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अप्रैल, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अमेरिका से सीखे अपने नागरिकों की सुरक्षा, Amerika,covid india

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  दबंग दुनिया                                                                                                           अमेरिका ने वैक्सीन के निर्यात पर तब तक रोक जारी रखी है , जब तक पूरे देश में टीकाकरण पूरा ना हो जाए। लेकिन भारत की नीति इससे कहीं अलग थी। भारत ने वैक्सीन कूटनीति को दृष्टिगत रखते हुए अपने देश में आयु-सीमा तय करके टीकाकरण योजना शुरू की। जो पहले दौर में 60 से ज्यादा और दूसरे दौर में 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने को लेकर थी। भारत ने घाना, फ़िजी और भूटान जैसे देशों को तो वैक्सीन भेजी , साथ ही सऊदी अरब , ब्रिटेन और कनाडा जैसे अमीर देशों को भी वैक्सीन निर्यात की गई। भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कंपनी द्वारा निर्मित कोविशील्ड वैक्सीन की पांच लाख डोज वाली पहली खेप कनाडा पहुंचाई गई।   भारत ने ब्राजील को कोरोना वैक्सीन की 20 लाख खुराक भेजी। इसी प्रकार कोविशील्ड की 1.417 करोड़ खुराक भूटान , मालदीव , बांगलादेश , नेपाल , म्यामांर ओर सेशेल्स में पहुंचाई गई। भारत ने भूटान को कोविशील्ड टीके की एक लाख   पचास हजार खुराक और मालदीव को   एक लाख खुराकें भेजी ज

यूक्रेन का संकट ukraine rusia

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  जनसत्ता                                                                                                                              रूस के राष्ट्रपति   व्लादिमीर   पुतिन को सोवियत संघ के बिखराव का बड़ा दर्द रहा है। इस बिखराव के तीन दशक बीत चूके है लेकिन अलग हुए देशों की स्वतंत्र नीतियों को लेकर पुतिन अक्सर असहज हो जाते है। यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामक नीतियों में पुतिन की अधिकनायकवादी विचारधारा प्रभावी रही है , जिसके अनुसार रूस के पड़ोसियों की नीतियां रूस के हितों से अलग नहीं हो सकती और जब भी कोई देश ऐसा करने की मंशा दर्शाता है , पुतिन आक्रामक हो जाते है। इस समय रूस यूरोप से लगे अपने पड़ोसी यूक्रेन की सीमा पर अपनी फौजों का जमावड़ा बड़ा रहा है और पुतिन ने साफ कहा है कि यदि यूक्रेन ने अपने देश में रह रहे रूसी समर्थित नागरिकों को निशाना बनाने कि कोशिश की तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।   दरअसल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन को बनाएं रखने के लिए हस्तक्षेप को एक प्रमुख साधन माना जाता है। यह देखा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रों के महत्वपूर्ण हितों के लिए या

अफगानिस्तान पर असमंजस आत्मघाती,afganstan india

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  राष्ट्रीय सहारा                              इतिहास को भुलाकर गहरी रणनीति के विचार को आगे लाने का अवसर एक बार फिर भारत के सामने है। करीब चार दशक से राजनीतिक अराजकता , अस्थायित्व , आतंकवाद , आंतरिक गतिरोध और वैश्विक हस्तक्षेप से जूझते अफगानिस्तान का भविष्य अनिश्चितता कि ओर बढ़ रहा है। इस समय दक्षिण एशिया के सबसे बड़े देश और अफगानिस्तान के पारंपरिक मित्र भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होना चाहिए , लेकिन कूटनीतिक हलकों में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अफगानिस्तान को लेकर हो रही बातचीत या महाशक्तियों के फैसलों में भारतीय हित नदारद है।   दरअसल दो दशक से अफगानिस्तान में तालिबान को उखाड़ फेंकने की तमाम कोशिशों में नाकाम रहने के बाद   अमेरिकी सेना वहां से जाने को तैयार है और इस प्रकार एक बार फिर इस दक्षिण एशियाई देश में तालिबान का कथित इस्लामी शासन   कायम होने का खतरा मंडरा गया है। पाकिस्तान के पूर्व सैनिक तानाशाह जनरल मुशर्रफ कहा करते थे कि वे पाकिस्तान को एक उदारवादी देश बनाने के लिए प्रतिबद्ध है , तालिबान भी विश्व समुदाय यह भरोसा दिला रहा है कि वे अफगानिस्तान में आतंकवाद को नहीं पनपने दें

भीड़तंत्र की मूर्खता की पराकाष्ठा bhidtantra india

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  दबंग दुनिया                       गौतम बुद्ध राजघराने से जुड़े थे और उन्हें सत्ता के अवगुणों का बेहतर ज्ञान था। वे सत्ता के अहम में डूबे राजा और उनकी राजनीति को दुखद विज्ञान कहते थे। लगभग डेढ़ हजार साल पहले   दिए गए बुद्द के ये राजनीतिक विचार भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान प्रयोगशाला में राजनीति के स्तर और उसके अंतिम लक्ष्य को चित्रित करने के लिए काफी है।   बुद्द ने आगे कहा था कि सत्ता का लोभ राजा के लिए सबसे प्रिय होता है और राजनीति ऐसी चीज़ है जो अपने माता पिता के हनन को भी जायज ठहरा देती है। अत: राजनीति दारुण दुख का विज्ञान है। दरअसल भारत के विकास के परम वैभव को देखने कि मदहोशी में डूबी भीड़ लाशों के ढेर और जलती हुई चिताओं से रोशन राजनीतिक पार्टियों की चुनावी सभाओं में बेतहाशा उमड़ रही है। इन सभाओं में सपने बांटे जा रहे है और लोग पागलों कि तरह उन सपनों को लूट लेने को आमादा नजर आ रहे है। यह भीड़ महाकुंभ में भी नजर आई जो मुक्ति के पवित्र स्नान की भावना से दूर सामाजिक दुख और अवसाद का कारण बनने को ज्यादा प्रेरित नजर आई। आखिर भारत जैसे प्राचीन और जियो और जीने दो की सभ्यता वाली भूमि पर य

क्या संविधान ख़तरे में है,sanvidhan khtre men hai

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  पॉलिटिक्स                                 संविधान के लिए सिर्फ यह काफी नहीं है कि उसमें लिखा क्या गया है , बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि संविधान को आप किस तरह पढ़ रहे है , समझ रहे है और उसे किस तरह पढ़ाया जा रहा है। यहां तक की उसकी व्याख्या किस तरह की जा रही है , यह भी अहम हो जाता है। डॉ. आंबेडकर इस बात को भलीभांति जानते भी थे । उन्होंने कहा भी था कि संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता , बल्कि व्यवस्थाओं का संचालन करने वाले लोगों तथा अपनी राजनीति की पूर्ति के लिए बनाये जाने वाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है । आज़ाद भारत के लोकतांत्रिक जीवन में संविधान को अलग अलग तरीके से समझने और समझाने की कोशिशें बेहद आम है ।   वैसे देश का संविधान इतना उदार और वृहत है की न्यायालय के इतर भी लोग और राजनीतिक पार्टियां अपनी पसंद के अनुसार संविधान को देखने और समझने की कोशिश करते रहते है।   संविधान लागू ही हुआ था कि 1951 में रोमेश थापर बनाम राज्य मद्रास के मामले में न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा यह कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय का गठन   लोगों के मौलिक अधिका