गणतंत्र बनने को बेताब भारत,gantnatra bharat

 मृदुभाषी

                         

महान दार्शनिक जान स्टुअर्ट मिल ने लगभग 200 साल पहले अपनी आत्मकथा में लिखा था की मुझे अब पक्का यकीन है कि मानव जाति की हालत में कोई सुधार मुमकिन नहीं है।  अगर उसके ख्याल के ढंग के बुनियादी ढांचे में कोई तब्दीली हो जाएं,तो दूसरी बात है।  इन दो सौ सालों में कहने को तो दुनिया बहुत बदली है,शिक्षा का व्यापक प्रवाह हुआ है और इससे प्रभावित हम सब हुए है। विज्ञान अवतार बनकर विकास की नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है और इन सबके बीच समाज खड़ा है। इन सालों में भारत का सफर भी बेहद दिलचस्प रहा है। राजतंत्र के साथ औपनिवेशिक तंत्र और करीब आठ दशक से गणतन्त्र।  जान स्टुअर्ट मिल के दावे की पड़ताल की जायें तो भारत अपने ख्यालों पर अडिग है और राजनीतिक सत्ता इससे इत्तेफाक भी रखती है।

मसलन भारत के इतिहास में राजतंत्र का असर खूब रहा है और गणतन्त्र होने के दावे भी साथ ही रहे है। सदियों पहले शुक्राचार्य द्वारा लिखी गई किताब नीति सार में भारत के गणतन्त्र को कुछ इस प्रकार समझाया गया है,गांव की पंचायत या चुनी हुई प्रतिनिधि सभा गांव के सर्वांगीण विकास के सारे निर्णय लेती थी,राजा को कर के रूप में एक हिस्सा दे दिया जाता थायद्यपि राजा का बहुत सम्मान था लेकिन गांव के स्वराज व्यवस्था में राजा भी हस्तक्षेप नही करते थेहिंदुस्तान में जमीन की कोई कमी नहीं थी,इसलिए किसान अपनी जमीन का मालिक होता था और सामंती प्रथा हावी नहीं थीप्रतिनिधि सभा के किसी भी सदस्य का आचरण ठीक नहीं होने पर उसे कभी भी पद से हटाया जा सकता था लोकमत को राजा के मुकाबले ज्यादा मजबूत माना जाता था।”यह विचार यूरोप की सामंती व्यवस्था के ठीक उलट था,जिसमें राजा को अपने राज्य के सब लोगों और वस्तुओं पर अधिकार हासिल था। नीतिसार की हमारे इतिहास में बहुत मान्यता है,वहीं इससे इतर भारत की असमानता गणतांत्रिक इतिहास की कुरूपता को सामने लाकर खड़ा कर देती है। यदि जमीन के महत्व और ग्राम स्वराज या गणतन्त्र के प्रति हमारा महाप्रतापी तंत्र इतना संवेदनशील होता तो ज़मीनें कुछ जमीदारों और सामंतों की जागीर बन कर न रह जाती और बाकी करोड़ों लोगों के भाग्य पीढ़ियों तक बंधुआ मजदूरी से शापित न रहे  होते। जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था तो नील की खेती के खिलाफ विद्रोह हुआ और जब आज़ाद होकर भारत गणतांत्रिक राष्ट्र बना तो भूदान के जरिए आर्थिक असमानता को दूर करने की कोशिशें शुरू हुई। लेकिन साथ ही किसानों की ज़मीनों पर विकास यात्राएं भी शुरू की गई। किसान कानून,प्रशासन और सत्ता के दबाव में जमीन देने को मजबूर थे। यह कार्य बदस्तूर जारी है। इन सबके बीच सामंती तंत्र और राजतंत्र अपनी हैसियत और प्रभाव को सत्ता के साथ कदम ताल मिलाकर बढ़ाने में कामयाब रहा। इन वर्गों ने जिसकी सत्ता उसका समर्थन के तर्ज पर अपनी बादशाहत कायम रखी।

गणतन्त्र का अर्थ बेहद सरल और स्पष्ट है, यहां राज्य की व्यवस्थाओं और सत्ता पर जनता का नियंत्रण होता है,यह किसी शासक की निजी संपत्ति नहीं होती है। राष्ट्र का मुखिया वंशानुगत नहीं होता है। भारत के गणतांत्रिक अतीत और वर्तमान को देखिये,भविष्य की दृष्टि साफ दिखाई देती है। लोकतंत्र के लिए न तो यह संभव है और न ही जरूरी की लोग सीधे शासन करें। लेकिन राजनीतिक दलों की विशिष्ट मान्यताओं ने गणतंत्र को अपने अनुसार ढालने को मजबूर कर दिया है। आप भारत के सभी राजनीतिक दलों को ऊपर से लेकर निचले स्तर तक देखिये। सरपंच का पद पुरुष के स्थान पर महिला हुआ तो सरपंच की पत्नी या मां का चुनाव लड़ना तय है और समाज इसे स्वीकार भी करता है। सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के परिवारों को देखिये। राजनीतिक धरोहर अपने परिवार में ही सौंप दी जाती है और राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था उनसे इतनी प्रभावित रहती है की इसका सामना करना आम जन मानस के लिए बेहद कठिन होता है।

इसके साथ व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए पूंजीवादी तंत्र हमेशा तैयार रहता है। कार्ल मार्क्स को खारिज इसीलिए तो नहीं किया जा सकता,उनका साफ कहना था की,पूंजीवादी समाज में अलगाव सर्वत्र व्याप्त है तथा समाज की सभी संस्थाओं जैसे धर्म,अर्थव्यवस्था और राजनीति आदि को नियंत्रित करता है। भारत के राजनीतिक दल देश की समस्याओं का समाधान पूंजीवादी घरानों से मिलकर करने को बेताब रहते है। जबकि कहने को भारत समाजवादी देश है। महात्मा गांधी भारत की भविष्य की राजनीति को लेकर आशंकित तो थे ही। बिना सत्तारूढ़ हुए भी जनता पर अधिकार हो सकता है और जनता में सर्वमान्य भी हो सकते है,महात्मा गांधी यही सिखाते है और भारत के नेताओं से ऐसी ही अपेक्षा किया करते थेभारत का गणतन्त्र कहने को सफलतापूर्वक कई साल गुजार चूका है लेकिन असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है। असमानता के आंकड़े इसके गवाह है। जिस तंत्र में विकास अल्प वर्ग तक स्थापित करने की व्यवस्था हो वह गणतन्त्र हो भी नहीं सकता। महात्मा गांधी कहते थे की भारत को समझना हो तो रेल में तृतीय श्रेणी का सफर कीजिये। यह पैमाना अब भी नहीं बदला है। रेल का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। वाकई,वातानुकूलित रेल के डिब्बे बढ़ाएँ जा रहे है,रेल स्टेशन के वेटिंग रूम आधुनिक करने के लिए करोड़ों रुपए भी खर्च किए जा रहे है। रेल के उच्च अधिकारी जब भी किसी रेलवे स्टेशन पर उतरते है तो सबसे पहले इन आधुनिक रेल के वेटिंग रूम देखने जाते है। इन सबकी निगाहों या प्राथमिकताओं में सबसे बड़ा रेल परिवहन का साधन तृतीय श्रेणी की सुविधाएं कभी नहीं होती और न ही उस और कोई देखने की तकलीफ करता है। रोजी रोटी की तलाश में सैकड़ों मील का सफर तय करने वाला मजदूर शायद ही कभी वातानुकूलित रेल के डिब्बे या आधुनिक वेटिंग रूम में बैठा होगा। बाकी तृतीय श्रेणी में बैठने का अनुभव महात्मा गांधी तो कर सकते थे लेकिन अब यह मुमकिन कहां है,अंतत: लोकतांत्रिक अधिनायकवाद जो कायम है। यह नीचे से ऊपर तक है।  महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई को जब सामाजिक न्याय स्थापित करने के संघर्ष के तौर पर निरुपित किया तब एक बार फिर भारतीय चेतना अपने घर की अर्थव्यवस्था को ठीक करने और रोजी रोटी के समुचित प्रबंधन की और प्रवृत हुई  गांधी ने अर्थव्यवस्था को सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित करके स्वावलंबी और आत्मनिर्भर भारत की और कदम बढ़ाएं  महात्मा गांधी आम जनमानस को आत्मनिर्भरता से जोड़ते थे जबकि अब सरकारों के लिए आत्मनिर्भरता का अर्थ पूंजीवादी शक्तियां होती है जो स्वदेशी होने  का राजनीतिक लाभ लेकर वैश्विक स्तर पर अपना व्यापार बढ़ाती है। महात्मा गांधी की अर्थव्यवस्था की कल्पना उनके स्वदेशी आंदोलन में साकार होती है यह आंदोलन समुदाय में उपलब्ध संसाधनों और समुदाय के कौशल और हुनर का उपयोग करके रोजमर्रा के उपयोग की चीजों के उत्पादन और लोगों को आत्मनिर्भर बनाने पर आधारित थाप्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा करना उसका प्रमुख उदेश्य था। शोषण रहित समाज का निर्माण और अहिंसक विकास की भावना इसमें निहित थी।

आखिर महात्मा गांधी गणतांत्रिक देश ही तो चाहते थे। लेकिन गांधीवादी सिद्धांत राज्य के नीति निदेशक तत्वों में डाल दिये गए। इसका मतलब यह है की राज्य की इच्छा हो तो इसे लागू करें। भला कोई भी राजनीतिक व्यवस्था जन सामान्य का राज मजबूत करने की कोशिश कैसे कर सकती है। नतीजे सामने है, स्टालिन से लेकर अखिलेश तक। उत्तर से लेकर दक्षिण तक सत्ता के केंद्र में परंपरागत सत्ता ही है और परंपरागत सत्ता का विचार ही गणतन्त्र का विरोध है।

गोल्ड कोस्ट एक ब्रिटिश उपनिवेश था जो स्वतंत्र होकर 1957 में घाना के रूप में अस्तित्व में आयाइसके नेता एनाक्रुमा लोकतंत्र के जरिये देश में सुधार लाना चाहते थे,लेकिन वे आजीवन राष्ट्रपति भी बने रहना चाहते थे ऐसा उन्होंने क़ानूनी रूप से कर भी लिया रूस हो या चीन,सब दूर सत्ता पर नियंत्रण हासिल किया जा रहा है। भारत में तरीके पारंपरिक है लेकिन है तो सत्ता पर नियंत्रण ही। आज दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में लोकतंत्र स्थापित है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं की लोगों को बोलने,अपना नेता चुनने और सत्ता का विरोध करने की आज़ादी है।

भारत में लोकतंत्र स्थायी और टिकाऊ है,इसमें कोई संदेह नही है। यहां शांतिपूर्ण सत्ता का हस्तांतरण भी होता रहा है,यह भारत के लोगों का लोकतांत्रिक चरित्र है। लेकिन आज़ादी के आठवें दशक तक आते आते एक प्रश्न खड़ा हुआ है। क्या लोग अपने शासकों का चुनाव या उनमें बदलाव कर सकते है। लोकतंत्र का मतलब यदि यह है की सिर्फ लोगों द्वारा चुने गए नेताओं को ही देश पर शासन करना चाहिए तो फिर संसदीय या विधानसभा चुनावों में स्थानीय उम्मीदवार अलोकप्रिय होकर भी क्यों चुन लिए जाते है।  जाहिर है हमारे कथित गणतांत्रिक देश के लोग संसदीय प्रणाली को तो खारिज कर ही चूके है। वे उच्च स्तर पर नेतृत्व देखकर स्थानीय स्तर के गैर जरूरी प्रतिनिधित्व को स्वीकार कर लेते है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल आम जनमानस के सामने विकल्प की मजबूरी का खूब फायदा उठा रहे है। अब भला भारत वास्तविक गणतन्त्र होता तो न तो किसान सड़क पर होते,न ही देश में व्यापक गरीबी और असमानता होती और न ही गांव का गरीब सैकड़ों किलोमीटर दूर रोटी की तलाश में जाने को मजबूर होता। भारत में ऊंची अट्टालिकाओं को विकास का पैमाना मान लिया गया है,एक नजर बेतहाशा बढ़ती हुई झोपड़ियों,पूंजीपतियों और राजनेताओं की संपत्ति पर भी नजर डालिए,जनतंत्र और गणतंत्र होने के मायाजाल को समझने में आसानी होगी।

 

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