मंगलवार, 10 नवंबर 2020

बिना कैडर खाली हाथ है कांग्रेस, khali hath congress

 

दबंग दुनिया

                                                                      

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने बिहार के विधानसभा चुनावों में महागठबंधन से अपने लिए 70 सीटें चुनाव लड़ने के लिए तो ले ली लेकिन योग्य उम्मीदवार कहां से लाये,इस प्रश्न पर पार्टी हांफने लगी और नतीजा सामने हैकांग्रेस अक्सर विचारधारा को आगे करके जनता के बीच जाने की बात कहती है लेकिन जिस भी राज्य में कांग्रेस से मिलती जुलती विचारधारा किसी दूसरे दल की होती है,कांग्रेस का वोट उस पार्टी में ट्रांसफर हो जाता हैबंगाल में तृणमूल के आते ही कांग्रेस जमीदोंज हो गईदिल्ली में आप  ने कांग्रेस का पत्ता साफ कर दिया महाराष्ट्र में पार्टी अंतिम पायदान पर हैबिहार में सितारा बुलंद होने की कोई संभावना ही नहीं नजर आतीउत्तर प्रदेश में अमेठी का किला ढह चूका है और उसके डेमेज कंट्रोल की कोई कोशिश नहीं की जा रही है रायबरेली का किला ढहने की कगार पर है और अगले लोकसभा चुनावों में उसे बचा लेना आसान नहीं होगा



मध्यप्रदेश की सत्ता पर शिवराज का कायम रहना महज इत्तेफाक नही है,इसे झुठलाने की कोशिशें वास्तव में वे ख्याली पुलाव थे जिसका स्वाद महसूस तो किया जा सकता है लेकिन उससे पेट नहीं भरा जा सकता था 2018 में कांग्रेस को मिली संयोग की सत्ता को अवसर में न बदलने की शीर्ष नेताओं की गलती को बिकाऊ और टिकाऊ के बूते झुठलाने की लगातार कोशिशें पार्टी के ताबूत में अंतिम कील ठोकने जैसी होगी दरअसल 2018 के कमलनाथ केबिनेट को देखकर यह लगता था की यह किसी नामचीन कॉलेज के विद्यार्थियों का वह समूह है जिसे बिना अनुभव के लोकतंत्र के रण में झोंक दिया गया हैकेबिनेट में युवा चेहरों ओर उन्हें दिए जाने वाले विभाग भी दिलचस्प थेजो किसानों के बीच बढ़िया काम कर सकते थे उन्हें शिक्षा का सारथी बना दिया गया जिन्हें अपने संस्थानों की शहर में विकास करने से फुर्सत नहीं मिलती थी,उन्हें ग्रामीण विकास सौंप दिया गयामरहूम पिताजी किसानों के नेता थे सो बेटा किसानों का मंत्री बना दिया गयाकंसाना,गुर्जर और दत्तीगांव जैसे वरिष्ठ नेता दशकों से जीतते आ रहे थे,उन्हें दरकिनार कर नये नवेलों को मंत्री पद से नवाज दिया गयाइन सबके बाद अपने कुनबे को सम्हालने के लिए जो कौशल चाहिए था,उसे कौन दिखाए,यह भी यक्ष प्रश्न सामने थेजमीन पर संगठन कैसे खड़ा हो,इसकी परवाह किसी को नहीं थी,आखिर सत्ता की मलाई का रस्वादन जो करना था। ऐसी स्थिति में सरकार तो बनी लेकिन रेत के महल के समान,और अंतत: रेत का महल 15 महीने में ही भरभरा कर ढह गया।



वास्तव में बिना तैयारी के जो मैदान में उतरते है उनका वीर गति को प्राप्त होना निश्चित हैयह भी समझना होगा की कांग्रेस का सामना भाजपा से है जो  कैडर  से चलने वाली पार्टी हैजब तक मैदान में कोई मजबूत खिलाडी नहीं था,कांग्रेस मैदान मार लिया करती थी,लेकिन अब कैडर के मजबूत खिलाडी के सामने आते ही हाथ पैर फूल जाते है

अब आप इवीएम को दोष दे या सिस्टम को कोसे लेकिन सच तो यह है की आपका झंडा उठाने वाले कितने है उनकी गिनती भी कर लीजिये चुनाव के समय भीड़ इकट्ठा होने को अपनी जीत का प्रमाण मान लेना ठीक वैसा ही है जैसे भरी दुपहरी में दूर चमकते हुई वेगों को पानी समझ लेनाचुनाव जीतने का कौशल और कला अपने विरोधी दल भाजपा से ही सीख लीजिये,कम से कम अपने कार्यकर्ताओं से एक महीने में एक बार ही बात तो कर लीजियेकभी जाकर समाज के बीच ही बैठ जाइये,अपने  बेशकीमती सफेद कपड़ों से पिंड छुडाइयेरही बात विचारधारा की तो उसके लिए ऐसे नेता भी चाहिए जिनमे ज्ञान पिपासा और सीखने का संयम होइस दौर के कांग्रेस नेताओं से नेहरु इंदिरा पर बोलने के लिए 30 मिनट का समय दीजिये,यकीन मानिये वे बगले झांकने लगेगे जब आपके पास वैचारिक फौज ही नहीं है ओर न ही उसका नेतृत्व करने वाला सेनापति,फिर आप कैसे युद्द जीतने की कल्पना कर सकते हो

2018 का चुनाव कांग्रेस अपनी मेहनत या काबिलियत से बिलकुल नहीं जीती थी बल्कि चम्बल में माई का लाल और किसानों का कमाल थाभाजपा का मतदाता दिल्ली की और भी देखता है,मामा पर भी उसकी नजर होती है,परम्पराओं से लेकर मान्यताओं तक में उन्हें कमल नजर आता हैभाजपा का यह प्रभाव ही है कि घर में माँ बहने ओर बुजुर्ग भी कहते है की मोदी जी के सामने किसे वोट देयकीनन नरेंद्र मोदी इस देश का इतना बड़ा व्यक्तित्व बन चुके है कि उनके सामने कोई राजनीतिक नेतृत्व नजर ही नहीं आताराजनीति के मैदान में जब तक दूसरा मजबूत दावेदार नहीं होगा तब तक किसी की नैया पार कैसे हो सकती है न तो शीर्ष पर काम करने वाले लोकप्रिय नेता है  और न ही जमीन पर काम करने वाले लोगों को तैयार करने की कांग्रेस की कोई योजना



महज ट्विटर,फेसबूक और सोशल मीडिया से लोकप्रियता का आंकलन राजनीति में नहीं हो सकता आखिर जनता जनार्दन भी तो मन बहला लेती है बिहार में भाजपा के साथ लेफ्ट का भी वोट प्रतिशत बढ़ा है यह दोनों कैडर से चलने वाली पार्टियां है कांग्रेस को लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करने का नारा देने कि कोई जरूरत नहीं है और न ही जनता को वह ऐसा करके प्रभावित कर सकती हैकांग्रेस को जरूरत है अपना अस्तित्व बचाने के लिए कैडर तैयार करने की,अफ़सोस इस दिशा में उसका कोई प्रयास अब तक नजर नहीं आ रहा है फ़िलहाल यह समय कांग्रेस को भाजपा की विराट विजय पर बधाई देने का है और चुनाव प्रबंधन सीखने का है

 

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brahmadeep alune

aakashwani sanvidhan koumi ekta Aajkal- 23rd November