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राष्ट्रीय एकता के लिए राष्ट्रीय संकल्प की दरकार rashtriya ekta

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  सुबह सवेरे                             http://epaper.subahsavere.news/c/56035144                                                   जे.ई.वेल्डन कलकत्ता के पूर्व बिशप थे। भारत की आज़ादी के प्रश्न पर 1915 में उन्होने कहा था की , भारत से ब्रिटिश साम्राज्य का अंत एक अकल्पनीय घटना होगी। जैसे ही अंतिम ब्रिटिश सिपाही बंबई या कराची के बंदरगाह से रवाना होगा , हिंदुस्तान परस्पर धार्मिक और नस्लीय समूह के लोगों का अखाड़ा बन जाएगा। इसके साथ ही ग्रेट ब्रिटेन से जिस ठोस रूप में यहां एक शांतिप्रिय और प्रगतिशील सभ्यता की नींव रखी है वह रातों रात खत्म हो जाएगी।” इसका जवाब 14 अगस्त 1947  की मध्य रात्रि को मिला। दिल्ली में जब आज़ाद भारत का पहली बार झण्डा फहराने का महा आयोजन किया गया , वंदे मातरम और ध्वज प्रस्तुतीकरण का दौर चला , उस रात उसमें बोलने वाले तीन प्रमुख वक्ता थे। सबसे पहले चौधरी ख़ालिक़ज्जमा ने मुसलमानों  की नुमाइंदगी करते  हुए कहा की यहां के अल्पसंख्यक समुदाय के लोग इस नए आज़ाद मुल्क के प्रति अपनी वफादारी निभाने से पीछे नहीं हटेंगे। इसके बाद देश के महान शिक्षाविद डॉ.राधाकृष्णन का भाषण हुआ और

फ्रांस में बिखरता बहुलतावाद , france bahultavad islam

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  फ्रांस में बिखरता बहुलतावाद                                                                              https://epaper.jansatta.com/c/56033327                                                             बहुलवादी देशों में एकीकृत समाज का निर्माण कैसे किया जाए , यह चुनौती आधुनिक विश्व के सामने बड़ा संकट बन कर उभरेगी , यह कल्पना सभ्य समाज ने कभी नहीं की होगी। दरअसल यूरोप के सबसे बड़े बहुलवादी देश फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अंतर्द्वंद सभ्यता और सांस्कृतिक संघर्ष का कारण बन गया है , इसके परिणाम बेहद भयावह होकर वहां के बहुलवादी परिवेश को प्रभावित कर  रहे है , यह संकट आने वाले समय में बेहद हिंसक और विध्वंसक हो सकता है। इस दिनों फ्रांस का समाज एक शिक्षक की हत्या को लेकर बेहद आक्रोशित है जिन्हें एक इस्लामिक कट्टरपंथी द्वारा गला काटकर इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह एक पत्रिका में प्रकाशित उन कार्टूनों की चर्चा कर रहे थे जिसे फ्रांस में रहने वाला इस्लामिक समुदाय अपनी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ मानता रहा है।   फ्रांस की आबादी का दस फीसद मुसलमान है और इन्हें आमतौर पर पिछड़े और अशिक्षित

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

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सांध्य प्रकाश                                सर सैयद अहमद खां की जयंती -17 अक्टूबर                 सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है                                                                                        - डॉ.ब्रह्मदीप अलूने हिंदुस्तान यदि मिथक है तो वह सहस्त्रों वर्षों से आबाद कैसे है और यदि वह  यथार्थ है तो समूची संस्कृतियों को सहेजने की उसकी कला पर गर्व होना चाहिए । यहां कुछ भी अंदाजा लगाना आसान नहीं है । संस्कृतिवादी शिवाजी को अपना आदर्श बताते है और पूजते है जबकि वे स्वयं सभी धर्मों का सम्मान करते थे । शिवाजी ने अपने प्रशासन में धर्मनिरपेक्षता का पालन किया था और उनका राजधर्म किसी एक किसी धर्म पर आधारित नहीं था । उनकी सेना में सैनिकों की नियुक्ति के लिए धर्म कोई मानदंड नहीं था और इनमें एक तिहाई मुस्लिम सैनिक शामिल थे । हिन्दू  राजशाही के तौर पर पहचाने जाने वाले शिवाजी का जीवन बेहद दिलचस्प रहा । शिवाजी के दादा मालोजीराव भोसले ने सूफी संत शाह शरीफ के सम्मान में अपने बेटों को नाम शाहजी और शरीफजी रखा था । उनकी नौसेना की कमान सिद्दी संबल के हाथों में थी और

अर्थव्यवस्था के अंधकार को दूर करने की चुनौती,arthvyvstha india

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  नया इंडिया                                                                            भारत जैसे विकासशील देश के करोड़ों लोग पिछले तीन दशकों में इस बात को भलीभांति समझने लगे है की जब अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन करती है तो कारोबारी और ज़्यादा पैसा निवेश करते हैं और उत्पादन को बढ़ाते हैं क्योंकि भविष्य को लेकर वे आशावादी होते हैं । ऐसे में करोड़ों लोगों को रोजगार मिलते है और खुशहाली की संभावनाएं बढ़ जाती है । भारत की यही जरूरत भी है क्योंकि यहां करोड़ों लोगों के लिए खुशहाली का मतलब महंगी कारें या ऊंची इमारतें नहीं होता बल्कि दो जून रोटी का उपलब्ध होना होता है । अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़ , भारत में कम से कम नब्बे फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं । ये लोग सिक्योरिटी गार्ड,सफाई करने वाले,रिक्शा चलाने वाले , रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले , कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं । भारत की अर्थव्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी और इसका असर देखने को भी मिला । संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2016 के बीच रिकॉर्ड 27