सोमवार, 9 नवंबर 2020

बाइडन के साथ बदलेगी दुनिया,baiden, amerika duniya

 

जनसत्ता

                      

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अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक चिकन गेम मॉडल होता है इस गेम में खिलाड़ी का उद्देश्य अपने हितों को अधिकतम करना होता है,वह इस बात की परवाह नही करता की इससे दूसरे को कितना लाभ हो। दरअसल महाशक्ति अमेरिका की नीतियों में यह मॉडल सदैव प्रतिबिंबित होता है। यह एक ऐसा राष्ट्र है जहां की नीतियां वहां की राजनीतिक पार्टियां या राष्ट्रपति तय नहीं करते बल्कि तय वही होता है जो अमेरिकी हित में हो,चाहे सत्ता में कोई भी रहे।

डोनाल्ड ट्रंप को शिकस्त देने के साथ ही जो बाइडन की अगुवाई में अमेरिका को आगे का सफर तय करना है और इसके वैश्विक स्तर पर पड़ने वाले असर को लेकर संभावनाएं और आशंकाएं तलाशी जा रही है। ट्रंप को अन्य अमेरिकन राष्ट्रपतियों के मुक़ाबले अपेक्षाकृत असंतुलित और अनियंत्रित माना गया लेकिन इन सबके बाद भी अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को लेकर वे अग्रगामी नीति अपनाते रहे। जो बाइडन के लिए आंतरिक और बाह्य चुनौतियां सामने है और उनकी नीतियों पर परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक ट्रूमैन,बिल क्लिंट्न और बराक ओबामा का असर दिख सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह याद रखना आवश्यक है की सामरिक नीति,आर्थिक नीति, अप्रवासन कानून,वित्तीय मामले और वैदेशिक नीति में अमेरिका के लिए उसके व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। अमेरिका में किसी भी पार्टी की सत्ता रहे वे उसी रास्ते पर चलते हैं जिससे अमेरिका की सुरक्षा हो एवं उसकी प्रगति सुनिश्चित रहे।

द्वितीय विश्व युद्द के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डेमोक्रेटिक ट्रूमैन बने और उनकी नीतियों का प्रभाव इसके बाद लगातार अमेरिकी विदेश नीति पर प्रतिबिंबित होता रहा है। ट्रूमैन का साफ मत था की साम्यवादी प्रसार को अवरुद्द किया जाना चाहिए। इसके साथ ही रूस को लेकर उनकी यह स्पष्ट सोच रही की मास्को शांति की नीति को दुर्बलता समझता है,अत: उसके विरुद्द दृढ़ता की नीति ही अपनाई जानी चाहिए। जो बाइडन रूस को लेकर मुखर हो सकते है और इससे चीन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। पिछले कुछ वर्षों में चीन और रूस के संबंध मजबूत हुए है और उनकी एक दूसरे पर निर्भरता भी बढ़ी है। आने वाले समय में रूस के आसपास के देशों में  नाटो का प्रभाव अमेरिका बढ़ा सकता है और यह चीन को मंजूर नहीं होगा। ट्रंप व्यापार को लेकर उत्सुक रहते थे वहीं  बाइडन की प्राथमिकताओं में सामरिक सहयोग हो सकता है और अमेरिका की यह नीति भारत के लिए मुफीद हो सकती है।

बाइडन के पहले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा की एशिया-प्रशांत केंद्रित नीति के केंद्र में भारत रहा,अत: पूरी संभावना है की आने वाले समय में भी चीन और पाकिस्तान की तुलना में अमेरिका के द्वारा भारत को प्राथमिकता दी जाती रहेगी।  सामरिक और रणनीतिक रूप से क्वाड को लेकर भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिकी सहयोग जारी रहेगा। डेमोक्रेटिक मानव अधिकारों जैसे मुद्दों पर मुखर रहे है, बाइडन वीगर मुसलमानों की स्थिति को लेकर चीन की आलोचना कर सकते है। ऐसा बाइडन पहले भी कर चुके है अत: आने वाले समय में अमेरिकी चीन सम्बन्धों पर आशंकाएं बनी रह सकती है। इसका असर कोरिया प्रायद्वीप पर भी पड़ सकता है। उत्तर कोरिया चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। चीन उत्तर कोरिया को न केवल रोजमर्रा की जरूरतों का सामान मुहैय्या कराता हैं बल्कि उसे परमाणु ईंधन और हथियार बनाने के लिए धन, साधन और तकनीक भी देता हैं डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग की मुलाकातों से कुछ हासिल न हो सका, जबकि  बाइडेन उत्तर कोरिया पर और भी कड़े प्रतिबंध लगा सकते है।

सैनिक अड्डों की संख्या कम करने को लेकर बिल क्लिंट्न ने तत्परता दिखाई थी। बाइडन की अफगान और पाकिस्तान नीति बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। ट्रंप ने अफगाननिस्तान में शांति बहाली को लेकर पाकिस्तान पर भरोसा नहीं दिखाया और वे पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता रोकने के पक्षधर रहे,वहीं बाइडन की वैश्विक मामलों में बेहतर समझ रही है। 2008 में जो बाइडन को पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान हिलाल-ए-पाकिस्तान से नवाज़ा गया थाबाइडन को यह सम्मान पाकिस्तान को अमेरिका से डेढ़ अरब डॉलर की आर्थिक मदद दिलवाने में अहम भूमिका निभाने के कारण दिया गया था। हो सकता है बाइडन पाकिस्तान को लेकर थोड़ा नर्म रुख अपनाएं,ऐसा होने पर तालिबान से बातचीत की राह खुल सकती है।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मान्यता है। जिसके अनुसार राष्ट्रों के महत्वपूर्ण हितों को या तो खतरा उत्पन्न होता है या उनके लिए संकट की सम्भावना हमेशा बनी रहती है। यदि ऐसा न होता तो राष्ट्रों को उनकी रक्षा के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती। महाशक्तियों के हित और शक्ति संतुलन के बीच तेल संपदा का भी एक महत्वपूर्ण द्वंद है जो शह और मात के खेल को पश्चिम एशिया तक खींच लाता है। मध्य पूर्व में अपने हितों को लेकर अमेरिकी सतर्क रहे है,डेमोक्रेटिक ओबामा ने 2015 में अपने सहयोगियों के साथ ईरान से एक परमाणु समझौता किया था। जिसके तहत 2016 में अमरीका और अन्य पांच देशों से ईरान को तेल बेचने और उसके केंद्रीय बैंक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार की अनुमति मिली थीअमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के इस समझौते  को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की कोशिशों के तौर पर देखा गया था

बाद में ट्रंप सरकार ने इस समझौते को बेकार बताकर अपने कदम वापस खींच लिए और इस इलाके में शांति की कोशिशों को भी धराशाई कर दिया था अमरीकी प्रशासन ने तो यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि उनका देश ईरान पर अभूतपूर्व वित्तीय दवाब डालना चाहता है  ट्रंप प्रशासन की ईरान को दबाने की कोशिशे दुनिया के अन्य देशों को बिलकुल रास नहीं आ आई थी दुनिया भर में परमाणु कार्यक्रमों पर नज़र रखने वाली संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार ईरान 2015 के समझौते का पालन कर रहा था,ऐसे में ट्रंप के ईरान पर परमाणु जखीरे बनाने का आरोप पूरी तरह निराधार बताएं थे यूरोपियन यूनियन और ट्रंप के बीच व्यापारिक मतभेद जगजाहिर  रहे है,अमेरिका में ट्रंप के आने के बाद उनकी आर्थिक नीतियों से यूरोप के देश नाराज रहे ब्रिटेन,जर्मनी और फ्रांस जैसे देश ईरान से हुए  समझौते  का पालन करने के पक्षधर रहे है अब बाइडन ईरान से संतुलित सम्बन्धों की पुन: बहाली कर सकते है। बीते कुछ समय में ईरान और चीन सहयोग बढ़ा है,जबकि ईरान को साम्यवाद से दूर रखने की अमेरिका की पुरानी नीति रही है। बाइडेन को न केवल ईरान का विश्वास जितना होगा बल्कि यह कोशिश भी करना होगी की मध्य पूर्व में रूस और चीन के प्रभाव को संतुलित किया जाएं। मध्य पूर्व का भौगोलिक क्षेत्र तीन महाद्वीपों का संगम क्षेत्र है अमेरिका की मध्य पूर्व को लेकर व्यापक नीति रही है और इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।

अपने चुनाव प्रचार के दौरान बाइडन ने मुसलमानों के साथ बेहतर बर्ताव और ट्रंप प्रशासन के प्रवासी विरोधी नीतियों पर दोबारा विचार करने का वादा किया था। लेकिन यूरोप में इस्लामिक चरमपंथियों के बढ़ते हमलों का असर बाइडन की भावी योजनाओं को भी प्रभावित कर सकता है। माना जाता है की अमेरिकी पश्चिम की और मुंह करके जन्म लेते है,इस धारणा का मुख्य कारण यह है की अमेरिकी यूरोप की समस्या को खुद की समस्या समझ लेते है और यूरोप के किसी भी घटनाक्रम को लेकर उनकी बैचेनी बढ़ जाती है। ब्रिटेन  के यूरोपीय यूनियन से अलग होने का एक प्रमुख कारण अप्रवासन की समस्या रही। फ्रांस में बढ़ती इस्लामिक कट्टरता से अमेरिका आंखें नहीं मूँद सकता। इन समस्याओं को लेकर बाइडन इसलिए भी सतर्क रहेंगे,क्योंकि उन्हें अपने देश में भी दक्षिणपंथी ताकतों का व्यापक विरोध झेलना पड़ सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में यह देखने में आया की वे रूस के पुतिन जैसे दुनिया के सत्तावादी नेताओं की प्रशंसा करते रहे,ट्रंप के आलोचकों ने तो उन्हें तानाशाही का समर्थक भी कह डाला। जबकि अमेरिकी जनतंत्र में इतना भरोसा करते है कि प्रथम विश्व युद्द उन्होने जनतंत्र कि रक्षा के नाम पर ही लड़ा था। द्वितीय महायुद्द के समय डेमोक्रेटिक रूज़वेल्ट ने अमेरिका का उद्देश्य हिटलर कि तानाशाही को नष्ट करना तथा संसार में अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतन्त्रता तथा अभाव  और भय से स्वतन्त्रता बताया था। बाइडन दुनिया में लोकतंत्र की मजबूती को लेकर प्रतिबद्धता दिखा सकते है। बिल क्लिंट्न ने संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन का समर्थन किया था और इसे लेकर बाइडन भी सकारात्मक रुख अपनाएंगे,यह उम्मीद की जा सकती है। ऐसे में आने वाले समय में जापान,जर्मनी,ब्राज़ील और भारत जैसे देश सुरक्षा परिषद में पूर्ण सदस्यता के लिए अपनी कोशिशें बढ़ा सकते है।

पिछले दो दशकों से यह देखा गया है कि अमेरिका भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता है लेकिन सीएए,आर्टिकल 370 जैसे मसलों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के लेफ्ट मेंबर्स और ख़ासतौर पर कमला हैरिस ने काफ़ी आपत्ति जताई थीहालांकि इसका प्रभाव भारत अमेरिकी सम्बन्धों को प्रभावित करें,इसकी संभावना कम ही है। साल 2000  में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 21 वी शताब्दी के लिए भारत अमेरिकी सम्बन्धों पर एक संयुक्त दस्तावेज जारी किया था, जिसमें आने वाले समय में भारत अमेरिकी संबंधों को एक नई दिशा मिलने के संकेत दिए गए थे।

इस नीति को शीत युद्द के समय की अमेरिकी नीति से अलग नई शुरुआत माना गया था। शीत युद्द में अमेरिका पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश मानता था और पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक और सामरिक मदद देता रहा था। वर्तमान में जब भारत अमेरिकी संबंध सबसे बेहतर दौर में माने जा रहे हैं,अमेरिका में बसे लगभग 20 लाख भारतीय इंजीनियर,डॉक्टर और वैज्ञानिक होकर अमेरिका को मजबूत कर रहे हैं। दबाव समूह के रूप में काकस ऑन इंडिया एंड इंडियन अमेरिकन्स निचले सदन का सबसे बड़ा दबाव समूह है। ऐसे में आशा यह की जाती है कि अमेरिकी कूटनीति संतुलन की कूटनीति से ऊपर उठकर अपने दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन जारी रखेगी और बाइडन के काल में भी भारत अमेरिका संबंध मजबूत बने रहेंगे।

बहरहाल वैश्विक संदर्भ में बाइडन के सामने यूरोप की मजबूती,चीन,मध्य पूर्व,अफगानिस्तान,पाकिस्तान,आतंकवाद और अप्रवासन जैसे मुद्दे होंगे। वही अमेरिका में 1930 के बाद सबसे बड़ा आर्थिक संकट और 1960 के बाद सबसे बड़े नस्लवाद के मुद्दे पर अशांति खत्म करने की चुनौती। बाइडन को बेहद सतर्क रहकर आगे बढ़ना होगा।

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