मंगलवार, 23 फ़रवरी 2021

अमेरिका की यमन नीति

 

जनसत्ता

 

 

                          


 

राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कूटनीतिक,आर्थिक,सैनिक और मनौवैज्ञानिक साधनों का प्रयोग  बेहद रणनीतिक तरीके से किया जाना चाहिएअमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडेन को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ है और ट्रम्प प्रशासन से उलट उनकी नीतियों में यह दिखाई भी दे रहा है


दरअसल बाइडेन ने पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अरब देशों के साथ किए गए अरबों डॉलर के सैन्य समझौतों की समीक्षा करने की बात कहकर यमन युद्ध में सऊदी अरब के लिए अमेरिकी सहयोग रोकने की घोषणा की हैयमन दक्षिण पश्चिम एशिया का एक ऐसा देश है जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है,यह देश पिछले एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता और जातीय संघर्ष से बूरी तरह जूझ रहा हैयहां युद्द के मैदान में शिया और सुन्नी ताकतें एक दूसरे के सामने हैपिछले पांच छह सालों से सऊदी अरब के नेतृत्व वाला गठबंधन हूथी विद्रोहियों पर हमले कर रहा हैइस गठबंधन  में अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस जैसे राष्ट्र शामिल है और अब अमेरिका ने यमन समस्या के सैनिक समाधान के  बदले कूटनीतिक प्रयास तेज करने का इरादा जताया है अमेरिका के पारम्परिक साझेदार सऊदी अरब के लिए बाइडेन की नई नीति झटका मानी जा रही है,वहीं वैश्विक राजनीति में इसके गहरे निहितार्थ देखे जा सकते है

यमन के बड़े क्षेत्र पर हूथियों का कब्जा है और इनकी राजनीतिक विचारधारा शाही शासन के खिलाफ हैयमन के विभिन्न जातीय समूहों पर सऊदी अरब और ईरान का बड़ा प्रभाव है और इन राष्ट्रों के हितों का खमियाजा यमन को भोगना पड़ रहा है यह देश गृहयुद्ध के बाद से बर्बादी के कगार पर पहुंच गया है,लाखों लोग मारे जा चूके है तथा लाखों नागरिक विस्थापित होकर दोयम दर्जे का जीवन जीने को मजबूर है आम नागरिक सैन्य समूहों का निशाना बन रहे है सऊदी अरब समर्थित राष्ट्रपति मंसूर हादी की नीतियों से नाराज होकर शिया समर्थक  हूथी विद्रोहियों ने जो संघर्ष शुरू किया था,उसके बाद हादी को देश छोड़कर भागने को मजबूर  होना पड़ा था और इस समय हूथी विद्रोहियों का देश के अधिकतर हिस्सों पर नियंत्रण है। इन सबके बीच सऊदी अरब की आक्रामक नीति से यमन के हालात बेहद बिगड़ गए है इस समय यमन के प्रधानमंत्री मइन अब्दुलमलिक सईद है जिन्हें सऊदी अरब का समर्थक माना  जाता है और वे भी हूथी विद्रोहियों के निशाने पर है



यमन की आंतरिक राजनीति में बड़ी जटिलता रही है और शिया यहां बड़ा जातीय समूह है, जबकि सत्ता पर सुन्नी समर्थकों का कब्जा रहा हैशिया समर्थक हूथी शाही शासन के खिलाफ है दिलचस्प है की सऊदी अरब शाही शासन का प्रतिनिधित्व करता है और यमन से उसकी सीमाएं लगी हुई हैसऊदी अरब जहां सुन्नी मुसलमानों के नेतृत्व को तरजीह देता है वही हूथी शिया मुसलमान माने जाते है और उन्हें ईरान का समर्थन हासिल हैइसी कारण यमन शिया और सुन्नी प्रतिद्वंदिता के चलते युद्द का मैदान बन गया है ट्रम्प प्रशासन ईरान के खिलाफ सख्त नीति अपनाएं हुए था वहीं बाइडेन इस मामले में ओबामा के ज्यादा करीब नजर आते हैओबामा काल में उपराष्ट्रपति रहे बाइडेन ने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के पारित होने में भी अहम भूमिका निभाई थी यह एक ऐसा अनूठा समझौता माना जाता है जिसके बाद अप्रत्याशित रूप से भारत अपने सामरिक मित्र रूस से दूर होकर अमेरिका का रणनीतिक साझेदार बन गयाजबकि इसके पहले भारत अमेरिका संबंधों को देखते हुए  यह नामुमकिन थाअब अमेरिका ने हिन्द महासागर में भारत के सहयोग से चीन को जो क्वाड की चुनौती पेश की है वह पूरी योजना  बाइडेन की रणनीतिक समझ से ही परवान चढ़ सकी यहीं नहीं  2015 में ओबामा काल में ईरान  के साथ परमाणु समझौता करने में भी बाइडेन ने ही बड़ी भूमिका निभाई थी जिसके बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा बंद कर दिया था और बचे हुए हिस्से की निगरानी अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षकों से कराने पर राज़ी हो गया था। इस समझौते पर जर्मनी,चीन,अमरीका,फ्रांस,ब्रिटेन और रूस क साथ ईरान ने हस्ताक्षर  किये थे,जिसके तहत ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के बदले उसे परमाणु कार्यक्रमों पर नियंत्रण लगाना थाईरान के साथ इस समझौते में वैश्विक शक्तियां भी शामिल हुई थी और इस  परमाणु समझौते को मध्य पूर्व में शांति स्थापना की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना गया थाबाद में डोनाल्ड ट्रंप ने इसे बड़ी भूल बताते हुए अमेरिका को उस समझौते से अलग कर दिया था और ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थेट्रम्प की मध्य पूर्व को लेकर इन नीतियों की यूरोपीय यूनियन ने कड़ी आलोचना की थी


ओबामा मध्य एशिया में शांति की स्थापना के लिए जहां कृत संकल्पित नजर आये वहीं ट्रम्प का रुख बेहद आक्रामक होकर एकतरफा नजर आया। उन्होंने  अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए सऊदी अरब को चुना और 110 अरब डॉलर के अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े सैन्य सौदे पर हस्ताक्षर किएइससे अमेरिका की उस मध्य पूर्व नीति को बल मिला जिसमें सऊदी अरब की तरफ़ पूरी तरह झुकाव था और ईरान पर अधिकतम दबाव। यमन को लेकर अमेरकी राष्ट्रपति बाइडेन की नीति से न केवल ईरान अमेरिका संबंधों में गर्माहट आ सकती है बल्कि इसका असर कई क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है अमेरिका के लिए मध्य पूर्व में इस समय सबसे बड़ी चुनौती रूस और चीन की है और वे अमेरिका ईरान विवाद का भरपूर फायदा उठा रहे है। यह देखा गया है की अमेरिका और ईरान के संबंधों में तल्खी का फायदा रूस और चीन को मिल रहा है और यह दोनों देश सामरिक रूप से अरब इलाके में लगातार मजबूत हो रहे हैईरान ने चीन और रूस के साथ सामरिक और आर्थिक भागीदारी लगातार बढाई है  वैश्विक प्रतिबंधों के बीच भी ईरान को इन दोनों देशों का भरपूर समर्थन और मदद मिलती रही है ईरान को लगता है कि वो पश्चिम के नुक़सान को चीनी निवेश और उसे तेल बेचकर भरपाई कर लेगा 2015 में जब ईरान के साथ परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर हुआ था तो चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संबंधों के दायरे को और बढ़ाने पर सहमति बनाई थी इसके बाद दोनों देशों के बीच कथित रूप से लायन-ड्रैगन डील भी हुई जिसे अमेरिकी वर्चस्ववाद को रोकने की बड़ी कोशिश बताया जा रहा है,इस डील के अनुसार ढाई दशकों में ऊर्जा,सुरक्षा और आर्थिक मामलों में चीन और ईरान के बीच बड़ा सहयोग बढने की संभावना बताई गई है


इसी प्रकार ईरान और रूस के बीच भी सम्बन्ध लगातार मजबूत हुए है  रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने ईरान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिक डॉ मोहसिन फखरीजादेह और अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए ईरानी सेना के जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या की निंदा  कर रूस और ईरान के बीच मजबूत संबंधों  को मील का पत्थर बताया था। रूस और ईरान के बीच भौगोलिक रूप से भी सम्बन्धों को मजबूत करने वाले तत्व मौजूद है मास्को को कैस्पियन,काला,बाल्टिक,श्वेत सागर और लाडोगा झील जैसे पांच सागरों का पत्तन कहा जाता है। इस सागरों से लगते देशों के साथ रूस के संबंध और उसके प्रभाव से रूस के वैश्विक प्रभुत्व का पता चलता है। इन क्षेत्रों के अधिकांश इस्लामिक देशों से रूस के मजबूत सम्बन्ध है। अमेरिका की आँख में चुभने वाला ईरान कैस्पियन सागर के तट पर है, जो रूस का सामरिक मित्र है। अमेरिकी के द्वारा ईरान पर बनाएं जा रहे दबाव को ख़ारिज करते हुए पुतिन ने ईरान के साथ रणनीतिक सम्बन्धों को मजबूती दी है। इसके साथ ही रूस ने ईरान और चीन के साथ हिंद महासागर और ओमान की खाड़ी में चार दिवसीय संयुक्त सैन्य अभ्यास कर अमेरिकी नीतियों को चुनौती देने से भी गुरेज नहीं किया इस समय रूस ईरान को सबसे ज्यादा हथियार देने वाला देश भी है

अब बाइडेन यमन में शांति स्थापित करने के लिए हूथी विद्रोहियों पर हमले रोककर ईरान को नियंत्रित और संतुलित करने की ओर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैलाल सागर और हिंद महासागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाले जलडमरूमध्य पर यमन स्थित है और यहां से दुनिया का दो तिहाई तेल गुजरता है एशिया से यूरोप और अमरीका जाने वाले जहाज भी जाते हैं  समुदी व्यापार  की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस इलाके पर महाशक्तियों की गहरी नजर और व्यापारिक हित रहे है। अमेरिकी हितों के लिए इस इलाके में रूस और चीन का मजबूत होना चुनौतीपूर्ण बन गया है। वहीं ऐसा भी लगता है की हूती विद्रोहियों से बेहतर संबंध अमेरिका के लिए सामरिक और आर्थिक रूप से ज्यादा मददगार हो सकते हैहूथियों की सैन्य ताकत को कम नहीं आंका जा सकता इसमें यमन की  सेना के बेहद प्रशिक्षित और हथियार चलाने में दक्ष सैनिक शामिल है



माना जाता है की  हूथी विद्रोहियों के पास एक लाख 80 हजार से लेकर दो लाख लोगों वाली सेना हैसेना के ये जवान टैंक चलाने,एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल चलाने,लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल चलाने से लेकर तकनीकी वाहन तक को चलाने में सक्षम हैं उन्होंने प्रमुख आबादी वाले जगहों सहित यमन के लगभग एक तिहाई क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है



दूसरी और सऊदी अरब को लेकर जो बाइडेन के अविश्वास का कारण सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की  व्यापारिक नीतियां भी है,जो उन्हें रूस के करीब बताती रही है। 2018 में हुए जी20 सम्मेलन में  रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने जिस प्रकार की गर्म जोशी दिखाई थी,उसने सबको अचरज में डाल दिया था2015 में सत्ता में आने के बाद से क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन-सलमान ने एक उग्र सुधारक के रूप में अपनी छवि बनानी शुरू की थी और उनके कार्यो पर शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन  की छवि का असर देखा गया हैट्रम्प एक बिजनेसमैन की तरह राजनयिक व्यवहार करते रहे,अत: उन्होंने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान  को लेकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जबकि बाइडेन का अलग रुख सामने आ रहा है बाइडेन प्रशासन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान से ज्यादा किंग सलमान को तरजीह दे रहा है और अमेरिका द्वारा इसकी बाकायदा घोषणा भी कर दी गई है। जाहिर है जो बाइडेन यमन में शांति बहाल करके अरब क्षेत्र में अपने प्रभाव को मजबूत करके सऊदी अरब पर अपनी निर्भरता खत्म करना चाहते है,वहीं ईरान को लेकर उनकी नीति में संतुलन दिखाई पड़ सकता है यमन को लेकर अमेरिका  की इस नीति से मध्य पूर्व  में शांति की स्थापना की उम्मीदें बढ़ गई है

 

शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

म्यांमार में अब असहयोग आंदोलन,myanmar,ashayog aandolan gandhi

 राष्ट्रीय सहारा

                


यंगून के एक कस्बे से सुले पैगोडा की तरफ बढ़ता हुआ मार्च और इसमें शामिल हजारों शिक्षकों की अहिंसक भीड़ बेखौफ होकर म्यांमार के सैन्य शासन को चुनौती दे रही है भारत के इस पड़ोसी देश में गांधीवादी नेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी की लोकतांत्रिक सरकार की बहाली और सैन्य शासन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैइनमें भाग लेने वालों में सामान्य जनमानस के साथ विभिन्न सेवाओं में काम करने वाले लोग है। देश में स्वास्थ्य सेवाएं एकदम ठप्प हो गई है,डॉक्टर और नर्सों ने अस्पतालों में जाना बंद कर दिया है। मंडियों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर हड़ताल पर चले गए है,वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया है और वे सैन्य सरकार के खिलाफ रैलियां निकाल रहे है। लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज भेजना बंद कर दिया है। देश की आर्थिक व्यवस्थाएं बूरी तरह चरमरा गई है,बैंकों का कामकाज भी ठप्प पड़ गया है और बैंक अधिकारी ड्यूटी पर नहीं जाकर इन विरोध-प्रदर्शनों में भाग ले रहे हैम्यांमार के यंगून, नेपीडव और मांडले जैसे शहरों के साथ देश के कई कस्बों और गांवों में सैन्य  शासन का विरोध अब जन आंदोलन बन गया है और सैन्य शासन के दबाव से भी कोई रुकने और झूकने को तैयार नहीं है

दरअसल 100 साल पहले महात्मा गांधी ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ जो असहयोग आंदोलन चलाया था,म्यांमार के लोग सैन्य शासन के खिलाफ उसी प्रकार का जन आंदोलन कर सही मायनों में उसकी शताब्दी मना रहे है। ये बात और है की भारत में असहयोग आंदोलन के सौ साल पूरे होने पर इसके महत्व और प्रभाव को लेकर व्यापक प्रचार प्रसार की कोई भी सरकारी या सामाजिक योजना अब तक कहीं दिखाई नहीं दी है। जबकि यह दुनिया का एक ऐसा  अभूतपूर्व जन आन्दोलन था जिसमें महात्मा गांधी ने विरोध  की व्यापक और अनूठी परिभाषा गढ़ी थी और इसने ब्रिटिश सरकार को पस्त कर दिया था ब्रिटिश उपनिवेश और नीतियों के विरोध में शुरू हुए इस जन आंदोलन में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के सभी वर्गों के लोग शामिल हुए थे इस आंदोलन में   छात्रों,सरकारी सेवा में काम करने वाले भारतीयों,किसानों,आदिवासियों समेत श्रमिक वर्ग ने भी व्यापक भागीदारी की थी। यह भारत का अंग्रेजों के खिलाफ प्रथम जन आंदोलन बन गया था। उस दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना  जांच के कारावास की अनुमति दे दी थी।

म्यांमार में इस समय सैन्य सरकार से असहयोग को लेकर सभी वर्गों के लोगों में अभूतपूर्व एकता और जागरूकता दिखाई दे रही है। वहीं म्यांमार की सैन्य सरकार ब्रिटिश सरकार की तरह ही लोगों को डरा रही है। लोगों से प्रदर्शन रोकने को कहा गया है और यह भी बताया गया है की सैन्य बलों को किसी भी तरह की बाधा पहुँचाने के लिए सात साल की सज़ा हो सकती हैजो लोग सार्वजनिक तौर पर डर या अशांति फैलाते हुए पाए जाएँगे उन्हें तीन साल की सज़ा हो सकती हैआम लोगों को चेतावनी दी गई है कि वो लोकतांत्रिक सरकार के कार्यकर्ताओं को भागने में या पनाह देने में मदद ना करें। म्यांमार के उस कानून को निरस्त कर दिया है,जिसके तहत लोगों को 24 घंटे से ज्यादा हिरासत में रखने के लिए कोर्ट के आदेश की जरूरत पड़ती थी  सैनिक रात को लोगों के घरों में जबरन घुसकर जांच अभियान चले रहे है और सैन्य सरकार के द्वारा यह भी प्रचारित किया जा रहा है की अब फ़ौज बिना कोर्ट के आदेश के किसी की भी निजी संपत्ति की जांच कर सकती है 

म्यांमार की लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू ची नजरबंद है  वे देश की सर्वोच्च और व्यापक जनाधार वाली नेता है जो महात्मा गांधी के आदर्शों और मूल्यों से प्रेरणा लेकर सैन्य शासन से लगातार जूझती रही है अब म्यांमार के लोग अपनी प्रिय नेता की रिहाई और लोकतंत्र की बहाली के लिए महात्मा गांधी की असहयोग नीति का ही सहारा ले रहे है। आखिर असहयोग म्यांमार के लोगों के लिए बेहतर विकल्प क्यों बन गया है,यह जानना भी बेहद जरूरी है। वास्तव में किसी सरकार की वैधानिक और व्यापक शक्ति के आगे आम जनमानस बेहद कमजोर माना जाता है। वहीं सरकार के  समूचे तंत्र का संचालन करने के लिए इन्हीं लोगों की जरूरत होती है,जो विभिन्न कामों और अपनी भूमिका के जरिए शासन व्यवस्था के सुचारू संचालन में भागीदार होते है। स्पष्ट है सरकार जनता के सहयोग से चलती है और इस सहयोग को रोककर किसी सरकार के आधार को प्रभावित किया जा सकता है। दूसरी और यह महसूस किया जाता है की पिछड़े और गरीब देशों में सांस्कृतिक बहुलता भी बेहद प्रभावी भूमिका अदा करती है और ऐसे में सभी समुदायों को किसी एक आंदोलन में शामिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सामने भी बेहद विषम परिस्थितियां थी लेकिन महात्मा गांधी के अनूठे प्रयोग और दूरदर्शिता से विभिन्नताओं में बिखरे समाज को एकाकार करने में बढ़ी मदद मिली। असहयोग आंदोलन के दौरान श्रमिकों,आदिवासियों और किसानों के साथ सभी समुदायों ने उपनिवेश का विरोध अहिंसक तरीके से किया और यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ पहली बार एक ऐसा प्रभावी आंदोलन बन गया जिसे व्यापक जनाधार हासिल था।

म्यांमार में भौगोलिक जटिलता और समाज में व्यापक विविधता है। यहां बामर, राखीन,शान,सोम,करेन,रोहिंग्या,अराकानी और चीनी जातीय समूहों समेत करीब डेढ़ सौ जातीय समूह रहते है। इसके साथ ही कबीलाई समाज का सीमाई क्षेत्रों में बड़ा प्रभाव है।  म्यांमार की स्वभाव से ही उग्र और आक्रामक जनजातियों को ब्रिटिश सरकार ने एक दूसरे से संघर्षरत रखा जिससे ब्रिटेन अपने इस कठिन उपनिवेश में शासन का संचालन कर सके। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने जहां भारत की विविधता का बेहतर तरीके से सम्हाला और देश की शासन व्यवस्था को सुचारू रूप से संचालित किया,वहीं म्यांमार के पहले प्रधानमंत्री देश की आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं का हल ढूंढने में असमर्थ रहे। इस राजनीतिक अस्थिरता का फायदा सैन्य शासन ने उठाया और 1962 में लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता पलट  करके सेना ने सत्ता पर कब्जा जमा लिया इसके बाद लंबे समय से सेना का निरंकुश शासन लोग झेलने को मजबूर हो गए और लोकतंत्र समर्थकों को झेल में डाल दिया गया



इतिहास ने एक बार फिर करवट ली है। अब म्यांमार के सभी जातीय समूह अभूतपूर्व रूप से सैन्य सरकार का असहयोग आंदोलन के जरिए विरोध कर रहे है। यह अनूठा आंदोलन न केवल देश की बहुसांस्कृतिक विशेषताओं के बीच राष्ट्रीय एकता को मजबूत कर रहा है बल्कि लोकतांत्रिक म्यांमार के सुनहरे भविष्य की आशा भी दिखा रहा है।  2012 में न्यूयॉर्क में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित करते हुए म्यांमार की सर्वोच्च लोकतांत्रिक नेता आंग सान सू ची ने कहा था की महात्मा गांधी का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव रहा है उन्होंने छात्रों से भी आग्रह किया था कि वह गांधी के विचारों को पढ़ें और अपने व्यवहार में लाएं। दिलचस्प है की आंग सान सू ची के अपने देश के लोग ही महात्मा गांधी के मार्ग पर चल पड़े है

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

आंदोलनजीवी की अस्मिता और लोकतंत्र के अंतर्द्वंद,aandolanjivi,loktntntra

 

मृदुभाषी

              


जिंदगी के आठ दशक पार कर चूकी बठिंडा की मोहिंदर कौर किसान आंदोलन की पोस्टर वुमन है,वह कमर झुकाकर चल रही है और एक हाथ में भारतीय किसान यूनियन का झंडा थामे हैं  लेकिन एक और दादी भी किसान आंदोलन को समर्थन देने के लिए चर्चा में है,जो बिलकिस बानो के नाम विख्यात है वे सीएए के खिलाफ शाहीन बाग आंदोलन का चेहरा थी और टाइम मैगजीन ने उन्हें 100 प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शामिल किया गया था  दोनों दादियों की किसान आंदोलन में शख्सियत और उद्देश्य को लेकर आम राय अलग अलग बन सकती है 


हाल ही में सत्ता के खिलाफ या सत्ता के नीतियों के खिलाफ़ खड़े होने वाले लोकतांत्रिक जनआंदोलनों में अक्सर शामिल होने वाले लोगों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा तो आंदोलनों की उपयोगिता भी सवालों में घिर गई  किसान आंदोलन से देश में जो माहौल दिखाई दे रहा है उस बीच इस प्रकार का सवाल खड़ा करना एक खेलने वाला दांव था और ऐसा करने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी गुरेज भी नहीं करते 


लोकतांत्रिक देश में जन आंदोलन रचनात्मक विषयों पर अहिंसात्मक तरीके से हो,यह अपेक्षा की जाती है। भारत में भाषाई,जातीय,क्षेत्र और कानून के समर्थन और विरोध में अक्सर आंदोलन होते रहे है जिनका अहिंसात्मक और हिंसक रूप दोनों देश ने देखा है। कृषि कानूनों के विरोध में अहिंसात्मक तरीकों से धरना और हड़ताल लगातार कई दिनों तक जारी रहने के बीच 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर अराजकता भी देखने को मिली और इसीलिए इस पर सवाल उठ खड़े हुए। इस अराजकता को लेकर वैचारिक समर्थन असामान्य था और इसमें शामिल कुछ लोग किसान नहीं थे। यह संयोग भर इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस आंदोलन में हर्ष मंदर,योगेश यादव जैसे कुछ सामाजिक कार्यकर्ता भी जुड़े है जो पिछले कुछ सालों से किसी भी सत्ता विरोधी आंदोलन के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करते रहे है  मसलन योगिता भयाना को ही लीजिये,वे किसान आंदोलन का समर्थन  कर रही है जबकि वे पीपल अगेंस्ट रेप्स इन इंडिया की संस्थापक  होकर दिल्ली की एक जानी मानी  सामाजिक कार्यकर्ता हैं और महिला सशक्तिकरण के  उद्देश्य  से पिछले 10 साल से सामाजिक हक की लड़ाई में आम लोगों के पक्ष में काम कर रही हैं  उनकी संस्‍था भारत में रेप पीड़ितों की देखभाल और उनकी कानूनी लड़ाई में मदद करती है,निर्भया को न्याय दिलाने में भी योगिता ने महती भूमिका निभाई थी  वे किसान आंदोलन में क्यों है,इसे लेकर संशय उत्पन्न हो सकता है 



इस आंदोलन में भारतीय सेना से रिटायर्ड होने वाले जोगिंदर सिंह उगराहां भी है जो करीब ढाई दशक से किसानों के मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं  वहीं डॉ.दर्शन पाल भी है जो लगभग चार दशक से चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं देने के साथ क्रांतिकारी किसान यूनियन के नेता भी हैं उगराहां और डॉ.दर्शन पाल का उद्देश्य साफ है इसलिए इन्हें लेकिन सवाल नहीं खड़े किये जा सकते लेकिन ऐसा सबके साथ नहीं है

लोकतंत्र का आधार व्यापक चर्चा और बहसें है, और सामान्य रूप से यह विश्वास किया जाता है की आंदोलन से लोकतंत्र मजबूत होता है भारत में संसदीय लोकतंत्र तो है लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में यह सवाल भी उभरता है की प्रतिनिधित्व वाले लोकतंत्र में क्या सम्पूर्णता होती है। इसका जवाब जन आंदोलनों में मिल ही जाता है। एक आदर्श लोकतंत्र में निर्णय लेने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक होना चाहिए और हर लोकतंत्र को इस आदर्श स्थिति को प्राप्त करने की कोशिश करना चाहिएक्या भारत में इस प्रकार की कोशिश की गई हैसामान्य लोकतंत्र और एक अच्छे लोकतंत्र में फर्क समझने के लिए इसके बहुआयामी अर्थ को समझने की जरूरत है



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं इस देश के उन राजनेताओं में शुमार है जो भारतीय लोकतंत्र से हासिल की जाने वाली सत्ता की चाबी के इस समय मजबूत दावेदार नजर आते हैउन्होंने यहां तक आने के सफर में अपनी पहचान पुख्ता करने के लिए लोकतंत्र की जमीन पर होने वाले आंदोलनों का ही सहारा लिया है  उनके राजनीतिक जीवन के सफर में आपातकाल,कश्मीर,राम जन्मभूमि,स्वदेशी जागरण जैसे कई जन आंदोलन हुए है और उनकी इसमें अहम भागीदारी भी रही है2014 में जब मोदी युग का सूत्रपात हुआ तब भी उसमें अन्ना और बाबा रामदेव के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की बड़ी भूमिका मानी जाती है इसे गैर राजनीतिक आंदोलन बताकर प्रचारित तो किया गया लेकिन कोई आंदोलन लम्बे समय तक गैर राजनीतिक नहीं हो सकता और वह भी किसी लोकतांत्रिक देश में राजनीतिक दलों का अंतिम लक्ष्य सत्ता की प्राप्ति ही है अत: कोई भी विपक्षी दल सरकार के खिलाफ जाते हुए किसी माहौल को अपने पक्ष में करने का प्रयास न करे,ऐसा मुमकिन भी नहीं है। बेशक किसान आंदोलन को भाजपा के खिलाफ देखा जा रहा है और विपक्षी दल अपनी वापसी की संभावनाएं भी तलाश रहे है।

लोकतंत्र जीवन के अनेक पहलुओं में प्रासंगिक है लेकिन इसका रचनात्मक होना जनकल्याण के लिए ज्यादा प्रभावकारी होता है। जन आंदोलनों के उद्देश्य के अनुरूप लोगों की भागीदारी से इसमें पारदर्शिता बनी रहती है और इसे लेकर सजग और सावधान रहने की जरूरत है। यह सजगता और स्पष्टता महात्मा गांधी के आंदोलनों में दिखती थी और वे इसे लेकर सावधान रहते थे।



जनआंदोलनों को लोकतंत्र का प्राण बताने वाले डॉ.राम मनोहर लोहिया ने कहा भी था की जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती। भारत की आज़ादी के आंदोलन में गांधी और नेहरु के खास सहयोगी रहे लोहिया आज़ादी के बाद नीतियों को लेकर नेहरु के सामने संसद में बेहद मुखरता से बोला करते थे।  उनकी तथ्य परक मुद्दों पर तत्कालीन सरकार निरुत्तर हो जाया करती थी।  एक बार जब डॉ. लोहिया से किसी ने यह सवाल किया कि उनके भीतर जवाहर लाल नेहरू के प्रति इतना गुस्सा क्यों है तो उनका कहना था कि उनका उनसे निजी कोई राग द्वेष नहीं है। वे नेहरु के शिष्य भी रहे है और वे उनका गहरा सम्मान करते है लेकिन यह सारा विरोध वे सिद्धांत के लिए कर रहे हैं और देश में मरे हुए विपक्ष को खड़ा करने के लिए कर रहे हैं। वे जानते थे कि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस एक चट्टान की तरह से है इसीलिए उससे टकराना ही होगा तभी उसमें दरार पड़ेगी। 

यह घटनाक्रम आज़ादी के बाद दस पन्द्रह सालों का है और अब हमने लंबा सफर तय कर लिया हैअब विपक्ष के लिए भाजपा और मोदी उसी चट्टान की तरह खड़े है जिसकी चर्चा लोहिया ने कांग्रेस के लिए की थीलेकिन अब संसद में कोई लोहिया और उन जैसा पारदर्शी व्यक्तित्व नहीं है अत: वैसे तथ्य परक विरोध की उम्मीद भी बेमानी है

पिछलें कुछ सालों से भारत के लोकतंत्र में भारी बदलाव देखने में आ रहे है और इसका प्रभाव आम जनमानस के साथ राजनीतिक विचारधाराओं पर भी पड़ा है। यह जिम्मेदारी राजनीतिक पार्टियों की है की वे रचनात्मक तरीके से अपना काम करके जनता को आकर्षित करें। यह दुर्भाग्य है की भारत जैसे मजबूत लोकतांत्रिक देश में सत्ता और विपक्ष अपना समर्थन दिखाने के लिए कलाकारों और जानी मानी शख्सियतों का उपयोग करने लगे है और यह स्थिति लोकतंत्र और आंदोलन के उद्देश्य और स्वरूप को बिगाड़ने वाली है।

सत्ता के विरोध को हथियार बनाकर सामाजिक कार्यकर्ताओं का राजनीतिक समर्थन अराजक स्थिति को बढ़ा सकता है,वहीं किसी आंदोलन को देशद्रोह से जोड़ना वैधानिक और सामाजिक व्यवस्था के लिए भी खतरनाक है। जहां तक लोकतंत्र का सवाल है तो इसका फायदा यह है की इसमें गलतियों को ज्यादा देर तक छुपाया नहीं जा सकता,इन गलतियों पर सार्वजनिक चर्चा की गुंजाइश लोकतंत्र में है और इनमे सुधार की गुंजाइश भी लोकतंत्र में है। इस स्थिति और भूमिका को लेकर सत्ता और विपक्ष को ज्यादा स्पष्ट होने की जरूरत है।

 

 

शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

अस्थिर म्यांमार की चुनौती,myanmar bharat

राष्ट्रीय सहारा


                      

                                                                                

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का अंतिम लक्ष्य चाहे जो कुछ हो,शक्ति सदैव तात्कालिक उद्देश्य रखती है। म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर सैन्य सरकार का विकल्प वैश्विक समुदाय के लिए भले ही कड़ी आलोचना का कारण बन गया हो लेकिन संयुक्तराष्ट्र में निंदा प्रस्ताव को रोककर चीन ने अपनी कुटिलतापूर्ण सामरिक  नीति के जरिए म्यांमार की सैन्य सरकार को अपने प्रभाव में लिया है। इस प्रकार उत्तर पूर्व में एक बार फिर भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई है।  


 

दरअसल म्यांमार दक्षिण पूर्व एशिया का एकमात्र देश है जिसके साथ भारत की समुद्री और भू भागीय सीमा मिलती है। बंगाल की खाड़ी से जुड़े म्यांमार और भारत के मध्य लगभग 1600 किमी की लम्बी सीमा उत्तर पूर्वी राज्यों अरुणाचल,नागालैंड,मणिपुर,और मिजोरम आपस में मिलती है। भारत अपने इस सांस्कृतिक और सामरिक पड़ोसी देश में लोकतंत्र का समर्थक रहा है और इस कारण दोनों देशों के सम्बन्ध प्रभावित भी रहे है। 1962 में म्यांमार में जब सैन्य शासन लागू हुआ था तब भारत की कड़ी प्रतिक्रिया से दोनों देशों के सम्बन्ध प्रभावित हुए थे। जबकि चीन म्यांमार में सैन्य सरकार का सदा समर्थक रहा है जिससे वह बिना जनता के प्रतिरोध के इस देश में अपने सामरिक और आर्थिक हित पूरे कर सके। म्यांमार में प्राकृतिक गैस का भंडार भारी मात्रा में पाया जाता है। चीन कोको द्वीप पर अपना अड्डा स्थापित कर रहा है तथा धीरे धीरे म्यांमार को आर्थिक और सामरिक गिरफ्त में लेता जा रहा है। चीन राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वकांक्षी योजना सीपीईसी को लेकर म्यांमार की लोकतांत्रिक सरकार ज्यादा उत्साहित नहीं थी जबकि चीन उस पर लगातार दबाव बना रहा था। चीन के युन्नान प्रांत की राजधानी कुनमिंग से म्यांमार के दो मुख्य आर्थिक केंद्रों को जोड़ने के लिए लगभग 1700 किलोमीटर लंबा कॉरिडोर बनाया जाना है।  म्यांमार से चीन तक तेल गैस पाइपलाइन की योजना भी काम कर रही है। बंगाल की खाड़ी में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है।  चीन की पहुंच म्यांमार कॉरिडोर के माध्यम से हिंद महासागर तक हो जाने से भारत की सुरक्षा चिंताओं में भी इजाफा हुआ है जिसे समझकर सू की के नेतृत्व वाली सरकार चीन की भारत को घेरने की चीन की रणनीति को लगातार प्रभावित कर रही थी। 


म्यांमार की  भौगोलिक स्थिति भारत की सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। म्यांमार भारत की पूर्व की ओर देखो विदेश नीति का प्रवेश द्वार है। भारत 1992 से अपनी पूर्व की ओर देखों नीति के अनुसार मणिपुर-म्यांमार थाईलैंड राजमार्ग का निर्माण करने को कृतसंकल्पित है। इसके अंतर्गत भारत के मोरे से लेकर थाईलैंड के माई सोट तक राजमार्ग बनाया जाएगा तथा इसके जरिए म्यांमार होते हुए भारत से थाईलैंड का सफर सड़क मार्ग से किया जा सकेगा। दोनों देशों के बीच 16 किलोमीटर के क्षेत्र में मुक्त आवागमन का प्रावधान है,सरहदी हॉट खुलने से व्यापार व्यवसाय में तेजी आने की उम्मीद बढ़ी है। यहीं नहीं दोनों देशों के साझा सैन्य अभियानों से पूर्वोत्तर के चीन-पाक-बंगलादेश समर्थित आतंकवाद पर गहरी चोट होती रही है। भारतीय सेना द्वारा 1995 का गोल्डन बर्ड ऑपरेशन के कारण आतंकवादियों का सफाया हो या साल 2015 में म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकियों को मार गिराने की सफलता,म्यांमार-भारत के आपसे सहयोग की यह मिसाल है। भारत के मिजोरम राज्य तथा म्यांमार के सितवे बंदरगाह को जोड़ने के लिए कलादान मल्टीमॉडल पारगमन परियोजना को विकसित किया जा रहा है। भारत ने म्यांमार की सड़क परियोजनाओं को भी बहुत मदद की है, जिससे आने वाले समय में इन परियोजनाओं से पूर्वोत्तर को बहुत फायदा होने की उम्मीद बढ़ी है।


इस समय भारत और चीन की सीमा पर गहरा तनाव है और ऐसे में म्यांमार की सैन्य सरकार से मजबूत सम्बन्ध बनाकर चीन भारत के लिए आंतरिक सुरक्षा का नया संकट बढ़ा सकता है। भारत सीमा के आसपास म्यांमार के सुरक्षा बलों की काफी कम तैनाती है,जिससे पूर्वोत्तर के अलगाववादी तत्व म्यांमार में आसानी से कैम्प स्थापित कर भारत में अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देते है। भारत और म्यांमार की सीमा के दोनों और नागा कुकी जनजातियों की बड़ी आबादी है,जिनके बीच सांस्कृतिक एवम् साझे सामाजिक सम्बन्ध है। इसलिए दोनों देशों के बीच 16 किमी के क्षेत्र में मुक्त आवागमन का प्रावधान है,रोहिंग्या घुसपैठ के लिए यह रास्ता अनुकूल माना जाता है। म्यांमार की सरकार भी रोहिंग्या के प्रति कड़ा रुख अपनाएं हुए है,ऐसे में रोहिंग्या वहां से भाग कर भारत आ गये है और उनके भारत में कई आतंकी हमलों में संलिप्त रहने की जानकारी सामने आई है।



पूर्वोत्तर की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में पृथकतावादी संगठनों से भारत को सुरक्षा चुनौतियां मिलती रही है। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम, एनडीएफबी,पीपुल्स लिबरेशन आर्मी, यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपक,कांगलीपक कम्युनिस्ट पार्टी,मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट,ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स,नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा जैसे आतंकी और अलगाववादी संगठनों शामिल है। इन इलाकों में सामाजिक,सांस्कृतिक,सामरिक जटिलताओं और प्रतिकूल परिस्थितियों में सुरक्षा बलों के लिए म्यांमार से मजबूत सामरिक सम्बन्ध होना बेहद आवश्यक है। जिससे सीमा पार जाकर भी इन अलगाववादी संगठनों पर दबाव बनाया जा सके।  इन गुटों को चीन से हथियार मिलते रहे है और म्यांमार की ओर से इन्हें ढील मिलने पर भारत में माओवाद का प्रभाव बढ़ सकता है।

भारत और म्यांमार के संबंधों को खराब करने के लिए चीन वहां रहने वाले हिन्दुओं पर भी आतंकी हमले करवा सकता है। इस समय म्यांमार में तकरीबन ढाई लाख हिन्दू रहते है जबकि म्यांमार के चरमपंथ प्रभावित रखाइन में करीब 10 हजार हिन्दू रहते है। म्यांमार में प्रभावशील चरमपंथी  अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी ने सेना से युद्द और संघर्ष की आड़ में कुछ साल पहले हिन्दुओं को इसीलिए निशाना बनाया है,जिससे न केवल भारत और म्यांमार के संबंध खराब हो बल्कि बौद्ध और हिन्दुओं में भी धार्मिक उन्माद फैले। यह हत्या अगस्त 2017 में की गई थी,जिसकी पुष्टि मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी की थी।  आतंकी संगठन अराकन रोहिंग्या सालवेशन आर्मी म्यांमार में सेना पर हमले करने के लिए जिम्मेदार रही है और उसके सम्बन्ध पाकिस्तान से माने जाते है। इस आतंकी संगठन का अगुआ कराची का रहने वाला है और जमात उद दावा के हाफिज सईद के प्रभाव में है। म्यांमार में अब सैन्य सरकार आने से परिस्थितियां तेजी से बदल सकती है और चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत और म्यांमार के बीच सम्बन्ध खराब करने के लिए हिन्दुओं को निशाना बनाने की रणनीति पर भी काम कर सकते है।



अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है की विदेश नीति सम्बन्धी निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर किये जाने चाहिए,न की नैतिक सिद्धांतों और भावनात्मक मान्यताओं के आधार पर। भारत के सामने पूर्वोत्तर में परिस्थितियां जटिल हुई है और भारतीय सरकार को राष्ट्रीय हितों के लिए बदली हुई परिस्थितियों में म्यांमार के साथ संबंधों को संतुलित रखना होगा। ऐसा लगता है की इस समय भारत की लोकतांत्रिक सरकार म्यांमार से अपने संबंधों को वहां के आंतरिक परिवर्तन से प्रभावित न होने देने  को अपने राष्ट्रीय हितों के लिए तरजीह दे रही है। इसीलिए भारत ने म्यांमार के सैन्य शासन की आलोचना से बचते हुए सधी हुई प्रतिक्रिया दी है। लेकिन इन सबके बीच म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार की बिदाई भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए चुनौतीपूर्ण है और भविष्य में म्यांमार से लगती सीमा पर ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होगी।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2021

अहम और वहम के बीच आंदोलन, kisan aandolan

 पीपुल्स समाचार

                                                        

                                                                    

मेरे एक फोन से दूर है किसान,प्रधानमंत्री का यह संदेश जितना राहत देने वाला है उतना ही आश्चर्यचकित भी कर रहा है। तीसरे महीने में प्रवेश कर चूका ऐसा जन आन्दोलन जिसकी दुनियाभर में चर्चा है,इस आंदोलन से लाखों लोग प्रभावित हो रहे है। कुछ लोग मर भी चूके है,खालिस्तान जैसे मुद्दे के उभार की आशंका भी खतरनाक है। गणतन्त्र दिवस पर शानदार परेड के लिए जानी जानी वाली दिल्ली में हिंसा  का मंजर और इसके बाद किसानों को लेकर समाज के व्यापक बंटने को लेकर आशंकाएं बलवती हो रही है। इन सब समस्याओं का समाधान यदि प्रधानमंत्री के फोन से होना है तो फिर इसमें देरी क्यों हो रही है। अंततः लोकतंत्र में समस्याओं के समाधान का रास्ता संवाद से ही खुलता है,इसलिए सरकार और किसानों की ओर से हर मुमकिन कोशिश की जाती रहनी चाहिए।


किसी लोकतांत्रिक देश में आंदोलन होते रहने चाहिए ,यह हर प्रकार से देश को जागरूक करते है और इससे लोकमत मजबूत ही होता है। इसलिए आंदोलनों को लेकर आम जनमानस की सामान्य दृष्टि होना चाहिए और यह देश की एकता और अखंडता के लिए जरूरी भी है। भारत में जन आंदोलनों का इतिहास रहा है और विभिन्न सरकारों ने इसकी गंभीरता को समझा भी है। लेकिन आन्दोलनों को लेकर व्यापक दूर दृष्टि की जरूरत हमेशा महसूस की गई है। नक्सलबाड़ी आंदोलन को लेकर दूर दृष्टि का अभाव आत्मघाती साबित हुआ और इससे उत्पन्न हिंसा की समस्या से देश कई दशकों से जूझने को मजबूर है।


किसान आंदोलन, किस राज्य से है यह कभी महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इस मायने में ज्यादा महत्वपूर्ण है  की भारत गांवों का देश है और अधिकांश जनता गांवों में रहती है जिनके जीवन का आधार ही खेती है। भारत का आम जन इस अनुभव से दो चार है की आज़ादी के आठवे दशक तक आते आते सरकारों की प्राथमिक कार्य योजना में शहरों का विकास रहा है और गांव आज भी विकास से कोसो दूर है। जाहिर है इसका प्रभाव किसानों पर भी पड़ा है और वे किसी आशंका में पड़ने के स्थान पर सुरक्षित मार्ग पसंद करते है। इस आंदोलन से आशंकित किसान है और उनका संतुष्ट होना देश के लोकतंत्र को ही मजबूत करेगा। भारत का लोकतंत्र चाहे जिस मॉडल पर आधारित हो लेकिन किसानों और गांवों को देखने की हमारी दृष्टि गांधीवादी होना चाहिए।


गांधीवादी लोकतंत्र का रास्ता गांव से शुरू होकर शहर की ओर जाता है जबकि भारत का विकास शहरीकरण पर आधारित रहा जो समय के साथ और पुख्ता होता चला।  इसका प्रभाव भारत की आत्मा कहे जाने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ना ही था। जिस साल पूर्ण संविधान लागू हुआ उस समय सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान तक़रीबन 55 फीसदी था। अब यह घटकर 13 फीसदी तक आ गया है।  लेकिन आज भी देश की श्रम शक्ति का लगभग 53 फीसदी भाग कृषि और इससे संबंधित उद्योग धंधों से अपनी आजीविका कमाता है और निजी क्षेत्र का यह सबसे बड़ा अकेला व्यवसाय है जिससे करोड़ों लोगों के जीवन की दशा और दिशा तय होती है। भारत के औद्योगिक विकास में भी कृषि का अहम योगदान है। उद्योगों को कच्चा माल कृषि से ही प्राप्त होता है,फिर चाहे वह वनस्पति तथा बागान उद्योग हो या सूती वस्त्रों पर आधारित उद्योग।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद भारत के किसान सामन्ती और पूंजीवादी व्यवस्था से आशंकित हैइसका एक कारण यह भी है की उन्हें वह विश्वास हासिल नहीं है जो ग्राम स्वराज दे सकता है वैसे किसानों को शोषण की समस्या से कई सदियों से जूझना पड़ा है,अत: अन्य समुदायों से ज्यादा वे व्यवस्था परिवर्तन पर बेचैन हो जाते है और उनकी यह बैचेनी निर्मूल भी नहीं हैअंततः किसान शोषण  से अभिशिप्त ही रहा है समाजवाद का आधार समानता है इसलिए भारत ने समाजवाद को अंगीकार कर गांधी के समन्वय को संविधानिक आदर्श के रूप में ढालने का प्रयास किया। इसमें पूंजीपति तो बने और सुरक्षित रहे लेकिन उनके व्यवस्था पर हावी होने की उतनी आशंका कभी भी नहीं गहराई,जितनी इस समय देखी जा रही है।


आज़ाद भारत में गरीबी,बेरोजगारी,अशिक्षा जैसी समस्याएं मुंह बाएं खड़ी है अत: एक विचार यह भी बना हुआ है की राष्ट्रीय क्रांति और सामाजिक क्रांति के स्वदेशी तरीकों का उपयोग बद्दस्तूर जारी रहे। यह तरीके पूंजीवादी ताकतों के ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हावी होने के संकेत देने वाले नहीं हो सकते है बापू ने अर्थव्यवस्था को सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित करके स्वावलंबी और आत्मनिर्भर भारत बनाने का संदेश दिया था महात्मा गांधी का लोकतंत्र समभाव,सहभागिता और भागीदारी पर आधारित रहा। बहुमत की सत्ता और लोकतंत्र को राज्य द्वारा नियंत्रित करने की नीति के वे आलोचक रहे,आधुनिक लोकतंत्र को राज्य द्वारा नियंत्रित  किए जाने की आशंका सदा बनी रहती है। महात्मा गांधी बहुमत के शासन से उभरने वाले अधिनायकवादी नेतृत्व के प्रति आशंकित थे और वे इसीलिए दलविहीन लोकतांत्रिक प्रक्रिया चाहते थे आज भी ग्राम पंचायतों में दल के आधार पर चुनाव नहीं लड़े  जाते और महात्मा गांधी देश में भी कुछ ऐसा ही लोकतंत्र चाहते थे

हम यह भूल नहीं सकते की दुनिया में भारत को गांधी के नाम से पहचाना जाता है लेकिन यदि यह वास्तव में महात्मा गांधी का गणतन्त्र होता तो उस पर ट्रैक्टर का कभी भार नहीं होता और किसान दिल्ली की सड़कों पर नहीं बल्कि अपने खुशहाल गांवों में तिरंगा फहरा रहे होते। आवश्यकता इस बात की है की किसान संवाद का रास्ते पर आगे बढ़ते रहे वही सरकार को भी यह समझना होगा की देश की समस्याओं का हल सिर्फ संसद में बहुमत से नहीं हो सकता,आम राय की जरूरत को कभी नजरअंदाज नही की जाना चाहिए। यह किसान आंदोलन न केवल संसदीय प्रणाली को चुनौती दे रहा है बल्कि यह सबक भी दे रहा है की भारत के विकास को ग्रामों से जोड़ना होगा। यदि गांव विकसित हो गए तो किसानों की आशंकाएं भी कम होगी और वर्तमान जैसी समस्याओं से सरकार को दो चार नहीं होना पड़ेगा। लेकिन गांवों और कृषि के विकास का संबंध पूंजीवादी व्यवस्था  के उभार से कभी नहीं होना चाहिए।  फ़िलहाल समस्या और गतिरोध पूंजीवादी आशंकाओं को लेकर है और उसके जवाब हमें संवाद और समाजवादी ढांचे में ही ढूंढने होंगे।

brahmadeep alune

बिक गया पाकिस्तान.... ! bik gaya pakistan politics

  पॉलिटिक्स                                                                                                             पाकिस्तान...