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सवालों में फिलस्तीन का भविष्य,phelestine ka bhavishy

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  जनसत्ता            अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है की राष्ट्र की शक्ति का विकास ही उसके हितों को पूर्ण करने का एकमात्र माध्यम है तथा विदेश नीति संबंधी निर्णय राष्ट्रीय हित के आधार पर लिए जाने चाहिए न कि नैतिक सिद्धांतों और भावनात्मक मान्यताओं के आधार पर । 1947 से विश्व राजनीति में उथल पुथल मचाने वाले इजराइल और फिलीस्तीन का जमीनी विवाद अब इन दो राष्ट्रों तक ही सीमित रहने के संकेत मिलने लगे है । इस साल ट्रम्प के ' डील ऑफ़ द सेंचुरी ' के दांव में इसराइल,यूएई और बहरीन ने जब हाथ मिलाया तो यह साफ हो गया था की मध्यपूर्व अब पारम्परिक प्रतिद्वंदिता को पीछे छोड़कर आगे बढ़ रहा है और अरब देशों के लिए फिलीस्तीन नीतिगत और निर्णायक मुद्दा बना नहीं रह सकता । दरअसल 1947 में संयुक्त राष्ट्र  द्वारा फिलीस्तीन को स्वतंत्र यहूदी राष्ट्र और अरब राष्ट्र में बांटने की सिफ़ारिश के बाद इस इलाके में संघर्ष का नया दौर शुरू हो गया था । फिलीस्तीन को मुस्लिम और अरब अस्मिता से जोड़ने वाले ज़्यादातर अरब देश इस नीति पर अडिग माने जाते थे की वे इसराइल के साथ रिश्ते तभी सा

संवैधानिक आदर्शों को सहेजता भारत,bharat sanvidhan aadrsh

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       26 नवंबर-संविधान दिवस प्रजातंत्र      भारत की सार्वभौमिकता को चुनौती देकर द्विराष्ट्रवाद के आधार पर पाकिस्तान बनाने वाले मोहम्मद अली जिन्ना का कोई भी नजदीकी वंशज अब पाकिस्तान में नहीं रहता है। 1948 को जिन्ना की मौत के बाद उनकी जायदाद की एक मात्र वारिस उनकी बहन फातिमा जिन्ना 1967 में चल बसी । मादर - ए – मिल्लत के नाम से मशहूर फातिमा 1964-65 में फील्ड मार्शल अयूब खान के खिलाफ राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ी । लेकिन उन्हें शिया होने से गैर इस्लामिक कहकर नकार दिया गया और इसके बाद उन्होंने कभी न खत्म होने वाली ख़ामोशी ओढ़ ली। जिन्ना की बेटी दीना अपने पिता के साथ रहने कभी पाकिस्तान ही नहीं गई। वह केवल 1948 में जिन्ना की मैयत में शामिल होने कराची गई थी । दीना और उनके पति नेविल वाडिया ने मुंबई में अपना घर बनाया।  जिस पाकिस्तान का जन्म भारत से नफरत के कारण हुआ था , उसके जन्मदाता के रिश्तेदार भारत में ही रहते है । बदहाल पाकिस्तान में जिन्ना की कब्र की ख़ामोशी सब कुछ बयां करती है जबकि भारत में प्यार का ताजमहल सदा आबाद है। जिन्ना काश यह समझ गए होते की अपनी हिन्दुस्तानी पहचान को नकारने का

पूंजीवादी ताकतों से देश के समाजवादी ढांचे को बचाने की चुनौती,punjivadi smahvadi

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26 नवंबर-संविधान दिवस पर विशेष हम समवेत   https://www.humsamvet.com/opinion-feature/challenge-of-saving-socialist-structure-of-our-nation-from-capitalistic-onslaught-8708   90 के दशक में जब दुनिया में उदारीकरण,वैश्वीकरण और निजीकरण का दौर प्रारम्भ हुआ तो इसका प्रभाव भारत के समाजवादी ढांचे पर पड़ना ही था । स्वतंत्र भारत में लोकतंत्र होने से राजा महाराजाओं और जमींदारों के दिन लद चूके थे,सत्ता मुट्ठी भर लोगों के हाथों से फिसल चुकी थी और पूंजीवादी ताकतें अनुकूल समय का इंतजार कर रही थी। वैश्वीकरण से पूंजीवाद को प्रश्रय मिला और सामंती शक्तियां भारत में भी क्रियाशील हो गई। देश का संवैधानिक समाजवादी ढांचा पूंजीवाद को स्थापित होने से रोकने के लिए प्रतिबद्द था। ऐसे में 90 के दशक के अंत तक आते आते पूंजीवादी और सामंतवादी शक्तियों ने जनता के नुमाइंदों को येन केन कर अपने बाहुपाश में जकड़कर भारत के संविधान को ही नाकाम बताने और दिखाने की कोशिश की।    संविधान में संशोधन की ज़रूरत पर विचार करने के लिए न्यायमूर्ति  वैंकटचेलैया की अध्यक्षता में 22 फरवरी 2000 को संविधान समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन त