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आइए अटल बिहारी वाजपेयी का सुशासन ढूंढते है,atal bihari vajpayi sushashan

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  सुबह सवेरे                                                                                                                        “मेरे प्रभु,मुझे इतनी ऊँचाई कभी मत देना,गैरों को गले न लगा सकूं,इतनी रुखाई कभी मत देना ।” भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कही यह पंक्तियां भारत की लोकतांत्रिक राजनीति की उस उंचाई को चुनौती देती नजर आती है,जहां पहुंचकर राजनेता जनमानस से दैवीय सत्ता के रूप में अक्सर व्यवहार करने लगते है । दरअसल भारतीय लोकतंत्र का चाहे कितना गुणगान होता रहे लेकिन असल में जनमानस लोकतंत्र से निकलने वाली तानाशाही को भोगने को मजबूर हो गया है । पिछले आठ दशकों में यहां की दलगत राजनीति ने लोकतंत्र को अपने बाहुपाश में इस मजबूती से जकड़ लिया है की जनता कराहती रहती है लेकिन उनके पास राजनीतिक दलों द्वारा थोपे गये वे जानलेवा विकल्प होते है जिन्हें न चाहते हुए भी जनमानस को स्वीकार करना होता है । वहीं दलीय राजनीति से निर्मित राजनेताओं का विभाजनकारी,जातीय और साम्प्रदायिक विचार,बडबोलापन,अदूरदर्शितापूर्ण   आचरण और व्यवहार राष्ट्र की एकता और अखंडता को संकट में डालता रहता है।   इन सबके ब