शनिवार, 10 अप्रैल 2021

जांबाजों का मनोबल गिरने न पाए,naxsal crpf india

 राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप विशेषांक 





                                                                                                                                     

अपने शहीद जवानों के खून से सने कलश को शौर्य,साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानने वाला सीआरपीएफ को भारत की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा पहरुआ समझा जाता है जिनसे  सुकमा के घने जंगलों समेत पूरे रेड कॉरिडोर में नक्सली खौफ खाते हैये जांबाज़ जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में पृथकतावादी और अलगाववादी संगठनों से मुकाबला करते है और उनके निशाने पर भी होते है नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है,इसका सबसे कठिन पहलू यह है कि यह ऐसी लड़ाई है जिसमें दुश्मन का बहुत कम पता चल पाता है। घने जंगलों की खाक छानते हुए नक्सल विरोधी अभियान का हिस्सा होना बेहद खतरनाक चुनौती होता है। एक बार किसी ऑपरेशन के लिए अपनी बटालियन के साथ रवाना होने के बाद यह पता ही नहीं होता की वापस कब लौटना है। कई बार जंगलों की खाक  छानते हुए 10-10 दिन तक हो जाते है। इस दौरान कड़ी सतर्कता के साथ सावधानी रखना होता है। कोबरा बटालियन के एक अधिकारी ने बताया,माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन पर जाते  हुए हम अपना सामान इकट्ठा कर कैंप में रख कर जाते थे और साथ में एक चिट्ठी भी छोड़ कर जाते थे की यदि मै लौट न पाया तो चिट्टी और सारा सामान हमारे घर तक पहुंचा दिया जाएँ।” वापस जिंदा न लौट पाने की आशंका के साथ माओवादियों का मुकाबला करना इन क्षेत्रों में काम करने वाले सुरक्षा और पुलिस जवानों की हकीकत मानी जाती है। ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को अपने परिवार से बात करने की मनाही होती है और आमतौर पर इस अनुशासन का पालन सभी के द्वारा किया जाता है।


माओवाद के प्रभाव वाले इलाकों में सुरक्षाबलों को बेहद विषम परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और ऐसे में उनके लिए स्वयं का मनोबल बनाएं रखना बेहद कठिन होता है।  महज साठ दिनों की छुट्टी हर साल मिलती है और विपरीत परिस्थितियों में वह कम या रद्द भी हो सकती है देश के अंदर भारतीय सेना जैसी चुनौतियों का सामना करने के बाद भी सीआरपीएफ़ अत्याधुनिक हथियारों की कमी,सैन्य साजो सामान का अभाव,मूलभूत सुविधाओं की कमी और उच्च स्तर के सेवा लाभों से महरूम हैरणक्षेत्र में सेवा के दौरान और मारे जाने के बाद भी इन जांबाजों को सेना के सभी लाभ नहीं मिल पाते,यहीं नहीं अफ़सोस उन्हें शहीद का दर्जा भी नहीं दिया जाता सातवें वेतन आयोग की सिफारिश स्वीकार कर अर्द्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा देने की केंद्र की घोषणा अभी तक साकार रूप नहीं ले सकी है। कैंटीन की सुविधा उस प्रकार नहीं मिलती जैसे आर्मी को मिलती है,उन्हें पेंशन की सुविधा भी नहीं है। जो सामान मंगाते है,उस पर जीएसटी देने को मजबूर है।  इनकम टैक्स में कोई  विशेष छूट नहीं और इन सबके साथ नक्सलियों से अग्रिम मोर्चों पर लड़ने को तत्पर और तैयार रहना पड़ता है नक्सली क्षेत्रों में काम करने वाले अन्य बलों के भी सीआरपीएफ़ जैसे ही हालात है


 

इन सबके बीच यह कडवी हकीकत है कि तमाम प्रशिक्षण के बाद भी जंगलों की जानकारी सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर नक्सलियों को होती है। वे स्थानीय परिवेश में घुले मिले होते है तथा इन परिस्थितियों का फायदा भी वे खूब उठाते है,जिससे सुरक्षाबलों को ज्यादा नुकसान होने की आशंका बनी रहती है माओवादियों और अन्य लोगों में पहचान कर पाना भी मुश्किल होता है सुरक्षा एजेंसियों के पास माओवादियों के कई नेताओं और उनके सहयोगियों की कोई पुख्ता जानकारी नहीं  होती कि वे  कौन हैं और किन इलाक़ों में रहते हैंऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते है जब जंगल में किसी के पास हथियार हो,अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है

घने जंगलों से गुजरते हुए सुरक्षा बल हमेशा सावधान रहते है की उन पर किसी की भी नजर न पड़ेमाओवादी आदिवासियों की गरीबी का फायदा उठाकर  उन्हें विकास से दूर रखे हुए हैसुरक्षाबल सभी की नजरों से बचने के लिए रात में पैदल सफर करते है जबकि दिन में उनके लिए छूपना ज्यादा बेहतर रहता हैखासतौर पर माओवादी गुरिल्ला पद्धति से युद्द करते है,जिसमे छूपकर तथा घात लगाकर हमला किया जाता है कोबरा बटालियन भी इसी पद्धति पर काम करना पसंद करती हैबदलते दौर में आधुनिक संचार के साधनों के आने से सुरक्षा बल अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सम्पर्क में रह पाना काफी हद तक संभव हुआ है लेकिन कुछ  सालों पहले हालात ऐसे नहीं थे। कुछ वर्षों पहले एक बार घने वन में प्रवेश करने के बाद सभी से सम्पर्क टूट जाते थे


माओवादी एम्बुश लगाकर सुरक्षा बलों को घेर लेते है और इसके बाद  चारों और से हमला करते है,जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सकेइस दौरान नक्सली बेहद घातक हथियारों का इस्तेमाल करते है और सुरक्षा बलों के लिए उनका सामना करना  बेहद मुश्किल होता हैखासकर बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर लड़ना नक्सली इलाकों में मुश्किल होता हैजम्मू कश्मीर जैसे इलाकों में आंतरिक शांति के लिए तुरत फुरत कार्रवाई करनी होती है जबकि नक्सली इलाकों में कब इसकी जरूरत पड़ेगी,यह भी पता नहीं होताबुलेट प्रूफ जैकेट का वजन करीब 4 किलो होता है और कड़े मौसम से इसे पहनकर कर रखना मुश्किल हो जाता है खासकर तब जबकि सुरक्षाबलों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। नक्सली इलाकों में आपरेशन शुरू होने का कोई निश्चित समय भी नहीं होता अत: सुरक्षा बल बिना बुलेट प्रूफ जैकेट के ही लड़ते है और इसीलिए हताहतों की संख्या बढ़ जाती है


छत्तीसगढ़ को नक्सल हमलों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है और यहां पर काम करने के दौरान सुरक्षाबलों के अनुभव बेहद भयावह होते है यहां के कयी इलाकों में इतनी गरीबी है कि महज दस रूपये देकर बच्चों से भी नक्सली लैंड माईन के धमाके करवा देते हैसीआरपीएफ के अधिकारी  कंधे पर बैच  लगाकर ऑपरेशन नहीं करते क्योंकि ऐसे में नक्सलियों के लिए वे पहला निशाना बन सकते है नक्सली हमलों में यह भी देखा गया है कि इसमें महिलाओं की भी बड़ी भूमिका होती हैवहीं ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों में महिलाओं का होना ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता हैनक्सली महिलाओं को लेकर सुरक्षाबलों के सामने कठिन चुनौती होती हैमध्य प्रदेश,छतीसगढ़ और महाराष्ट्र से लगे बालाघाट और आसपास कई महिला नक्सली काम कर रही है। नक्सलियों की पहचान दलम से होती है और बालाघाट के इलाके में इनका संगठन एमएमसी के नाम से जाना जाता है एम  का अर्थ मध्यप्रदेश,एम से महाराष्ट्र और सी से छतीसगढ़ होता है अभी बालाघाट इलाके में मलाजखंड दलम, टांडा दलम और दर्रे कसा दलम कार्य करते हैहर दलम में महिलाएं होती है,इन्हें सामाजिक न्याय के नाम पर इतना भ्रमित किया जाता है कि वे शोषण को भी समूह के प्रति सेवा का अनिवार्य हिस्सा समझने लगती है ऐसे में सुरक्षाबलों के लिए सावधानी रखने के साथ ही मानवीय पक्ष का पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है और अक्सर यह जानलेवा भी होता है


माओवादी प्रभाव के लिए कुख्यात रेड कॉरिडोर भौगोलिक जटिलताओं का क्षेत्र है। नेपाल से शुरू होकर भारत के कई राज्यों के सीमांत क्षेत्रों से गुजरने वाला यह इलाका गरीबी और पिछड़ेपन से अभिशिप्त है। इसमें से अधिकांश इलाकों में घने जंगल है,जहां माओवादी छूपे होते है और नक्सल विरोधी अभियानों से जुड़े सुरक्षाबलों की समस्या यहीं से गहरा जाती है। आंध्रप्रदेश में ग्रे-हाउंड्स की सफलता से उत्साहित केंद्र सरकार ने 2008 में स्पेशल एक्शन फ़ोर्स की स्थापना की जिसे कोबरा बटालियन नाम दिया गया। इसके लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जांबाज़ जवानों को तरजीह दी गई। कड़े परीक्षण के बाद 150 जवानों का चयन किया गया और इन्हें बाद भी कठिन हालातों में रहने का प्रशिक्षण दिया गया। शुरूआती दौर में इनकी उम्र 35 साल से कम हो यह विशेष रूप से ध्यान रखा गया। इसके पीछे यह कारण बताया गया की जंगल की कठिन परिस्थितियों में ज्यादा  ऊर्जा से भरपूर युवा ही बेहतर काम कर सकते है


लेकिन अब हालात भी बदले है और सुरक्षा की चुनौतियां ज्यादा बढ़ गई है। इस समय नक्सली विरोधी ऑपरेशन में उन सभी को भाग लेना होता है जो बटालियन के सदस्य हो। ऑपरेशन के लंबा खींचने के दौरान 40 साल या इससे ज्यादा के जवान युवाओं के मुकाबले जल्दी  थक  जाते है और माओवादी अक्सर लौटते हुए जवानों को ही निशाना बनाते है। बहरहाल नक्सली इलाकों में काम करने वाले अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस को सेना की तरह सेवा और सामरिक सुविधाओं को देने की जरूरत है,जिससे न केवल इन जवानों का मनोबल ऊँचा बना रहे बल्कि वे माओवाद पर नकेल कसने के लिए और बेहतर तथा कारगर उपाय भी कर सके।

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