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लव जिहाद के सामाजिक पहलू को कैसे नजर अंदाज करें,LOVE ZIHAD

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सुबह सवेरे            http://epaper.subahsavere.news/c/56708941 जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते तब तक आपको कानून चाहे जो भी स्वतंत्रता देता है , वह आपके किसी काम की नहीं है ।   भारत के संविधान निर्माता के ये विचार भारतीय समाज की गहराई तक जड़ें जमा चूकी असमानता की सामाजिक चुनौती को वैधानिक न्याय की अवधारणा के सामने लाकर खड़ा कर देता है। दरअसल   आज़ादी के आठवें दशक में मजबूती से आगे बढ़ता भारत आबाद तो है लेकिन सामाजिक परिवर्तन को लेकर उसकी संकुचित दृष्टि बदस्तूर जारी है। आर्थिक और सामाजिक असमानता से हम उबर नहीं पाये है। हमारे कड़े संवैधानिक प्रावधानों के बाद भी भारत का पारम्परिक और सामाजिक ढांचा मजबूत है और   बदलने को बिल्कुल तैयार नहीं है।   आधुनिक दुनिया का नेतृत्व का सपना देखने वाले भारत की सामाजिक सच्चाई स्त्री स्वतंत्र्य और विवाह की गुंजाइशों को सीमित करके उसे स्वीकारने को मजबूर करने की रही है। खास कर हिंदू धर्म को मानने  वाले लोगों के समाचार पत्रों में छपने वाले वैवाहिक विज्ञापनों में वह असमान सोच साफ नजर आती है जिसका विरोध आर्य समाज से लेकर

सवालों में फिलस्तीन का भविष्य,phelestine ka bhavishy

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  जनसत्ता            अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है की राष्ट्र की शक्ति का विकास ही उसके हितों को पूर्ण करने का एकमात्र माध्यम है तथा विदेश नीति संबंधी निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर लिए जाने चाहिए न कि नैतिक सिद्धांतों और भावनात्मक मान्यताओं के आधार पर । 1947 से विश्व राजनीति में उथल पुथल मचाने वाले इजराइल और फिलीस्तीन का जमीनी विवाद अब इन दो राष्ट्रों तक ही सीमित रहने के संकेत मिलने लगे है । इस साल ट्रम्प के ' डील ऑफ़ द सेंचुरी ' के दांव में इसराइल,यूएई और बहरीन ने जब हाथ मिलाया तो यह साफ हो गया था की मध्यपूर्व अब पारम्परिक प्रतिद्वंदिता को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा है और अरब देशों के लिए फिलीस्तीन नीतिगत और निर्णायक मुद्दा बना नहीं रह सकता । दरअसल 1947 में संयुक्त राष्ट्र  द्वारा फिलीस्तीन को स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र और अरब राष्ट्र में बांटने की सिफ़ारिश के बाद इस इलाके में संघर्ष का नया दौर शुरू हो गया था । फिलीस्तीन को मुस्लिम और अरब अस्मिता से जोड़ने वाले ज़्यादातर अरब देश इस नीति पर अडिग माने जाते थे की वे इसराइल के साथ रिश्ते तभी सा

संवैधानिक आदर्शों को सहेजता भारत,bharat sanvidhan aadrsh

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       26 नवंबर-संविधान दिवस प्रजातंत्र      भारत की सार्वभौमिकता को चुनौती देकर द्विराष्ट्रवाद के आधार पर पाकिस्तान बनाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना का कोई भी नजदीकी वंशज अब पाकिस्तान में नहीं रहता है। 1948 को जिन्ना की मौत के बाद उनकी जायदाद की एक मात्र वारिस उनकी बहन फातिमा जिन्ना 1967 में चल बसी । मादर - ए – मिल्लत के नाम से मशहूर फातिमा 1964-65 में फील्ड मार्शल अयूब खान के खिलाफ राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ी । लेकिन उन्हें शिया होने से गैर इस्लामिक कहकर नकार दिया गया और इसके बाद उन्होंने कभी न खत्म होने वाली ख़ामोशी ओढ़ ली। जिन्ना की बेटी दीना अपने पिता के साथ रहने कभी पाकिस्तान ही नहीं गई। वह केवल 1948 में जिन्ना की मैयत में शामिल होने कराची गई थी । दीना और उनके पति नेविल वाडिया ने मुंबई में अपना घर बनाया।  जिस पाकिस्तान का जन्म भारत से नफरत के कारण हुआ था , उसके जन्मदाता के रिश्तेदार भारत में ही रहते है । बदहाल पाकिस्तान में जिन्ना की कब्र की ख़ामोशी सब कुछ बयां करती है जबकि भारत में प्यार का ताजमहल सदा आबाद है। जिन्ना काश यह समझ गए होते की अपनी हिन्दुस्तानी पहचान को नकारने का