सोमवार, 19 अप्रैल 2021

भीड़तंत्र की मूर्खता की पराकाष्ठा bhidtantra india

 दबंग दुनिया


                    

गौतम बुद्ध राजघराने से जुड़े थे और उन्हें सत्ता के अवगुणों का बेहतर ज्ञान था। वे सत्ता के अहम में डूबे राजा और उनकी राजनीति को दुखद विज्ञान कहते थे। लगभग डेढ़ हजार साल पहले  दिए गए बुद्द के ये राजनीतिक विचार भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान प्रयोगशाला में राजनीति के स्तर और उसके अंतिम लक्ष्य को चित्रित करने के लिए काफी है।  बुद्द ने आगे कहा था कि सत्ता का लोभ राजा के लिए सबसे प्रिय होता है और राजनीति ऐसी चीज़ है जो अपने माता पिता के हनन को भी जायज ठहरा देती है। अत: राजनीति दारुण दुख का विज्ञान है।


दरअसल भारत के विकास के परम वैभव को देखने कि मदहोशी में डूबी भीड़ लाशों के ढेर और जलती हुई चिताओं से रोशन राजनीतिक पार्टियों की चुनावी सभाओं में बेतहाशा उमड़ रही है। इन सभाओं में सपने बांटे जा रहे है और लोग पागलों कि तरह उन सपनों को लूट लेने को आमादा नजर आ रहे है। यह भीड़ महाकुंभ में भी नजर आई जो मुक्ति के पवित्र स्नान की भावना से दूर सामाजिक दुख और अवसाद का कारण बनने को ज्यादा प्रेरित नजर आई। आखिर भारत जैसे प्राचीन और जियो और जीने दो की सभ्यता वाली भूमि पर यह कैसे संभव हो सकता है। लेकिन यह हम सबने कुंभ के मेले मे देखा। कुंभ जैसे स्नान मुख्यत: साधू,सन्यासियों या तपस्वियों के लिए एक प्रमुख धर्म या संस्कार होता है। इससे जनता को दूर रखा जा सकता है। धर्म को आचरण से ज्यादा प्रदर्शन की वस्तु समझने वाले आधुनिक समाज को न तो महामारी की विभीषिका से बचाने के लिए इस स्थान से दूर रखने के बारे में सोचा गया और न ही जनता को स्वयं यह परवाह थी।


  

यह सब भारत के लोकतंत्र में ही हो सकता है जहां जिंदगी के आसन्न संकट के बीच भी धार्मिक और चुनावी महोत्सव जारी है। बंगाल को भारत भूमि में विद्वत्ता के लिए पहचाना जाता है लेकिन यह राजनीतिक कारणों से किसी राष्ट्रीय आपदा के संकट को स्वीकार करने से भी इंकार कर देंगी,यह कल्पना किसी ने नहीं की होगी। महामारी के प्रकोप से मरते लोग और उससे उपजी बेबसी,निराशा और हताशा भारत की त्रासदी बन गई है। यह किसी एक स्थान,गांव,कस्बे या शहर का हाल नहीं है बल्कि समूचे भारत का दृश्य है। इस बीच देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे है और नेताओं के चमकीले भाषण बदस्तूर जारी है। इन राजनीतिक कार्यक्रमों में उमड़ती भीड़ अपनी मौत कि आहट को क्यों न सुन पा रही है,यह आश्चर्यजनक है।   


सवाल यह भी उठता है कि क्या राष्ट्रीय आपदा के संकट में भारत में कुछ राज्यों में होने वाले चुनावों को टाला जा सकता था। बेशक संवैधानिक रूप से तो यह बेहद आसान था लेकिन  इस पर विचार करना न तो सत्ताधारी दल को जरूरी लगा न ही देश की विपक्षी पार्टियों ने ऐसी कोई पेशकश की। इसका कारण यह भी तो है कि भारत में सत्ता भले ही परिवर्तित होती रहे लेकिन सत्ता के केंद्र में अभिजनवादी होते है और उन्हें आम जनता के हितों से कोई ज्यादा सरोकार नहीं होता। इन अभिजनों को लोकतंत्र भीड़ तंत्र नजर आता है जो अपंग होकर भी लंबी दौड़ लगाने का माद्दा रखते है और राजनीतिक दल उनसे यह आसानी से करवा भी लेते है।


एक बार फिर देश के कई इलाकों से भूखे प्यासे मजदूर वापस अपने घरों को लौट रहे है। उसमें से कितने ज़िंदा लौट पाएंगे यह किसी को पता नहीं और न ही इसकी चिंता करने की किसी ने जरूरत समझी। जनता चुनावों में जीत दिलाकर सत्ता की ऑक्सीजन राजनीतिक पार्टियों को इसीलिए देती है क्योंकि कठिन समय में जिंदगी को बचाने के लिए जब उन्हें ऑक्सीजन की जरूरत पड़े,उन्हें मिल जाएँ। ऐसा हुआ नहीं। कई मासूम,युवा और बूढ़े आक्सीजन के इंतजार में जिंदगी से अलविदा कह गए। पूरे के पूरे परिवार उजड़ गए। न जाने कितने सपने इन लोगों के साथ चले गए और जो पीछे छूट गए उनके जीवन का क्या होगा किसी को पता नहीं।


इसके लिए जिम्मेदार भी तो भीड़ तंत्र ही है जो अपने सुनहरे भविष्य की पहचान करने में अक्सर नाकाम रहता है। उसकी बेहतरी शिक्षा,स्वास्थ्य और सड़कों में है लेकिन उसे तो जातीय और धर्म में सब कुछ नजर आता है।  भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,लोकतंत्र की जड़े भले ही इसमें मजबूत हो लेकिन अंतत: यह जागरूक लोकतंत्र बिल्कुल भी नहीं है। 


एथेंस के दार्शनिक प्लेटो ने लगभग ढाई हजार साल पहले अपनी किताब 'द रिपब्लिक' में मतदाताओं की योग्यता और सोच पर सवाल उठाएँ थे। उन्होने कहा था कि मतदाता अप्रासंगिक बातों जैसे कि उम्मीदवार के रूपरंग आदि से प्रभावित हो सकते हैं। उन्हें ये अहसास नहीं रहेगा कि शासन करने से लेकर सरकार चलाने के लिए योग्यता की ज़रूरत होती है। किसी नेता के लिए मतदान करना उन्हें काफ़ी जोखिम भरा लगा।  


वहीं भारत के करोड़ों लोगों के लिए मतदान से बढ़कर कुछ भी नहीं है,यहां तक कि जिंदगी भीं नहीं। जब आम आदमी जिंदगी के लिए इतना लापरवाह होगा तो सत्ता के लिए तो उनकी जिंदगी सस्ती होगी ही।  2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि,कोई भी नागरिक अपने आप में क़ानून नहीं बन सकता है। लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाज़त नहीं दी जा सकती। शुक्र है माननीय न्यायालय का जो भारत को लोकतन्त्र समझती है। जबकि यकीनन हम भीड़ तंत्र का हिस्सा है जो सत्ता से उचित,विवेकपूर्ण और बुद्धिमत्तापूर्ण फैसलों की अपेक्षा नहीं करती बल्कि वह भावनाओं के राज को पसंद करती है। अब यही भावनाएं मौत का मंजर लेकर खौफ का कारण बन गई है जो जलती हुई चिताओं के रूप में हम सबक़ों चिढ़ा रही है।  

 

 

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