शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

प्रवासी मजदूरों का मानवीय संकट,Pravasi Majdur

 सुबह सवेरे

                                                        

 

खुले आसमान के नीचे जमीन पर एक मजदूर का बच्चा बैठा है। कोविड का संदिग्ध मानकर और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए उस मासूम के चेहरे पर एक कर्मचारी मशीन के तेज प्रेशर से छिड़काव कर रहा है। बच्चा इस कैमिकल से बचने के लिए अपना चेहरा छिपा रहा है। वह उठकर भागने का प्रयास करता है लेकिन मशीन से निकल रहे कैमिकल के प्रेशर से वह नहीं उठ पाता। पिछले साल उत्तर प्रदेश  के लखनऊ में दूसरे राज्यों से आए मजदूरों को सैनिटाइजेशन के नाम पर कैमिकल से नहलाया गया था। ये मजदूर श्रमिक स्पेशल ट्रेन से यहां पहुंचे थे। स्टेशन पर आने के बाद उनके ऊपर मशीन के जरिए प्रेशर से कैमिकल डाला गया। इस दौरान छोटे बच्चों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया था।


दरअसल यह आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की तस्वीर है जहां मजदूर अपनी बेबसी पर हांफते हुए सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल भी चलने के लिए मजबूर है। भारत की राजनीति की यह बदतरीन हकीकत रही है कि यह  जातीयता,धर्म,मंदिर,मस्जिद और क्षेत्रवाद पर केंद्रित होती है,मजदूर इन सबके बीच खो जाते है और अंतत: भूला दिए जाते है।    

न्याय के सिद्धान्त के महान प्रवर्तक जॉन रॉल्स ने न्याय को निष्पक्ष बनाने कि बात कहते हुए अज्ञान के पर्दे का जिक्र किया था। अज्ञान के पर्दे से उनका आशय यह था कि किसी भी व्यक्ति को अपनी विशेष क्षमता और प्रतिभा का ज्ञान  नहीं है। अंतत: मजदूरों की प्राथमिकता रोटी होती है,इसलिए वे सिर्फ उसके लिए सोचते और प्रयास करते है। कुल मिलाकर वे अज्ञान बने रहने में ही बेहतरी समझते है,इसका कारण यह भी होता है कि वे सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर होते है। ऐसे मेन उनकी आवाजों को आसानी से दबा दिया जाता है। पिछले साल भारत में लॉकडाऊन लगने के बाद दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट को प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के रूप में देखा गया था।


 जहां देश के विभिन्न इलाकों में काम करने वाले मजदूरों को उद्योगों और अन्य कामकाजी संस्थाओं से निकाल दिया गया था। देश में यातायात की सेवाओं को रोक दिया गया था और इसलिए लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हो गए थे। इसमें कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपने मासूम बच्चों को कंधे पर उठाकर सैकड़ों किलोमीटर का पैदल सफर तय किया था। इस मानवीय त्रासदी के बीच प्रवासी मजदूरों को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान की सरकारी घोषणा की गई थी।

 

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान  के अंतर्गत उन जिलों को शामिल किया गया था जहां पर वापस लौटे प्रवासी कामगारों की संख्या पच्चीस हजार से ज्यादा थी। यह राज्य बिहार,झारखंड,उड़ीसा,राजस्थान,मध्यप्रदेश तथा उत्तरप्रदेश बताएं गए और इन छह राज्यों के लगभग 116 जिले शामिल किए गए। 20 जून 2020 से 125 दिन की अवधि के लिए मजदूरों को फौरी लाभ देने का वादा किया गया था। उत्तरप्रदेश सरकार ने  एक माइग्रेशन कमीशन गठित कर यह कहा था कि भविष्य में यूपी के कामगार किसी और राज्य में काम करने जाते है तो संबन्धित राज्य को उत्तरप्रदेश की सरकार से अनुमति लेना होगी। जिससे मजदूरों के हितों की रक्षा की जा सके। बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले थे,अत: कथित सुशासन बाबू नीतीश कुमार ने भी मजदूर हितों पर बड़े वादे किए।  इन सबसे प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों को यह आशा बंधी थी कि आने वाले समय में उन्हें स्थानीय रोजगार मिलेगा और सरकार इस पर गंभीरता से विचार करेंगी।


इससे उलट केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं दीर्घकालीन प्रभाव कायम करने वाली हो,ऐसा कभी दिखाई ही नहीं दिया। यदि मजदूर हित सरकार की प्राथमिकताओं में होते तो मजदूरों के लिए बोल्सा फेमिलिया जैसी योजना लागू की जा सकती थी। ब्राज़ील में गरीबी दूर करने के लिए यह योजना आरंभ की गई थी। करीब दो दशक पहले शुरू की गई इस योजना के अच्छे परिणाम हुए। नकदी हस्तांतरण की इस योजना से ब्राज़ील में गरीबी उन्मूलन में बड़ी मदद मिली। यूपी और बिहार में 50 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर अपने अपने गांव लौटे थे। लेकिन   कुछ ही समय के बाद इन्हें वापस रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में लौटना पड़ा। अब इनकी संख्या का पता लगाना भी मुश्किल है।  


यूरोप के 4 बड़े देश इंग्लैंड,फ्रांस,इटली और स्पेन दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत है और इनकी कंपनियों और उद्योगों से करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है। वहीं इन चारों की बराबर आबादी वाला भारत का सबसे बड़ा सूबा उत्तरप्रदेश के लोग रोजगार और रोटी की तलाश में महाराष्ट्र,गुजरात या उत्तर पूर्व जाने को मजबूर है। आत्मनिर्भर भारत की बहुप्रचारित योजना जमीनी प्रभाव कायम करने में बूरी तरह विफल रही है। करीब डेढ़ दशक पहले अस्तित्व में आई महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना को विकास और रचनात्मक कार्यो से जोड़कर इन  प्रवासी मजदूरों का विश्वास अर्जित किया जा सकता था। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक साल के बाद कोरोना महामारी में लॉकडाउन की परेशानियों से आशंकित मजदूर एक बार फिर अपने अपने गांव लौटने को मजबूर हो गए है। जाहिर है एक साल बीत जाने के बाद भी मजदूरों के मानवीय संकट की गंभीरता को समझा ही नहीं  गया।     


 

समकालीन युग में न्याय स्वत: सामाजिक न्याय को सामने लाता है। अमेरिका के नव उदारवादी विचारक राबर्ट नोजिक ने कहा था कि न्याय का आधार पात्रता या योग्यता होना चाहिए। इनके अनुसार वस्तुओं का वितरण व्यक्ति द्वारा समाज के लिए किए गए योगदान के अनुपात मे होना चाहिए। इनके अनुसार,जो व्यक्ति जिस जिस वस्तु का अधिकारी है,उसे उसकी सहमति के बिना दूसरे को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। अन्य राज्यों में काम करने वाले मजदूरों में बहुतायत उन वंचित जातीय समूहों की है,जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े है। ये लोग गांवों या जंगलों में रहते है और यहां पर भौगोलिक संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। विभिन्न सरकारों के विकास के मॉडल जब भी सामने आते है,इसका खामियाजा ये वंचित समूह ही भुगतते है। भौगोलिक संसाधनों का सही वितरण और उपयोग स्थानीय आबादी में किया जाने लगे,तब इससे सबसे ज्यादा लाभान्वित वंचित वर्ग हो सकते है,लेकिन ये कभी लाभ की हिस्सेदारी का भाग ही नहीं समझे जाते।


इनकी चर्चा तब होती है,जब हर साल मानव विकास की वैश्विक रिपोर्ट जारी होती है और उसमें भारत का सामाजिक सूचकांक बदतर स्थिति में सामने आता है। 2020 में वैश्विक सामाजिक गतिशीलता सूचकांक में 82 देशों को शामिल किया गया था जिनमें भारत 76वें स्थान पर है। सूचकांक के अनुसार,भारत में एक गरीब परिवार के सदस्य को औसत आय प्राप्त करने में अभी भी सात पीढ़ियों का समय लगेगा। शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कई मामलों में अफ्रीका के गृह युद्द से जूझने वाले गरीब देशों से भी बदतर है। इसमें सुधार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार श्रमिकों को उनके रोज़गार की स्थिति की परवाह किये बिना समग्र सुरक्षा प्रदान करे। लेकिन प्रवासी मजदूरों कि बेबसी और लाचारी देखकर लगता है कि ये लोग सरकार कि प्राथमिकताओं में है ही नहीं। कोरोना काल में दूसरी बार ये लोग बदहवास होकर अपने घर कि ओर भाग रहे है। लेकिन हकीकत तो यह भी है कि ये लोग अपने उन गांवों की ओर लौट रहे है जहां दो जून रोटी कमाना नामुमकिन है। ऐसे में रोटी कि तलाश में उन्हें वापस उसी अनिश्चित रास्ते पर लौटने को मजबूर होना होगा।


इन सबके बीच नया भारत व्यवस्थागत खामियों,पूंजीवाद को प्रश्रय,समाजवादी ढांचे और विविधता के प्रति संकीर्णता तथा लोकतंत्रात्मक मूल्यों के प्रति गैर जवाबदेही से लोककल्याण कि मूल अवधारणा से दूर होता जा रहा है। ऐसे में इन प्रवासी मजदूरों के हितों की रक्षा की  संभावना भी लगातार धूमिल होती जा रही है।   

 

 

 

 

 

कोई टिप्पणी नहीं:

brahmadeep alune

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

  सुबह सवेरे            मसला ये नहीं की दर्द कितना है , मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही...