बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

अर्थव्यवस्था के अंधकार को दूर करने की चुनौती,arthvyvstha india

 

नया इंडिया

                                                                         

भारत जैसे विकासशील देश के करोड़ों लोग पिछले तीन दशकों में इस बात को भलीभांति समझने लगे है की जब अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन करती है तो कारोबारी और ज़्यादा पैसा निवेश करते हैं और उत्पादन को बढ़ाते हैं क्योंकि भविष्य को लेकर वे आशावादी होते हैंऐसे में करोड़ों लोगों को रोजगार मिलते है और खुशहाली की संभावनाएं बढ़ जाती है भारत की यही जरूरत भी है क्योंकि यहां करोड़ों लोगों के लिए खुशहाली का मतलब महंगी कारें या ऊंची इमारतें नहीं होता बल्कि दो जून रोटी का उपलब्ध होना होता हैअंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़, भारत में कम से कम नब्बे फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं ये लोग सिक्योरिटी गार्ड,सफाई करने वाले,रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं



भारत की अर्थव्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी और इसका असर देखने को भी मिला संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2016 के बीच रिकॉर्ड 27 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं2005-06 में भारत के करीब 64 करोड़ लोग गरीबी में थे2015-16 में यह संख्या घटकर 37 करोड़ आ गई जो देश की जनसंख्या का करीब 28 फीसदी है

गरीबी के कम होने से इन सालों में भारत के लोग यह सुनना भी पसंद नहीं करते की देश की जीडीपी कमजोर हो जायेक्योंकि इसका मतलब है कि निवेशक अपने पैसे बचाने में लग जायेंगे,आम लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं होगा,वे कम पैसा ख़र्च  करेंगे और इससे करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों और छोटे व्यापारियों की तो शामत आ जाएगी,इनकी संख्या भारत  में कई करोड़ है

दरअसल जीडीपी को महत्व को लेकर यह विचार इसलिए किया जा रहा है  क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की जीडीपी के इस साल माईनस दस दशमलव तीन फीसदी तक जाने की आशंका जताई है और यह भारत के करोड़ों लोगों के लिए किसी बूरे सपने जैसा है



अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दुनिया भर की उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत की स्थिति सबसे ख़राब बताई गई है एक अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा



पिछले कुछ वर्षों में जीडीपी कम तो हो रही थी लेकिन कोरोना काल में यह इतनी नीचे गिर जाएगी,इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी साल 2016-17 में जीडीपी आठ दशमलव तीन फीसदी से बढ़ी थीइसके बाद 2017-18 में ग्रोथ सात फ़ीसदी रही2018-19 में यह  छह दशमलव एक फ़ीसदी और 2019-20 में यह गिरकर चार दशमलव दो पर आ गई। अब  यह बहुत नीचे गिर गई है । पिछले साल देश के लगभग सवा तीन करोड़ नौकरियां देने वाले ऑटोमोबाइल सेक्टर की गिरती हालत से निराश मारुती सुजुकी के चेयरमेन आर सी भार्गव ने कहा था कि कोई सुधार के साफ संकेत नहीं है और उत्पादन क्षमता ठप हैभारत को 2020 तक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का प्रधानमंत्री का सपना वाहन उद्योग की बेहतरी के बिना साकार नहीं हो सकतायह निराशा इस बात से सामने आई थी क्योंकि देश में सैकड़ों डीलरशिप बंद हो रही थी या बंद होने की कगार पर थी साल 2018 में एक आर्थिक सर्वेक्षण में यह तथ्य उभर कर आया था कि भारत के 17 राज्यों के किसानों की मासिक औसत आय महज 1662 रूपये है और यदि इसके किसानों की आय के दूगुना होने के सपने को सही समझा जाये तो यह 2022 में 3332 रूपये हो सकती है8 नवम्बर 2016  को नोटबंदी के बाद कई भारतीय निवेशक देश छोड़कर चले गएइससे दैनिक वेतनभोगी और मजदूर वर्ग बेहद प्रभावित हुआ



वास्तव में देश में सवा करोड़ लोग हर साल रोजगार की तलाश में अग्रिम पंक्ति में होते है 1972-73 के बाद बेरोजगारी के दर सबसे निम्न स्तर तक जाने का दंश देश भोग रहा हैग्रामीण असंगठित मजदूर बेहाल है और शहरी असंगठित मजदूरों की कोरोना काल के एक साल पहले ही 18 लाख नौकरियां छूट गई हैभारत की अर्थ व्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी लेकिन फिर भी यह पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर सकीमाना जाता है कि भारत जैसे कम और मध्यम आमदनी वाले देश के लिए साल दर साल अधिक जीडीपी ग्रोथ हासिल करना ज़रूरी है जिससे देश की बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके



पिछले साल एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था की अब आगे तेज उन्नति के लिए उड़ान भरने का अवसर है,आगे की यात्रा बदलते सपनों की कहानी है,निराशा की स्थिति से आशा के शिखर तक पहुंचने की कहानी है,संकल्प से सिद्धि तक की कहानी हैगरीबी हटाओं की कठिन यात्रा वाले देश में उन्नति के ख्याल करोड़ो लोगों को रोमांचित करते रहे हैखासकर मध्यम और निम्न वर्ग के लिए उन्नति का मतलब घर,रोटी,कपड़ा,मकान और बच्चों की शिक्षा दिवास्वप्न रहे है और कोई भी आशा उनके घर को कुछ समय के लिए तो रोशन कर ही देती है



भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2021 में आठ दशमलव आठ फ़ीसदी विकास दर का अनुमान भी लगाया है। फ़िलहाल हम यही कामना कर सकते है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो देश को विश्वास दिलाया था,वह सही साबित हो। क्योंकि विकास दर के गिरने से बेरोजगारी,गरीबी,असमानता और अशांति को बढ़ावा मिलेगा और देश की एकता और अखंडता के लिए यह बड़ी चुनौती बन सकता है।

 

 

1 टिप्पणी:

Dr. Rambabu Mehar ने कहा…

Informative article sir👋👋👋

brahmadeep alune

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

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