शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

असमानता से पस्त मजदूर,asmanta majdur

 राज एक्सप्रेस                       

                      


   

देश के सबसे अमीर शहर मुंबई में आप भारत के चार रूप देख सकते है। साउथ मुंबई का अल्टामाउंट रोड दुनिया की सबसे महंगी स्ट्रीट्स में से एक गिना जाता है। मालाबार हिल्स,मॅड आइलेंड,जुहू बीच में रहने वाले लोगों को देखकर लगता है कि यह बेहतरीन भारत का वह अंदाज है जो ऑस्ट्रेलिया या अमेरिका की बराबरी करता हुआ दिखाई देता है। मुंबई से बाहर दिल्ली,बेंगलुरु,सूरत,अहमदाबाद, विशाखापत्तनम,गोवा,चंडीगढ़, जयपुर और वडोदरा शहर में भी ऐसे इलाके और चुनिंदा लोग मिल जायेंगे। देशभर के विभिन्न इलाकों में रहने वाले इन रईसों की आबादी कुल मिलाकर दस करोड़ के आसपास होगी। भारत के एक फीसदी अमीरों के पास 70 फीसदी की कुल संपत्ति का चार गुना धन है। भारत की आर्थिक समृद्धि दिखाने में ये लोग अक्सर काम आते है। हम सामाजिक सूचकांक की बिल्कुल भी बात नहीं कर रहे है क्योंकि भारत के आम नागरिक से इन लोगों का कोई ज्यादा सरोकार नहीं है।


भारत का दूसरा रूप आपको अंधेरी या बांद्रा में या उससे जुड़े कुछ इलाकों में देखने को मिलेगा। यह वह मध्यमवर्ग है जो समृद्धि के सपनों की तलाश में घर से निकलता है और हर बार उसकी मंजिल बहुत दूर नजर आती है। पिछले दो तीन सालों में देश में मंदी के बढ़ते संकट से यह वर्ग बेहाल है। सरकारी भर्तियां बंद है और प्रायवेट कंपनियों ने कर्मचारियों की संख्या मे भारी कमी कर दी है। यह इस वर्ग की बेबसी को बढ़ा रहा है। इन संकटों से रूबरू मध्यमवर्ग को न तो नोट बंदी से कुछ हासिल हुआ है और न ही इनके खातों में सरकार की ओर से पैसे जमा कराएं जाते है 


तीसरा भारत मुंबई के धारावी,भिवंडी,नाला सुपारा जैसे स्लम एरिया में रहता है। इनकी संख्या का पता लगाना मुश्किल है। क्योंकि इनका जन्म लेना या मर जाना समाचार नहीं होते। पूरे भारत में ऐसी जिंदगी जीने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है और अमूमन सब मुफ़लिसी,लाचारी और बेकारी की जिंदगी जीने को मजबूर है। इनकी चर्चा तब होती है,जब हर साल मानव विकास की वैश्विक रिपोर्ट जारी होती है और उसमें भारत का सामाजिक सूचकांक बदतर स्थिति में सामने आता है। 2020 में वैश्विक सामाजिक गतिशीलता सूचकांक में 82 देशों को शामिल किया गया था जिनमें भारत 76वें स्थान पर है। सूचकांक के अनुसार,भारत में एक गरीब परिवार के सदस्य को औसत आय प्राप्त करने में अभी भी सात पीढ़ियों का समय लगेगा। शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कई मामलों में अफ्रीका के गृह युद्द से जूझने वाले गरीब देशों से भी बदतर है। इसमें सुधार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार श्रमिकों को उनके रोज़गार की स्थिति की परवाह किये बिना समग्र सुरक्षा प्रदान करे। लेकिन प्रवासी मजदूरों कि बेबसी और लाचारी देखकर लगता है कि ये लोग सरकार कि प्राथमिकताओं में है ही नहीं। कोरोना काल में दूसरी बार ये लोग बदहवास होकर अपने घर कि ओर भाग रहे है। लेकिन हकीकत तो यह भी है कि ये लोग अपने उन गांवों की ओर लौट रहे है जहां दो जून रोटी कमाना नामुमकिन है। ऐसे में रोटी कि तलाश में उन्हें वापस उसी अनिश्चित रास्ते पर लौटने को मजबूर होना होगा।


अब जो भारत का अंतिम और चौथा रूप है,उसमें जीने वालों कि संख्या भी करोड़ों  में है,जो किसी फूटपाथ पर या अस्थायी डेरों में अपना जीवन यापन करने को मजबूर है। इनका कोई पता ठिकाना नहीं होता और जिंदगी जीने का इनका सफर भी आसान नहीं होता। ये अपराधी,पुलिस और समाज के अन्य वर्गों के द्वारा अलग अलग वजहों से काम में लिए जाते है। अपराधी इनसे छोटे मोटे अपराध करने,भीख मंगवाने और वेश्यावृति जैसे घृणित काम करवाने के लिए दबाव डालते है,वहीं पुलिस का एक डंडा इनका ठिकाना बदल देता है। कोई अपराध घटित हो तो पुलिस के लिए ये आसान टारगेट होते है। रोटी,कपड़े या बिस्किट देकर मीडिया में चर्चा का विषय बनने के लिए इनका उपयोग खूब चलन में है। पिछले साल जब लाकडाऊन कि घोषणा हूई और प्रधानमंत्री ने कहा की जो जहां है वहीं रहे। तब ये तबका किसी के जेहन में था ही नहीं,वैसे भी ये मतदाता की सामान्य परिधि से दूर नजर आते है,अत: राजनीतिक दलों के लिए ये खास बन भी नहीं पाते। लाकडाऊन के बाद देश के कई इलाकों से ये ऐसे गायब हुए कि कभी नहीं लौटे। इनकी सरकारी आंकड़ों में भी कोई गिनती नहीं है,अत: इन्हें ढूँढने या पता लगाने कि जरूरत भी महसूस भी नहीं की जाती।


स्पेन के मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो  ने कहा था कि जवानी साठ साल की उम्र से शुरू होती है। हालांकि उन्होंने यह कभी नहीं कहा था की  पचहत्तर साल तक आते आते यह खत्म भी हो जाती है। दरअसल आज़ादी के 60 वें साल अर्थात 2006-07  में देश की आर्थिक वृद्धि दर का आंकड़ा 10.08 फीसदी रहा था जो कि उदारीकरण शुरू होने के बाद का सर्वाधिक वृद्धि आंकड़ा माना जाता है। उस समय यह आशा बनी थी कि आने वाले दस पंद्रह सालों में तीसरा और चौथे स्तर का भारत दूसरे स्थान तक तो पहुँच ही जाएगा। मतलब सबके पास रोटी कपड़ा और मकान होगा। अब आज़ादी के 75 वें साल में यह उम्मीद भी टूटती हुई नजर आ रही है। कोरोना से दुनिया तो संभल गई लेकिन भारत में व्यवस्था की नाकामियां आम जनता पर कहर बनकर टूट पड़ी है। प्रवासी मजदूरों की बेबसी,खत्म होते काम धंधे,बढ़ती बेकारी, और महामारी से बचने में नाकामी जानलेवा हो गई है। ऑक्सीज़न और इलाज की कमी से लोग मर रहे है। श्मशान घाटों पर शवों को जलाने के लिए लकड़ियां खत्म हो गई है,लोग इलाज के इंतजार में दम तोड़ रहे है। दवाइयों की काला बाजारी में अभूतपूर्व इजाफ़ा हुआ है। यह पूरे भारत की तस्वीर है। इन सबके बीच धार्मिक और चुनावी महोत्सव बदस्तूर जारी है।


वास्तव में यह दौर पहचान आधारित राजनीति को बढ़ावा देने का है,जिसमें जात,संप्रदाय और धर्म को जरूरत के अनुसार खास बनाकर निर्णायक बना दिया गया है। इन सबके बीच स्वास्थ्य के प्रति गंभीर अनदेखी की जा रही है। भारत अपनी जीडीपी का स्वास्थ्य पर महज एक फीसदी से कुछ ज्यादा ही खर्च करता है। यह इस विशाल देश के लिए अपर्याप्त है और इसमें गरीब,मजबूरों और मजदूरों के जीवन और स्वास्थ्य की गारंटी न के बराबर है।  कोरोना काल में यह उभर कर भी आया कि भारत में आम इंसान कि जान की कीमत कुछ नहीं है। पिछलें कुछ समय से देश के तेजी से बदलते हालात से यह साफ हो गया है कि डेढ़ दशक पहले बेहतरी और खुशहाली की जो संभावनाएं नजर आ रही थी,वह इस समय खत्म हो गई है और स्थितियां इतनी तेजी से बदली है कि इससे उबरना आने वाली कई पीढ़ियों के लिए चुनौतीपूर्ण ही होगा।


ऑक्सफैम की रिपोर्ट 'इनइक्वालिटी वायरस' में कहा गया है कि,मार्च 2020 के बाद की अवधि में भारत में सौ अरबपतियों की संपत्ति में इतना उछाल आया है कि यदि इस राशि का वितरण देश के 13.8 करोड़ सबसे गरीब लोगों में किया जाए,तो इनमें से प्रत्येक को करीब चौरानवे हजार रुपये दिए जा सकते हैं। जब कोरोना के कहर से मध्यमवर्ग और गरीब बर्बाद हो गए तब अमीर और ज्यादा अमीर हो गए है।  जाहिर है हमें यह स्वीकारना होगा कि तकरीबन डेढ़ अरब की आबादी वाला यह देश महज कुछ घरों के रोशन होने से आगे नहीं बढ़ सकता। अफसोस व्यवस्थागत खामियों,पूंजीवाद को प्रश्रय,समाजवादी ढांचे और विविधता के प्रति संकीर्णता तथा लोकतंत्रात्मक मूल्यों के प्रति गैर जवाबदेही से भारत लोककल्याण कि मूल अवधारणा से दूर होता जा रहा है। ऐसे में सभी भारतवासियों के घरों में खुशहाली की संभावना भी लगातार धूमिल होती जा रही है।    

 

 

 

प्रवासी मजदूरों का मानवीय संकट,Pravasi Majdur

 सुबह सवेरे

                                                        

 

खुले आसमान के नीचे जमीन पर एक मजदूर का बच्चा बैठा है। कोविड का संदिग्ध मानकर और दूसरों को संक्रमण से बचाने के लिए उस मासूम के चेहरे पर एक कर्मचारी मशीन के तेज प्रेशर से छिड़काव कर रहा है। बच्चा इस कैमिकल से बचने के लिए अपना चेहरा छिपा रहा है। वह उठकर भागने का प्रयास करता है लेकिन मशीन से निकल रहे कैमिकल के प्रेशर से वह नहीं उठ पाता। पिछले साल उत्तर प्रदेश  के लखनऊ में दूसरे राज्यों से आए मजदूरों को सैनिटाइजेशन के नाम पर कैमिकल से नहलाया गया था। ये मजदूर श्रमिक स्पेशल ट्रेन से यहां पहुंचे थे। स्टेशन पर आने के बाद उनके ऊपर मशीन के जरिए प्रेशर से कैमिकल डाला गया। इस दौरान छोटे बच्चों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया था।


दरअसल यह आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की तस्वीर है जहां मजदूर अपनी बेबसी पर हांफते हुए सैकड़ों किलोमीटर का सफर पैदल भी चलने के लिए मजबूर है। भारत की राजनीति की यह बदतरीन हकीकत रही है कि यह  जातीयता,धर्म,मंदिर,मस्जिद और क्षेत्रवाद पर केंद्रित होती है,मजदूर इन सबके बीच खो जाते है और अंतत: भूला दिए जाते है।    

न्याय के सिद्धान्त के महान प्रवर्तक जॉन रॉल्स ने न्याय को निष्पक्ष बनाने कि बात कहते हुए अज्ञान के पर्दे का जिक्र किया था। अज्ञान के पर्दे से उनका आशय यह था कि किसी भी व्यक्ति को अपनी विशेष क्षमता और प्रतिभा का ज्ञान  नहीं है। अंतत: मजदूरों की प्राथमिकता रोटी होती है,इसलिए वे सिर्फ उसके लिए सोचते और प्रयास करते है। कुल मिलाकर वे अज्ञान बने रहने में ही बेहतरी समझते है,इसका कारण यह भी होता है कि वे सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद कमजोर होते है। ऐसे मेन उनकी आवाजों को आसानी से दबा दिया जाता है। पिछले साल भारत में लॉकडाऊन लगने के बाद दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट को प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के रूप में देखा गया था।


 जहां देश के विभिन्न इलाकों में काम करने वाले मजदूरों को उद्योगों और अन्य कामकाजी संस्थाओं से निकाल दिया गया था। देश में यातायात की सेवाओं को रोक दिया गया था और इसलिए लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हो गए थे। इसमें कई लोग ऐसे भी थे जिन्होंने अपने मासूम बच्चों को कंधे पर उठाकर सैकड़ों किलोमीटर का पैदल सफर तय किया था। इस मानवीय त्रासदी के बीच प्रवासी मजदूरों को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान की सरकारी घोषणा की गई थी।

 

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार अभियान  के अंतर्गत उन जिलों को शामिल किया गया था जहां पर वापस लौटे प्रवासी कामगारों की संख्या पच्चीस हजार से ज्यादा थी। यह राज्य बिहार,झारखंड,उड़ीसा,राजस्थान,मध्यप्रदेश तथा उत्तरप्रदेश बताएं गए और इन छह राज्यों के लगभग 116 जिले शामिल किए गए। 20 जून 2020 से 125 दिन की अवधि के लिए मजदूरों को फौरी लाभ देने का वादा किया गया था। उत्तरप्रदेश सरकार ने  एक माइग्रेशन कमीशन गठित कर यह कहा था कि भविष्य में यूपी के कामगार किसी और राज्य में काम करने जाते है तो संबन्धित राज्य को उत्तरप्रदेश की सरकार से अनुमति लेना होगी। जिससे मजदूरों के हितों की रक्षा की जा सके। बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले थे,अत: कथित सुशासन बाबू नीतीश कुमार ने भी मजदूर हितों पर बड़े वादे किए।  इन सबसे प्रवासी मजदूरों और उनके परिवारों को यह आशा बंधी थी कि आने वाले समय में उन्हें स्थानीय रोजगार मिलेगा और सरकार इस पर गंभीरता से विचार करेंगी।


इससे उलट केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाएं दीर्घकालीन प्रभाव कायम करने वाली हो,ऐसा कभी दिखाई ही नहीं दिया। यदि मजदूर हित सरकार की प्राथमिकताओं में होते तो मजदूरों के लिए बोल्सा फेमिलिया जैसी योजना लागू की जा सकती थी। ब्राज़ील में गरीबी दूर करने के लिए यह योजना आरंभ की गई थी। करीब दो दशक पहले शुरू की गई इस योजना के अच्छे परिणाम हुए। नकदी हस्तांतरण की इस योजना से ब्राज़ील में गरीबी उन्मूलन में बड़ी मदद मिली। यूपी और बिहार में 50 लाख से ज्यादा प्रवासी मजदूर अपने अपने गांव लौटे थे। लेकिन   कुछ ही समय के बाद इन्हें वापस रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में लौटना पड़ा। अब इनकी संख्या का पता लगाना भी मुश्किल है।  


यूरोप के 4 बड़े देश इंग्लैंड,फ्रांस,इटली और स्पेन दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत है और इनकी कंपनियों और उद्योगों से करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है। वहीं इन चारों की बराबर आबादी वाला भारत का सबसे बड़ा सूबा उत्तरप्रदेश के लोग रोजगार और रोटी की तलाश में महाराष्ट्र,गुजरात या उत्तर पूर्व जाने को मजबूर है। आत्मनिर्भर भारत की बहुप्रचारित योजना जमीनी प्रभाव कायम करने में बूरी तरह विफल रही है। करीब डेढ़ दशक पहले अस्तित्व में आई महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना को विकास और रचनात्मक कार्यो से जोड़कर इन  प्रवासी मजदूरों का विश्वास अर्जित किया जा सकता था। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक साल के बाद कोरोना महामारी में लॉकडाउन की परेशानियों से आशंकित मजदूर एक बार फिर अपने अपने गांव लौटने को मजबूर हो गए है। जाहिर है एक साल बीत जाने के बाद भी मजदूरों के मानवीय संकट की गंभीरता को समझा ही नहीं  गया।     


 

समकालीन युग में न्याय स्वत: सामाजिक न्याय को सामने लाता है। अमेरिका के नव उदारवादी विचारक राबर्ट नोजिक ने कहा था कि न्याय का आधार पात्रता या योग्यता होना चाहिए। इनके अनुसार वस्तुओं का वितरण व्यक्ति द्वारा समाज के लिए किए गए योगदान के अनुपात मे होना चाहिए। इनके अनुसार,जो व्यक्ति जिस जिस वस्तु का अधिकारी है,उसे उसकी सहमति के बिना दूसरे को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। अन्य राज्यों में काम करने वाले मजदूरों में बहुतायत उन वंचित जातीय समूहों की है,जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े है। ये लोग गांवों या जंगलों में रहते है और यहां पर भौगोलिक संसाधनों की कोई कमी नहीं होती। विभिन्न सरकारों के विकास के मॉडल जब भी सामने आते है,इसका खामियाजा ये वंचित समूह ही भुगतते है। भौगोलिक संसाधनों का सही वितरण और उपयोग स्थानीय आबादी में किया जाने लगे,तब इससे सबसे ज्यादा लाभान्वित वंचित वर्ग हो सकते है,लेकिन ये कभी लाभ की हिस्सेदारी का भाग ही नहीं समझे जाते।


इनकी चर्चा तब होती है,जब हर साल मानव विकास की वैश्विक रिपोर्ट जारी होती है और उसमें भारत का सामाजिक सूचकांक बदतर स्थिति में सामने आता है। 2020 में वैश्विक सामाजिक गतिशीलता सूचकांक में 82 देशों को शामिल किया गया था जिनमें भारत 76वें स्थान पर है। सूचकांक के अनुसार,भारत में एक गरीब परिवार के सदस्य को औसत आय प्राप्त करने में अभी भी सात पीढ़ियों का समय लगेगा। शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कई मामलों में अफ्रीका के गृह युद्द से जूझने वाले गरीब देशों से भी बदतर है। इसमें सुधार के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि सरकार श्रमिकों को उनके रोज़गार की स्थिति की परवाह किये बिना समग्र सुरक्षा प्रदान करे। लेकिन प्रवासी मजदूरों कि बेबसी और लाचारी देखकर लगता है कि ये लोग सरकार कि प्राथमिकताओं में है ही नहीं। कोरोना काल में दूसरी बार ये लोग बदहवास होकर अपने घर कि ओर भाग रहे है। लेकिन हकीकत तो यह भी है कि ये लोग अपने उन गांवों की ओर लौट रहे है जहां दो जून रोटी कमाना नामुमकिन है। ऐसे में रोटी कि तलाश में उन्हें वापस उसी अनिश्चित रास्ते पर लौटने को मजबूर होना होगा।


इन सबके बीच नया भारत व्यवस्थागत खामियों,पूंजीवाद को प्रश्रय,समाजवादी ढांचे और विविधता के प्रति संकीर्णता तथा लोकतंत्रात्मक मूल्यों के प्रति गैर जवाबदेही से लोककल्याण कि मूल अवधारणा से दूर होता जा रहा है। ऐसे में इन प्रवासी मजदूरों के हितों की रक्षा की  संभावना भी लगातार धूमिल होती जा रही है।   

 

 

 

 

 

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

अमेरिका से सीखे अपने नागरिकों की सुरक्षा, Amerika,covid india

 दबंग दुनिया

 


                                                                                                     

अमेरिका ने वैक्सीन के निर्यात पर तब तक रोक जारी रखी है,जब तक पूरे देश में टीकाकरण पूरा ना हो जाए। लेकिन भारत की नीति इससे कहीं अलग थी। भारत ने वैक्सीन कूटनीति को दृष्टिगत रखते हुए अपने देश में आयु-सीमा तय करके टीकाकरण योजना शुरू की। जो पहले दौर में 60 से ज्यादा और दूसरे दौर में 45 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने को लेकर थी।


भारत ने घाना,फ़िजी और भूटान जैसे देशों को तो वैक्सीन भेजी,साथ ही सऊदी अरब,ब्रिटेन और कनाडा जैसे अमीर देशों को भी वैक्सीन निर्यात की गई। भारत में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कंपनी द्वारा निर्मित कोविशील्ड वैक्सीन की पांच लाख डोज वाली पहली खेप कनाडा पहुंचाई गई। भारत ने ब्राजील को कोरोना वैक्सीन की 20 लाख खुराक भेजी। इसी प्रकार कोविशील्ड की 1.417 करोड़ खुराक भूटान,मालदीव, बांगलादेश,नेपाल,म्यामांर ओर सेशेल्स में पहुंचाई गई। भारत ने भूटान को कोविशील्ड टीके की एक लाख  पचास हजार खुराक और मालदीव को  एक लाख खुराकें भेजी जबकि बांग्लादेश को कोविड-19 टीकों की 20 लाख से अधिक खुराक और नेपाल को 10 लाख खुराक भेजी गई।

 

इस समय आंकड़ों को लेकर यह दावा किया गया कि दुनिया में सबसे ज्यादा संख्या में भारत में लोगों का टीकाकरण किया गया जिसे मोटे तौर पर 10 करोड़ बताया गया।  लेकिन आबादी के हिसाब से यह कितना कम था,इसे इन आंकड़ों को देखकर समझा जा सकता है। जब भारत में यह दावा किया जा रहा था तब भारत में आबादी के हिसाब से यह बेहद कम थी और इसकी पहुँच साढ़े पाँच फीसदी लोगों तक हुई। वहीं,ब्रिटेन में लगभग पचास फीसदी और अमेरिका में तैतीस फीसदी आबादी को टीका लगाया जा चुका था। कोरोना के कहर कि पहली लहर को झेलने वाला ब्राज़ील भी भारत से आगे रहा और उसने 10 फीसदी लोगों को टीका लगा दिया। भारत का पड़ोसी देश भूटान,जिसने भारत से वैक्सीन निर्यात की है। वहाँ साठ फीसदी से ज्यादा लोगों का टीकाकरण हो चुका है।


चीन में कोरोना फैलने के बाद पिछले साल जनवरी में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे लेकर चेतावनी दी थी,इसके बाद भी फरवरी के महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे पर अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम का आयोजन किया गया था,जिसमें एक लाख से अधिक लोग शामिल हुए थे। भारत ऐसे आयोजनों से दूर नहीं हुआ और इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव आयोजित किए गए जिसमें करीब अठारह करोड़ मतदाताओं ने भाग लिया। यह आगामी समय में और संकट बढ़ाएगा,इसकी आशंका बढ़ गई है।


वहीं कोरोना से निपटने कि योजनाओं को ले तो अमेरिका के पास ऐस्ट्राज़ेनेका की 300 लाख डोज़ बिना इस्तेमाल हुई रखी हुई है, जो संकट में काम आ सकती है। भारत में कोरोना के बढ़ते मामले और इससे उत्पन्न भीषण संकट के बीच बड़ी समस्या यह सामने आई की अमेरिका ने वैक्सीन और दवाओं से जुड़े कच्चे माल के आयात पर रोक लगा रखी थी। भारत ने जब इसे हटाने की बात कहीं तो अमेरिका ने पहले तो इसे हटाने से इंकार कर दिया और फिर व्हाइट हाउस की प्रवक्ता जेन साकी ने कहा कि,अमेरिका पहले अपने नागरिकों की ज़रूरतें पूरी करेगा। हालांकि बाद में अमेरिकी प्रशासन ने हाल ही में भारत को मदद देने का भरोसा दिलाया, यह कब मिलेगी,यह साफ नहीं है।



कोरोना से निपटने की बेहतर  कार्ययोजना कभी भारत में नजर ही नहीं और वैश्विक खतरों को नजर अंदाज करके इसे हर्ड इम्यूनिटी वाला देश बार बार बताया गया। पिछले साल कोरोना संक्रमण फैलने के खतरों के बीच ऑक्सीज़न की कमी की समस्या सामने आई थी। बाद में भारत ने दूसरी लहर को लेकर कोई भी तैयारी करने पर ज़ोर नहीं दिया। भारत कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा 3 प्रभावित देशों में शामिल था। बिजनेस टुडे के मुताबिक अप्रैल 2020 से जनवरी 2021 के दौऱान भारत ने 9301 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया जिससे उसे 8.9 करोड़ रुपये की कमाई हुई। इसकी तुलना में भारत ने वित्त वर्ष 2019-20 में कुल 4514 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का निर्यात किया था जिससे 5.5 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी। भारत ने वित्त वर्ष 2020-21 के पहले 10 महीनों में पूरे वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में दोगुना ऑक्सीजन का निर्यात किया। डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स के आंकड़ों में यह खुलासा हुआ है। कोरोना के संकट में भारत कि यह नीति हैरान और परेशान करने वाली है।

इस समय देश में ऑक्सीजन की कमी से हजारों लोग मर चुके है और यह समस्या बदस्तूर जारी है। हालत यह है कि दिल्ली और कुछ दूसरे राज्यों के पास अपने ऑक्सीजन प्लांट नहीं हैं। सप्लाई के लिए वे दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं। ऑक्सीजन कि कमी से मरते लोगों कि बड़ी संख्या से संतप्त सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से एक राष्ट्रीय कोविड योजना बनाने को कहा है जिससे  ऑक्सीजन सप्लाई की कमी दूर की जा सके।  देश के कई राज्यों में अस्पतालों के बाहर बोर्ड टांग दिये गए जिसमें अस्पताल में ऑक्सीजन उपलब्ध न होने का हवाला दिया गया है। कोविड से निपटने में इस समय रेमडेसिविर इंजेक्शन को बेहद मददगार माना जा रहा है और इसकी काला बाजारी भी बड़े पैमाने पर सामने आई है। भारत में सात कंपनियाँ मायलेन,हेट्रो हेल्थ केयर,जुबलियंट,सिप्ला,डॉक्टर रेड्डी लैब,सन फ़ार्मा और ज़ाइडस कैडिला रेमडेसिविर का उत्पादन करती हैं। कोरोना की दूसरी लहर को लेकर भारत में तैयारियों और चेतावनियों का अभाव इस कदर रहा कि रेमडेसिविर का प्रोडक्शन तीन महीने रोक दिया गया था,इसका कारण बीते दिसंबर से लेकर इस साल फ़रवरी तक रेमडेसिविर की कम या लगभग न के बराबर माँग को बताया गया। तीन महीने तक न के बराबर प्रोडक्शन होना इस दवा की आपूर्ति में कमी के पीछे बड़ा कारण बन गया।


इस समय देश कोरोना की विपदा से बूरी तरह जूझ रहा है और इसकी जद में कम उम्र के वे लोग भी आ गए है,जिन्हें वैक्सीन लग जाने से वे ज़िंदा बच सकते थे। जाहिर है देश के नेतृत्व को यह समझने की जरूरत है कि किसी राष्ट्र के कितने भी ऊंचे आदर्श और कितनी ही उदार अभिलाषाएं हो,वह अपनी विदेश नीति को राष्ट्रीय हित के अतिरिक्त किसी अन्य धारणा पर आधारित नहीं कर सकता। अंतत: राष्ट्रीय चरित्र और राष्ट्रीय शक्ति का सार तो राष्ट्र के लोगों की सुरक्षा में ही निहितहोना चाहिए,फिर वह राष्ट्रीय स्वार्थ या अव्यवहारिक आदर्शवाद के रूप में ही क्यों न हो। अमेरिका से यह सीखने की जरूरत है।  

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2021

यूक्रेन का संकट ukraine rusia

 जनसत्ता


                                         

                                                                                  

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को सोवियत संघ के बिखराव का बड़ा दर्द रहा है। इस बिखराव के तीन दशक बीत चूके है लेकिन अलग हुए देशों की स्वतंत्र नीतियों को लेकर पुतिन अक्सर असहज हो जाते है। यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामक नीतियों में पुतिन की अधिकनायकवादी विचारधारा प्रभावी रही है,जिसके अनुसार रूस के पड़ोसियों की नीतियां रूस के हितों से अलग नहीं हो सकती और जब भी कोई देश ऐसा करने की मंशा दर्शाता है,पुतिन आक्रामक हो जाते है। इस समय रूस यूरोप से लगे अपने पड़ोसी यूक्रेन की सीमा पर अपनी फौजों का जमावड़ा बड़ा रहा है और पुतिन ने साफ कहा है कि यदि यूक्रेन ने अपने देश में रह रहे रूसी समर्थित नागरिकों को निशाना बनाने कि कोशिश की तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। 


दरअसल अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन को बनाएं रखने के लिए हस्तक्षेप को एक प्रमुख साधन माना जाता है। यह देखा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रों के महत्वपूर्ण हितों के लिए या तो खतरा  विद्यमान रहता है या खतरा उत्पन्न होने कि संभावना बनी रहती है। इसलिए राष्ट्र उनकी रक्षा के लिए सतत सजग और प्रयत्नशील रहते है। शक्ति संतुलन को बनाएं रखने के लिए विभिन्न राज्यों के साथ गठबंधन अथवा मैत्री संधियों कि नीति एक प्रमुख साधन रही है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस के नेतृत्व में सामूहिक सुरक्षा और सामूहिक हितों के प्रति एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ाने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र  संगठन सीआईएस  का गठन 8 दिसम्बर 1991 को किया गया था जिसे मिंस्क समझौता कहा जाता है। सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये राज्यों की  सीआईएस के अंतर्गत सामूहिक नीतियां बनाई गई। यह संगठन मुख्य रूप से व्यापार,वित्त,कानून निर्माण,सुरक्षा तथा सदस्यों के मध्य समन्वय स्थापित करने जैसे कार्य करता है। इस संगठन की स्थापना में यूक्रेन का भी अहम योगदान माना जाता है। यूक्रेन सोवियत संघ से अलग हुआ एक बड़ा देश है जो यूरोप में आता है और इसे  सामरिक रूप से एक शक्तिशाली देश माना जाता है। इसका  एक कारण यह भी है कि अविभाजित सोवियत संघ के अधिकांश आणविक केंद्र यूक्रेन में रहे थे अत: यह न केवल रूस के लिए अहम बना रहा बल्कि यूरोपियन देशों की नजर भी इस पर बनी रही। 


 

रूस बनने के बाद देश के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने सीआईएस से संबद्द देशों से आपसी सहमति के आधार पर सम्बन्धों को आगे बढ़ाने की नीति पर काम किया,लेकिन पुतिन युग के प्रारम्भ होते ही स्थितियां बदलने लगी। पुतिन ने रूसी प्रथम की भावना पर काम करते हुए पड़ोसी देशों पर दबाव बढ़ाने की नीति अपनाई। उनके मन में सोवियत संघ के बिखराव को लेकर दर्द तो था ही,अत: यूक्रेन जैसे शक्तिशाली देशों से उनके संबंध खराब होने लगे। इसका व्यापक असर  जल्द सामने आया और यूक्रेन की यूरोप समर्थित नीति खुलकर सामने आ गई। इसमें यूक्रेन की यूरोप के महत्वपूर्ण सहयोगी बनने के साथ ही नाटो का सदस्य बनने की इच्छा शामिल थी। 1949 में स्थापित नाटो यूरोप और उत्तरी अमेरिका के देशों के मध्य एक सैन्य गठबंधन है जिसका उद्देश्य साम्यवाद और रूस का प्रभाव कम करना रहा है। नाटो सामूहिक रक्षा के सिद्धांत पर काम करता है,जिसका तात्पर्य एक या अधिक सदस्यों पर आक्रमण सभी सदस्य देशों पर आक्रमण माना जाता है। नाटो की अपनी सेना है जिसमें सभी सदस्य देशों की सेना  की भागीदारी होती है। जब किसी मुद्दे पर राजनीतिक तरीके से समाधान नहीं निकलता है तो फिर उसके लिये  सैन्य ऑपरेशन का विकल्प आजमाया जाता है। अफगानिस्तान,इराक,सीरिया और आईएसआईएस समेत दुनिया के कई भागों में विभिन्न सैन्य अभियानों में नाटो की भागीदारी देखी गई है।


जाहिर है यूक्रेन का नाटो के साथ खड़े होने का संकल्प रूस के लिए संदेह बढ़ाता रहा है और इसी के परिणामस्वरूप क्रीमिया संकट उभर कर सामने आया था।  यह पूर्वी यूरोप  में यूक्रेन का एक स्वशासित अंग था। 2014 को हथियारबंद रूस समर्थकों ने यूक्रेन के क्रीमिया प्रायद्वीप में संसद और सरकारी इमारतों पर कब्जा कर लिया। यह सब बेहद सुनियोजित तरीके से किया गया जिसका उद्देश्य यूक्रेन को सबक सिखाना नजर आता था। क्रीमिया के आंतरिक हालात का फायदा उठाते हुए पुतिन ने वहां अपनी सेना भेजने में बिल्कुल देर नहीं की। रूस का कहना था की यूक्रेन वहां रहने वाले रूसी मूल के लोगों पर अत्याचार कर रहा है,ऐसे में रूसी मूल के लोगों के हितों की रक्षा करना रूस की जिम्मेदारी है। रूस ने इसके बाद राजनीतिक स्तर पर कदम उठाते हुए अन्य प्रयास करने से भी गुरेज नहीं किया और  क्रीमिया की संसद ने  रूसी संघ  का हिस्सा बनने के पक्ष में मतदान किया। इसी जनमत संग्रह के परिणामों को आधार बनाकर रूस ने यह घोषणा कर दी की अब क्रीमिया रूसी फेडरेशन का हिस्सा बन गया है। इस घटना से यूक्रेन और रूस के बीच तनाव गहरा गया जो बदस्तूर जारी है। रूस यूक्रेन को लेकर आक्रामक कूटनीति का प्रदर्शन करता रहा है और यूक्रेन से द्विपक्षीय संबंध बनाने वाले देशों पर भी दबाव बनाता रहा है।


दूसरी तरफ यूक्रेन के समर्थन में अमेरिका आक्रामक कूटनीति अपनाता रहा है। क्रीमिया के रूस में विलय को लेकर तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने रूस की कड़ी आलोचना करते हुए इसे अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। यूक्रेन का आरोप है कि रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी यूक्रेन को तोड़ने के लिए वहां रह रहे रूसी मूल के लोगों को भड़काने की योजना पर लगातार काम कर रही है। अमेरिका ने इसकी पुष्टि भी की है। इस समय जब यूक्रेन की सीमा पर भारी तनाव है,उसका असर अमेरिका और रूस के सम्बन्धों पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। इस साल अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के सत्ता में आने के बाद अमेरिका ने रूस के कई अधिकारियों को देश निकाला दे दिया है,वहीं रूस ने भी कुछ अमेरिका अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिए है।  यूक्रेन के समर्थन में अमेरिका ने सामरिक मदद देने कि बात कही है वहीं रूस ने अमेरिका से किसी भी आक्रामक कदम उठाने को लेकर आगाह किया है।


हालांकि पुतिन युग में वैश्विक स्तर पर रूस की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को देखकर लगता है कि यूक्रेन के संकट पर उसका रुख महज क्षेत्रीय प्रभुत्व कायम करने नीति से कहीं आगे बढ़कर है। रूस के राष्ट्रपति के तौर पर ताकतवर बनकर उभरे पुतिन कि अधिकनायकवादी नीतियों को उनके देश में व्यापक समर्थन हासिल है,इसके साथ ही विश्व में रूस के शक्ति प्रदर्शन को रूसी जनता द्वारा लगातार सराहा जा रहा है। इससे उत्साहित पुतिन अमरीका और नाटो को वैश्विक स्तर पर चुनौती देते हुए नजर आ रहे है। इसके साथ ही वे चीन से मिलकर अमेरिका के विरुद्द आर्थिक और सामरिक दबाव बनाने कि नीति पर भी लगातार काम कर रहे है।  यह समर्थन म्यांमार से लेकर ईरान और उत्तर कोरिया तक दिखाई देता है। अमेरिका और यूरोप से विभिन्न कारणों से प्रतिबंधित देश रूस के लिए सामरिक रूप से बड़े बाज़ार बन कर उभरे है। ईरान रूस से व्यापक हथियार खरीद रहा है और ऐसा माना जाता है कि उसके हथियारों को उन्न्त करने और परमाणु केन्द्रों को अत्याधुनिक करने में भी रूस गोपनीय तरीके से मदद कर रहा है।


   

इस बीच अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ एक शिखर बैठक करने का भी प्रस्ताव रखा है,अभी इन बैठकों कि तारीख और एजेंडा तय नहीं हुआ है,लेकिन दोनों महाशक्तियों के बीच होने वाली यह बैठक बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। इसमें यूक्रेन को लेकर क्या सहमति बनती है,यह देखना भी बड़ा दिलचस्प होगा। पिछले सालों में यूक्रेन ने अपनी सेना को अत्याधुनिक करने के साथ ही अमेरिका से सामरिक सहयोग बढ़ाया है। ऐसे समय में जब मध्य और पूर्वी यूरोप में दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच भू-राजनीतिक मुक़ाबला तेज़ हो रहा है और यूक्रेन पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मज़बूत करने की लगातार कोशिश कर रहा है,ऐसे में रूस पर सामरिक दबाव बनाने के लिए नाटो और अमेरिका के लिए यूक्रेन निर्णायक भूमिका में नजर आता है।  नाटो की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक समुद्री सुरक्षा है। जिसके लिये नाटो ने अटलांटिक महासागर और हिन्द महासागर को केंद्र में रखा है,यहीं नहीं उसके लिए काला सागर सामरिक रूप से बहुत  अहम है जो रूस और यूक्रेन से भी जुड़ा है। नाटो जमीन,आसमान,स्पेस और साइबर चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी सेना को अत्याधुनिक बनाने की ओर अग्रसर है,इसमें उसकी सीधी प्रतिद्वंदिता रूस और चीन से है।  काला सागर उत्तर-पूर्व में  रूस  और  यूक्रेन तथा  दक्षिण में तुर्की के बीच स्थित है। पिछले कुछ सालों में तुर्की के  राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन सुर्ख़ियों में  रहे है और उनकी विस्तारवादी नीतियां नाटो देशों के लिए चिंता का सबब बन गई है। तुर्की की सेना लीबिया,सीरिया और अज़रबैजान में जिस प्रकार सक्रिय रही और अर्दोआन ने अपनी विस्तारवादी नीति को बढ़ावा दिया  उसमें उसे कई मर्तबा रूस का समर्थन मिलता रहा है। आर्मेनिया और अज़रबैजान युद्द में तुर्की को रूस का समर्थन मिला और इसी कारण नागोर्नो और काराबाख़ क्षेत्र आर्मेनिया के हाथ से चला गया। अर्दोआन अपनी गनबोट कूटनीति से मुस्लिम राष्ट्रों का समर्थन का सपना देख रहे है और रूस के लिए मुस्लिम देश हथियारों का बड़ा बाज़ार है।


ऐसे में रूस न केवल यूक्रेन पर दबाव डाल रहा है बल्कि अपनी आक्रामक नीतियों से अमेरिका समेत नाटो को यह संदेश भी देने की कोशिश भी कर रहा है की जरूरत पड़ने पर उसे विश्व के कई देशों का समर्थन हासिल होगा। रूस आने वाले समय में यूक्रेन में राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देकर यूरोप के इस देश को अशांत कर सकता है और यहीं महाशक्तियों की नीतियां भी रही है। इस समूचे घटनाक्रम में यह भी साफ हो जाता है कि यूक्रेन की शुरुआती नीतियां नियंत्रण और संतुलन पर आधारित नहीं रही, इस नव राष्ट्र को भू राजनीतिक स्थिति को परखते हुए अपनी वैश्विक स्थिति को धीरे धीरे मजबूत करना था। लेकिन यूक्रेन की रूस से अलग होते ही उसके सामने खड़े होने की जल्दबाज़ी में वह नाटो और रूस के बीच प्रतिद्वंदिता का मैदान बन गया है। यह स्थिति जहां यूक्रेन के लिए घातक साबित हो रही है वहीं  पुतिन के लिए मुफीद है। वे यूक्रेन को तोड़कर उसके क्षेत्रों को रूस में मिलाने की नीति पर काम कर रहे है,इससे पुतिन की लोकप्रियता रूस में अभूतपूर्व तरीके से बढ़ सकती है,जिसे एलेक्‍सी नवलनी प्रकरण से धक्का पहुंचा था। जाहिर है पुतिन यूक्रेन संकट को बनाएं रखना चाहते है और इसका अपने देश में राजनीतिक और  वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक फायदा लेना चाहते है। पुतिन इस प्रकार कि कूटनीति के माहिर खिलाड़ी भी रहे है।


वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन के लिए यूक्रेन संकट का ठीक ढंग से समाधान करना बेहद जरूरी होगा। यदि पुतिन अपने इरादों में सफल हो गए तो इसका असर दक्षिण चीन सागर तक प्रभावित कर सकता है। ऐसे में रूस के प्रमुख सहयोगी के तौर पर उभरें चीन की अधिनायकवादी और आक्रामक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है। इससे व्यापक अमेरिकी हित प्रभावित हो सकते है और इससे विश्व शांति के समक्ष नई चुनौतियां भी बढ़ सकती है। 

brahmadeep alune

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

  सुबह सवेरे            मसला ये नहीं की दर्द कितना है , मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही...