गुरुवार, 7 जनवरी 2021

प्रणव मुखर्जी का नेपाली संकट,Pranav mukhrji,book,nepal,nehru

 

राष्ट्रीय सहारा


जवाहरलाल नेहरु ने अपनी किताब डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया में बुद्द की शिक्षाओं पर बात करते हुए बुद्द और उनके शिष्य आनंद के बीच की एक घटना का वर्णन किया है इसके अनुसार एक बार बुद्द ने अपने हाथ में कुछ सूखी पत्तियां लेकर अपने प्रिय शिष्य आनंद से पूछा कि हाथ की इन पत्तियों के अलावा क्या और भी कही पत्तियां है आनंद ने जवाब दिया,पतझड़ की पत्तियां सभी तरफ गिर रही है,और वे इतनी है कि उनकी गिनती नहीं हो सकती तब बुद्द ने कहा,इसी तरह मैंने तुम्हें मुट्ठी भर सत्य दिए है,लेकिन इनके अलावा कई हजार सत्य है,इतने कि उनकी गिनती नहीं हो सकती।”

दरअसल इतिहास में दफन हो चूकी घटनाओं को खोद कर बाहर लाने की किताबी कोशिशों से मुट्ठी भर घटनाओं का विश्लेष्ण तो किया जा सकता है लेकिन समय काल और परिस्थिति के अनुसार राष्ट्रीय मानस और उस पर आधारित तत्कालीन निर्णयों  की दृष्टि का अंदाजा लगाना दुष्कर कार्य होता है। खासकर कूटनीतिक मामलों में रुको और देखो की दीर्घकालीन नीतियों को अच्छा नहीं समझा जाता। अत: कोई भी राष्ट्रीय नेतृत्व अपने राष्ट्रीय हित को सर्वोपरी रखकर समयानुकूल निर्णय लेने को बेहतर समझते है। इस समय चर्चा में भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की ऑटोबायोग्राफी द प्रेसिडेंशियल ईयर्सहै जिसमें यह दावा किया गया है की, भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरु के सामने नेपाल के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने उनके देश का भारत में विलय का प्रस्ताव था जिसे नेहरु ने स्वीकार नहीं किया। भारत को आज़ादी मिली उस समय त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह नेपाल के राजा थे और 1955 में उनकी मृत्यु तक वे इस पद पर बने रहे

द प्रेसिडेंशियल ईयर्स के दावे की सच्चाई को तलाशने का प्रयास इसलिए भी जरूरी हो जाता है क्योंकि किसी राष्ट्र के हित उसकी कूटनीति में प्रतिबिम्बित होते हैऔर यह उस देश के संबंध में है जिससे भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे है,दोनों देशों के बीच 1850 किलोमीटर से अधिक लंबी साझा सीमा है,जिससे भारत के पाँच राज्य सिक्किम,पश्चिम बंगाल,बिहार,उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड जुड़े हैं

यह देखा गया था की भारत को आज़ादी मिलने के समय नेपाल में भी लोकतंत्र स्थापित होने की बेकरारी देखी जा रही थी और 1950 में नेपाली कांग्रेस ने जब लोकतांत्रिक आंदोलन का नेतृत्व किया तो बड़ी संख्या में नेपाली जनता भी नेपाली कांग्रेस के साथ कंधा से कंधा मिलाकर इस संघर्ष में शामिल हो गई राणाओं  और राजा के बीच सत्ता और शक्ति संघर्ष का परिणाम यह हुआ की इससे भयभीत नेपाल के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह देव और उनके बेटे महेन्द्र बीर बिक्रम शाह देव ने भारतीय दूतावास में शरण ली और इस प्रकार विद्रोहियों से अपनी जान बचाई। इस विद्रोह को भारत के नेपाल से लगते सीमाई राज्यों से भी मदद मिल रही थी। आज़ाद भारत के लिए यह बड़ी चुनौती थी,वहीं उस समय भारत के प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरु थे जो लोकतंत्र के बड़े समर्थक होकर  फासिस्ट ताकतों के सर्वाधिकारवादी प्रवृत्ति के कटु आलोचक भी थेनेपाली कांग्रेस एक समाजवादी लोकतांत्रिक दल के रूप में अपना पहचान बना चूका था और यह भारत की नीतियों के अनुकूल ही थानेहरु का लोकतान्त्रिक सरकार का समर्थन करना लाजिमी था और राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह देव के लिए अपनी सुरक्षा करना जरूरी था। इस समय यह भी उल्लेखनीय है की भारत राजा महाराजाओं की चुनौतियों से जूझते हुए बमुश्किल एकीकृत राष्ट्र बना सका था,इसलिए राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह देव नेहरु के समर्थन को लेकर मुमकिन है की आशंकित  रहे होंगे

17 मार्च 1950 को नेहरु ने संसद में साफ कहा था की,भारत तथा नेपाल के मध्य किसी तरह का कोई सामरिक सम्बन्ध नहीं है,किन्तु भारत नेपाल पर किये गये किसी भी आक्रमण को सहन नहीं करेगाक्योंकि नेपाल पर किया जाने वाला कोई भी संभावित आक्रमण भारत की सुरक्षा के लिए एक निश्चित खतरा होगा। जाहिर है नेहरु सौहार्दपूर्ण रिश्तों के बाद भी चीन पर ज्यादा भरोसा नहीं करते थे और भारत और चीन के बीच बफ़र राष्ट्र के रूप में स्थापित नेपाल का स्थायित्व भारत के राष्ट्रीय हितों के लिए बेहद जरूरी समझा गया पड़ोसियों से शांतिपूर्ण सह अस्तित्व सम्बन्ध कायम रखना भारत की प्राचीन वैदेशिक नीति  रही है और नेहरु पर इसकी गहरी छाप थी

नेपाल की राजनीति के उथल पुथल के बीच तत्कालीन समय में नेहरु की नेपाल के संबंध में नीति बेहद दिलचस्प नजर आती है। उन्होंने लोकतंत्र के समर्थन से ज्यादा भारत के राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरी समझा।  उनकी नजर में नेपाल में अचानक राजतन्त्र खत्म हो जाने से  भारत के इस पड़ोसी देश में आंतरिक संघर्ष शुरू हो सकता था और नेपाल की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए सामरिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत के लिए यह बेहतर स्थिति न होती  लिहाजा भारत ने  1950 की एक मैत्री संधि के जरिये न केवल नेपाल की सुरक्षा सुनिश्चित की बल्कि राजा त्रिभुवन की मदद भी की इसके बाद नेपाल में संवैधानिक राजतंत्र को बहाल किया गया यह वह समय था जब राजा त्रिभुवन के अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा था और ऐसे समय में भारत में नेपाल के विलय की उनकी पेशकश को मानना भारत की आंतरिक और बाहय सुरक्षा के लिए आत्मघाती कदम हो सकता था किसी चूके हुए और अलोकप्रिय राजा के किसी राज्य की संप्रभुता को दांव पर लगाने के निर्णय का परिणाम जन विद्रोह के रूप में सामने आ सकता था और ऐसे में भारत के लिए इसे सम्हालना बेहद मुश्किल हो सकता था ऐसा लगता है की नेहरु ने बेहद कूटनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए न केवल नेपाल  में राजनीतिक स्थिरता कायम करके वहां की जनता की संवेदनाओं को जीत लिया बल्कि सीमित संसाधनों के बावजूद नेपाल की आर्थिक सहायता प्रदान करके चीन पर निर्णायक बढ़त हासिल कर ली  भारत और नेपाल के बीच की 1950 में हुई मैत्री संधि दोनों देश के मधुर संबंधों का आधार बन गई और इस प्रकार भारत ने चीन की शरण में जाते हुए एक देश को अपने पक्ष में कर लिया  इसके अनुसार दोनों देशों की सीमा एक-दूसरे के नागरिकों के लिए खुली रहेगी और उन्हें एक-दूसरे के देशों में बिना रोकटोक रहने और काम करने की अनुमति होगी। इस सन्धि से दोनों देशों की जनता में अभूतपूर्व विश्वास बढ़ा इस समय नेपाल और भारत के बीच बेरोकटोक आवागमन होता है। 


 गौरतलब है की नेपाल की राजनीति में 1950 से लेकर 1955 तक गहरा अस्थायित्व रहा।1951 में दिल्ली समझौते के बाद नेपाल में संयुक्त सरकार की स्थापना हुई। लेकिन कुछ ही दिनों बाद राणाओं और नेपाली कांग्रेस में गहरे मतभेद पैदा हो गये थे, जिसके बाद नेपाल में एक सशत्र विद्रोह प्रारम्भ हो गया था। इस समय देश में कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों का भी अच्छा खासा प्रभाव था,भारत के किसी अप्रिय कूटनीतिक कदम से वहां की जनता भारत के खिलाफ लामबंद हो सकती थी और उससे चीन मजबूत हो सकता था। नव स्वतंत्र भारत ने शुरू से ही नेपाल में लोकतंत्र को मजबूत करने की कोशिशें जारी रखी,1947 में नेपाल के प्रधानमन्त्री की मांग पर भारत ने नेपाल की सरकार  को नया संविधान बनाने में सहायता देने के लिए वरिष्ठ राजनीतिज्ञ श्रीप्रकाश के साथ नई संधि करने का प्रस्ताव रखा,जो बेहद कारगर और महत्वपूर्ण परिणाम देने वाला रहा

भारत की आज़ादी के आंदोलन में उपनिवेश और साम्राज्यवाद का विरोध केंद्र में रहा था। साम्राज्यवाद यह राज्य की ऐसी नीति है जिसका उद्देश्य अपने राज्य की सीमाओं से बाहर रहने वाली ऐसी जनता पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना होता है,जो सामान्य रूप से ऐसे नियंत्रण को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक है। क्या भारत किसी अलोकप्रिय राजा के द्वारा अपने राज्य को  भारत में मिलाने के फैसले को स्वीकार करने की गलती कर सकता था। नेपाल अब भी राजतन्त्र और लोकतंत्र के बीच झूलता हुआ नजर आता है और वहां आंतरिक अशांति बदस्तूर जारी है। शुक्र है नेहरु ने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया जिसके दूरगामी परिणाम नव स्वतंत्र भारत की सुरक्षा और प्रगति के लिए नासूर बन जाते।

 

 

 

 

 

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