शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

सांध्य प्रकाश                                सर सैयद अहमद खां की जयंती -17 अक्टूबर

                सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है

                                                                                       - डॉ.ब्रह्मदीप अलूने



हिंदुस्तान यदि मिथक है तो वह सहस्त्रों वर्षों से आबाद कैसे है और यदि वह  यथार्थ है तो समूची संस्कृतियों को सहेजने की उसकी कला पर गर्व होना चाहिएयहां कुछ भी अंदाजा लगाना आसान नहीं हैसंस्कृतिवादी शिवाजी को अपना आदर्श बताते है और पूजते है जबकि वे स्वयं सभी धर्मों का सम्मान करते थेशिवाजी ने अपने प्रशासन में धर्मनिरपेक्षता का पालन किया था और उनका राजधर्म किसी एक किसी धर्म पर आधारित नहीं थाउनकी सेना में सैनिकों की नियुक्ति के लिए धर्म कोई मानदंड नहीं था और इनमें एक तिहाई मुस्लिम सैनिक शामिल थेहिन्दू  राजशाही के तौर पर पहचाने जाने वाले शिवाजी का जीवन बेहद दिलचस्प रहाशिवाजी के दादा मालोजीराव भोसले ने सूफी संत शाह शरीफ के सम्मान में अपने बेटों को नाम शाहजी और शरीफजी रखा थाउनकी नौसेना की कमान सिद्दी संबल के हाथों में थी और सिद्दी मुसलमान उनके नौसेना में बड़ी संख्या में थेजब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब मुगलों की कैद से निकल भागने में जिन दो व्‍यक्तियों ने उनकी मदद की थी उनमें से एक मुसलमान था।यहीं नहीं शिवाजी ने अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए एक मस्जिद का ठीक उसी तरह निर्माण करवाया था जिस तरह से उन्होंने अपनी पूजा के लिए जगदीश्वर मंदिर बनवाया थाहिंदुस्तान में शिवाजी को हिन्दू भावनाओं का प्रतीक बताने की लगातार कोशिश होती रही है,लेकिन स्वयं शिवाजी अपनी नीतियों से हिंदुस्तान की बहुसांस्कृतिक शक्ति के प्रतीक थे



शौर्य को लेकर जैसी पहचान हिन्दुओं में शिवाजी की है शिक्षा को लेकर कुछ वैसी ही सर सैयद अहमद खां की मुसलमानों में।19 वी सदी में युद्द और हिंसा से अभिशिप्त भारतीय मुसलमानों की समस्याओं को दूर करने के लिए सैयद अहमद खां ने शिक्षा का रास्ता चुनादर दर और पग पग नापते हुए उन्होंने दान से शिक्षा की इमारत खड़ी करने की ठानी और उनका जूनून उन्हें सफलता की और ले गयाअशिक्षा और पिछड़ेपन से गरीबी की मार झेलते हुए मुसलमानों  के लिए आधुनिक शिक्षा की परिकल्पना की दुर्लभ थी,जिसे अहमद खां ने अपनी नेक नियति और कड़ी मशक्कत से साकार कर दियागुलाम भारत में मुस्लिम शिक्षा का आगाज करने वाले मोहम्मद एंग्लों इंडियन कॉलेज जिसे अब अलीगढ़ विश्वविद्यालय कहते हैउसके दरवाजे पर लिखे इस वाक्य से सबका स्वागत होता है,”इल्म हासिल कीजिये,माँ की गोद से मौत तक।“19 वी सदी के पिछड़े भारत में जन्म लेने वाले  अहमद खां जैसे भारतीय शख्स में समाज के प्रति निष्ठा और राष्ट्र के प्रति जिजीविषा ही थी कि उत्तर भारत के एक बड़े परिक्षेत्र में बिना सरकारी मदद के शिक्षा की ऐसी बुलंद इमारत खड़ी कर दी गई,जिसका स्वर्णिम इतिहास गवाह हैकहने को इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम शिक्षा का केंद्र कहा जाता है लेकिन इसकी शिक्षा तो सच्ची  भारतीयता को ही बयां करती है

यह विश्वविद्यालय अपनी मुस्लिम छाप के लिए देश ही नहीं  दुनिया में विख्यात हैजबकि इसकी स्थापना सन्  1877 में भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय भावनाओं को मज़बूत आधार एवं स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए  सर सैय्यद अहमद ख़ान ने की थीपहले दिन से ही  अरबी फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ  संस्कृत  कि शिक्षा की भी व्यवस्था की गईसर सैयद अहमद खां निश्चित तौर पर इस विश्वविद्यालय के जरिए मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना चाहते थेदेश की सर्वोत्तम सुविधाओं से शुमार इस विश्वविद्यालय में तकरीबन 25 फ़ीसदी विद्यार्थी गैर मुसलमान पढ़ते हैयहाँ संस्कृत का विभाग बेहद ख्यात माना जाता हैपूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण की राजनीति, धर्म,कर्म,विज्ञान,गणित,समाज,अर्थ,मेडिकल,इंजीनियरिंग जैसे सैकड़ों विभाग विद्यार्थियों के लिए पूरी गुणवत्ता के साथ उपलब्ध होते हैयहां की सेंट्रल लायब्रेरी दुनिया की अहम लायब्रेरी मानी जाती हैयहाँ पर महाभारत  का फारसी अनुवाद भी है तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता से संबंधित कई पांडुलिपियां भी उपलब्ध हैयहाँ अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता है तो तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र भी सहेज कर रखे गए है

शिक्षा का स्तर भी इतना जबरदस्त की देश के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन,कैफ़ी आजमी,न्यायविद आर.पी.सेठी,मशहूर इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद और इरफ़ान हबीब,भौतिक शास्त्री पियारा सिंह गिल जैसी अनेक नामी गिरामी हस्तियां यहां से निकली हैहॉकी के जादूगर  ध्यानचंद ने कलाइयों से कमाल करना इसी विश्वविद्यालय से सीखा था। खान अब्दुल गफ्फार खान की शिक्षा भी अलीगढ़ मुस्लिम  विश्वविद्यालय में ही हुई थी।उनके देश प्रेम के बारे में कहा जाता है कि  वह ऐसे हिन्दुस्तानी थे जिसकी हर साँस में एहले वतन डोलता था।अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुदाई खिदमतगार और लाल कुर्ती आंदोलन छेड़कर पठानों को लामबंद करने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शिखर नेता रहे।धर्म के नाम पर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान देश बनने का पूरी उम्र उन्होंने खूब विरोध किया।विभाजन के बाद भी पाकिस्तान का वे लगातार विरोध करते रहे,उन्हें पाकिस्तान की जेल में भी डाला गया लेकिन उनके भारत के प्रति प्रेम में कभी कमी नही आई।भारत के प्रति उनकी अपार श्रद्धा के कारण ही उन्हें 1969 में नेहरु शांति पुरस्कार और 14 अगस्त 1987 में भारत रत्न के सर्वोच्च सम्मान से विभूषित किया गया।लोग इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम इच्छा का केंद्र समझते है लेकिन सर सैयद अहमद खां से जिस नीव पर यह इमारत खड़ी की है उससे प्रतीत होता है कि भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने में इस संस्थान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।




देश में जब अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ रहे थे तब सैयद अहमद खांने असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द किताब लिखकर मुसलमानों को स्वतंत्रता की भारतीय चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीधर्म की कट्टरपंथी ताकतों पर सीधा प्रहार करते हुए सर सैयद ने लोगों से यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि कुरान के उपदेशों को तर्क के आधार पर समझने का प्रयत्न करें



विडम्बना ही है कि भारत में जिन्ना को बार बार जीवित किया जाता है,उसका उपयोग किया जाता है और उससे अलगाब पैदा करने की कोशिशें भी की जाती हैजबकि  भारत में सर सैयद अहमद खां के विचारों और उद्देश्य को प्रचारित करने की जरूरत हैसर सैयद अहमद खां 19 वी  सदी में मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर परेशान थेलेकिन हकीकत में मुसलमान की समस्या इस समय भी जस की तस है गरीबी,पिछड़ापन और अशिक्षा से मुसलमान तब भी मुक्ति चाहते थे और अब भी उनके जीवन में ज्यादा बदलाव नहीं आया है

भारत जैसे बहु सांस्कृतिक देश के लिए सर सैयद अहमद खां ऐसी अनमोल धरोहर रहे,जिनके आदर्शों और उद्देश्यों को हर युग में सहेजने की जरूरत है।अंततः शिक्षा ही सारी समस्याओं का समाधान है,इसी के जरिए सर सैयद अहमद खां  जीवन भर और उसके बाद भी सशक्त भारत के निर्माण का रास्ता दिखाते नजर आते है । 

कोई टिप्पणी नहीं:

brahmadeep alune

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

सांध्य प्रकाश                                सर सैयद अहमद खां की जयंती -17 अक्टूबर                 सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों ...