बुधवार, 21 अप्रैल 2021

अफगानिस्तान पर असमंजस आत्मघाती,afganstan india

 राष्ट्रीय सहारा   

                        


इतिहास को भुलाकर गहरी रणनीति के विचार को आगे लाने का अवसर एक बार फिर भारत के सामने है। करीब चार दशक से राजनीतिक अराजकता,अस्थायित्व,आतंकवाद,आंतरिक गतिरोध और वैश्विक हस्तक्षेप से जूझते अफगानिस्तान का भविष्य अनिश्चितता कि ओर बढ़ रहा है। इस समय दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश और अफगानिस्तान के पारंपरिक मित्र भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होना चाहिए,लेकिन कूटनीतिक हलकों में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अफगानिस्तान को लेकर हो रही बातचीत या महाशक्तियों के फैसलों में भारतीय हित नदारद है। 



दरअसल दो दशक से अफगानिस्तान में तालिबान को उखाड़ फेंकने की तमाम कोशिशों में नाकाम रहने के बाद  अमेरिकी सेना वहां से जाने को तैयार है और इस प्रकार एक बार फिर इस दक्षिण एशियाई देश में तालिबान का कथित इस्लामी शासन  कायम होने का खतरा मंडरा गया है। पाकिस्तान के पूर्व सैनिक तानाशाह जनरल मुशर्रफ कहा करते थे कि वे पाकिस्तान को एक उदारवादी देश बनाने के लिए प्रतिबद्ध है,तालिबान भी विश्व समुदाय यह भरोसा दिला रहा है कि वे अफगानिस्तान में आतंकवाद को नहीं पनपने देंगे और इस देश को एक उदार देश बनाएँगे। पाकिस्तान में कथित लोकतंत्र होने के बाद भी यह देश उदार नहीं हो पाया,फिर धार्मिक उन्माद के आधार पर स्थापित तालिबान पर वैश्विक समुदाय कैसे भरोसा कर सकता है,यह आश्चर्यजनक है। वहीं भारत अफगानिस्तान को लेकर बदलते घटनाक्रम पर अब तक खामोश है और यह ठीक तीन दशक पहले की उस भारतीय कूटनीति कि याद दिला रहा है जब भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने रुको और देखों की नीति अपनाई थी और इसके दूरगामी परिणाम बेहद नुकसानदेह साबित हुए है। वे अफगानिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति नजीबुल्ला को भारत में शरण देने को लेकर चार साल तक असमंजस में रहे। इस कारण नजीबुल्ला अपने ही देश में फंसे रहे और उन्हें भारतीय दूतावास के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र संघ के दफ्तर में रहने को मजबूर होना पड़ा। अंतत: 27 सितंबर,1996 को अफगानिस्तान स्थित यूएनओ के दफ़्तर में घुसकर  नजीबुल्लाह को तालिबान के लड़ाकों ने खींच कर उनके कमरे से निकाला और सिर में गोली मार कर राजमहल के नज़दीक के लैंप पोस्ट से टांग दिया था। नजीबुल्ला की हत्या के बाद अफगानिस्तान ने तालिबान का बर्बर शासन देखा। तालिबान को पाकिस्तान की खुफियाँ एजेंसी आईएसआई का शिशु माना जाता है। अफगानिस्तान में कश्मीर चरमपंथियों को व्यापक प्रशिक्षण दिये गए,इससे कश्मीर में आतंकवाद का सबसे बुरा दौर देखा गया। 1999 में भारतीय विमान का अपहरण कर उसे कांधार ले जाया गया। भारत की अटलबिहारी सरकार ने इसके बदले कई कुख्यात आतंकवादी छोड़े और इन्हें लेकर भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंतसिंह स्वयं कांधार गए। इस समूचे घटनाक्रम में भारत की छवि एक कमजोर देश के रूप में उभर कर सामने आई थी।


2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद तालिबान कमजोर हुआ है और सामरिक रूप से इसका सीधा लाभ भारत को मिला है। यह भी देखा गया है कि अफगानिस्तान के लोग भारत को पसंद करते है और वे इस देश के भविष्य निर्धारण में भारत की बड़ी भूमिका भी देखना चाहते है।   

अफ़गानिस्तान में इस समय बैंकिंग,सुरक्षा और आईटी सेक्टर की कंपनियों के अलावा अस्पतालों को स्थापित करने में भारत की बड़ी भूमिका है और कृषि, विज्ञान,आईटी और शरणार्थी पुनर्वास के कार्यक्रमों में भी वह सहयोग दे रहा है। ईरान के चाबहार बंदरगाह से अफ़गान सीमा तक रेल चलाने की भारत की योजना है और इससे भारत यूरोप तक पहुँच सकता है। इसे चीन की वन बेल्ट योजना के प्रभाव को रोकने के तौर पर भी देखा जाता है।


अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी पाकिस्तान के लिए हमेशा चिंता का विषय रही है। अफगानिस्तान से भारत और पाकिस्तान के सम्बन्धों की जटिलता पर बेनज़ीर भुट्टों ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि,अफगानिस्तान का पाकिस्तान से एक लंबे समय से सीमा रेखा डूरन्ड लाइन को लेकर झगड़ा रहा है। इसके अलावा पख्तून लोगों ने 1947 में हिंदुस्तान के बँटवारे के समय,पाकिस्तान बनाने कि बड़ी खिलाफत की थी। अफगानी लोग खुद को हिंदुस्तान से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते है,उन्हें पाकिस्तान पक्ष से असुरक्षा का भाव रहता है।


अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच डूरन्ड रेखा को लेकर विवाद है। दोनों देशों के बीच इसी रेखा को सीमा निर्धारण का आधार माना जाता है। अफगानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकारें पाकिस्तान को चुनौती देती रही है जबकि तालिबान को लेकर स्थिति अलग है।  तालिबान पाकिस्तान की सेना के नियंत्रण में है और तालिबान के नेता और उनके परिवार पाकिस्तान के शहरों में रहकर यहां सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।  जाहिर है अफगानिस्तान में तालिबान का शासन पाकिस्तान के लिए मुफीद है और इसीलिए उसने अफगानिस्तान में शांति स्थापित होने,लोकतंत्र कायम होने और तालिबान को खत्म करने के वैश्विक प्रयासों को कभी सफल होने ही नहीं दिया है। इसके साथ ही तालिबान को अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति और पाकिस्तान तथा चीन के सामरिक,राजनीतिक और आर्थिक सहयोग का बड़ा फायदा मिलता रहा है। अफगानिस्तान के घने और ठंडे पर्वतीय प्रदेश,ऊंची ऊंची घाटियां,ऊबड़ खाबड़ रास्ते तालिबान और मुजाहिदीनों के  लिए सुरक्षित पनाहगह माने जाते है। इस देश के अधिकांश क्षेत्रों में घात लगाकर हमला करने में ज्यादा सफलता मिलती है। 1979 में तत्कालीन समय की विश्व की श्रेष्ठ सोवियत संघ की सेना के विरुद्द मुजाहिदीनों को सफलता मिलने का प्रमुख कारण यहीं था की इन आतंकवादी समूहों की छोटी मोटी टुकड़ियों ने गुरिल्ला पद्धति से अपने से अधिक सुसज्जित नियमित सेना के विरुद्द कम से कम क्षति उठाकर उन पर श्रेष्ठता स्थापित कर ली। पिछले दो दशकों से अमेरिकी सेना को भी इस कठिन स्थिति का सामना करना पड़ा। हालांकि अमेरिका और नैटो सेना ने हवाई हमलों और सेटेलाइट का व्यापक उपयोग कर अत्याधुनिक तरीके से तालिबान को गहरी क्षति पहुंचाई। ऐसे में अमरीका की हवाई शक्ति के बिना अफ़ग़ान सेना का कोई भविष्य दूर दूर तक नजर नहीं आता है और अमेरिका के वहां से जाते ही तालिबान स्थापित सरकार को खत्म करके फिर से शासन पर काबिज हो जाएगा,इसकी पूरी संभावना है।


इस समय अफगानिस्तान में चीन की दिलचस्पी काफी हद तक बढ़ गई है और पाकिस्तान चीन की  महात्वंकांक्षी वन बेल्ट परियोजना में शामिल करने के लिए अफगानिस्तान पर लगातार दबाव बना रहा है। भारत इस परियोजना का बड़ा विरोधी रहा है और इसमें अफगानिस्तान के शामिल होने से यह सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण ही होगा।  इसके साथ ही इस्लामिक स्टेट भी अफगानिस्तान के कई इलाकों में प्रभावी है। तालिबान के प्रभाव में आते ही यह देश फिर आंतरिक अशांति का सामना करेगा और इससे इस्लामिक स्टेट मजबूत होगा,जिसके दूरगामी परिणाम भारत समेत पूरी दुनिया के लिए घातक हो सकते है।


अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी देश में लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना चाहते है जबकि उन पर यह वैश्विक दबाव बढ़ रहा है कि वो तालिबान को सत्ता में लाएं और एक संभावित गृहयुद्ध की ओर जाने से बचें। भारत को यह समझना होगा कि तालिबान का अफगानिस्तान की सत्ता में काबिज होने से कश्मीर में आतंकवाद  पुन: उभर सकता है। जाहिर है भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक चुनाव और लोकतांत्रिक सरकार के पक्ष में आवाज बुलंद करना चाहिए।

 

 

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