म्यांमार में अब असहयोग आंदोलन,myanmar,ashayog aandolan gandhi

 राष्ट्रीय सहारा

                


यंगून के एक कस्बे से सुले पैगोडा की तरफ बढ़ता हुआ मार्च और इसमें शामिल हजारों शिक्षकों की अहिंसक भीड़ बेखौफ होकर म्यांमार के सैन्य शासन को चुनौती दे रही है भारत के इस पड़ोसी देश में गांधीवादी नेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी की लोकतांत्रिक सरकार की बहाली और सैन्य शासन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैइनमें भाग लेने वालों में सामान्य जनमानस के साथ विभिन्न सेवाओं में काम करने वाले लोग है। देश में स्वास्थ्य सेवाएं एकदम ठप्प हो गई है,डॉक्टर और नर्सों ने अस्पतालों में जाना बंद कर दिया है। मंडियों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर हड़ताल पर चले गए है,वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया है और वे सैन्य सरकार के खिलाफ रैलियां निकाल रहे है। लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज भेजना बंद कर दिया है। देश की आर्थिक व्यवस्थाएं बूरी तरह चरमरा गई है,बैंकों का कामकाज भी ठप्प पड़ गया है और बैंक अधिकारी ड्यूटी पर नहीं जाकर इन विरोध-प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैम्यांमार के यंगून, नेपीडव और मांडले जैसे शहरों के साथ देश के कई कस्बों और गांवों में सैन्य  शासन का विरोध अब जन आंदोलन बन गया है और सैन्य शासन के दबाव से भी कोई रुकने और झूकने को तैयार नहीं है

दरअसल 100 साल पहले महात्मा गांधी ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जो असहयोग आंदोलन चलाया था,म्यांमार के लोग सैन्य शासन के खिलाफ उसी प्रकार का जन आंदोलन कर सही मायनों में उसकी शताब्दी मना रहे है। ये बात और है की भारत में असहयोग आंदोलन के सौ साल पूरे होने पर इसके महत्व और प्रभाव को लेकर व्यापक प्रचार प्रसार की कोई भी सरकारी या सामाजिक योजना अब तक कहीं दिखाई नहीं दी है। जबकि यह दुनिया का एक ऐसा  अभूतपूर्व जन आन्दोलन था जिसमें महात्मा गांधी ने विरोध  की व्यापक और अनूठी परिभाषा गढ़ी थी और इसने ब्रिटिश सरकार को पस्त कर दिया था ब्रिटिश उपनिवेश और नीतियों के विरोध में शुरू हुए इस जन आंदोलन में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी वर्गों के लोग शामिल हुए थे इस आंदोलन में   छात्रों,सरकारी सेवा में काम करने वाले भारतीयों,किसानों,आदिवासियों समेत श्रमिक वर्ग ने भी व्यापक भागीदारी की थी। यह भारत का अंग्रेजों के खिलाफ प्रथम जन आंदोलन बन गया था। उस दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना  जांच के कारावास की अनुमति दे दी थी।

म्यांमार में इस समय सैन्य सरकार से असहयोग को लेकर सभी वर्गों के लोगों में अभूतपूर्व एकता और जागरूकता दिखाई दे रही है। वहीं म्यांमार की सैन्य सरकार ब्रिटिश सरकार की तरह ही लोगों को डरा रही है। लोगों से प्रदर्शन रोकने को कहा गया है और यह भी बताया गया है की सैन्य बलों को किसी भी तरह की बाधा पहुँचाने के लिए सात साल की सज़ा हो सकती हैजो लोग सार्वजनिक तौर पर डर या अशांति फैलाते हुए पाए जाएँगे उन्हें तीन साल की सज़ा हो सकती हैआम लोगों को चेतावनी दी गई है कि वो लोकतांत्रिक सरकार के कार्यकर्ताओं को भागने में या पनाह देने में मदद ना करें। म्यांमार के उस कानून को निरस्त कर दिया है,जिसके तहत लोगों को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में रखने के लिए कोर्ट के आदेश की जरूरत पड़ती थी  सैनिक रात को लोगों के घरों में जबरन घुसकर जांच अभियान चले रहे है और सैन्य सरकार के द्वारा यह भी प्रचारित किया जा रहा है की अब फ़ौज बिना कोर्ट के आदेश के किसी की भी निजी संपत्ति की जांच कर सकती है 

म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू ची नजरबंद है  वे देश की सर्वोच्च और व्यापक जनाधार वाली नेता है जो महात्मा गांधी के आदर्शों और मूल्यों से प्रेरणा लेकर सैन्य शासन से लगातार जूझती रही है अब म्यांमार के लोग अपनी प्रिय नेता की रिहाई और लोकतंत्र की बहाली के लिए महात्मा गांधी की असहयोग नीति का ही सहारा ले रहे है। आखिर असहयोग म्यांमार के लोगों के लिए बेहतर विकल्प क्यों बन गया है,यह जानना भी बेहद जरूरी है। वास्तव में किसी सरकार की वैधानिक और व्यापक शक्ति के आगे आम जनमानस बेहद कमजोर माना जाता है। वहीं सरकार के  समूचे तंत्र का संचालन करने के लिए इन्हीं लोगों की जरूरत होती है,जो विभिन्न कामों और अपनी भूमिका के जरिए शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन में भागीदार होते है। स्पष्ट है सरकार जनता के सहयोग से चलती है और इस सहयोग को रोककर किसी सरकार के आधार को प्रभावित किया जा सकता है। दूसरी और यह महसूस किया जाता है की पिछड़े और गरीब देशों में सांस्कृतिक बहुलता भी बेहद प्रभावी भूमिका अदा करती है और ऐसे में सभी समुदायों को किसी एक आंदोलन में शामिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सामने भी बेहद विषम परिस्थितियां थी लेकिन महात्मा गांधी के अनूठे प्रयोग और दूरदर्शिता से विभिन्नताओं में बिखरे समाज को एकाकार करने में बढ़ी मदद मिली। असहयोग आंदोलन के दौरान श्रमिकों,आदिवासियों और किसानों के साथ सभी समुदायों ने उपनिवेश का विरोध अहिंसक तरीके से किया और यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली बार एक ऐसा प्रभावी आंदोलन बन गया जिसे व्यापक जनाधार हासिल था।

म्यांमार में भौगोलिक जटिलता और समाज में व्यापक विविधता है। यहां बामर, राखीन,शान,सोम,करेन,रोहिंग्या,अराकानी और चीनी जातीय समूहों समेत करीब डेढ़ सौ जातीय समूह रहते है। इसके साथ ही कबीलाई समाज का सीमाई क्षेत्रों में बड़ा प्रभाव है।  म्यांमार की स्वभाव से ही उग्र और आक्रामक जनजातियों को ब्रिटिश सरकार ने एक दूसरे से संघर्षरत रखा जिससे ब्रिटेन अपने इस कठिन उपनिवेश में शासन का संचालन कर सके। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जहां भारत की विविधता का बेहतर तरीके से सम्हाला और देश की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित किया,वहीं म्यांमार के पहले प्रधानमंत्री देश की आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का हल ढूंढने में असमर्थ रहे। इस राजनीतिक अस्थिरता का फायदा सैन्य शासन ने उठाया और 1962 में लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट  करके सेना ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया इसके बाद लंबे समय से सेना का निरंकुश शासन लोग झेलने को मजबूर हो गए और लोकतंत्र समर्थकों को झेल में डाल दिया गया



इतिहास ने एक बार फिर करवट ली है। अब म्यांमार के सभी जातीय समूह अभूतपूर्व रूप से सैन्य सरकार का असहयोग आंदोलन के जरिए विरोध कर रहे है। यह अनूठा आंदोलन न केवल देश की बहुसांस्कृतिक विशेषताओं के बीच राष्ट्रीय एकता को मजबूत कर रहा है बल्कि लोकतांत्रिक म्यांमार के सुनहरे भविष्य की आशा भी दिखा रहा है।  2012 में न्यूयॉर्क में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित करते हुए म्यांमार की सर्वोच्च लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू ची ने कहा था की महात्मा गांधी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है उन्होंने छात्रों से भी आग्रह किया था कि वह गांधी के विचारों को पढ़ें और अपने व्यवहार में लाएं। दिलचस्प है की आंग सान सू ची के अपने देश के लोग ही महात्मा गांधी के मार्ग पर चल पड़े है

टिप्पणियां

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ऑपरेशन ब्लू स्टार -स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ना क्यों जरूरी था,operation blue star

असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां, rashtrvad aur vaishvik chunoutiyna

राष्ट्र के राजीव..rashtra ke rajiv