अस्थिर म्यांमार की चुनौती,myanmar bharat

राष्ट्रीय सहारा


                      

                                                                                

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का अंतिम लक्ष्य चाहे जो कुछ हो,शक्ति सदैव तात्कालिक उद्देश्य रखती है। म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर सैन्य सरकार का विकल्प वैश्विक समुदाय के लिए भले ही कड़ी आलोचना का कारण बन गया हो लेकिन संयुक्तराष्ट्र में निंदा प्रस्ताव को रोककर चीन ने अपनी कुटिलतापूर्ण सामरिक  नीति के जरिए म्यांमार की सैन्य सरकार को अपने प्रभाव में लिया है। इस प्रकार उत्तर पूर्व में एक बार फिर भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई है।  


 

दरअसल म्यांमार दक्षिण पूर्व एशिया का एकमात्र देश है जिसके साथ भारत की समुद्री और भू भागीय सीमा मिलती है। बंगाल की खाड़ी से जुड़े म्यांमार और भारत के मध्य लगभग 1600 किमी की लम्बी सीमा उत्तर पूर्वी राज्यों अरुणाचल,नागालैंड,मणिपुर,और मिजोरम आपस में मिलती है। भारत अपने इस सांस्कृतिक और सामरिक पड़ोसी देश में लोकतंत्र का समर्थक रहा है और इस कारण दोनों देशों के सम्बन्ध प्रभावित भी रहे है। 1962 में म्यांमार में जब सैन्य शासन लागू हुआ था तब भारत की कड़ी प्रतिक्रिया से दोनों देशों के सम्बन्ध प्रभावित हुए थे। जबकि चीन म्यांमार में सैन्य सरकार का सदा समर्थक रहा है जिससे वह बिना जनता के प्रतिरोध के इस देश में अपने सामरिक और आर्थिक हित पूरे कर सके। म्यांमार में प्राकृतिक गैस का भंडार भारी मात्रा में पाया जाता है। चीन कोको द्वीप पर अपना अड्डा स्थापित कर रहा है तथा धीरे धीरे म्यांमार को आर्थिक और सामरिक गिरफ्त में लेता जा रहा है। चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वकांक्षी योजना सीपीईसी को लेकर म्यांमार की लोकतांत्रिक सरकार ज्यादा उत्साहित नहीं थी जबकि चीन उस पर लगातार दबाव बना रहा था। चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी कुनमिंग से म्यांमार के दो मुख्य आर्थिक केंद्रों को जोड़ने के लिए लगभग 1700 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बनाया जाना है।  म्यांमार से चीन तक तेल गैस पाइपलाइन की योजना भी काम कर रही है। बंगाल की खाड़ी में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है।  चीन की पहुंच म्यांमार कॉरिडोर के माध्यम से हिंद महासागर तक हो जाने से भारत की सुरक्षा चिंताओं में भी इजाफा हुआ है जिसे समझकर सू की के नेतृत्व वाली सरकार चीन की भारत को घेरने की चीन की रणनीति को लगातार प्रभावित कर रही थी। 


म्यांमार की  भौगोलिक स्थिति भारत की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। म्यांमार भारत की पूर्व की ओर देखो विदेश नीति का प्रवेश द्वार है। भारत 1992 से अपनी पूर्व की ओर देखों नीति के अनुसार मणिपुर-म्यांमार थाईलैंड राजमार्ग का निर्माण करने को कृतसंकल्पित है। इसके अंतर्गत भारत के मोरे से लेकर थाईलैंड के माई सोट तक राजमार्ग बनाया जाएगा तथा इसके जरिए म्यांमार होते हुए भारत से थाईलैंड का सफर सड़क मार्ग से किया जा सकेगा। दोनों देशों के बीच 16 किलोमीटर के क्षेत्र में मुक्त आवागमन का प्रावधान है,सरहदी हॉट खुलने से व्यापार व्यवसाय में तेजी आने की उम्मीद बढ़ी है। यहीं नहीं दोनों देशों के साझा सैन्य अभियानों से पूर्वोत्तर के चीन-पाक-बंगलादेश समर्थित आतंकवाद पर गहरी चोट होती रही है। भारतीय सेना द्वारा 1995 का गोल्डन बर्ड ऑपरेशन के कारण आतंकवादियों का सफाया हो या साल 2015 में म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकियों को मार गिराने की सफलता,म्यांमार-भारत के आपसे सहयोग की यह मिसाल है। भारत के मिजोरम राज्य तथा म्यांमार के सितवे बंदरगाह को जोड़ने के लिए कलादान मल्टीमॉडल पारगमन परियोजना को विकसित किया जा रहा है। भारत ने म्यांमार की सड़क परियोजनाओं को भी बहुत मदद की है, जिससे आने वाले समय में इन परियोजनाओं से पूर्वोत्तर को बहुत फायदा होने की उम्मीद बढ़ी है।


इस समय भारत और चीन की सीमा पर गहरा तनाव है और ऐसे में म्यांमार की सैन्य सरकार से मजबूत सम्बन्ध बनाकर चीन भारत के लिए आंतरिक सुरक्षा का नया संकट बढ़ा सकता है। भारत सीमा के आसपास म्यांमार के सुरक्षा बलों की काफी कम तैनाती है,जिससे पूर्वोत्तर के अलगाववादी तत्व म्यांमार में आसानी से कैम्प स्थापित कर भारत में अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देते है। भारत और म्यांमार की सीमा के दोनों और नागा कुकी जनजातियों की बड़ी आबादी है,जिनके बीच सांस्कृतिक एवम् साझे सामाजिक सम्बन्ध है। इसलिए दोनों देशों के बीच 16 किमी के क्षेत्र में मुक्त आवागमन का प्रावधान है,रोहिंग्या घुसपैठ के लिए यह रास्ता अनुकूल माना जाता है। म्यांमार की सरकार भी रोहिंग्या के प्रति कड़ा रुख अपनाएं हुए है,ऐसे में रोहिंग्या वहां से भाग कर भारत आ गये है और उनके भारत में कई आतंकी हमलों में संलिप्त रहने की जानकारी सामने आई है।



पूर्वोत्तर की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में पृथकतावादी संगठनों से भारत को सुरक्षा चुनौतियां मिलती रही है। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, एनडीएफबी,पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपक,कांगलीपक कम्युनिस्ट पार्टी,मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट,ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स,नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा जैसे आतंकी और अलगाववादी संगठनों शामिल है। इन इलाकों में सामाजिक,सांस्कृतिक,सामरिक जटिलताओं और प्रतिकूल परिस्थितियों में सुरक्षा बलों के लिए म्यांमार से मजबूत सामरिक सम्बन्ध होना बेहद आवश्यक है। जिससे सीमा पार जाकर भी इन अलगाववादी संगठनों पर दबाव बनाया जा सके।  इन गुटों को चीन से हथियार मिलते रहे है और म्यांमार की ओर से इन्हें ढील मिलने पर भारत में माओवाद का प्रभाव बढ़ सकता है।

भारत और म्यांमार के संबंधों को खराब करने के लिए चीन वहां रहने वाले हिन्दुओं पर भी आतंकी हमले करवा सकता है। इस समय म्यांमार में तकरीबन ढाई लाख हिन्दू रहते है जबकि म्यांमार के चरमपंथ प्रभावित रखाइन में करीब 10 हजार हिन्दू रहते है। म्यांमार में प्रभावशील चरमपंथी  अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी ने सेना से युद्द और संघर्ष की आड़ में कुछ साल पहले हिन्दुओं को इसीलिए निशाना बनाया है,जिससे न केवल भारत और म्यांमार के संबंध खराब हो बल्कि बौद्ध और हिन्दुओं में भी धार्मिक उन्माद फैले। यह हत्या अगस्त 2017 में की गई थी,जिसकी पुष्टि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी की थी।  आतंकी संगठन अराकन रोहिंग्या सालवेशन आर्मी म्यांमार में सेना पर हमले करने के लिए जिम्मेदार रही है और उसके सम्बन्ध पाकिस्तान से माने जाते है। इस आतंकी संगठन का अगुआ कराची का रहने वाला है और जमात उद दावा के हाफिज सईद के प्रभाव में है। म्यांमार में अब सैन्य सरकार आने से परिस्थितियां तेजी से बदल सकती है और चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत और म्यांमार के बीच सम्बन्ध खराब करने के लिए हिन्दुओं को निशाना बनाने की रणनीति पर भी काम कर सकते है।



अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है की विदेश नीति सम्बन्धी निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर किये जाने चाहिए,न की नैतिक सिद्धांतों और भावनात्मक मान्यताओं के आधार पर। भारत के सामने पूर्वोत्तर में परिस्थितियां जटिल हुई है और भारतीय सरकार को राष्ट्रीय हितों के लिए बदली हुई परिस्थितियों में म्यांमार के साथ संबंधों को संतुलित रखना होगा। ऐसा लगता है की इस समय भारत की लोकतांत्रिक सरकार म्यांमार से अपने संबंधों को वहां के आंतरिक परिवर्तन से प्रभावित न होने देने  को अपने राष्ट्रीय हितों के लिए तरजीह दे रही है। इसीलिए भारत ने म्यांमार के सैन्य शासन की आलोचना से बचते हुए सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। लेकिन इन सबके बीच म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार की बिदाई भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण है और भविष्य में म्यांमार से लगती सीमा पर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होगी।

टिप्पणियां

Unknown ने कहा…
Very nice thought.
Unknown ने कहा…
Nice Article.

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