सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

कॉकेशस की आग, aarmeniya azarbejan

 

 

जनसत्ता

                                    कॉकेशस की आग

                                                                                 


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सहस्त्रों वर्षों पहले भौगोलिक अरबी प्लेट और यूरेशियाई प्लेट की टकराहट से बने काकेशस पर्वत का राजनैतिक और धार्मिक इतिहास बेहद रक्तरंजित रहा है। ईसाई और इस्लाम के बीच खूनी संघर्ष से लगातार जूझने वाली इन पहाड़ियों में सांस्कृतिक,धार्मिक और भाषाई विभिन्नताएं बिखरी पड़ी है। यूरोप और एशिया के कई देशों को छूने वाले दुर्गम कॉकेशस से रूस,तुर्की और ईरान का गहरा जुड़ाव है।  भौगोलिक और खनिज संसाधनों से परिपूर्ण इस क्षेत्र से तेल और गैस की पाइप लाइने गुजरती है और इन्हें रणनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जाता है। इसीलिए इन पर आधिपत्य को लेकर क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां सतर्क रहती है।



पिछले कुछ दिनों से कॉकेशस से जुड़े विवादित इलाके नागोर्नो-काराबाख़ पर कब्ज़े को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच जारी लड़ाई रूस की मध्यस्थता से फिलहाल रुकी तो है लेकिन दोनों देशों के बीच किसी भी समय संघर्ष छिड़ने की आशंका बनी हुई है। इस समय दोनों देशों की ओर से लगातार आक्रामक बयान आ रहे है और युद्दविराम को लेकर अविश्वास भी बना हुआ है।

कभी अविभाजित सोवियत संघ का भाग रहे यह दोनों देश अब अपनी अलग पहचान बना चूके है। आर्मेनिया ईसाई बहुल देश होकर फ्रांस का करीबी है जबकि अज़रबैजान मुस्लिम बाहुल्य होकर ईरान और तुर्की का मित्र देश हैयुद्दरत इन देशों पर रूस का प्रभाव तो है लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप आर्दोंआन के द्वारा कथित रुप से अज़रबैजान का समर्थन करने की घोषणा से स्थितियां खराब हो गई है। अज़रबैजान इस्लामिक सहयोग संगठन का सदस्य राष्ट्र है और इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने का आर्दोंआन का सपना दुनिया के लिए विध्वंसकारी बनता जा रहा है। जिस नागोर्नो-काराबाख को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान में संघर्ष हो रहा है,यह करीब साढ़े चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला इलाक़ा है,जहां आर्मीनियाई ईसाई और तुर्की नस्ल के मुस्लिम रहते हैं। 90 के दशक में भी इस इलाके में ईसाइयों और तुर्क मुसलमानों के बीच भीषण संघर्ष हुए थे,इस दौरान नरसंहार में हजारों लोग मारे गए थे जबकि लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। इस इलाके को अज़रबैजान अपना कहता है। 1994 में ख़त्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाक़े पर आर्मीनिया का कब्ज़ा है लेकिन तुर्की अज़रबैजान को समर्थन देकर इस क्षेत्र को आर्मेनिया से छीनना चाहता है।



यूरोप के एकमात्र मुस्लिम बाहुल्य देश तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोंआन अपने देश में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देकर सत्ता पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहे है और उनकी वैदेशिक नीति में भी यह लगातार प्रतिबिंबित हो रहा है। सोवियत संघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए  अज़रबैजान को तुर्की ने 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करते हुए उसे अपना भाई बताया था। जबकि आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं। 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी थी। आर्मेनिया और अजरबैजान  के बीच छिड़े संघर्ष में तुर्की अजरबैजान का खुलकर समर्थन कर रहा है। यह भी तथ्य सामने आए है कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ने वाले कई लड़ाके भी अजरबैजान  की  ओर से युद्द के मैदान में झोंक दिये गए है।

तुर्की रणनीतिक रूप से जिस प्रकार इस समूचे युद्द में सहायता कर रहा है,उससे मध्यपूर्व की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता का असर भी इस इलाके पर पड़ सकता है। मध्यपूर्व में अस्थिरता फैलाने के लिए महाशक्तियां भाड़े के सैनिकों का उपयोग करती रही है।  पैसे के लिए दुनिया के किसी भी भाग में जाकर लड़ने के लिए तैयार यह सैनिक अफगानिस्तान,पाकिस्तान,लीबिया,लेबनान,सीरिया,इराक,यमन,सुडान और नाइजीरिया जैसे गरीब और गृहयुद्द से जूझने वाले देशों से होते है। सैनिकों के साथ ही इनमें आतंकवादियों का भी उपयोग किया जाता है,जिनके प्रशिक्षण अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होते रहे है।



तुर्की और पाकिस्तान  के गहराते सम्बन्धों के बीच लड़ाकों का दक्षिणपूर्वी यूरोप के इलाकों में जाकर युद्द में भाग लेना धार्मिक विद्वेष को बढ़ा सकता है और इससे दुनिया में ईसाई और मुस्लिम देशों के बीच समस्या बढ़ सकती है।

 

अज़रबैजान एशिया का भाग माना जाता है और इसकी सीमाओं से लगे देश ईरान,रूस,आर्मेनिया,तुर्की और जार्जिया है तथा यह केस्पियन सागर से जुड़ा हुआ है। अज़रबैजान धीरे-धीरे सत्तावादी लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है।  यहां के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव,आर्दोंआन की तर्ज पर सत्ता पर अपना नियंत्रण मजबूत करना चाहते है और वे युद्द को राष्ट्रीय भावनाओं और अस्मिता से जोड़ रहे है। अज़रबैजान में शिया मुसलमानों कि भी अच्छी ख़ासी तादाद है और उनकी सुरक्षा कि चिंता ईरान को है। दूसरी और आर्मेनिया की सीमा तुर्की,ईरान,जार्जिया और अज़रबैजान से लगी है। तुर्की और अज़रबैजान की सीमाओं पर आर्मेनिया के साथ अक्सर तनाव रहता है और यह बंद रहती है। ईसाई बाहुल्य आर्मेनिया में यज़ीदीयों की भी आबादी रहती है जिन पर सीरिया-इराक के गृहयुद्द  में आईएसआईएस ने गहरा अत्याचार किया था। यज़ीदी कुर्दी लोगों का एक उपसमुदाय है जिनका अपना अलग यज़ीदी धर्म है। तुर्की कुर्दों का विरोध करता रहा है और उस पर कुर्दों के नरसंहार के कई आरोप लग चूके है। नागोर्नो-काराबाख पर आधिपत्य को लेकर तुर्की द्वारा भेजे गए लड़ाके यज़ीदीयों को भी निशाना बना सकते है और इसका व्यापक असर मध्यपूर्व में पड़ सकता है।



इन सबके बीच रूस की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसके अजरबैजान और आर्मेनिया दोनों ही देशों से बेहतर संबंध है लेकिन आर्मेनिया में उसका सैन्य अड्डा है तथा दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग संधि भी है। इस समूचे क्षेत्र में नाटो के प्रभाव को लेकर रूस चौकन्ना रहा है जबकि तुर्की नाटो का सदस्य देश है। दूसरी ओर कई वर्षों तक जूझने के बाद जार्जिया और चेचन्या के इस्लामिक चरमपंथ पर बड़ी मुश्किल से काबू करने वाले रूस के लिए यह स्वीकार्य नहीं हो सकता की मध्यपूर्व के लड़ाके इस क्षेत्र में आकर अपनी पकड़ मजबूत करें। क्योंकि इन लड़ाकों का जेहाद के नाम पर प्रशिक्षण पूरे क्षेत्र में चरमपंथ की समस्या को बढ़ा सकती है और रूस इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।  

तुर्की और पाकिस्तान के संबंध इस समय बेहद मजबूत है और माना जा रहा है कि तुर्की की और से नागोर्नो-काराबाख में भेजे गए लड़ाके पाकिस्तान में प्रशिक्षित है। पाकिस्तान के प्रशिक्षण स्थलों से निकलने वाले लड़ाके धार्मिक युद्द के नाम पर तैयार किए जाते है और वे बेहद दुर्दांत होते है। पिछले साल अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से स्वीकार किया था कि उनके देश में अभी भी 30 से 40 हजार आतंकी है। पाकिस्तान  में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट और जमायत-उल-उलूम-इलइस्लामिया जैसे संस्थान बहुत कुख्यात है।  मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। इस संस्थानों का काम इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देना है। यहां पर सिंकियांग के उइगुर समेत उजबेक और तुर्क प्रशिक्षण लेते रहे है। चेचन्या में रुसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी और मुल्ला उमर समेत तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले है। पाकिस्तान के इन कुख्यात आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों में मसूद अजहर की खास भूमिका है। जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाक का एक प्रमुख आतंकी है। अजहर छह लाख आतंकियों की भर्ती का दावा करता है जिसमें से हजारों कश्मीर में जिहाद के लिए भर्ती किये गये है। इस आतंकी संगठन का तंत्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया,अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। कॉकेशस से जुड़े नागोर्नो-काराबाख़ पर कब्ज़े को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच लड़ाई में इन लड़ाकों का शामिल होना यूरोप और एशिया के कई राष्ट्रों की सुरक्षा का संकट बढ़ा सकता है। इस लड़ाई के खत्म होने के बाद एक नए प्रकार के आतंक की समस्या इस क्षेत्र में उत्पन्न हो सकती है।



इस सबके बीच सुरक्षा परिषद ने कहा है कि आर्मेनिया और अज़रबैजान में शांति स्थापना में मिन्स्क ग्रुप को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इस ग्रुप में फ़्रांस,रूस और अमरीका शामिल है। गौरतलब है कि ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप नामक संगठन ने 1992 में आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच मध्यस्थता के उद्देश्य से इस ग्रुप का गठन किया था। मिन्स्क ग्रुप के साझा प्रयास अभी हुए नहीं है लेकिन तुर्की को लेकर ये सभी देश अलग अलग कारणों से मुखर हो सकते है। रूस इस इलाके में तुर्की की धार्मिक रणनीति से आशंकित है।  जबकि फ्रांस भूमध्य सागर में तुर्की की हिमाकतों से काफी समय से नाराज है। तुर्की और ग्रीस की खींचतान में फ्रांस तुर्की के सामने कड़ा विरोध जता चूका है,यहां तक की सैन्य कार्रवाई की स्थिति बन चूकी थी। फ्रांस में आर्मेनियाई मूल के लोग बहुतायत में रहते है और इसलिए फ्रांस आर्मेनिया के साथ खड़ा है। इस संबंध में वह तुर्की को चेतावनी भी दे चूका है। अमेरिका और तुर्की के संबंध अच्छे रहे है लेकिन आर्दोंआन की नीतियों से दोनों देशों के बीच अब संबंध सामान्य नहीं है। तुर्की नाटो के भीतर अमेरिका की सीरिया और अन्य जगहों को लेकर नीतियों के ख़िलाफ़ रहा है। वहीं ट्रंप तुर्की के राष्ट्रपति की धर्मनिरपेक्ष विरोधी नीतियों को यूरोप के लिए खतरा मानते है। आर्दोंआन समय समय पर इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व की बात करते रहे है और अमेरिका के मित्र सऊदी अरब को यह स्वीकार नहीं है। आर्मेनिया और अज़रबैजान में युद्द भड़कने को लेकर तुर्की की भूमिका बेहद आशंकित करने वाली है और वैश्विक मंच पर इसके कारण तुर्की की आलोचना भी हो सकती है।



अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हमा अलीयेव ने कहा है कि इस लड़ाई को रोकने के लिए आर्मीनिया को नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के इलाक़ों से अपनी सेना हटानी होगी। आर्मेनिया के पक्ष में कई महाशक्तियां है और इसकी संभावना बहुत कम है कि नागोर्नो-काराबाख़ को अज़रबैजान को सौंप दिया जाए। इस विवादित क्षेत्र में आर्मेनियाई मूल के लोग बहुतायत में है और वे नागोर्नो-काराबाख़ में अज़रबैजान के निर्णायक प्रभाव को कभी स्वीकार नहीं कर सकते।

आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच कुछ समय के लिए संघर्षविराम तो हुआ है लेकिन तुर्की पर बिना दबाव डाले यह युद्द और संकट टलेगा,इसकी फिलहाल संभावना बहुत कम नजर आ रही है। बहरहाल कॉकेशस क्षेत्र में अशांति यहां की सांस्कृतिक,धार्मिक और भाषाई विभिन्नताओं के कारण किसी बड़े टकराव की आशंका को बढ़ा रही है,नागोर्नो-काराबाख़ का संघर्ष विश्व शांति के लिए शुभ संकेत नहीं है।

 

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