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अमेरिका की यमन नीति

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  जनसत्ता                                  राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कूटनीतिक,आर्थिक,सैनिक और मनौवैज्ञानिक साधनों का प्रयोग  बेहद रणनीतिक तरीके से किया जाना चाहिए । अमेरिका   के नए   राष्ट्रपति   जो बाइडेन को अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की गहरी समझ है और ट्रम्प प्रशासन से उलट उनकी नीतियों में यह दिखाई भी दे रहा है । दरअसल बाइडेन ने पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल के दौरान अरब देशों के साथ किए गए अरबों डॉलर के सैन्य समझौतों की समीक्षा करने की बात कहकर यमन युद्ध में सऊदी अरब के लिए अमेरिकी सहयोग रोकने की घोषणा की है । यमन दक्षिण पश्चिम एशिया का एक ऐसा देश है जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जाता है,यह देश पिछले एक दशक से राजनीतिक अस्थिरता और जातीय संघर्ष से बूरी तरह जूझ रहा है । यहां युद्द के मैदान में शिया और सुन्नी ताकतें एक दूसरे के सामने है । पिछले पांच छह सालों से सऊदी अरब के नेतृत्व वाला गठबंधन हूथी विद्रोहियों पर हमले कर रहा है । इस गठबंधन   में अमेरिका,ब्रिटेन और फ्रांस जैसे राष्ट्र शामिल है और अब अमेरिका ने यमन समस्या के सैनिक समाधान के   बदले कूटनीतिक प्र

म्यांमार में अब असहयोग आंदोलन,myanmar,ashayog aandolan gandhi

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  राष्ट्रीय सहारा                  यंगून के एक कस्बे से सुले पैगोडा की तरफ बढ़ता हुआ मार्च और इसमें शामिल हजारों शिक्षकों की अहिंसक भीड़ बेखौफ होकर म्यांमार के सैन्य शासन को चुनौती दे रही है । भारत के इस पड़ोसी देश में गांधीवादी नेता आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी की लोकतांत्रिक सरकार की बहाली और सैन्य शासन के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हो रहे है । इनमें भाग लेने वालों में सामान्य जनमानस के साथ विभिन्न सेवाओं में काम करने वाले लोग है । देश में स्वास्थ्य सेवाएं एकदम ठप्प हो गई है, डॉक्टर और नर्सों ने अस्पतालों में जाना बंद कर दिया है । मंडियों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर हड़ताल पर चले गए है,वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार कर दिया है और वे सैन्य सरकार के खिलाफ रैलियां निकाल रहे है । लोगों ने अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज भेजना बंद कर दिया है । देश की आर्थिक व्यवस्थाएं बूरी तरह चरमरा गई है, बैंकों का कामकाज भी ठप्प पड़ गया है और बैंक अधिकारी ड्यूटी पर नहीं जाकर इन विरोध-प्रदर्शनों में भाग ले रहे है । म्यांमार के यंगून, नेपीडव और मांडले जैसे शहरों के साथ देश के

आंदोलनजीवी की अस्मिता और लोकतंत्र के अंतर्द्वंद,aandolanjivi,loktntntra

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  मृदुभाषी                 जिंदगी के आठ दशक पार कर चूकी बठिंडा की मोहिंदर कौर किसान आंदोलन की पोस्टर वुमन है,वह कमर झुकाकर चल रही है और एक हाथ में भारतीय किसान यूनियन का झंडा थामे हैं ।   लेकिन एक और दादी भी किसान आंदोलन को समर्थन देने के लिए चर्चा में है,जो बिलकिस बानो के नाम विख्यात है । वे सीएए के खिलाफ शाहीन बाग आंदोलन का चेहरा थी और टाइम मैगजीन ने उन्हें 100 प्रभावशाली लोगों की लिस्ट में शामिल किया गया था ।   दोनों दादियों की किसान आंदोलन में शख्सियत और उद्देश्य को लेकर आम राय अलग अलग बन सकती है ।   हाल ही में सत्ता के खिलाफ या सत्ता के नीतियों के खिलाफ़ खड़े होने वाले लोकतांत्रिक जनआंदोलनों में अक्सर शामिल होने वाले लोगों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा तो आंदोलनों की उपयोगिता भी सवालों में घिर गई ।   किसान आंदोलन से देश में जो माहौल दिखाई दे रहा है उस बीच इस प्रकार का सवाल खड़ा करना एक खेलने वाला दांव था और ऐसा करने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी गुरेज भी नहीं करते ।   लोकतांत्रिक देश में जन आंदोलन रचनात्मक विषयों पर अहिंसात्मक तरीके से हो,यह अपेक्षा की जाती है । भारत में भा

अस्थिर म्यांमार की चुनौती,myanmar bharat

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राष्ट्रीय सहारा                                                                                                         अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का अंतिम लक्ष्य चाहे जो कुछ हो , शक्ति सदैव तात्कालिक उद्देश्य रखती है। म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार को भंग कर सैन्य सरकार का विकल्प वैश्विक समुदाय के लिए भले ही कड़ी आलोचना का कारण बन गया हो लेकिन संयुक्तराष्ट्र में निंदा प्रस्ताव को रोककर चीन ने अपनी कुटिलतापूर्ण सामरिक   नीति के जरिए म्यांमार की सैन्य सरकार को अपने प्रभाव में लिया है। इस प्रकार उत्तर पूर्व में एक बार फिर भारत के लिए सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई है।      दरअसल म्यांमार दक्षिण पूर्व एशिया का एकमात्र देश है जिसके साथ भारत की समुद्री और भू भागीय सीमा मिलती है। बंगाल की खाड़ी से जुड़े म्यांमार और भारत के मध्य लगभग 1600 किमी की लम्बी सीमा उत्तर पूर्वी राज्यों अरुणाचल , नागालैंड , मणिपुर , और मिजोरम आपस में मिलती है। भारत अपने इस सांस्कृतिक और सामरिक पड़ोसी देश में लोकतंत्र का समर्थक रहा है और इस कारण दोनों देशों के सम्बन्ध प्रभावित भी रहे है। 1962 में म्यांमार में जब सैन्य शासन

अहम और वहम के बीच आंदोलन, kisan aandolan

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  पीपुल्स समाचार                                                                                                                                  मेरे एक फोन से दूर है किसान,प्रधानमंत्री का यह संदेश जितना राहत देने वाला है उतना ही आश्चर्यचकित भी कर रहा है। तीसरे महीने में प्रवेश कर चूका ऐसा जन आन्दोलन जिसकी दुनियाभर में चर्चा है,इस आंदोलन से लाखों लोग प्रभावित हो रहे है। कुछ लोग मर भी चूके है,खालिस्तान जैसे मुद्दे के उभार की आशंका भी खतरनाक है। गणतन्त्र दिवस पर शानदार परेड के लिए जानी जानी वाली दिल्ली में हिंसा   का मंजर और इसके बाद किसानों को लेकर समाज के व्यापक बंटने को लेकर आशंकाएं बलवती हो रही है। इन सब समस्याओं का समाधान यदि प्रधानमंत्री के फोन से होना है तो फिर इसमें देरी क्यों हो रही है। अंततः लोकतंत्र में समस्याओं के समाधान का रास्ता संवाद से ही खुलता है,इसलिए सरकार और किसानों की ओर से हर मुमकिन कोशिश की जाती रहनी चाहिए। किसी लोकतांत्रिक देश में आंदोलन होते रहने चाहिए ,यह हर प्रकार से देश को जागरूक करते है और इससे लोकमत मजबूत ही होता है। इसलिए आंदोलनों को लेकर आम जनमानस