोवियत संघ के अधिकांश आणविक केंद्र यूक्रेन में रहे थे अत: यह न केवल रूस के लिए अहम बना रहा बल्कि यूरोपियन देशों की नजर भी इस पर बनी रही। 


 

रूस बनने के बाद देश के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने सीआईएस से संबद्द देशों से आपसी सहमति के आधार पर सम्बन्धों को आगे बढ़ाने की नीति पर काम किया,लेकिन पुतिन युग के प्रारम्भ होते ही स्थितियां बदलने लगी। पुतिन ने रूसी प्रथम की भावना पर काम करते हुए पड़ोसी देशों पर दबाव बढ़ाने की नीति अपनाई। उनके मन में सोवियत संघ के बिखराव को लेकर दर्द तो था ही,अत: यूक्रेन जैसे शक्तिशाली देशों से उनके संबंध खराब होने लगे। इसका व्यापक असर  जल्द सामने आया और यूक्रेन की यूरोप समर्थित नीति खुलकर सामने आ गई। इसमें यूक्रेन की यूरोप के महत्वपूर्ण सहयोगी बनने के साथ ही नाटो का सदस्य बनने की इच्छा शामिल थी। 1949 में स्थापित नाटो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों के मध्य एक सैन्य गठबंधन है जिसका उद्देश्य साम्यवाद और रूस का प्रभाव कम करना रहा है। नाटो सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है,जिसका तात्पर्य एक या अधिक सदस्यों पर आक्रमण सभी सदस्य देशों पर आक्रमण माना जाता है। नाटो की अपनी सेना है जिसमें सभी सदस्य देशों की सेना  की भागीदारी होती है। जब किसी मुद्दे पर राजनीतिक तरीके से समाधान नहीं निकलता है तो फिर उसके लिये  सैन्य ऑपरेशन का विकल्प आजमाया जाता है। अफगानिस्तान,इराक,सीरिया और आईएसआईएस समेत दुनिया के कई भागों में विभिन्न सैन्य अभियानों में नाटो की भागीदारी देखी गई है।


जाहिर है यूक्रेन का नाटो के साथ खड़े होने का संकल्प रूस के लिए संदेह बढ़ाता रहा है और इसी के परिणामस्वरूप क्रीमिया संकट उभर कर सामने आया था।  यह पूर्वी यूरोप  में यूक्रेन का एक स्वशासित अंग था। 2014 को हथियारबंद रूस समर्थकों ने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप में संसद और सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया। यह सब बेहद सुनियोजित तरीके से किया गया जिसका उद्देश्य यूक्रेन को सबक सिखाना नजर आता था। क्रीमिया के आंतरिक हालात का फायदा उठाते हुए पुतिन ने वहां अपनी सेना भेजने में बिल्कुल देर नहीं की। रूस का कहना था की यूक्रेन वहां रहने वाले रूसी मूल के लोगों पर अत्याचार कर रहा है,ऐसे में रूसी मूल के लोगों के हितों की रक्षा करना रूस की जिम्मेदारी है। रूस ने इसके बाद राजनीतिक स्तर पर कदम उठाते हुए अन्य प्रयास करने से भी गुरेज नहीं किया और  क्रीमिया की संसद ने  रूसी संघ  का हिस्सा बनने के पक्ष में मतदान किया। इसी जनमत संग्रह के परिणामों को आधार बनाकर रूस ने यह घोषणा कर दी की अब क्रीमिया रूसी फेडरेशन का हिस्सा बन गया है। इस घटना से यूक्रेन और रूस के बीच तनाव गहरा गया जो बदस्तूर जारी है। रूस यूक्रेन को लेकर आक्रामक कूटनीति का प्रदर्शन करता रहा है और यूक्रेन से द्विपक्षीय संबंध बनाने वाले देशों पर भी दबाव बनाता रहा है।


दूसरी तरफ यूक्रेन के समर्थन में अमेरिका आक्रामक कूटनीति अपनाता रहा है। क्रीमिया के रूस में विलय को लेकर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रूस की कड़ी आलोचना करते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। यूक्रेन का आरोप है कि रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी यूक्रेन को तोड़ने के लिए वहां रह रहे रूसी मूल के लोगों को भड़काने की योजना पर लगातार काम कर रही है। अमेरिका ने इसकी पुष्टि भी की है। इस समय जब यूक्रेन की सीमा पर भारी तनाव है,उसका असर अमेरिका और रूस के सम्बन्धों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। इस साल अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के सत्ता में आने के बाद अमेरिका ने रूस के कई अधिकारियों को देश निकाला दे दिया है,वहीं रूस ने भी कुछ अमेरिका अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए है।  यूक्रेन के समर्थन में अमेरिका ने सामरिक मदद देने कि बात कही है वहीं रूस ने अमेरिका से किसी भी आक्रामक कदम उठाने को लेकर आगाह किया है।


हालांकि पुतिन युग में वैश्विक स्तर पर रूस की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को देखकर लगता है कि यूक्रेन के संकट पर उसका रुख महज क्षेत्रीय प्रभुत्व कायम करने नीति से कहीं आगे बढ़कर है। रूस के राष्ट्रपति के तौर पर ताकतवर बनकर उभरे पुतिन कि अधिकनायकवादी नीतियों को उनके देश में व्यापक समर्थन हासिल है,इसके साथ ही विश्व में रूस के शक्ति प्रदर्शन को रूसी जनता द्वारा लगातार सराहा जा रहा है। इससे उत्साहित पुतिन अमरीका और नाटो को वैश्विक स्तर पर चुनौती देते हुए नजर आ रहे है। इसके साथ ही वे चीन से मिलकर अमेरिका के विरुद्द आर्थिक और सामरिक दबाव बनाने कि नीति पर भी लगातार काम कर रहे है।  यह समर्थन म्यांमार से लेकर ईरान और उत्तर कोरिया तक दिखाई देता है। अमेरिका और यूरोप से विभिन्न कारणों से प्रतिबंधित देश रूस के लिए सामरिक रूप से बड़े बाज़ार बन कर उभरे है। ईरान रूस से व्यापक हथियार खरीद रहा है और ऐसा माना जाता है कि उसके हथियारों को उन्न्त करने और परमाणु केन्द्रों को अत्याधुनिक करने में भी रूस गोपनीय तरीके से मदद कर रहा है।


   

इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक शिखर बैठक करने का भी प्रस्ताव रखा है,अभी इन बैठकों कि तारीख और एजेंडा तय नहीं हुआ है,लेकिन दोनों महाशक्तियों के बीच होने वाली यह बैठक बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। इसमें यूक्रेन को लेकर क्या सहमति बनती है,यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा। पिछले सालों में यूक्रेन ने अपनी सेना को अत्याधुनिक करने के साथ ही अमेरिका से सामरिक सहयोग बढ़ाया है। ऐसे समय में जब मध्य और पूर्वी यूरोप में दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच भू-राजनीतिक मुक़ाबला तेज़ हो रहा है और यूक्रेन पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करने की लगातार कोशिश कर रहा है,ऐसे में रूस पर सामरिक दबाव बनाने के लिए नाटो और अमेरिका के लिए यूक्रेन निर्णायक भूमिका में नजर आता है।  नाटो की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक समुद्री सुरक्षा है। जिसके लिये नाटो ने अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर को केंद्र में रखा है,यहीं नहीं उसके लिए काला सागर सामरिक रूप से बहुत  अहम है जो रूस और यूक्रेन से भी जुड़ा है। नाटो जमीन,आसमान,स्पेस और साइबर चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सेना को अत्याधुनिक बनाने की ओर अग्रसर है,इसमें उसकी सीधी प्रतिद्वंदिता रूस और चीन से है।  काला सागर उत्तर-पूर्व में  रूस  और  यूक्रेन तथा  दक्षिण में तुर्की के बीच स्थित है। पिछले कुछ सालों में तुर्की के  राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन सुर्ख़ियों में  रहे है और उनकी विस्तारवादी नीतियां नाटो देशों के लिए चिंता का सबब बन गई है। तुर्की की सेना लीबिया,सीरिया और अज़रबैजान में जिस प्रकार सक्रिय रही और अर्दोआन ने अपनी विस्तारवादी नीति को बढ़ावा दिया  उसमें उसे कई मर्तबा रूस का समर्थन मिलता रहा है। आर्मेनिया और अज़रबैजान युद्द में तुर्की को रूस का समर्थन मिला और इसी कारण नागोर्नो और काराबाख़ क्षेत्र आर्मेनिया के हाथ से चला गया। अर्दोआन अपनी गनबोट कूटनीति से मुस्लिम राष्ट्रों का समर्थन का सपना देख रहे है और रूस के लिए मुस्लिम देश हथियारों का बड़ा बाज़ार है।


ऐसे में रूस न केवल यूक्रेन पर दबाव डाल रहा है बल्कि अपनी आक्रामक नीतियों से अमेरिका समेत नाटो को यह संदेश भी देने की कोशिश भी कर रहा है की जरूरत पड़ने पर उसे विश्व के कई देशों का समर्थन हासिल होगा। रूस आने वाले समय में यूक्रेन में राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देकर यूरोप के इस देश को अशांत कर सकता है और यहीं महाशक्तियों की नीतियां भी रही है। इस समूचे घटनाक्रम में यह भी साफ हो जाता है कि यूक्रेन की शुरुआती नीतियां नियंत्रण और संतुलन पर आधारित नहीं रही, इस नव राष्ट्र को भू राजनीतिक स्थिति को परखते हुए अपनी वैश्विक स्थिति को धीरे धीरे मजबूत करना था। लेकिन यूक्रेन की रूस से अलग होते ही उसके सामने खड़े होने की जल्दबाज़ी में वह नाटो और रूस के बीच प्रतिद्वंदिता का मैदान बन गया है। यह स्थिति जहां यूक्रेन के लिए घातक साबित हो रही है वहीं  पुतिन के लिए मुफीद है। वे यूक्रेन को तोड़कर उसके क्षेत्रों को रूस में मिलाने की नीति पर काम कर रहे है,इससे पुतिन की लोकप्रियता रूस में अभूतपूर्व तरीके से बढ़ सकती है,जिसे एलेक्‍सी नवलनी प्रकरण से धक्का पहुंचा था। जाहिर है पुतिन यूक्रेन संकट को बनाएं रखना चाहते है और इसका अपने देश में राजनीतिक और  वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक फायदा लेना चाहते है। पुतिन इस प्रकार कि कूटनीति के माहिर खिलाड़ी भी रहे है।


वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन के लिए यूक्रेन संकट का ठीक ढंग से समाधान करना बेहद जरूरी होगा। यदि पुतिन अपने इरादों में सफल हो गए तो इसका असर दक्षिण चीन सागर तक प्रभावित कर सकता है। ऐसे में रूस के प्रमुख सहयोगी के तौर पर उभरें चीन की अधिनायकवादी और आक्रामक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। इससे व्यापक अमेरिकी हित प्रभावित हो सकते है और इससे विश्व शांति के समक्ष नई चुनौतियां भी बढ़ सकती है। 

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