अमेरिका की यमन नीति

 

जनसत्ता

 

 

                          


 

राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कूटनीतिक,आर्थिक,सैनिक और मनौवैज्ञानिक साधनों का प्रयोग  बेहद रणनीतिक तरीके से किया जाना चाहिएअमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ है और ट्रम्प प्रशासन से उलट उनकी नीतियों में यह दिखाई भी दे रहा है


दरअसल बाइडेन ने पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अरब देशों के साथ किए गए अरबों डॉलर के सैन्य समझौतों की समीक्षा करने की बात कहकर यमन युद्ध में सऊदी अरब के लिए अमेरिकी सहयोग रोकने की घोषणा की हैयमन दक्षिण पश्चिम एशिया का एक ऐसा देश है जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है,यह देश पिछले एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता और जातीय संघर्ष से बूरी तरह जूझ रहा हैयहां युद्द के मैदान में शिया और सुन्नी ताकतें एक दूसरे के सामने हैपिछले पांच छह सालों से सऊदी अरब के नेतृत्व वाला गठबंधन हूथी विद्रोहियों पर हमले कर रहा हैइस गठबंधन  में अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस जैसे राष्ट्र शामिल है और अब अमेरिका ने यमन समस्या के सैनिक समाधान के  बदले कूटनीतिक प्रयास तेज करने का इरादा जताया है अमेरिका के पारम्परिक साझेदार सऊदी अरब के लिए बाइडेन की नई नीति झटका मानी जा रही है,वहीं वैश्विक राजनीति में इसके गहरे निहितार्थ देखे जा सकते है

यमन के बड़े क्षेत्र पर हूथियों का कब्जा है और इनकी राजनीतिक विचारधारा शाही शासन के खिलाफ हैयमन के विभिन्न जातीय समूहों पर सऊदी अरब और ईरान का बड़ा प्रभाव है और इन राष्ट्रों के हितों का खमियाजा यमन को भोगना पड़ रहा है यह देश गृहयुद्ध के बाद से बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है,लाखों लोग मारे जा चूके है तथा लाखों नागरिक विस्थापित होकर दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर है आम नागरिक सैन्य समूहों का निशाना बन रहे है सऊदी अरब समर्थित राष्ट्रपति मंसूर हादी की नीतियों से नाराज होकर शिया समर्थक  हूथी विद्रोहियों ने जो संघर्ष शुरू किया था,उसके बाद हादी को देश छोड़कर भागने को मजबूर  होना पड़ा था और इस समय हूथी विद्रोहियों का देश के अधिकतर हिस्सों पर नियंत्रण है। इन सबके बीच सऊदी अरब की आक्रामक नीति से यमन के हालात बेहद बिगड़ गए है इस समय यमन के प्रधानमंत्री मइन अब्दुलमलिक सईद है जिन्हें सऊदी अरब का समर्थक माना  जाता है और वे भी हूथी विद्रोहियों के निशाने पर है



यमन की आंतरिक राजनीति में बड़ी जटिलता रही है और शिया यहां बड़ा जातीय समूह है, जबकि सत्ता पर सुन्नी समर्थकों का कब्जा रहा हैशिया समर्थक हूथी शाही शासन के खिलाफ है दिलचस्प है की सऊदी अरब शाही शासन का प्रतिनिधित्व करता है और यमन से उसकी सीमाएं लगी हुई हैसऊदी अरब जहां सुन्नी मुसलमानों के नेतृत्व को तरजीह देता है वही हूथी शिया मुसलमान माने जाते है और उन्हें ईरान का समर्थन हासिल हैइसी कारण यमन शिया और सुन्नी प्रतिद्वंदिता के चलते युद्द का मैदान बन गया है ट्रम्प प्रशासन ईरान के खिलाफ सख्त नीति अपनाएं हुए था वहीं बाइडेन इस मामले में ओबामा के ज्यादा करीब नजर आते हैओबामा काल में उपराष्ट्रपति रहे बाइडेन ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के पारित होने में भी अहम भूमिका निभाई थी यह एक ऐसा अनूठा समझौता माना जाता है जिसके बाद अप्रत्याशित रूप से भारत अपने सामरिक मित्र रूस से दूर होकर अमेरिका का रणनीतिक साझेदार बन गयाजबकि इसके पहले भारत अमेरिका संबंधों को देखते हुए  यह नामुमकिन थाअब अमेरिका ने हिन्द महासागर में भारत के सहयोग से चीन को जो क्वाड की चुनौती पेश की है वह पूरी योजना  बाइडेन की रणनीतिक समझ से ही परवान चढ़ सकी यहीं नहीं  2015 में ओबामा काल में ईरान  के साथ परमाणु समझौता करने में भी बाइडेन ने ही बड़ी भूमिका निभाई थी जिसके बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा बंद कर दिया था और बचे हुए हिस्से की निगरानी अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षकों से कराने पर राज़ी हो गया था। इस समझौते पर जर्मनी,चीन,अमरीका,फ्रांस,ब्रिटेन और रूस क साथ ईरान ने हस्ताक्षर  किये थे,जिसके तहत ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के बदले उसे परमाणु कार्यक्रमों पर नियंत्रण लगाना थाईरान के साथ इस समझौते में वैश्विक शक्तियां भी शामिल हुई थी और इस  परमाणु समझौते को मध्य पूर्व में शांति स्थापना की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना गया थाबाद में डोनाल्ड ट्रंप ने इसे बड़ी भूल बताते हुए अमेरिका को उस समझौते से अलग कर दिया था और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थेट्रम्प की मध्य पूर्व को लेकर इन नीतियों की यूरोपीय यूनियन ने कड़ी आलोचना की थी


ओबामा मध्य एशिया में शांति की स्थापना के लिए जहां कृत संकल्पित नजर आये वहीं ट्रम्प का रुख बेहद आक्रामक होकर एकतरफा नजर आया। उन्होंने  अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए सऊदी अरब को चुना और 110 अरब डॉलर के अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े सैन्य सौदे पर हस्ताक्षर किएइससे अमेरिका की उस मध्य पूर्व नीति को बल मिला जिसमें सऊदी अरब की तरफ़ पूरी तरह झुकाव था और ईरान पर अधिकतम दबाव। यमन को लेकर अमेरकी राष्ट्रपति बाइडेन की नीति से न केवल ईरान अमेरिका संबंधों में गर्माहट आ सकती है बल्कि इसका असर कई क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में इस समय सबसे बड़ी चुनौती रूस और चीन की है और वे अमेरिका ईरान विवाद का भरपूर फायदा उठा रहे है। यह देखा गया है की अमेरिका और ईरान के संबंधों में तल्खी का फायदा रूस और चीन को मिल रहा है और यह दोनों देश सामरिक रूप से अरब इलाके में लगातार मजबूत हो रहे हैईरान ने चीन और रूस के साथ सामरिक और आर्थिक भागीदारी लगातार बढाई है  वैश्विक प्रतिबंधों के बीच भी ईरान को इन दोनों देशों का भरपूर समर्थन और मदद मिलती रही है ईरान को लगता है कि वो पश्चिम के नुक़सान को चीनी निवेश और उसे तेल बेचकर भरपाई कर लेगा 2015 में जब ईरान के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था तो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संबंधों के दायरे को और बढ़ाने पर सहमति बनाई थी इसके बाद दोनों देशों के बीच कथित रूप से लायन-ड्रैगन डील भी हुई जिसे अमेरिकी वर्चस्ववाद को रोकने की बड़ी कोशिश बताया जा रहा है,इस डील के अनुसार ढाई दशकों में ऊर्जा,सुरक्षा और आर्थिक मामलों में चीन और ईरान के बीच बड़ा सहयोग बढने की संभावना बताई गई है


इसी प्रकार ईरान और रूस के बीच भी सम्बन्ध लगातार मजबूत हुए है  रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ईरान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक डॉ मोहसिन फखरीजादेह और अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए ईरानी सेना के जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या की निंदा  कर रूस और ईरान के बीच मजबूत संबंधों  को मील का पत्थर बताया था। रूस और ईरान के बीच भौगोलिक रूप से भी सम्बन्धों को मजबूत करने वाले तत्व मौजूद है मास्को को कैस्पियन,काला,बाल्टिक,श्वेत सागर और लाडोगा झील जैसे पांच सागरों का पत्तन कहा जाता है। इस सागरों से लगते देशों के साथ रूस के संबंध और उसके प्रभाव से रूस के वैश्विक प्रभुत्व का पता चलता है। इन क्षेत्रों के अधिकांश इस्लामिक देशों से रूस के मजबूत सम्बन्ध है। अमेरिका की आँख में चुभने वाला ईरान कैस्पियन सागर के तट पर है, जो रूस का सामरिक मित्र है। अमेरिकी के द्वारा ईरान पर बनाएं जा रहे दबाव को ख़ारिज करते हुए पुतिन ने ईरान के साथ रणनीतिक सम्बन्धों को मजबूती दी है। इसके साथ ही रूस ने ईरान और चीन के साथ हिंद महासागर और ओमान की खाड़ी में चार दिवसीय संयुक्त सैन्य अभ्यास कर अमेरिकी नीतियों को चुनौती देने से भी गुरेज नहीं किया इस समय रूस ईरान को सबसे ज्यादा हथियार देने वाला देश भी है

अब बाइडेन यमन में शांति स्थापित करने के लिए हूथी विद्रोहियों पर हमले रोककर ईरान को नियंत्रित और संतुलित करने की ओर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैलाल सागर और हिंद महासागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरूमध्य पर यमन स्थित है और यहां से दुनिया का दो तिहाई तेल गुजरता है एशिया से यूरोप और अमरीका जाने वाले जहाज भी जाते हैं  समुदी व्यापार  की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस इलाके पर महाशक्तियों की गहरी नजर और व्यापारिक हित रहे है। अमेरिकी हितों के लिए इस इलाके में रूस और चीन का मजबूत होना चुनौतीपूर्ण बन गया है। वहीं ऐसा भी लगता है की हूती विद्रोहियों से बेहतर संबंध अमेरिका के लिए सामरिक और आर्थिक रूप से ज्यादा मददगार हो सकते हैहूथियों की सैन्य ताकत को कम नहीं आंका जा सकता इसमें यमन की  सेना के बेहद प्रशिक्षित और हथियार चलाने में दक्ष सैनिक शामिल है



माना जाता है की  हूथी विद्रोहियों के पास एक लाख 80 हजार से लेकर दो लाख लोगों वाली सेना हैसेना के ये जवान टैंक चलाने,एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल चलाने,लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल चलाने से लेकर तकनीकी वाहन तक को चलाने में सक्षम हैं उन्होंने प्रमुख आबादी वाले जगहों सहित यमन के लगभग एक तिहाई क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है



दूसरी और सऊदी अरब को लेकर जो बाइडेन के अविश्वास का कारण सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की  व्यापारिक नीतियां भी है,जो उन्हें रूस के करीब बताती रही है। 2018 में हुए जी20 सम्मेलन में  रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने जिस प्रकार की गर्म जोशी दिखाई थी,उसने सबको अचरज में डाल दिया था2015 में सत्ता में आने के बाद से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने एक उग्र सुधारक के रूप में अपनी छवि बनानी शुरू की थी और उनके कार्यो पर शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन  की छवि का असर देखा गया हैट्रम्प एक बिजनेसमैन की तरह राजनयिक व्यवहार करते रहे,अत: उन्होंने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान  को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जबकि बाइडेन का अलग रुख सामने आ रहा है बाइडेन प्रशासन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से ज्यादा किंग सलमान को तरजीह दे रहा है और अमेरिका द्वारा इसकी बाकायदा घोषणा भी कर दी गई है। जाहिर है जो बाइडेन यमन में शांति बहाल करके अरब क्षेत्र में अपने प्रभाव को मजबूत करके सऊदी अरब पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहते है,वहीं ईरान को लेकर उनकी नीति में संतुलन दिखाई पड़ सकता है यमन को लेकर अमेरिका  की इस नीति से मध्य पूर्व  में शांति की स्थापना की उम्मीदें बढ़ गई है

 

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