गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

आइए अटल बिहारी वाजपेयी का सुशासन ढूंढते है,atal bihari vajpayi sushashan

 सुबह सवेरे                                                             

                                                       


“मेरे प्रभु,मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,गैरों को गले न लगा सकूं,इतनी रुखाई कभी मत देना।” भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कही यह पंक्तियां भारत की लोकतांत्रिक राजनीति की उस उंचाई को चुनौती देती नजर आती है,जहां पहुंचकर राजनेता जनमानस से दैवीय सत्ता के रूप में अक्सर व्यवहार करने लगते हैदरअसल भारतीय लोकतंत्र का चाहे कितना गुणगान होता रहे लेकिन असल में जनमानस लोकतंत्र से निकलने वाली तानाशाही को भोगने को मजबूर हो गया है पिछले आठ दशकों में यहां की दलगत राजनीति ने लोकतंत्र को अपने बाहुपाश में इस मजबूती से जकड़ लिया है की जनता कराहती रहती है लेकिन उनके पास राजनीतिक दलों द्वारा थोपे गये वे जानलेवा विकल्प होते है जिन्हें न चाहते हुए भी जनमानस को स्वीकार करना होता है। वहीं दलीय राजनीति से निर्मित राजनेताओं का विभाजनकारी,जातीय और साम्प्रदायिक विचार,बडबोलापन,अदूरदर्शितापूर्ण   आचरण और व्यवहार राष्ट्र की एकता और अखंडता को संकट में डालता रहता है।  

इन सबके बीच शुक्र है की इस लोकतांत्रिक देश में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता भी हुए है जिनका चरित्र शुचिता की उस कड़ी साधना को छूता है जहां से समाज और राष्ट्र निर्माण की ज्योति प्रज्वलित होती है 1971 में सांसद रहते अटलजी ग्वालियर आये तो साईकिल उठाई और घूमने निकल पड़ेइस दौरान वे अपने रिश्तेदारों और कई दोस्तों से मिले.मार्ग में महारानी विजयाराजे सिंधिया की नजर अटलजी पर पड़ी तो वे तुरंत कार से उतरीं और बोली खबर कर देते,मैं गाड़ी की व्यवस्था कर देती.तब अटलजी ने कहा,यह तो ग्वालियर है,अपना घर

अपने पूरे राजनीतिक जीवन में विपक्ष की राजनीति करते अटलजी ने लंबा सफर तय किया लेकिन राष्ट्र के मूल्यों और लोकतांत्रिक आदर्शों को लांघकर उन्होंने सत्ता प्राप्ति के लिए कभी भी कोई कोशिश नहीं कीइस कारण वे सत्ता पक्ष से गहरा सम्मान भी हासिल करते रहे1962 में लोकसभा चुनाव हारने के बाद वे उच्च सभा हेतु चुने गयेकम संख्या बल के बाद भी अटलजी की प्रतिभा से प्रभावित सभापति राधाकृष्णन उन्हें अग्रिम पंक्ति से बैठने का स्थान देते थे1964 में कश्मीर के प्रश्न पर उन्होंने शेख अब्दुल्ला की कड़ी आलोचना करते हुए कहा था,शेख अब्दुल्ला बड़े व्यक्ति हो सकते है,मैं उनका सम्मान करता हूँ ,किन्तु वे जम्मू कश्मीर और शेष भारत से बड़े नहीं हो सकते” इस प्रकार राष्ट्रीय हितों को लेकर अटलजी की बेबाकी के सभी कायल थे लेकिन इसमें नीतिगत विरोध होता था,व्यक्तिगत आलोचना या कडुवाहट न तो शब्दों में होती थी न ही विचारों में

अपने राजनीतिक जीवन में अनेक सोपान चढ़ने वाले इस महान राजनीतिज्ञ को पक्ष विपक्ष ही नहीं दुश्मन देश के राजनेता भी सराहते हे। मोदी के सत्ता में आने पर आशंकाओं को लेकर परवेज मुशर्रफ ने कहा था  कि भाजपा हो या कांग्रेस पार्टियों का कोई मसला नहीं होता। अटल बिहारी वाजपेयी भी भाजपा से थे। वह बेहतरीन इंसान थे। भारत-पाक मसलों को सुलझाने के लिए ज्यादा संजीदा थे।1957 से संसद का सफ़र तय करने वाले अटलजी लगभग चार दशक विपक्ष में और उसके बाद देश के सर्वाधिक समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले प्रथम गैर कांग्रेसी रहे लेकिन उन्होनें देश की प्रगति के लिए कदम मिलाकर चलना होगा के विचार को सर्वोपरी रखा उनकी ओजस्विता और  गाम्भीर्य से अभिभूत पंडित जवाहरलाल नेहरु ने एक दिन उनके भारत के प्रधानमंत्री बनने की घोषणा की थीवाजपेयी  दल की नही दिलों की राजनीति करते थे ,उन पर देश का भरोसा इतना की विपक्ष के नेता होने के बावजूद प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने उन्हें देश का पक्ष रखने के लिए जिनेवा भेजा था  देश में साम्प्रदायिक राजनीति की खिलाफत करने वाले इस महान राजनेता  को जब विरोधियों ने साम्प्रदायिकता के दुष्प्रचार में घसीटने की कोशिश की,उस दौर में इसका करार जवाब जनता जनार्दन ने दिया था 1996 के लोक सभा चुनाव के दौरान लखनऊ की सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं ने उनकी सफलता के लिए उनकी दाहिनी भुजा पर इमाम-जामिन अर्थात पवित्र ताबीज बांधा था भारत में साम्प्रदायिक विद्वेष के बहुसंख्यकों पर प्रभाव को लेकर उन्होनें संसद में बेबाकी से सर्वधर्म समभाव को हिन्दू धर्म की जन्म घूंटी बताते हुए कहा था की इस देश में ईश्वर को मानने वाले भी है और ईश्वर को नकारने वाले भी है ,यहाँ किसी को सूली पर नही चढ़ाया गया किसी को पत्थर मारकर दुनिया से नही उठाया गया,ये सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है ये अनेकान्तवाद का देश है,और भारत कभी मजहबी राष्ट्र नहीं हो सकता

सुशासन जनतंत्र का मूल आधार है ,आज ये अपने तौर तरीकों को लेकर विवादों में भी  रहता है,लेकिन अटलजी ने सुशासन की अपनी कोशिशों में दलीय राजनीति को कभी हावी नही होने दियासामान्यत सरकारें बदलने के साथ नीतियां भी बदल जाती है लेकिन वाजपेयी अलहदा थे नरसिम्हा राव ने आर्थिक सुधारों की जो नीति आरम्भ की थी,उसे अटल जी ने जारी रखा। उन्हें इस नीति के सकारात्मक तथ्यों का ज्ञान था। वह उसे इस कारण ख़ारिज नहीं करना चाहते थे कि वह कांग्रेस की आर्थिक नीति थी। अटलजी का इस साहस के दूरगामी परिणाम हुए और अर्थव्यवस्था के सुधार से देश आर्थिक रूप से सम्पन्न हुआ। देश में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना का आरम्भ कर देश के महत्त्वपूर्ण शहरों को लम्बी-चौड़ी सड़कों के माध्यम से जोड़ उन्होनें विकास की नई इबारत लिखी जिससे व्यापारिक क्रांति भी आयीवे लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति इतने प्रतिबद्द रहे की अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिटंन के भारत आगमन पर अटलजी ने पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ़ की रिहाई के लिए बिल क्लिंटन से वार्ता की ताकि पड़ोसी देश में प्रजातंत्र की हत्या हो सके। इस साझा प्रयास से ही नवाज शरीफ़ की रिहाई सम्भव हो सकी।

लोकतंत्र में सत्ता स्थाई नहीं होती लेकिन येन केन कर सत्ता में बने रहने की राजनीति से भारत का लोकतंत्र कलंकित होता रहा हैऐसे समय में परीक्षा का अवसर अटल जी के सामने में आया लेकिन उन्होंने खरीद फरोख्त की राजनीति को अपने आदर्शों के खिलाफ बताकर 1 वोट से सरकार गिरना स्वीकार कर लिया यह भारतीय राजनीति की अभूतपूर्व घटना थी

इसके बाद जनता के समर्थन से अटलजी एक बार फिर प्रधानमंत्री बने और उन्होंने सामाजिक न्याय स्थापित करने की अवधारणा के अनुरूप उल्लेखनीय कार्य करते हुए विश्व की सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा योजना अंत्योदय अन्न योजना,किसान क्रेडिट कार्ड योजना,पूरे देश को आपस में जोड़ने की स्वर्णिम चतुर्भुज योजना और ग्रामीण बस्ती को पक्की तथा बारह मासी सड़कों से जोड़ने की प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू कर भारत के बेहतर भविष्य की संभावनाएं जगाई

राजनीति के इस दौर में अटलजी के साथ सुशासन भी नदारद है। आधुनिक चमकदमक और भौतिकवाद की परछाई में चलने वाले नेताओं की बेतहाशा बढती हुई सम्पत्ति सुशासन को गर्भ में ही खत्म कर देने के लिए हर पल आतुर नजर आती है। अटलजी का चरित्र उनका आईना है वहीं अब राजनीति और इससे जुड़े नेताओं के लिए चरित्र और विचारधारा उपयोग की जाने वाली वस्तु की तरह है जिसे किसी भी ढांचे में ढाल कर उपयोग कर लिया जाता है। अटलजी के साथ सुशासन  इसलिए जुड़ा है क्योंकि उनके व्यक्तित्व और कार्यो में वह प्रतिबिम्बित होता रहा। जाहिर है इस महान राजनेता की राजनीतिक और वैचारिक धरोहर को दरकिनार कर सुशासन की इमारत तैयार नहीं की जा सकती। बहरहाल सुशासन के लिए राजनेताओं के राजनीतिक जीवन में उच्चता और शुचिता चाहिए,जो अब ढूंढने पर भी नहीं मिलती

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brahmadeep alune

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