अहम और वहम के बीच आंदोलन, kisan aandolan

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मेरे एक फोन से दूर है किसान,प्रधानमंत्री का यह संदेश जितना राहत देने वाला है उतना ही आश्चर्यचकित भी कर रहा है। तीसरे महीने में प्रवेश कर चूका ऐसा जन आन्दोलन जिसकी दुनियाभर में चर्चा है,इस आंदोलन से लाखों लोग प्रभावित हो रहे है। कुछ लोग मर भी चूके है,खालिस्तान जैसे मुद्दे के उभार की आशंका भी खतरनाक है। गणतन्त्र दिवस पर शानदार परेड के लिए जानी जानी वाली दिल्ली में हिंसा  का मंजर और इसके बाद किसानों को लेकर समाज के व्यापक बंटने को लेकर आशंकाएं बलवती हो रही है। इन सब समस्याओं का समाधान यदि प्रधानमंत्री के फोन से होना है तो फिर इसमें देरी क्यों हो रही है। अंततः लोकतंत्र में समस्याओं के समाधान का रास्ता संवाद से ही खुलता है,इसलिए सरकार और किसानों की ओर से हर मुमकिन कोशिश की जाती रहनी चाहिए।


किसी लोकतांत्रिक देश में आंदोलन होते रहने चाहिए ,यह हर प्रकार से देश को जागरूक करते है और इससे लोकमत मजबूत ही होता है। इसलिए आंदोलनों को लेकर आम जनमानस की सामान्य दृष्टि होना चाहिए और यह देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी भी है। भारत में जन आंदोलनों का इतिहास रहा है और विभिन्न सरकारों ने इसकी गंभीरता को समझा भी है। लेकिन आन्दोलनों को लेकर व्यापक दूर दृष्टि की जरूरत हमेशा महसूस की गई है। नक्सलबाड़ी आंदोलन को लेकर दूर दृष्टि का अभाव आत्मघाती साबित हुआ और इससे उत्पन्न हिंसा की समस्या से देश कई दशकों से जूझने को मजबूर है।


किसान आंदोलन, किस राज्य से है यह कभी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है  की भारत गांवों का देश है और अधिकांश जनता गांवों में रहती है जिनके जीवन का आधार ही खेती है। भारत का आम जन इस अनुभव से दो चार है की आज़ादी के आठवे दशक तक आते आते सरकारों की प्राथमिक कार्य योजना में शहरों का विकास रहा है और गांव आज भी विकास से कोसो दूर है। जाहिर है इसका प्रभाव किसानों पर भी पड़ा है और वे किसी आशंका में पड़ने के स्थान पर सुरक्षित मार्ग पसंद करते है। इस आंदोलन से आशंकित किसान है और उनका संतुष्ट होना देश के लोकतंत्र को ही मजबूत करेगा। भारत का लोकतंत्र चाहे जिस मॉडल पर आधारित हो लेकिन किसानों और गांवों को देखने की हमारी दृष्टि गांधीवादी होना चाहिए।


गांधीवादी लोकतंत्र का रास्ता गांव से शुरू होकर शहर की ओर जाता है जबकि भारत का विकास शहरीकरण पर आधारित रहा जो समय के साथ और पुख्ता होता चला।  इसका प्रभाव भारत की आत्मा कहे जाने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ना ही था। जिस साल पूर्ण संविधान लागू हुआ उस समय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान तक़रीबन 55 फीसदी था। अब यह घटकर 13 फीसदी तक आ गया है।  लेकिन आज भी देश की श्रम शक्ति का लगभग 53 फीसदी भाग कृषि और इससे संबंधित उद्योग धंधों से अपनी आजीविका कमाता है और निजी क्षेत्र का यह सबसे बड़ा अकेला व्यवसाय है जिससे करोड़ों लोगों के जीवन की दशा और दिशा तय होती है। भारत के औद्योगिक विकास में भी कृषि का अहम योगदान है। उद्योगों को कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है,फिर चाहे वह वनस्पति तथा बागान उद्योग हो या सूती वस्त्रों पर आधारित उद्योग।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद भारत के किसान सामन्ती और पूंजीवादी व्यवस्था से आशंकित हैइसका एक कारण यह भी है की उन्हें वह विश्वास हासिल नहीं है जो ग्राम स्वराज दे सकता है वैसे किसानों को शोषण की समस्या से कई सदियों से जूझना पड़ा है,अत: अन्य समुदायों से ज्यादा वे व्यवस्था परिवर्तन पर बेचैन हो जाते है और उनकी यह बैचेनी निर्मूल भी नहीं हैअंततः किसान शोषण  से अभिशिप्त ही रहा है समाजवाद का आधार समानता है इसलिए भारत ने समाजवाद को अंगीकार कर गांधी के समन्वय को संविधानिक आदर्श के रूप में ढालने का प्रयास किया। इसमें पूंजीपति तो बने और सुरक्षित रहे लेकिन उनके व्यवस्था पर हावी होने की उतनी आशंका कभी भी नहीं गहराई,जितनी इस समय देखी जा रही है।


आज़ाद भारत में गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा जैसी समस्याएं मुंह बाएं खड़ी है अत: एक विचार यह भी बना हुआ है की राष्ट्रीय क्रांति और सामाजिक क्रांति के स्वदेशी तरीकों का उपयोग बद्दस्तूर जारी रहे। यह तरीके पूंजीवादी ताकतों के ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हावी होने के संकेत देने वाले नहीं हो सकते है बापू ने अर्थव्यवस्था को सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित करके स्वावलंबी और आत्मनिर्भर भारत बनाने का संदेश दिया था महात्मा गांधी का लोकतंत्र समभाव,सहभागिता और भागीदारी पर आधारित रहा। बहुमत की सत्ता और लोकतंत्र को राज्य द्वारा नियंत्रित करने की नीति के वे आलोचक रहे,आधुनिक लोकतंत्र को राज्य द्वारा नियंत्रित  किए जाने की आशंका सदा बनी रहती है। महात्मा गांधी बहुमत के शासन से उभरने वाले अधिनायकवादी नेतृत्व के प्रति आशंकित थे और वे इसीलिए दलविहीन लोकतांत्रिक प्रक्रिया चाहते थे आज भी ग्राम पंचायतों में दल के आधार पर चुनाव नहीं लड़े  जाते और महात्मा गांधी देश में भी कुछ ऐसा ही लोकतंत्र चाहते थे

हम यह भूल नहीं सकते की दुनिया में भारत को गांधी के नाम से पहचाना जाता है लेकिन यदि यह वास्तव में महात्मा गांधी का गणतन्त्र होता तो उस पर ट्रैक्टर का कभी भार नहीं होता और किसान दिल्ली की सड़कों पर नहीं बल्कि अपने खुशहाल गांवों में तिरंगा फहरा रहे होते। आवश्यकता इस बात की है की किसान संवाद का रास्ते पर आगे बढ़ते रहे वही सरकार को भी यह समझना होगा की देश की समस्याओं का हल सिर्फ संसद में बहुमत से नहीं हो सकता,आम राय की जरूरत को कभी नजरअंदाज नही की जाना चाहिए। यह किसान आंदोलन न केवल संसदीय प्रणाली को चुनौती दे रहा है बल्कि यह सबक भी दे रहा है की भारत के विकास को ग्रामों से जोड़ना होगा। यदि गांव विकसित हो गए तो किसानों की आशंकाएं भी कम होगी और वर्तमान जैसी समस्याओं से सरकार को दो चार नहीं होना पड़ेगा। लेकिन गांवों और कृषि के विकास का संबंध पूंजीवादी व्यवस्था  के उभार से कभी नहीं होना चाहिए।  फ़िलहाल समस्या और गतिरोध पूंजीवादी आशंकाओं को लेकर है और उसके जवाब हमें संवाद और समाजवादी ढांचे में ही ढूंढने होंगे।

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