गुरुवार, 8 अप्रैल 2021

माओवादियों से निपटने की नीति,maovad india

 

जनसत्ता                                                                                                      

                                                                         


छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर के जंगलों में माओवादी हमले में सुरक्षाबलों के 22 जवानों के मारे जाने से इन क्षेत्रों में माओवाद के प्रभाव के कमजोर पड़ने के सरकारी दावों की सच्चाई भयावह रूप में सामने आ गई है,वहीं आंतरिक सुरक्षा के लिए इस बड़ी समस्या से निपटने की नीति भी सवालों में है। दरअसल नेपाल से शुरू होकर देश के कई राज्यों की भौगोलिक जटिलताओं से गुजरने वाला रास्ता जिसे लाल गलियारा भी कहते है,माओवादियों के लिए कई कारणों से सुरक्षित पनाहगाह है। सीमाई इलाकों की सामाजिक और आर्थिक विषमताएं विद्रोह पनपने का मजबूत आधार बनती है। वहीं जातीय संरचना,पिछड़ापन,गरीबी,अशिक्षा और सामन्तवाद से संतप्त समूहों को लामबंद करके वैधानिक व्यवस्था को चुनौती मिलने की आशंकाएं बढ़ जाती है। नक्सलियों ने बुनियादी रूप से पिछड़े हुए सुदूरवर्ती और भौगोलिक रूप से कटे इलाकों पर अपना प्रभाव कायम किया हुआ है पिछले पांच दशकों से नक्सलवाद की विध्वंसकारी नीतियों को झेल रहा देश अब तक कोई ऐसी बहुआयामी मिश्रित रणनीति अपनाने में नाकाम रहा है जिससे आंतरिक शांति कायम करने में महती सफलता मिल सके।


पिछड़े इलाकों में विकास के लिए माओवादियों से बातचीत की जरूरत है, वे इन इलाकों में विकास को अवरुद्ध कर अपनी समांतर सत्ता स्थापित किए हुए है। इसे  स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन ओर ज्यादा घातक बना देता है। आदिवासी युवाओं के पिछड़ेपन के कारण उनके दिग्भ्रमित होने और उनके द्वारा हिंसक रास्ते को अपनाने की आशंका बढ़ जाती है। माओवाद के इस अभियान को महज जंगल या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। नक्सलवादी होने का आरोप कई बार ऐसे लोग झेलने को मजबूर होते है जो शांतिप्रिय जीवन जीना चाहते है। वे जंगल में रहकर माओवादियों की समांतर सत्ता के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते,अत: उन्हें मजबूरी में नक्सलवादी समूहों का हिस्सा बनने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे लोगों को नक्सलवादियों के चंगुल से आज़ाद करवाने की नीतियां प्रभावी नहीं  हो सकी है। आदिवासी इलाकों में गरीबी और रोजगार का बड़ा संकट रहा है, यह स्थिति माओवादी शक्तियों को मजबूत करने के लिए काफी है।



माओवाद से निपटने की नीतियों में आमतौर पर सुरक्षात्मक कदमों पर फोकस किया जाता है। नक्सलवादी समूहों में स्थानीय लोग शामिल होते है अत: इसके लिए सैन्य विकल्प को ज्यादा तरजीह देना समस्या को बढ़ाता रहा है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स इन कार्रवाइयों में अग्रणी भूमिका में होती है। स्थानीय परिस्थितियों,भाषा,रीति रिवाज और नक्सलियों की पहचान न कर पाने की कमियां न केवल आंतरिक संघर्ष को बढ़ा रही है बल्कि इससे लगातार बड़ी संख्या में सुरक्षाबल हताहत भी हो रहे है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा के दुर्गम जंगलों में एसटीएफ,सीआरपीएफ,डीआरजी औऱ कोबरा बटालियन के लगभग दो हज़ार जवानों के नक्सल विरोधी साझा अभियान में कई ऐसी रणनीतिक खामियां सामने आई है जिसकी कीमत कई जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ीछत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों बीजापुर,नारायणपुर  और दंतेवाड़ा के करीब 4 हजार किलोमीटर क्षेत्र में घने जंगल है।  सुकमा की सरहद आंध्रप्रदेश और ओडिशा से मिलती है,यह माओवादियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन का सुगम  रास्ता है। पुलिस के पास इस बात की जानकारी थी कि कुख्यात और इनामी नक्सली हिड़मा और उसकी पूरी टीम इस इलाके में मौजूद हैपुलिस  ने हिड़मा और उसके साथियों की तलाश में घने जंगलों में व्यापक तलाशी अभियान चलाया लेकिन यहां किसी भी माओवादी का पता नहीं चला। नक्सली इलाके में रास्तों को लेकर सुरक्षाबल बेहद सावधानी का प्रयोग करते है अत: उन्होंने बीजापुर के बासागुड़ा रोड पर वह रास्ता चुना जो बंद माना जाता है और यहीं पर नक्सलियों ने  सुरक्षाबलों पर चारों और से हमला कर दियाइसको लेकर नक्सली पहले ही तैयारी कर चुके थे,उन्होंने आसपास के जंगलों में पोजीशन ले रखी थी और  गांवों को खाली करवा लिया था 


माओवादी एम्बुश का इस्तेमाल कर पूरी बटालियन को चारो और से घेर लेते है और सुकमा में एक बार फिर यही देखा गया। नक्सली इलाकों को लेकर यह साफ है की सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर तैयारी और जानकारी जंगलों की नक्सलियों को होती हैगुप्तचर एजेंसियों के पास माओवादियों के कई नेताओं की कोई जानकारी नहीं हैउन्हें ये भी नहीं पता कि उनके नेता और सदस्य कौन हैं और किन इलाक़ों में रहते हैंऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते है जब जंगल में किसी के पास हथियार हो,अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है। यहां यह तथ्य भी उभर कर आता है कि  विभिन्न एजेंसियों के साझा अभियान को अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं होता। अलग अलग ट्रूप्स की अपनी कमांड होती है और माओवादी हमलें से अप्रत्याशित परिस्थितियां उत्पन्न होने  पर समन्वय भंग होने की आशंका बढ़ जाती है 

देश में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र स्थापित करने और एनआईए  जैसी जाँच एजेंसी का प्रावधान तो किया गया है लेकिन नक्सलवाद पर अभी तक ऐसी कोई रणनीति नहीं बन सकी है।   एसटीएफ, सीआरपीएफ, डीआरजी औऱ कोबरा बटालियन के साझा खोजी अभियान के पहले गुप्तचर एजेंसियां नाकाम रहीजिस गांव में पहले से ही ताले लगे थे और नक्सली घरों के अंदर छुपे थे,इस योजना का पता न  कर पाना सुरक्षाबलों के लिए जानलेवा साबित हुआमार्च से लेकर मई तक खेती का समय नहीं होता,इसीलिए नक्सली केडर की भर्ती का यह मुफीद समय माना जाता है।  ऐसी जानकारियां सामने आई है की नक्सलियों के बड़े नेता कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को अपने अभियान से जोड़ते है।  सुरक्षा एजेंसियां इस दौरान बड़े अभियानों की योजना बनाती है जिससे ज्यादा संख्या में माओवादियों को पकड़ा जा सके लेकिन भयावह  हकीकत यह है कि इन्हीं महीनों में ही नक्सली सुरक्षाबलों को बड़ा नुकसान पहुँचाने में कामयाब हो जाते है।


केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स भारत की सबसे बड़ी आर्म्ड पुलिस फोर्स है। यह पुलिस फोर्स भारत के केन्द्रीय  गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होती है। जंगल में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान नक्सलियों के लिए ओपन टारगेट होते है,जबकि जंगल में रहने वालों की पहचान करने और नक्सलियों को पहचानने के लिए स्थानीय पुलिस बेहतर तरीके से काम कर सकती है। नक्सल विरोधी फ्रंटलाइन फोर्स डीआरजी में अधिकतर स्थानीय युवा भर्ती किए जाते हैं, जिनमें नक्सली संगठनों को छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले युवा होते हैं।  स्थानीय होने का उन्हें फायदा मिलता है वे स्थानीय लोगों में आसानी से घुल मिल सकते है तथा  पूर्व नक्सली होने के चलते उनके तौर-तरीकों की जानकार होते है वे भौगोलिक और सामाजिक जानकारियों का फायदा उठाकर छिपकर निगरानी में सक्षम भी होते है जाहिर है माओवादी इलाकों में डीआरजी जैसे स्थानीय बलों को ज्यादा तरजीह देने और उन पर निर्भरता बढ़ाने की जरूरत है 


1967 में ही ऑल इंडिया कमेटी ऑन कम्यूनिस्ट रिवोल्यूशनरी का गठन किया गया था जिसमें पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,आंध्रा,तमिलनाडु,उत्तरप्रदेश,केरल और जम्मू कश्मीर के नेता शामिल हुए थे और उन्होंने संगठन को मजबूत करने,सशस्त्र संघर्ष चलाने तथा गैर संसदीय मार्ग अपनाने का निर्णय लिया था। इससे यह साफ था कि वंचितों,गरीबों और शोषितों के हितों के नाम पर स्थापित संगठन ने लोकतंत्र की वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए हिंसक और अलोकतांत्रिक रास्ता चुना। लोकतांत्रिक देश में जहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए व्यापक संविधानिक उपाय है,वहां आश्चर्यजनक रूप से माओवाद को मजबूत करने में बड़ी भूमिका स्थानीय राजनीति की भी रही है। यह देखा गया है कि राजनीतिक दल स्थानीय स्तर पर सत्ता हासिल करने के लिए नक्सलियों का समर्थन हासिल करने से भी आमतौर पर परहेज नहीं करते  है और यह समस्या को ज्यादा गंभीर बनाता है। बिहार के लंबे समय तक नक्सलग्रस्त सन्देश प्रखंड का मॉडल पूरे देश में अपनाने की जरूरत है। इस इलाके में नक्सलियों का प्रभाव खत्म करने के लिए पंचायत चुनावों का सहारा लिया गया,जिसमें अधिकतर मुखिया माओवादी चुने गए। लेकिन समय के साथ विकेंद्रीकरण का फायदा जनता को मिला और लोगों का मोह माओवादियों से भंग हो गया।  इस समय यह इलाका माओवाद के प्रभाव से मुक्त है। इससे साफ है कि राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को मजबूत करने और छत्तीसगढ़ समेत देश के माओवाद ग्रस्त अन्य इलाकों में राजनीतिक दलों को अपना केडर बढ़ाने की जरूरत है। जिससे लोकतांत्रिक सहभागिता बढ़ सके और माओवादी शक्तियों की समांतर सत्ता को कमजोर किया जा सके। माओवादी को आदिवासियों के पिछड़ेपन और अशिक्षा का  खूब फायदा  मिलता है। वे रणनीतिक रूप से जंगल के इलाकों में विकास कार्य होने नहीं देना चाहते। सड़क,स्वास्थ्य सेवाओं और स्कूल से दूर गरीब नौनिहालों पर नक्सलवादियों की नजर होती है और उनका कम उम्र से ही ब्रेन वाश कर दिया जाता है। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास के कार्य होने से युवाओं को नक्सलियों से जुड़ने से रोकने में मदद मिल सकती है। विकेन्द्रीकरण और लोकतंत्र सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में समन्वित प्रयासों की जरूरत है।


यूपीए शासनकाल में नक्सलियों पर त्वरित कार्रवाई और उन्हें समाप्त करने के लिए  के लिए  'इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान भी बनाया गया जिसे ख़त्म करके वर्तमान सरकार ने 'सिक्योरिटी रिलेटेड एक्स्पेंडीचर' यानी एसआरई योजना पर  फोकस किया हैइस योजना के तहत नक्सल विरोधी अभियान और नक्सल प्रभावित इलाक़ों के लिए संचार माध्यमों को विकसित करने और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए भत्ते का प्रयोजन किया गया हैयह भत्ता केंद्र सरकार राज्यों को देती हैइसके तहत नक्सल प्रभावित इलाक़ों में तैनात सुरक्षा बलों और थानों के लिए भी धन का आवंटन किया जाता है

दरअसल केंद्र और राज्य में अलग अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने का असर नक्सलवाद से निपटने के तरीकों को भी प्रभावित करता है। छत्तीसगढ़ के माओवादी मांग करते रहे है की बस्तर से सुरक्षाबलों के कैम्प हटायें  जाएं और माओवादी नेताओं को रिहा कर दिया जाएं राज्य सरकार कहती है कि माओवादी पहले हथियार छोड़ें,फिर बातचीत की  पहल करें जबकि राज्य सरकारों को इस सम्बन्ध में दोहरी रणनीति पर काम करने की जरूरत है बातचीत के विकल्प खोलने से नक्सलियों की पहचान करने में सुगमता हो सकती है 


2017 में माओवादी हिंसा से प्रभावित दस राज्यों में एकीकृत कमान के गठन की पहल करते हुए सभी राज्यों की साझा रणनीति बनाकर एक आठ सूत्रीय समाधान तैयार किया गया था। इसके अंतर्गत कुशल नेतृत्व,आक्रामक रणनीति,अभिप्रेरणा  और प्रशिक्षण,कारगर ख़ुफ़िया तंत्र,कार्य योजना के मानक,कारगर प्रौद्योगिकी,प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना और वामपंथी आतंकियों के वित्त पोषण को विफल करने की रणनीति को शामिल करने की जरूरत बताई गई थी। वास्तव में नक्सलवाद से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस,स्थानीय शासन,स्थानीय लोग,स्थानीय परिवेश और स्थानीय राजनीति में समन्वय स्थापित करने और स्थानीय व्यवस्थाओं को बेहतर करने की ज्यादा जरूरत है 

 

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