शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

असमानता से पस्त मजदूर,asmanta majdur

 राज एक्सप्रेस                       

                      


   

देश के सबसे अमीर शहर मुंबई में आप भारत के चार रूप देख सकते है। साउथ मुंबई का अल्टामाउंट रोड दुनिया की सबसे महंगी स्ट्रीट्स में से एक गिना जाता है। मालाबार हिल्स,मॅड आइलेंड,जुहू बीच में रहने वाले लोगों को देखकर लगता है कि यह बेहतरीन भारत का वह अंदाज है जो ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका की बराबरी करता हुआ दिखाई देता है। मुंबई से बाहर दिल्ली,बेंगलुरु,सूरत,अहमदाबाद, विशाखापत्तनम,गोवा,चंडीगढ़, जयपुर और वडोदरा शहर में भी ऐसे इलाके और चुनिंदा लोग मिल जायेंगे। देशभर के विभिन्न इलाकों में रहने वाले इन रईसों की आबादी कुल मिलाकर दस करोड़ के आसपास होगी। भारत के एक फीसदी अमीरों के पास 70 फीसदी की कुल संपत्ति का चार गुना धन है। भारत की आर्थिक समृद्धि दिखाने में ये लोग अक्सर काम आते है। हम सामाजिक सूचकांक की बिल्कुल भी बात नहीं कर रहे है क्योंकि भारत के आम नागरिक से इन लोगों का कोई ज्यादा सरोकार नहीं है।


भारत का दूसरा रूप आपको अंधेरी या बांद्रा में या उससे जुड़े कुछ इलाकों में देखने को मिलेगा। यह वह मध्यमवर्ग है जो समृद्धि के सपनों की तलाश में घर से निकलता है और हर बार उसकी मंजिल बहुत दूर नजर आती है। पिछले दो तीन सालों में देश में मंदी के बढ़ते संकट से यह वर्ग बेहाल है। सरकारी भर्तियां बंद है और प्रायवेट कंपनियों ने कर्मचारियों की संख्या मे भारी कमी कर दी है। यह इस वर्ग की बेबसी को बढ़ा रहा है। इन संकटों से रूबरू मध्यमवर्ग को न तो नोट बंदी से कुछ हासिल हुआ है और न ही इनके खातों में सरकार की ओर से पैसे जमा कराएं जाते है 


तीसरा भारत मुंबई के धारावी,भिवंडी,नाला सुपारा जैसे स्लम एरिया में रहता है। इनकी संख्या का पता लगाना मुश्किल है। क्योंकि इनका जन्म लेना या मर जाना समाचार नहीं होते। पूरे भारत में ऐसी जिंदगी जीने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है और अमूमन सब मुफ़लिसी,लाचारी और बेकारी की जिंदगी जीने को मजबूर है। इनकी चर्चा तब होती है,जब हर साल मानव विकास की वैश्विक रिपोर्ट जारी होती है और उसमें भारत का सामाजिक सूचकांक बदतर स्थिति में सामने आता है। 2020 में वैश्विक सामाजिक गतिशीलता सूचकांक में 82 देशों को शामिल किया गया था जिनमें भारत 76वें स्थान पर है। सूचकांक के अनुसार,भारत में एक गरीब परिवार के सदस्य को औसत आय प्राप्त करने में अभी भी सात पीढ़ियों का समय लगेगा। शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कई मामलों में अफ्रीका के गृह युद्द से जूझने वाले गरीब देशों से भी बदतर है। इसमें सुधार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार श्रमिकों को उनके रोज़गार की स्थिति की परवाह किये बिना समग्र सुरक्षा प्रदान करे। लेकिन प्रवासी मजदूरों कि बेबसी और लाचारी देखकर लगता है कि ये लोग सरकार कि प्राथमिकताओं में है ही नहीं। कोरोना काल में दूसरी बार ये लोग बदहवास होकर अपने घर कि ओर भाग रहे है। लेकिन हकीकत तो यह भी है कि ये लोग अपने उन गांवों की ओर लौट रहे है जहां दो जून रोटी कमाना नामुमकिन है। ऐसे में रोटी कि तलाश में उन्हें वापस उसी अनिश्चित रास्ते पर लौटने को मजबूर होना होगा।


अब जो भारत का अंतिम और चौथा रूप है,उसमें जीने वालों कि संख्या भी करोड़ों  में है,जो किसी फूटपाथ पर या अस्थायी डेरों में अपना जीवन यापन करने को मजबूर है। इनका कोई पता ठिकाना नहीं होता और जिंदगी जीने का इनका सफर भी आसान नहीं होता। ये अपराधी,पुलिस और समाज के अन्य वर्गों के द्वारा अलग अलग वजहों से काम में लिए जाते है। अपराधी इनसे छोटे मोटे अपराध करने,भीख मंगवाने और वेश्यावृति जैसे घृणित काम करवाने के लिए दबाव डालते है,वहीं पुलिस का एक डंडा इनका ठिकाना बदल देता है। कोई अपराध घटित हो तो पुलिस के लिए ये आसान टारगेट होते है। रोटी,कपड़े या बिस्किट देकर मीडिया में चर्चा का विषय बनने के लिए इनका उपयोग खूब चलन में है। पिछले साल जब लाकडाऊन कि घोषणा हूई और प्रधानमंत्री ने कहा की जो जहां है वहीं रहे। तब ये तबका किसी के जेहन में था ही नहीं,वैसे भी ये मतदाता की सामान्य परिधि से दूर नजर आते है,अत: राजनीतिक दलों के लिए ये खास बन भी नहीं पाते। लाकडाऊन के बाद देश के कई इलाकों से ये ऐसे गायब हुए कि कभी नहीं लौटे। इनकी सरकारी आंकड़ों में भी कोई गिनती नहीं है,अत: इन्हें ढूँढने या पता लगाने कि जरूरत भी महसूस भी नहीं की जाती।


स्पेन के मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो  ने कहा था कि जवानी साठ साल की उम्र से शुरू होती है। हालांकि उन्होंने यह कभी नहीं कहा था की  पचहत्तर साल तक आते आते यह खत्म भी हो जाती है। दरअसल आज़ादी के 60 वें साल अर्थात 2006-07  में देश की आर्थिक वृद्धि दर का आंकड़ा 10.08 फीसदी रहा था जो कि उदारीकरण शुरू होने के बाद का सर्वाधिक वृद्धि आंकड़ा माना जाता है। उस समय यह आशा बनी थी कि आने वाले दस पंद्रह सालों में तीसरा और चौथे स्तर का भारत दूसरे स्थान तक तो पहुँच ही जाएगा। मतलब सबके पास रोटी कपड़ा और मकान होगा। अब आज़ादी के 75 वें साल में यह उम्मीद भी टूटती हुई नजर आ रही है। कोरोना से दुनिया तो संभल गई लेकिन भारत में व्यवस्था की नाकामियां आम जनता पर कहर बनकर टूट पड़ी है। प्रवासी मजदूरों की बेबसी,खत्म होते काम धंधे,बढ़ती बेकारी, और महामारी से बचने में नाकामी जानलेवा हो गई है। ऑक्सीज़न और इलाज की कमी से लोग मर रहे है। श्मशान घाटों पर शवों को जलाने के लिए लकड़ियां खत्म हो गई है,लोग इलाज के इंतजार में दम तोड़ रहे है। दवाइयों की काला बाजारी में अभूतपूर्व इजाफ़ा हुआ है। यह पूरे भारत की तस्वीर है। इन सबके बीच धार्मिक और चुनावी महोत्सव बदस्तूर जारी है।


वास्तव में यह दौर पहचान आधारित राजनीति को बढ़ावा देने का है,जिसमें जात,संप्रदाय और धर्म को जरूरत के अनुसार खास बनाकर निर्णायक बना दिया गया है। इन सबके बीच स्वास्थ्य के प्रति गंभीर अनदेखी की जा रही है। भारत अपनी जीडीपी का स्वास्थ्य पर महज एक फीसदी से कुछ ज्यादा ही खर्च करता है। यह इस विशाल देश के लिए अपर्याप्त है और इसमें गरीब,मजबूरों और मजदूरों के जीवन और स्वास्थ्य की गारंटी न के बराबर है।  कोरोना काल में यह उभर कर भी आया कि भारत में आम इंसान कि जान की कीमत कुछ नहीं है। पिछलें कुछ समय से देश के तेजी से बदलते हालात से यह साफ हो गया है कि डेढ़ दशक पहले बेहतरी और खुशहाली की जो संभावनाएं नजर आ रही थी,वह इस समय खत्म हो गई है और स्थितियां इतनी तेजी से बदली है कि इससे उबरना आने वाली कई पीढ़ियों के लिए चुनौतीपूर्ण ही होगा।


ऑक्सफैम की रिपोर्ट 'इनइक्वालिटी वायरस' में कहा गया है कि,मार्च 2020 के बाद की अवधि में भारत में सौ अरबपतियों की संपत्ति में इतना उछाल आया है कि यदि इस राशि का वितरण देश के 13.8 करोड़ सबसे गरीब लोगों में किया जाए,तो इनमें से प्रत्येक को करीब चौरानवे हजार रुपये दिए जा सकते हैं। जब कोरोना के कहर से मध्यमवर्ग और गरीब बर्बाद हो गए तब अमीर और ज्यादा अमीर हो गए है।  जाहिर है हमें यह स्वीकारना होगा कि तकरीबन डेढ़ अरब की आबादी वाला यह देश महज कुछ घरों के रोशन होने से आगे नहीं बढ़ सकता। अफसोस व्यवस्थागत खामियों,पूंजीवाद को प्रश्रय,समाजवादी ढांचे और विविधता के प्रति संकीर्णता तथा लोकतंत्रात्मक मूल्यों के प्रति गैर जवाबदेही से भारत लोककल्याण कि मूल अवधारणा से दूर होता जा रहा है। ऐसे में सभी भारतवासियों के घरों में खुशहाली की संभावना भी लगातार धूमिल होती जा रही है।    

 

 

 

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