शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

बदलाव की उम्मीदों का नया साल, bdlav naya sal

 प्रजातंत्र

                  

 

सवा अरब भारतीयों की आशाओं और उम्मीदों से भरा नया साल नई शुरुआत के लिए तत्पर नजर आ रहा है,बीते साल की चुनौतियों से बेहाल जिंदगी नये साल में बदहाली को पीछे छोड़कर कही आगे निकल जाना चाहती है अब ट्रम्प नहीं बिडेन होंगे,रिश्तों को नये ढंग से लिखने और रचने की जरूरत भी होगीलेकिन विश्वास है की उन्हें भारत का नमस्कार उसी ताजगी से रास आएगा जिसे नमस्ते ट्रम्प या हाउडी मोदी में महसूस किया गया था। 


पड़ोसी देशों से सम्बन्धों को लेकर निराशाएं बहुत है लेकिन बंगलादेश चावल खरीदकर बेहतरी की आशाएं जगा रहा है। पाकिस्तान को जवाब हमने बेहतर दिए है लेकिन अंततः बातचीत से ही समाधान निकलते है। नये साल में कूटनीतिक दबाव डालकर बातचीत की मेज पर खींच लाने और सरहद पर शांति समेत अन्य मांगे मनवा लेने में हम कामयाब हो,इसकी कोशिश तो की ही जानी चाहिए। चीन का संकट गहरा और बड़ा है,हमारे वीरों ने जान देकर ड्रेगन को काबू में तो किया है लेकिन इस साल उसे पीछे धकेल देना है। माओ की नीति समस्याओं के समाधान की नहीं,उसे दीर्घकालीन समय तक बनाये और उलझाएं रखने की है। इससे हमारे देश का विकास का पैसा सुरक्षा में लगाना पड़ रहा है। चीन की रणनीति भारत को उलझाएं रखने की है। इस साल न केवल चीन की हिमाकतों को खत्म करना है बल्कि सभी प्रकार के सीमा विवाद खत्म करके भारत की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखने पर जोर होना चाहिए। रूस मित्र तो है लेकिन चीन को लेकर हमारी रणनीति के प्रति आशंकित भी है, अंततः राष्ट्रीय हितों से बढ़कर कोई भी वैदेशिक सम्बन्ध नहीं हो सकते,अब रूस से आगे देखने की जरूरत होगी।

नये साल को लेकर चमक उन हजारों आंखों में भी होगी जिन्होंने टकटकी लगायें पैदल मीलों का सफर तय कर जिंदगी बचाने की जदोजहद की नई इबारत लिखी। मजदूरों का यह सफर किसी नमक तोड़ने वाले मार्च से भी कही बड़ा था। नमक तोड़कर अंग्रेजों की नीतियों को करारा जवाब दिया गया था,लेकिन आज़ाद भारत में ऐसी जरूरत नहीं होना चाहिए। सैकड़ों किलोमीटर का पैदल सफर तयकर अपने गांव लौटने वाले मजदूर कह रहे थे की अब वे कभी शहर नहीं जायेंगे। भारत गांवों में ही तो बसता है। 68 फीसदी आबादी गांवों में ही रहती है,लेकिन रोटी की तलाश में मजदूर वापस शहर लौट गए है। गांधी कहा करते थे की भारत की तरक्की और आत्मनिर्भरता के रास्ते गांवों से ही निकलते है।गांधी चले गए,आज़ादी के बाद कई साल बीत गए लेकिन गांवों में रोजगार अब भी नहीं है। आधुनिक शिक्षा से गांव अब भी कोसो दूर है। शुद्द पीने का पानी उन्हें अब भी नसीब नहीं होता,अंधविश्वास बदस्तूर जारी है। महिलाओं की शिक्षा को लेकर भी जागरूकता की कमी है। आशा है नया साल गांवों की आत्मनिर्भरता और खुशहाली की मिसाल कायम करने वाला होगा।

यकीनन नये साल से उम्मीदें तो उस बेटी को भी होंगी जिसने सायकिल पर बिठाकर अपने पिता के साथ देश की उम्मीदों की नगरी दिल्ली को छोड़कर मीलों का सफर तय किया था। उसके हालात बदलेंगे और देश की व्यवस्थाएं भी इस प्रकार बनेगी जिससे बड़ी चुनौतियों के बीच भी जनता की सुगमता के मार्ग खुले। जापान भूकंप का सामना रोज करता है लेकिन भूकंप से वह देश कभी प्रभावित नहीं हुआ। कोरोना काल में लॉक डाउन से बहुत सारे लोग भूख,प्यास और पैदल चलते हुए मर गए है,अब किसी भी परेशानी में ऐसा न हो,इस दिशा में सरकार अवश्य ही सोच रही होगी।  देश में स्मार्ट शहर बन रहे है,कई शहरों में मैट्रो ट्रेने भी चलेगी।  



विकास से जीवन में खुशहाली आती है इसलिए यह अच्छी शुरुआत है। इसके साथ स्मार्ट गांव,स्मार्ट स्कूल,स्मार्ट अस्पताल और ग्रामीण जीवन भी स्मार्ट बन जाये तो समझ लीजिये हमारा देश विकसित राष्ट्रों में भी अग्रणी हो जायेगा। शिक्षा को लेकर अभी बहुत कुछ किया जाना है,देश में शोध को लेकर माहौल नहीं बन पा रहा है। अंततः शोध से ही तो भारत के चरक,बौधायन,चरक,कौमारभृत्य,जीवक,सुश्रुत,आर्यभट,वराह मिहिर,ब्रह्मगुप्त और वाग्भट ने अपनी पहचान बनाई हैहमारे युवाओं में बहुत सारी संभावनाएं है लेकिन वे नासा और अमेरिका की और अपना रुख कर लेते हैनये साल में शोध को लेकर संभावनाएं बनना ही चाहिए 

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति कई आशाएं लेकर आई है लेकिन वह साकार तो शिक्षा संस्थानों से ही होगी ऐसा भी लगता है की लोकतंत्र में यदि शिक्षा चुनाव जीतने का आवश्यक कारण बना दिया जाये तो यकीन मानिये  देश की कई बड़ी समस्याओं का हल हो जायेगा,भारत उस पल का इंतजार कर रहा हैमुमकिन है इस साल होने वाले विभिन्न चुनावों में शिक्षा की बेहतरी के आधार पर मतदान हो। विधायकों और सांसदों से जनता यह पूछे की आपने क्षेत्र में शिक्षा के विकास के लिए क्या किया है और आपकी क्या योजना है।

नये साल में अन्नदाता के मुस्कुराने की उम्मीदें भी बंधी हैठंड से बेहाल हजारों परिवार अपेक्षाओं की आस में दिल्ली के आसपास कांप रहे हैआशा है सरकार के साथ सुलह की उम्मीदें बढने से मासूम बच्चें,माताएं और बहने अपने घर की ओर रवाना हो जाएगी इन परिवारों को खालिस्तानी या पाकिस्तानी का ताना सहने का मलाल तो होगा लेकिन उन्हें रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के किसानों को भला बुरा कहने वालों को दी गई नसीहत में रोशनी दिखाई दी होगी। लोकतंत्र में असहमति हो सकती है और इससे लोकतंत्र ही मजबूत होता है,इस भावना को समझने की जरूरत इस समय खूब महसूस की जा रही है। नये साल में सहमति और असहमति का समन्वय कडुवाहट का कारण न बने,इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है,अंततः हम सब मिलकर ही तो भारत को मजबूत बनायेंगे। सभी की हिस्सेदारी,सभी में बराबरी यही तो लोकतंत्र का मूलमंत्र है।

नया साल किसी हाथरस को भूला देने को भी बेताब हैजहां जातीय अराजकता का संकट एक बेटी की जान लेकर भी उसके परिवार की अस्मिता को तार तार करने को तैयार था भला हो प्रधानमंत्री का जिनके हस्तक्षेप से मुख्यमंत्री जागे और जांच एजेंसी से पीड़ितों को न्याय नसीब हुआ। नया साल बेटियों की सशक्तिकरण की मिसाल बने,वे देश के किसी भी गांव या शहर में बेखौफ होकर घूम सके। बेटियों के लिए सुरक्षित माहौल बनाने के लिए प्रयास समाज को करना होगा।

बहरहाल बदलाव की अनन्त उम्मीदों के साथ नये साल का अभिनन्दन है। बदलाव समय की मांग है और इसकी जरूरत वैदेशिक से लेकर आंतरिक नीतियों तक में होगी। देश की एकता और अखंडता की रक्षा तथा राष्ट्रीय हित के लिए नया साल बदलावों का स्वागत ही करेगा।

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