सोमवार, 4 जनवरी 2021

अस्थिरता की ओर पाक,Pakistan democrecy

 

   जनसत्ता                                                    

किसी लोकतांत्रिक देश के नीति निर्धारकों का पहला लक्ष्य जन संप्रभुता की सर्वोच्चता की स्थापना का होना चाहिए। लेकिन पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना अपनी राजनीतिक अभिलाषाओं की पूर्ति के लिए इतने उतावले थे की उन्होंने देश का पहला गवर्नर जनरल बनकर सत्ता पर पूर्ण नियन्त्रण का दांव खेला। बाद में जिन्ना का यह कदम उनके देश की राजनीतिक व्यवस्था का आदर्श बन गया जो अब आत्मघाती होकर सेना,धार्मिक नेताओं और ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के जरिए लोकतंत्र को जकड़ने को हर क्षण बेकरार नजर आता है। डेमोक्रेटिक थ्योरी में  कहा गया है कि लोकतंत्र के लिए वास्तविक खतरा नेताओं से नहीं,बल्कि नेताओं के अभाव से है। अपनी स्थापना के आठ दशक पूर्ण करने की ओर पाकिस्तान में लोकतांत्रिक सरकारों का गठन और असमय पतन नियति बन गई है और इसी कारण यह दक्षिण एशियाई देश राजनीतिक स्थिरता से स्थिरता से कोसो दूर नजर आता है।

इस समय विपक्षी पार्टियां इमरान खान सरकार के खिलाफ लामबंद होकर देश भर में रैलियां कर रही है। इन पार्टियों ने  सत्ताधारी इमरान खान की सरकार से किसी भी बातचीत से इंकार कर दिया है। विपक्षी पार्टियों के नेता सेना और आईएसआई को लेकर बेहद मुखर होकर विरोध कर रहे है। विपक्षी दलों के गठबंधन पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की रैलियां पाकिस्तान के प्रमुख शहरों में लगातार अपना प्रभाव दिखाने में कामयाब भी हो रही है इसमें जुड़ने वाली भीड़ अविश्वसनीय है,इसका प्रमुख कारण विभिन्न राजनीतिक दलों का अच्छा खासा जनाधार भी है। पीडीएम के प्रमुख मौलाना  फ़जलुर्रहमान पाकिस्तान के परम्परावादी समाज की पहली पसंद है और उनका संगठन जमीयत-उलेमा-इस्लाम बेहद प्रभावी माना जाता है पूर्व प्रधानमंत्री और मुस्लिम लीग (नवाज़) के नेता नवाज़ शरीफ़ रैलियों में वीडियो लिंक के ज़रिए भाषण दे रहे है और उनकी बेटी मरियम शरीफ लोगों से जा जाकर मिल रही हैपाकिस्तान पीपल्स पार्टी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो देश के युवाओं का पसंदीदा चेहरा है और वे इमरान खान की सरकार को उखाड़ फेंकने को  तत्पर नजर आ रहे है उनकी मां बेनजीर भुट्टों की हत्या में सेना और आईएसआई की भूमिका मानी जाती है बेनजीर भुट्टों की हत्या एक आतंकवादी हमले में 2007 में हो गई थी। ऐसा माना जाता है कि सेना के उच्च अधिकारियों ने उनकी सुरक्षा को लेकर जान बूझकर लापरवाही की थी। पाकिस्तान की सेना का इमरान खान को पूर्ण समर्थन है और आम चुनावों में यह साफ नजर भी आया था।

2018 के आम चुनावों में इमरान खान की पार्टी  तहरीक-ए-इंसाफ का देश की शीर्ष सत्ता तक पहुंचना पहले से तय नजर आ रहा था। सेना,न्यायालय के साथ चुनाव आयोग ने चुनाव परिणाम का खाका बेहद सोच समझ कर तैयार किया और बड़े रणनीतिक तरीके से अंजाम भी दिया।   उस समय का समूचा घटनाक्रम इसकी पुष्टि भी करता है। न्यायालय के फैसले को आधार बनाकर देश के सबसे  बड़े राजनीतिक दल मुस्लिम लीग एन के नेता नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया गया चुनाव परिणाम के पहले ही तहरीक-ए-इंसाफ के नेता इमरान खान को मीडिया ने जीत का सेहरा बांध दिया। सेना,आतंकियों,आईएसआई और धार्मिक समूहों ने उनका भरपूर समर्थन किया और इमरान खान को लोकतांत्रिक ढंग से चुने जाने की हर संभव परिस्थितियां उपलब्ध कराई गई। चुनाव आयोग ने सेना के इशारे पर अभूतपूर्व कदम उठाते हुए पहली बार पोलिंग बूथ के अंदर सेना को तैनात करने का फैसला किया जबकि इसके पहले सुरक्षाकर्मियों को सिर्फ अतिसंवेदनशील पोलिंग बूथों के बाहर तैनात किया जाता थाआम चुनाव के दौरान तीन लाख  71 हजार से अधिक जवानों को तैनात किया  गया जो इसके पहले 2013 में हुए आम चुनाव से तीन गुना से अधिक संख्या में थेचुनाव आयोग ने सेना को यह अधिकार दिया कि मतदान के दिन मतदान केन्द्रों में यदि कोई कानून को उल्लंघन करता हुआ पाया जाये तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाये और सजा दी जायेदोषी को छह महीने की सजा हो सकती हैइसके अलावा मतपत्रों की छपाई करने वाले सरकारी छापेखानों को भी सेना के हवाले किया गया था  यही नहीं,मतपत्रों एवं चुनाव से संबंधित अन्य सामग्रियों की हिफाजत करने के लिए भी सेना की सेवाएं ली गई थी। इस प्रकार बूथ के अंदर सेना का कर्मचारियों और मतदाताओं पर नजर रखने की कवायद और मत पेटियों और मत पत्रों पर सेना का कब्जा किसी चुनावी फिक्सिंग का संकेत दे रहे थे।

कुछ राजनीतिक पार्टियों ने आम चुनावों में सेना के नियन्त्रण पर जब आपत्ति जताई तो चुनाव आयोग ने साफ कह दिया की यह सुरक्षा व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए किया गया। इस बीच सेना ने भी विपक्षी दलों पर दबाव बनाने से गुरेज नहीं किया।

इन सबके बाद भी पाकिस्तान की जनता को इमरान खान से बहुत आशाएं  थी जो अब निराशा में बदलती जा रही है। इमरान खान ने जनता को नये पाकिस्तान का सपना दिखाया था लेकिन वे  जनता से ज्यादा सेना के नुमाइंदे नजर आते है। देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो गई है जबकि सेना बलूचिस्तान समेत कई इलाकों में आम जनता,मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बना रही है। मनी लॉन्ड्रिंग और टेरर फ़ंडिंग की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय संगठन फ़ाइनैंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स की ग्रे लिस्ट में बरकरार पाकिस्तान के सामने यह चुनौती बनी हुई है कि वह आतंकियों को मदद की वैश्विक छवि से बाहर आने के लिए आतंकी समूहों पर कार्रवाई  करें और उसके सबूत भी पेश करे। लेकिन यह आसान काम नहीं है। सेना और आईएसआई का आतंकियों को पूर्ण समर्थन है,ऐसे में इमरान खान की सरकार आतंकियों के खिलाफ कदम कड़े कदम उठाने में बूरी तरह नाकामयाब हो रही हैं। पाकिस्तान विदेशी मदद पर अपनी आर्थिक स्थिति के लिए बहुत हद तक निर्भर है,ग्रे लिस्ट में बने रहना देश की अर्थव्यवस्था को तोड़ने वाला हैइससे पाकिस्तान को हर साल लगभग 10 बिलियन डॉलर का नुक़सान हो रहा है इमरान खान को डर सता रहा है की एफएटीएफ़ पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट करता है तो पहले से ही लचर चल रही अर्थव्यवस्था पर ख़तरा और बढ़ जाएगा,क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मदद नहीं मिल पाएगी। अंतर्राष्ट्रीय दबावों और प्रतिबंधों का असर दिख रहा है,देश में महंगाई बढ़ रही है तथा आम जनता के लिए रोजी रोटी जुटाना मुश्किल होता जा रहा है।  

इमरान खान कूटनीतिक मोर्चों पर भी लगातार नाकाम हो रही है। पाकिस्तान की इस्लामिक देशों के नेतृत्व की कूटनीति बेदम होने लगी है। तुर्की और ईरान के साथ लामबंद होकर उसने अपने परम्परागत मित्र सऊदी अरब को नाराज कर दिया है। सऊदी अरब पाकिस्तान से अपना अरबों बकाया कर्ज मांग रहा है वहीं संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान के नागरिकों को वर्क वीजा देना बंद कर दिया है। इन देशों में पाकिस्तान के लाखों नागरिक काम करते है,पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बेहतर रखने में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके मुकाबले इन देशों से भारत के संबंध बेहद मजबूत हुए है। पिछलें दिनों  भारत के सेना प्रमुख ने सऊदी अरब  और यूएई का दौरा भी किया था इसे पाकिस्तान की नाकामी माना जा रहा है इसे लेकर विपक्षी दल इमरान खान सरकार पर हमलावर है

साल 2013 में शुरू  हुए चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर को लेकर पाकिस्तान में आंतरिक अशांति बड़ीहै बलूचिस्तान के लोग इसे अपने हितों के विरुद्द मानते है और बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी चीन- पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर की सुरक्षा कर रहे जवानों और  चीनी नागरिकों को लगातार निशाना  बना रही है। वहीं चीन का रुख भी पाकिस्तान को बेचैनी बढ़ाने वाला है। पाकिस्तान की सरकार और सेना इस कॉरिडोर को जल्दी पूरा करवाना चाहती है जबकि ड्रैगन का रुख पाकिस्तान को लेकर ढीला पड़ता जा रहा है।  कोरोना वायरस के कारण परियोजना का काम बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है और अनेक परियोजनाएं अभी शुरू ही नहीं की गई है पाकिस्तान को खुले हाथों से पैसे देने वाला चीन अब इससे भी हाथ पीछे खींचने लगा है2016 में चीन की सरकारी चाइना डेवलपमेंट बैंक और एक्सपोर्ट इंपोर्ट बैंक ऑफ चाइना ने पाकिस्तान को 75 बिलियन डॉलर का कर्ज दिया था। 2019 में यह रकम घटकर 4 बिलियन डॉलर पर आ गई थी। 2020 में चीन ने पाकिस्तान को केवल 3 बिलियन डॉलर का ही कर्ज दिया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है की चीन पाकिस्तान से जोड़ने वाले इस कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर आशंकित है

इन सबके बीच इमरान खान को लेकर पाकिस्तान का समाज भी विभाजित हो रहा है। इमरान खान देश और बाहर अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए राष्ट्रवाद का नुस्खा आजमाने लगे है। वे स्वयं की सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों की लामबंदी को भारत की साजिश से जोड़कर जनता का भरोसा जितने की कोशिश करते नजर आ रहे है। लेकिन इमरान खान के लिए सत्ता में बने रहना आसान नहीं है। 2014 में उनकी राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ ने आज़ाद मार्च के जरिए नवाज शरीफ की सरकार को उखाड़ फेंकने का बिगुल बजाया था। इमरान ख़ान ने नवाज़ शरीफ़ पर मतदान में छेड़छाड़ करने के आरोप लगाते हुए नवाज़ शरीफ़ को पद से हटाने की मांग के साथ यह मार्च किया था

6 साल बाद एक बार फिर पाकिस्तान में वैसे ही हालात बन गए है। फर्क बस इतना है की इस समय जब देश के प्रधानमंत्री वे स्वयं है।  विपक्षी पार्टियां लामबंद है और वह इमरान खान पर सत्ता को हासिल करने के लिए आम चुनावों में सेना के साथ मिलकर षडयंत्र रचने के आरोप लगा रही है। बहरहाल पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता से वहां सेना और आईएसआई मजबूत होती है। एक बार फिर पाकिस्तान अस्थिरता की ओर बढ़ रहा है। इन हालातों में पाकिस्तान में फिर से सैन्य शासन की आशंकाओं से इंकार नहीं किया जा सकता है।

 

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