शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

अभी नहीं है क्वाड की चीन को चुनौती, QUAD KI CHUNOUTY

 

राष्ट्रीय सहारा 

अभी नहीं है क्वाड की चीन को चुनौती

http://rashtriyasahara.com/imageview_25097_134043668_4_71_10-10-2020_6_i_1_sf.html                                                                            

आक्रमणकारी दुश्मन के विरुद्द सामरिक रक्षा की रणनीति चीन का पारंपरिक सिद्धान्त है और वैदेशिक मामलों में उसके व्यवहार से यह प्रतिबिम्बित भी होता है। दुनिया के नामचीन लोकतांत्रिक देश और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार अमेरिका,जापान,ऑस्ट्रेलिया और भारत के अनौपचारिक 'क्वॉड्रिलैटरल सिक्‍योरिटी डायलॉग' की विकसित होती साझेदारी पर निशाना साधते हुए चीन के उप विदेश मंत्री लुओ झाओहुई ने क्वाड को मिनी नाटो बताया। नाटो पूंजीवादी देशों का एक सैन्य संगठन माना जाता है और उसका व्यवहार भी साम्यवाद और समाजवाद के खिलाफ आक्रामक ही रहा है। नाटो को लेकर रूस बेहद सतर्क रहता है और चीन ने क्वाड को मिनी नाटो कहकर भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर दबाव बनाने की कोशिश की है।

बदलती वैश्विक चुनौतियों में चीन दुनिया के सामने एक अहम आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरा है,वहीं इसे रोकने के लिए क्वाड जैसे बहुआयामी संगठन की जरूरत भी महसूस की जा रही है। लेकिन क्वाड के चार देशों के चीन को लेकर अलग अलग व्यवहार से चीन को मिलने वाली चुनौती कितनी प्रभावी होगी,इसे लेकर संशय गहरा गया है।

हिमालय और हिन्द महासागर में आक्रामक व्यवहार से यूरेशिया को संकट में डालने की चीन की सैन्य नीति को लेकर जब क्वाड के सदस्य देशों से कड़े संदेश की अपेक्षा की जा रही थी,तब भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया ने सीधे तौर पर चीन का नाम लेने से गुरेज किया। इसे क्वाड के तीन सदस्यों की चीन से सीधे टकराव से बचने का प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए,लेकिन चीन के खिलाफ पीछे हटकर मोर्चाबंदी नहीं जा सकती,रणनीतिक रूप से यह भी समझने की जरूरत है। वहीं अमरीका के विदेशमंत्री पोम्पियो ने दूसरे देशों के जरूरी दौरे टालकर केवल टोक्यो में होने वाली क्वाड बैठक में शिरकत की और चीन को आड़े हाथों भी लिया। पोम्पियो ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के आक्रामक नीति की आलोचना करते हुए पूर्वी चीन सागर,मेकांग,हिमालय,ताइवान जलडमरूमध्य पर लेकर चिंता जाहिर की और क्वाड की साझेदारी को उच्च स्तर पर ले जाने की बात  कही। अमरीका के अलावा किसी और क्वॉड सदस्य ने चीन का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया और ना ही बैठक का औपचारिक बयान जारी किया गया

दरअसल क्वाड की बढ़ती चुनौती को रोकने के लिए चीन ने मनोवैज्ञानिक दबाव की जो रणनीति अपनाई उससे भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया बच नहीं सके है। चीन ने मिनी नाटो की बात कहकर रूस जैसे देशों के साथ आने का इशारा भी किया वहीं आर्थिक सरोकारों को लेकर भी इस समूह को आगाह किया। आर्थिक स्तर पर साझेदारी की दृष्टि से क्वाड के सभी सदस्य देशों की चीन से बड़ी भागीदारी है। सीमा पर तनातनी,चीन के सामान के बहिष्कार और चीनी एप पर प्रतिबंध के बाद भी वह भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। ऑस्ट्रेलिया के कुल निर्यात का लगभग आधा चीन को जाता है,वहीं चीन-जापान द्विपक्षीय व्यापार 2019 में 317 अरब डॉलर का था जो जापान के कुल व्यापार का 20 प्रतिशत है। अमेरिका भी इस मामले में पीछे नहीं है और व्यापारिक युद्द की खबरों के बीच चीन अमेरिका व्यापार में कोई खास कमी नहीं आई है।

2007 में जापान के प्रधान मंत्री शिंजों आबे ने चीन के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन की नींव रखते हुए क्वाड की परिकल्पना की थी,लेकिन तेरह सालों में अमेरिका,भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया हिंद महासागर में नौसैनिक अभ्यास से आगे बढ़ नहीं पाये है। यहां तक की सुरक्षा से जुड़े हितों के टकराव के बाद भी इन वर्षों में क्वाड के सदस्य देशों के चीन के साथ व्यापार में उत्तरोत्तर वृद्धि ही देखी गई है। 2017 में चीन में आयोजित ओबीओआर सम्मेलन का भारत ने सीधे तौर पर बहिष्कार किया  था जबकि जापान और अमेरिका जैसे देश तो इसमें शामिल भी हुए थे। इस समय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन की सेनाएं आमने सामने है। क्वाड के सदस्य देश लेह जैसे सामरिक स्थल पर सैनिक अड्डा बनाकर चीन पर सीधे दबाव डाल सकते थे। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भारत का नौ सैनिक अड्डा है। क्वाड के सभी सदस्य देश इस नौसैनिक अड्डे पर अपने जंगी जहाज सामूहिक रूप से तैनात करने का साहसिक निर्णय करते तो संभवत: चीन पर दबाव बढ़ सकता था।

लेकिन न तो भारत ने ऐसा प्रस्ताव किया और न ही क्वाड की कार्ययोजना में इस प्रकार की रणनीति पर विचार किया गया। पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू आइलैंड को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है,यह दक्षिणी द्वीप चीन के निकट है। यहां पर जापान चीन के खिलाफ आक्रामक है लेकिन क्वाड की किसी भी भूमिका को लेकर आपसी सहमति नहीं देखी गई। हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत और ऑस्ट्रेलिया ने एक दूसरे के सैन्‍य अड्डों के इस्‍तेमाल का एक अहम समझौता तो किया है लेकिन चीन पर इसका कोई प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं देता।

एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों से अमेरिका की बड़ी व्यापारिक भागीदारी है। इसे मजबूत करने के लिए ओबामा काल में ट्रांस पैसिफिक सहयोग पर खास ध्यान दिया गया था। इसके अंतर्गत अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया था क्वाड की टोक्यों में हुई बैठक में ओबामा की चीन के खिलाफ रणनीति को ध्यान में रखा गया होता,तब उसमें इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओस और वियतनाम जैसे देश भी आमंत्रित किए जा सकते थे। यह सभी देश चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान हैइनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है कजाकिस्तान,कम्बोडिया और दक्षिण कोरिया की सम्प्रभुता को चुनौती  देते हुए चीन इन्हें ऐतिहासिक रूप से अपना बताता है,नेपाल और भारत के कई इलाकों पर तथा दक्षिण चीनी समुद्र पर भी चीन का इसी प्रकार का दावा हैदक्षिण कोरिया और वियतनाम से चीन का दक्षिण चीन सागर पर आधिपत्य को लेकर विवाद है चीन के दक्षिण में वियतनाम,लाओस तथा म्यांमार है तथा वियतनाम  के साथ उसका युद्ध भी हो चुका है। चीन के पश्चिम में ताजीकिस्तान तथा किर्गिस्तान है वहीं उत्तर पश्चिम में कजाकिस्तान है। ये सभी देश अमेरिका के सामरिक सहयोगी है और चीन से इनका सीमाई विवाद बना हुआ है। चीन के परंपरागत विरोधी यह देश क्वाड का हिस्सा कब बनेगे,यह भी स्पष्ट नहीं है। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया सप्लाई चेन रेज़ीलियन्स इनिशिएटिव के जरिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते है,लेकिन यह कब होगा इसकी क्वाड कोई योजना प्रस्तुत नहीं कर पाया है। कोरोना से दुनिया भर में तबाही मची है और शुरुआती दौर में ऑस्ट्रेलिया ने इसे लेकर चीन पर निशाना साधा था। टोक्यो की बैठक में कोरोना के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए संयुक्त राष्ट्र से चीन पर कड़े प्रतिबंधों की मांग की जा सकती थी,लेकिन यह भी नहीं किया गया।



एशिया में प्रभाव कायम करने को और चीन को दबाने के लिए अमेरिका का सख़्त रुख बार बार सामने आता है,लेकिन चीन से जल और थल सीमा विवाद में उलझे देश मुखर होकर चीन की आलोचना से बचते रहे है। चीन की विस्तारवादी नीति से जूझने वाले ताइवान,वियतनाम, म्यांमार,लाओस ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,दक्षिण कोरिया जैसे क्वाड से अभी तक दूर है।



स्पष्ट है की आर्थिक प्रतिबद्धताओं को बनाएँ रखते हुए या महज द्विपक्षीय बातचीत और सम्बन्धों के आधार पर चीन की विस्तारवादी नीति को नहीं रोका जा सकता है। चीन को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए,चीन और हिंद महासागर से लगे सभी राष्ट्रों को क्वाड से जोड़ने तथा आपस में आर्थिक और सुरक्षा संधि करने की जरूरत है।

 

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