शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है sir saiyad aahmad khan

सांध्य प्रकाश                                सर सैयद अहमद खां की जयंती -17 अक्टूबर

                सर सैयद अहमद खां हिंदुस्तान की क्यों जरूरत है

                                                                                       - डॉ.ब्रह्मदीप अलूने



हिंदुस्तान यदि मिथक है तो वह सहस्त्रों वर्षों से आबाद कैसे है और यदि वह  यथार्थ है तो समूची संस्कृतियों को सहेजने की उसकी कला पर गर्व होना चाहिएयहां कुछ भी अंदाजा लगाना आसान नहीं हैसंस्कृतिवादी शिवाजी को अपना आदर्श बताते है और पूजते है जबकि वे स्वयं सभी धर्मों का सम्मान करते थेशिवाजी ने अपने प्रशासन में धर्मनिरपेक्षता का पालन किया था और उनका राजधर्म किसी एक किसी धर्म पर आधारित नहीं थाउनकी सेना में सैनिकों की नियुक्ति के लिए धर्म कोई मानदंड नहीं था और इनमें एक तिहाई मुस्लिम सैनिक शामिल थेहिन्दू  राजशाही के तौर पर पहचाने जाने वाले शिवाजी का जीवन बेहद दिलचस्प रहाशिवाजी के दादा मालोजीराव भोसले ने सूफी संत शाह शरीफ के सम्मान में अपने बेटों को नाम शाहजी और शरीफजी रखा थाउनकी नौसेना की कमान सिद्दी संबल के हाथों में थी और सिद्दी मुसलमान उनके नौसेना में बड़ी संख्या में थेजब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब मुगलों की कैद से निकल भागने में जिन दो व्‍यक्तियों ने उनकी मदद की थी उनमें से एक मुसलमान था।यहीं नहीं शिवाजी ने अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने मुस्लिम श्रद्धालुओं के लिए एक मस्जिद का ठीक उसी तरह निर्माण करवाया था जिस तरह से उन्होंने अपनी पूजा के लिए जगदीश्वर मंदिर बनवाया थाहिंदुस्तान में शिवाजी को हिन्दू भावनाओं का प्रतीक बताने की लगातार कोशिश होती रही है,लेकिन स्वयं शिवाजी अपनी नीतियों से हिंदुस्तान की बहुसांस्कृतिक शक्ति के प्रतीक थे



शौर्य को लेकर जैसी पहचान हिन्दुओं में शिवाजी की है शिक्षा को लेकर कुछ वैसी ही सर सैयद अहमद खां की मुसलमानों में।19 वी सदी में युद्द और हिंसा से अभिशिप्त भारतीय मुसलमानों की समस्याओं को दूर करने के लिए सैयद अहमद खां ने शिक्षा का रास्ता चुनादर दर और पग पग नापते हुए उन्होंने दान से शिक्षा की इमारत खड़ी करने की ठानी और उनका जूनून उन्हें सफलता की और ले गयाअशिक्षा और पिछड़ेपन से गरीबी की मार झेलते हुए मुसलमानों  के लिए आधुनिक शिक्षा की परिकल्पना की दुर्लभ थी,जिसे अहमद खां ने अपनी नेक नियति और कड़ी मशक्कत से साकार कर दियागुलाम भारत में मुस्लिम शिक्षा का आगाज करने वाले मोहम्मद एंग्लों इंडियन कॉलेज जिसे अब अलीगढ़ विश्वविद्यालय कहते हैउसके दरवाजे पर लिखे इस वाक्य से सबका स्वागत होता है,”इल्म हासिल कीजिये,माँ की गोद से मौत तक।“19 वी सदी के पिछड़े भारत में जन्म लेने वाले  अहमद खां जैसे भारतीय शख्स में समाज के प्रति निष्ठा और राष्ट्र के प्रति जिजीविषा ही थी कि उत्तर भारत के एक बड़े परिक्षेत्र में बिना सरकारी मदद के शिक्षा की ऐसी बुलंद इमारत खड़ी कर दी गई,जिसका स्वर्णिम इतिहास गवाह हैकहने को इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम शिक्षा का केंद्र कहा जाता है लेकिन इसकी शिक्षा तो सच्ची  भारतीयता को ही बयां करती है

यह विश्वविद्यालय अपनी मुस्लिम छाप के लिए देश ही नहीं  दुनिया में विख्यात हैजबकि इसकी स्थापना सन्  1877 में भारत के स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्रीय भावनाओं को मज़बूत आधार एवं स्वदेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए  सर सैय्यद अहमद ख़ान ने की थीपहले दिन से ही  अरबी फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ  संस्कृत  कि शिक्षा की भी व्यवस्था की गईसर सैयद अहमद खां निश्चित तौर पर इस विश्वविद्यालय के जरिए मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना चाहते थेदेश की सर्वोत्तम सुविधाओं से शुमार इस विश्वविद्यालय में तकरीबन 25 फ़ीसदी विद्यार्थी गैर मुसलमान पढ़ते हैयहाँ संस्कृत का विभाग बेहद ख्यात माना जाता हैपूर्व,पश्चिम,उत्तर,दक्षिण की राजनीति, धर्म,कर्म,विज्ञान,गणित,समाज,अर्थ,मेडिकल,इंजीनियरिंग जैसे सैकड़ों विभाग विद्यार्थियों के लिए पूरी गुणवत्ता के साथ उपलब्ध होते हैयहां की सेंट्रल लायब्रेरी दुनिया की अहम लायब्रेरी मानी जाती हैयहाँ पर महाभारत  का फारसी अनुवाद भी है तो भारतीय संस्कृति और सभ्यता से संबंधित कई पांडुलिपियां भी उपलब्ध हैयहाँ अकबर के दरबारी फैजी की फारसी में अनुवादित गीता है तो तमिल भाषा में लिखे भोजपत्र भी सहेज कर रखे गए है

शिक्षा का स्तर भी इतना जबरदस्त की देश के तीसरे राष्ट्रपति जाकिर हुसैन,कैफ़ी आजमी,न्यायविद आर.पी.सेठी,मशहूर इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद और इरफ़ान हबीब,भौतिक शास्त्री पियारा सिंह गिल जैसी अनेक नामी गिरामी हस्तियां यहां से निकली हैहॉकी के जादूगर  ध्यानचंद ने कलाइयों से कमाल करना इसी विश्वविद्यालय से सीखा था। खान अब्दुल गफ्फार खान की शिक्षा भी अलीगढ़ मुस्लिम  विश्वविद्यालय में ही हुई थी।उनके देश प्रेम के बारे में कहा जाता है कि  वह ऐसे हिन्दुस्तानी थे जिसकी हर साँस में एहले वतन डोलता था।अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुदाई खिदमतगार और लाल कुर्ती आंदोलन छेड़कर पठानों को लामबंद करने वाले खान अब्दुल गफ्फार खान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शिखर नेता रहे।धर्म के नाम पर मुसलमानों के लिए अलग पाकिस्तान देश बनने का पूरी उम्र उन्होंने खूब विरोध किया।विभाजन के बाद भी पाकिस्तान का वे लगातार विरोध करते रहे,उन्हें पाकिस्तान की जेल में भी डाला गया लेकिन उनके भारत के प्रति प्रेम में कभी कमी नही आई।भारत के प्रति उनकी अपार श्रद्धा के कारण ही उन्हें 1969 में नेहरु शांति पुरस्कार और 14 अगस्त 1987 में भारत रत्न के सर्वोच्च सम्मान से विभूषित किया गया।लोग इस विश्वविद्यालय को मुस्लिम इच्छा का केंद्र समझते है लेकिन सर सैयद अहमद खां से जिस नीव पर यह इमारत खड़ी की है उससे प्रतीत होता है कि भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने में इस संस्थान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।




देश में जब अंग्रेजों के अत्याचार बढ़ रहे थे तब सैयद अहमद खांने असबाब-ए-बगावत-ए-हिन्द किताब लिखकर मुसलमानों को स्वतंत्रता की भारतीय चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थीधर्म की कट्टरपंथी ताकतों पर सीधा प्रहार करते हुए सर सैयद ने लोगों से यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि कुरान के उपदेशों को तर्क के आधार पर समझने का प्रयत्न करें



विडम्बना ही है कि भारत में जिन्ना को बार बार जीवित किया जाता है,उसका उपयोग किया जाता है और उससे अलगाब पैदा करने की कोशिशें भी की जाती हैजबकि  भारत में सर सैयद अहमद खां के विचारों और उद्देश्य को प्रचारित करने की जरूरत हैसर सैयद अहमद खां 19 वी  सदी में मुसलमानों के पिछड़ेपन को लेकर परेशान थेलेकिन हकीकत में मुसलमान की समस्या इस समय भी जस की तस है गरीबी,पिछड़ापन और अशिक्षा से मुसलमान तब भी मुक्ति चाहते थे और अब भी उनके जीवन में ज्यादा बदलाव नहीं आया है

भारत जैसे बहु सांस्कृतिक देश के लिए सर सैयद अहमद खां ऐसी अनमोल धरोहर रहे,जिनके आदर्शों और उद्देश्यों को हर युग में सहेजने की जरूरत है।अंततः शिक्षा ही सारी समस्याओं का समाधान है,इसी के जरिए सर सैयद अहमद खां  जीवन भर और उसके बाद भी सशक्त भारत के निर्माण का रास्ता दिखाते नजर आते है । 

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

अर्थव्यवस्था के अंधकार को दूर करने की चुनौती,arthvyvstha india

 

नया इंडिया

                                                                         

भारत जैसे विकासशील देश के करोड़ों लोग पिछले तीन दशकों में इस बात को भलीभांति समझने लगे है की जब अर्थव्यवस्था अच्छा प्रदर्शन करती है तो कारोबारी और ज़्यादा पैसा निवेश करते हैं और उत्पादन को बढ़ाते हैं क्योंकि भविष्य को लेकर वे आशावादी होते हैंऐसे में करोड़ों लोगों को रोजगार मिलते है और खुशहाली की संभावनाएं बढ़ जाती है भारत की यही जरूरत भी है क्योंकि यहां करोड़ों लोगों के लिए खुशहाली का मतलब महंगी कारें या ऊंची इमारतें नहीं होता बल्कि दो जून रोटी का उपलब्ध होना होता हैअंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक़, भारत में कम से कम नब्बे फीसदी लोग गैर-संगठित क्षेत्रों में काम करते हैं ये लोग सिक्योरिटी गार्ड,सफाई करने वाले,रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाकर सामान बेचने वाले, कूड़ा उठाने वाले और घरों में नौकर के रूप में काम करते हैं



भारत की अर्थव्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी और इसका असर देखने को भी मिला संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2006 से 2016 के बीच रिकॉर्ड 27 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं2005-06 में भारत के करीब 64 करोड़ लोग गरीबी में थे2015-16 में यह संख्या घटकर 37 करोड़ आ गई जो देश की जनसंख्या का करीब 28 फीसदी है

गरीबी के कम होने से इन सालों में भारत के लोग यह सुनना भी पसंद नहीं करते की देश की जीडीपी कमजोर हो जायेक्योंकि इसका मतलब है कि निवेशक अपने पैसे बचाने में लग जायेंगे,आम लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं होगा,वे कम पैसा ख़र्च  करेंगे और इससे करोड़ों दिहाड़ी मजदूरों और छोटे व्यापारियों की तो शामत आ जाएगी,इनकी संख्या भारत  में कई करोड़ है

दरअसल जीडीपी को महत्व को लेकर यह विचार इसलिए किया जा रहा है  क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत की जीडीपी के इस साल माईनस दस दशमलव तीन फीसदी तक जाने की आशंका जताई है और यह भारत के करोड़ों लोगों के लिए किसी बूरे सपने जैसा है



अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने दुनिया भर की उभरती हुई और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की सूची में भारत की स्थिति सबसे ख़राब बताई गई है एक अनुमान ये भी है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी में आने वाले दिनों में बांग्लादेश भी भारत को पीछे छोड़ कर आगे निकल जाएगा



पिछले कुछ वर्षों में जीडीपी कम तो हो रही थी लेकिन कोरोना काल में यह इतनी नीचे गिर जाएगी,इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी साल 2016-17 में जीडीपी आठ दशमलव तीन फीसदी से बढ़ी थीइसके बाद 2017-18 में ग्रोथ सात फ़ीसदी रही2018-19 में यह  छह दशमलव एक फ़ीसदी और 2019-20 में यह गिरकर चार दशमलव दो पर आ गई। अब  यह बहुत नीचे गिर गई है । पिछले साल देश के लगभग सवा तीन करोड़ नौकरियां देने वाले ऑटोमोबाइल सेक्टर की गिरती हालत से निराश मारुती सुजुकी के चेयरमेन आर सी भार्गव ने कहा था कि कोई सुधार के साफ संकेत नहीं है और उत्पादन क्षमता ठप हैभारत को 2020 तक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का प्रधानमंत्री का सपना वाहन उद्योग की बेहतरी के बिना साकार नहीं हो सकतायह निराशा इस बात से सामने आई थी क्योंकि देश में सैकड़ों डीलरशिप बंद हो रही थी या बंद होने की कगार पर थी साल 2018 में एक आर्थिक सर्वेक्षण में यह तथ्य उभर कर आया था कि भारत के 17 राज्यों के किसानों की मासिक औसत आय महज 1662 रूपये है और यदि इसके किसानों की आय के दूगुना होने के सपने को सही समझा जाये तो यह 2022 में 3332 रूपये हो सकती है8 नवम्बर 2016  को नोटबंदी के बाद कई भारतीय निवेशक देश छोड़कर चले गएइससे दैनिक वेतनभोगी और मजदूर वर्ग बेहद प्रभावित हुआ



वास्तव में देश में सवा करोड़ लोग हर साल रोजगार की तलाश में अग्रिम पंक्ति में होते है 1972-73 के बाद बेरोजगारी के दर सबसे निम्न स्तर तक जाने का दंश देश भोग रहा हैग्रामीण असंगठित मजदूर बेहाल है और शहरी असंगठित मजदूरों की कोरोना काल के एक साल पहले ही 18 लाख नौकरियां छूट गई हैभारत की अर्थ व्यवस्था पिछले डेढ़ दशकों में 7 फीसदी से अधिक बढ़ी लेकिन फिर भी यह पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर सकीमाना जाता है कि भारत जैसे कम और मध्यम आमदनी वाले देश के लिए साल दर साल अधिक जीडीपी ग्रोथ हासिल करना ज़रूरी है जिससे देश की बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके



पिछले साल एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था की अब आगे तेज उन्नति के लिए उड़ान भरने का अवसर है,आगे की यात्रा बदलते सपनों की कहानी है,निराशा की स्थिति से आशा के शिखर तक पहुंचने की कहानी है,संकल्प से सिद्धि तक की कहानी हैगरीबी हटाओं की कठिन यात्रा वाले देश में उन्नति के ख्याल करोड़ो लोगों को रोमांचित करते रहे हैखासकर मध्यम और निम्न वर्ग के लिए उन्नति का मतलब घर,रोटी,कपड़ा,मकान और बच्चों की शिक्षा दिवास्वप्न रहे है और कोई भी आशा उनके घर को कुछ समय के लिए तो रोशन कर ही देती है



भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 2021 में आठ दशमलव आठ फ़ीसदी विकास दर का अनुमान भी लगाया है। फ़िलहाल हम यही कामना कर सकते है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो देश को विश्वास दिलाया था,वह सही साबित हो। क्योंकि विकास दर के गिरने से बेरोजगारी,गरीबी,असमानता और अशांति को बढ़ावा मिलेगा और देश की एकता और अखंडता के लिए यह बड़ी चुनौती बन सकता है।

 

 

सोमवार, 12 अक्तूबर 2020

कॉकेशस की आग, aarmeniya azarbejan

 

 

जनसत्ता

                                    कॉकेशस की आग

                                                                                 


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सहस्त्रों वर्षों पहले भौगोलिक अरबी प्लेट और यूरेशियाई प्लेट की टकराहट से बने काकेशस पर्वत का राजनैतिक और धार्मिक इतिहास बेहद रक्तरंजित रहा है। ईसाई और इस्लाम के बीच खूनी संघर्ष से लगातार जूझने वाली इन पहाड़ियों में सांस्कृतिक,धार्मिक और भाषाई विभिन्नताएं बिखरी पड़ी है। यूरोप और एशिया के कई देशों को छूने वाले दुर्गम कॉकेशस से रूस,तुर्की और ईरान का गहरा जुड़ाव है।  भौगोलिक और खनिज संसाधनों से परिपूर्ण इस क्षेत्र से तेल और गैस की पाइप लाइने गुजरती है और इन्हें रणनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जाता है। इसीलिए इन पर आधिपत्य को लेकर क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां सतर्क रहती है।



पिछले कुछ दिनों से कॉकेशस से जुड़े विवादित इलाके नागोर्नो-काराबाख़ पर कब्ज़े को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच जारी लड़ाई रूस की मध्यस्थता से फिलहाल रुकी तो है लेकिन दोनों देशों के बीच किसी भी समय संघर्ष छिड़ने की आशंका बनी हुई है। इस समय दोनों देशों की ओर से लगातार आक्रामक बयान आ रहे है और युद्दविराम को लेकर अविश्वास भी बना हुआ है।

कभी अविभाजित सोवियत संघ का भाग रहे यह दोनों देश अब अपनी अलग पहचान बना चूके है। आर्मेनिया ईसाई बहुल देश होकर फ्रांस का करीबी है जबकि अज़रबैजान मुस्लिम बाहुल्य होकर ईरान और तुर्की का मित्र देश हैयुद्दरत इन देशों पर रूस का प्रभाव तो है लेकिन तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप आर्दोंआन के द्वारा कथित रुप से अज़रबैजान का समर्थन करने की घोषणा से स्थितियां खराब हो गई है। अज़रबैजान इस्लामिक सहयोग संगठन का सदस्य राष्ट्र है और इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने का आर्दोंआन का सपना दुनिया के लिए विध्वंसकारी बनता जा रहा है। जिस नागोर्नो-काराबाख को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान में संघर्ष हो रहा है,यह करीब साढ़े चार हजार वर्ग किलोमीटर में फैला इलाक़ा है,जहां आर्मीनियाई ईसाई और तुर्की नस्ल के मुस्लिम रहते हैं। 90 के दशक में भी इस इलाके में ईसाइयों और तुर्क मुसलमानों के बीच भीषण संघर्ष हुए थे,इस दौरान नरसंहार में हजारों लोग मारे गए थे जबकि लाखों लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। इस इलाके को अज़रबैजान अपना कहता है। 1994 में ख़त्म हुई लड़ाई के बाद से इस इलाक़े पर आर्मीनिया का कब्ज़ा है लेकिन तुर्की अज़रबैजान को समर्थन देकर इस क्षेत्र को आर्मेनिया से छीनना चाहता है।



यूरोप के एकमात्र मुस्लिम बाहुल्य देश तुर्की के राष्ट्रपति आर्दोंआन अपने देश में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा देकर सत्ता पर अपना नियंत्रण मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहे है और उनकी वैदेशिक नीति में भी यह लगातार प्रतिबिंबित हो रहा है। सोवियत संघ के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए  अज़रबैजान को तुर्की ने 1991 में एक स्वतंत्र देश के रूप में स्वीकार करते हुए उसे अपना भाई बताया था। जबकि आर्मीनिया के साथ तुर्की के कोई आधिकारिक संबंध नहीं हैं। 1993 में जब आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच सीमा विवाद बढ़ा तो अज़रबैजान का समर्थन करते हुए तुर्की ने आर्मीनिया के साथ सटी अपनी सीमा बंद कर दी थी। आर्मेनिया और अजरबैजान  के बीच छिड़े संघर्ष में तुर्की अजरबैजान का खुलकर समर्थन कर रहा है। यह भी तथ्य सामने आए है कि तुर्की के सहयोग से सीरिया में लड़ने वाले कई लड़ाके भी अजरबैजान  की  ओर से युद्द के मैदान में झोंक दिये गए है।

तुर्की रणनीतिक रूप से जिस प्रकार इस समूचे युद्द में सहायता कर रहा है,उससे मध्यपूर्व की पारंपरिक प्रतिद्वंदिता का असर भी इस इलाके पर पड़ सकता है। मध्यपूर्व में अस्थिरता फैलाने के लिए महाशक्तियां भाड़े के सैनिकों का उपयोग करती रही है।  पैसे के लिए दुनिया के किसी भी भाग में जाकर लड़ने के लिए तैयार यह सैनिक अफगानिस्तान,पाकिस्तान,लीबिया,लेबनान,सीरिया,इराक,यमन,सुडान और नाइजीरिया जैसे गरीब और गृहयुद्द से जूझने वाले देशों से होते है। सैनिकों के साथ ही इनमें आतंकवादियों का भी उपयोग किया जाता है,जिनके प्रशिक्षण अफगानिस्तान और पाकिस्तान में होते रहे है।



तुर्की और पाकिस्तान  के गहराते सम्बन्धों के बीच लड़ाकों का दक्षिणपूर्वी यूरोप के इलाकों में जाकर युद्द में भाग लेना धार्मिक विद्वेष को बढ़ा सकता है और इससे दुनिया में ईसाई और मुस्लिम देशों के बीच समस्या बढ़ सकती है।

 

अज़रबैजान एशिया का भाग माना जाता है और इसकी सीमाओं से लगे देश ईरान,रूस,आर्मेनिया,तुर्की और जार्जिया है तथा यह केस्पियन सागर से जुड़ा हुआ है। अज़रबैजान धीरे-धीरे सत्तावादी लोकतंत्र की ओर बढ़ रहा है।  यहां के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव,आर्दोंआन की तर्ज पर सत्ता पर अपना नियंत्रण मजबूत करना चाहते है और वे युद्द को राष्ट्रीय भावनाओं और अस्मिता से जोड़ रहे है। अज़रबैजान में शिया मुसलमानों कि भी अच्छी ख़ासी तादाद है और उनकी सुरक्षा कि चिंता ईरान को है। दूसरी और आर्मेनिया की सीमा तुर्की,ईरान,जार्जिया और अज़रबैजान से लगी है। तुर्की और अज़रबैजान की सीमाओं पर आर्मेनिया के साथ अक्सर तनाव रहता है और यह बंद रहती है। ईसाई बाहुल्य आर्मेनिया में यज़ीदीयों की भी आबादी रहती है जिन पर सीरिया-इराक के गृहयुद्द  में आईएसआईएस ने गहरा अत्याचार किया था। यज़ीदी कुर्दी लोगों का एक उपसमुदाय है जिनका अपना अलग यज़ीदी धर्म है। तुर्की कुर्दों का विरोध करता रहा है और उस पर कुर्दों के नरसंहार के कई आरोप लग चूके है। नागोर्नो-काराबाख पर आधिपत्य को लेकर तुर्की द्वारा भेजे गए लड़ाके यज़ीदीयों को भी निशाना बना सकते है और इसका व्यापक असर मध्यपूर्व में पड़ सकता है।



इन सबके बीच रूस की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उसके अजरबैजान और आर्मेनिया दोनों ही देशों से बेहतर संबंध है लेकिन आर्मेनिया में उसका सैन्य अड्डा है तथा दोनों देशों के बीच सुरक्षा और सहयोग संधि भी है। इस समूचे क्षेत्र में नाटो के प्रभाव को लेकर रूस चौकन्ना रहा है जबकि तुर्की नाटो का सदस्य देश है। दूसरी ओर कई वर्षों तक जूझने के बाद जार्जिया और चेचन्या के इस्लामिक चरमपंथ पर बड़ी मुश्किल से काबू करने वाले रूस के लिए यह स्वीकार्य नहीं हो सकता की मध्यपूर्व के लड़ाके इस क्षेत्र में आकर अपनी पकड़ मजबूत करें। क्योंकि इन लड़ाकों का जेहाद के नाम पर प्रशिक्षण पूरे क्षेत्र में चरमपंथ की समस्या को बढ़ा सकती है और रूस इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है।  

तुर्की और पाकिस्तान के संबंध इस समय बेहद मजबूत है और माना जा रहा है कि तुर्की की और से नागोर्नो-काराबाख में भेजे गए लड़ाके पाकिस्तान में प्रशिक्षित है। पाकिस्तान के प्रशिक्षण स्थलों से निकलने वाले लड़ाके धार्मिक युद्द के नाम पर तैयार किए जाते है और वे बेहद दुर्दांत होते है। पिछले साल अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान से स्वीकार किया था कि उनके देश में अभी भी 30 से 40 हजार आतंकी है। पाकिस्तान  में सैयद मौदूदी इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट और जमायत-उल-उलूम-इलइस्लामिया जैसे संस्थान बहुत कुख्यात है।  मुजफ्फराबाद,अलियाबाद,कहुटा,हजीरा,मीरपुर,रावलकोट,रावलपिंडी और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में अनेक आतंकी प्रशिक्षण केंद्र है। इस संस्थानों का काम इस्लामी चरमपंथियों को प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता देना है। यहां पर सिंकियांग के उइगुर समेत उजबेक और तुर्क प्रशिक्षण लेते रहे है। चेचन्या में रुसी सेना से लड़ने वाले चरमपंथी और मुल्ला उमर समेत तालिबान के अधिकांश लड़ाके यहीं से निकले है। पाकिस्तान के इन कुख्यात आतंकी प्रशिक्षण केन्द्रों में मसूद अजहर की खास भूमिका है। जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मौलाना मसूद अजहर पाक का एक प्रमुख आतंकी है। अजहर छह लाख आतंकियों की भर्ती का दावा करता है जिसमें से हजारों कश्मीर में जिहाद के लिए भर्ती किये गये है। इस आतंकी संगठन का तंत्र दक्षिण एशिया के साथ पश्चिम एशिया,अफ्रीका और यूरोप तक फैला हुआ है। कॉकेशस से जुड़े नागोर्नो-काराबाख़ पर कब्ज़े को लेकर आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच लड़ाई में इन लड़ाकों का शामिल होना यूरोप और एशिया के कई राष्ट्रों की सुरक्षा का संकट बढ़ा सकता है। इस लड़ाई के खत्म होने के बाद एक नए प्रकार के आतंक की समस्या इस क्षेत्र में उत्पन्न हो सकती है।



इस सबके बीच सुरक्षा परिषद ने कहा है कि आर्मेनिया और अज़रबैजान में शांति स्थापना में मिन्स्क ग्रुप को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। इस ग्रुप में फ़्रांस,रूस और अमरीका शामिल है। गौरतलब है कि ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर सिक्योरिटी एंड कोऑपरेशन इन यूरोप नामक संगठन ने 1992 में आर्मीनिया और अज़रबैजान के बीच मध्यस्थता के उद्देश्य से इस ग्रुप का गठन किया था। मिन्स्क ग्रुप के साझा प्रयास अभी हुए नहीं है लेकिन तुर्की को लेकर ये सभी देश अलग अलग कारणों से मुखर हो सकते है। रूस इस इलाके में तुर्की की धार्मिक रणनीति से आशंकित है।  जबकि फ्रांस भूमध्य सागर में तुर्की की हिमाकतों से काफी समय से नाराज है। तुर्की और ग्रीस की खींचतान में फ्रांस तुर्की के सामने कड़ा विरोध जता चूका है,यहां तक की सैन्य कार्रवाई की स्थिति बन चूकी थी। फ्रांस में आर्मेनियाई मूल के लोग बहुतायत में रहते है और इसलिए फ्रांस आर्मेनिया के साथ खड़ा है। इस संबंध में वह तुर्की को चेतावनी भी दे चूका है। अमेरिका और तुर्की के संबंध अच्छे रहे है लेकिन आर्दोंआन की नीतियों से दोनों देशों के बीच अब संबंध सामान्य नहीं है। तुर्की नाटो के भीतर अमेरिका की सीरिया और अन्य जगहों को लेकर नीतियों के ख़िलाफ़ रहा है। वहीं ट्रंप तुर्की के राष्ट्रपति की धर्मनिरपेक्ष विरोधी नीतियों को यूरोप के लिए खतरा मानते है। आर्दोंआन समय समय पर इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व की बात करते रहे है और अमेरिका के मित्र सऊदी अरब को यह स्वीकार नहीं है। आर्मेनिया और अज़रबैजान में युद्द भड़कने को लेकर तुर्की की भूमिका बेहद आशंकित करने वाली है और वैश्विक मंच पर इसके कारण तुर्की की आलोचना भी हो सकती है।



अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हमा अलीयेव ने कहा है कि इस लड़ाई को रोकने के लिए आर्मीनिया को नागोर्नो-काराबाख़ और उसके आसपास के इलाक़ों से अपनी सेना हटानी होगी। आर्मेनिया के पक्ष में कई महाशक्तियां है और इसकी संभावना बहुत कम है कि नागोर्नो-काराबाख़ को अज़रबैजान को सौंप दिया जाए। इस विवादित क्षेत्र में आर्मेनियाई मूल के लोग बहुतायत में है और वे नागोर्नो-काराबाख़ में अज़रबैजान के निर्णायक प्रभाव को कभी स्वीकार नहीं कर सकते।

आर्मेनिया और अज़रबैजान के बीच कुछ समय के लिए संघर्षविराम तो हुआ है लेकिन तुर्की पर बिना दबाव डाले यह युद्द और संकट टलेगा,इसकी फिलहाल संभावना बहुत कम नजर आ रही है। बहरहाल कॉकेशस क्षेत्र में अशांति यहां की सांस्कृतिक,धार्मिक और भाषाई विभिन्नताओं के कारण किसी बड़े टकराव की आशंका को बढ़ा रही है,नागोर्नो-काराबाख़ का संघर्ष विश्व शांति के लिए शुभ संकेत नहीं है।

 

शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2020

अभी नहीं है क्वाड की चीन को चुनौती, QUAD KI CHUNOUTY

 

राष्ट्रीय सहारा 

अभी नहीं है क्वाड की चीन को चुनौती

http://rashtriyasahara.com/imageview_25097_134043668_4_71_10-10-2020_6_i_1_sf.html                                                                            

आक्रमणकारी दुश्मन के विरुद्द सामरिक रक्षा की रणनीति चीन का पारंपरिक सिद्धान्त है और वैदेशिक मामलों में उसके व्यवहार से यह प्रतिबिम्बित भी होता है। दुनिया के नामचीन लोकतांत्रिक देश और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार अमेरिका,जापान,ऑस्ट्रेलिया और भारत के अनौपचारिक 'क्वॉड्रिलैटरल सिक्‍योरिटी डायलॉग' की विकसित होती साझेदारी पर निशाना साधते हुए चीन के उप विदेश मंत्री लुओ झाओहुई ने क्वाड को मिनी नाटो बताया। नाटो पूंजीवादी देशों का एक सैन्य संगठन माना जाता है और उसका व्यवहार भी साम्यवाद और समाजवाद के खिलाफ आक्रामक ही रहा है। नाटो को लेकर रूस बेहद सतर्क रहता है और चीन ने क्वाड को मिनी नाटो कहकर भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों पर दबाव बनाने की कोशिश की है।

बदलती वैश्विक चुनौतियों में चीन दुनिया के सामने एक अहम आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभरा है,वहीं इसे रोकने के लिए क्वाड जैसे बहुआयामी संगठन की जरूरत भी महसूस की जा रही है। लेकिन क्वाड के चार देशों के चीन को लेकर अलग अलग व्यवहार से चीन को मिलने वाली चुनौती कितनी प्रभावी होगी,इसे लेकर संशय गहरा गया है।

हिमालय और हिन्द महासागर में आक्रामक व्यवहार से यूरेशिया को संकट में डालने की चीन की सैन्य नीति को लेकर जब क्वाड के सदस्य देशों से कड़े संदेश की अपेक्षा की जा रही थी,तब भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया ने सीधे तौर पर चीन का नाम लेने से गुरेज किया। इसे क्वाड के तीन सदस्यों की चीन से सीधे टकराव से बचने का प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए,लेकिन चीन के खिलाफ पीछे हटकर मोर्चाबंदी नहीं जा सकती,रणनीतिक रूप से यह भी समझने की जरूरत है। वहीं अमरीका के विदेशमंत्री पोम्पियो ने दूसरे देशों के जरूरी दौरे टालकर केवल टोक्यो में होने वाली क्वाड बैठक में शिरकत की और चीन को आड़े हाथों भी लिया। पोम्पियो ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के आक्रामक नीति की आलोचना करते हुए पूर्वी चीन सागर,मेकांग,हिमालय,ताइवान जलडमरूमध्य पर लेकर चिंता जाहिर की और क्वाड की साझेदारी को उच्च स्तर पर ले जाने की बात  कही। अमरीका के अलावा किसी और क्वॉड सदस्य ने चीन का सीधे तौर पर नाम नहीं लिया और ना ही बैठक का औपचारिक बयान जारी किया गया

दरअसल क्वाड की बढ़ती चुनौती को रोकने के लिए चीन ने मनोवैज्ञानिक दबाव की जो रणनीति अपनाई उससे भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया बच नहीं सके है। चीन ने मिनी नाटो की बात कहकर रूस जैसे देशों के साथ आने का इशारा भी किया वहीं आर्थिक सरोकारों को लेकर भी इस समूह को आगाह किया। आर्थिक स्तर पर साझेदारी की दृष्टि से क्वाड के सभी सदस्य देशों की चीन से बड़ी भागीदारी है। सीमा पर तनातनी,चीन के सामान के बहिष्कार और चीनी एप पर प्रतिबंध के बाद भी वह भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। ऑस्ट्रेलिया के कुल निर्यात का लगभग आधा चीन को जाता है,वहीं चीन-जापान द्विपक्षीय व्यापार 2019 में 317 अरब डॉलर का था जो जापान के कुल व्यापार का 20 प्रतिशत है। अमेरिका भी इस मामले में पीछे नहीं है और व्यापारिक युद्द की खबरों के बीच चीन अमेरिका व्यापार में कोई खास कमी नहीं आई है।

2007 में जापान के प्रधान मंत्री शिंजों आबे ने चीन के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन की नींव रखते हुए क्वाड की परिकल्पना की थी,लेकिन तेरह सालों में अमेरिका,भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया हिंद महासागर में नौसैनिक अभ्यास से आगे बढ़ नहीं पाये है। यहां तक की सुरक्षा से जुड़े हितों के टकराव के बाद भी इन वर्षों में क्वाड के सदस्य देशों के चीन के साथ व्यापार में उत्तरोत्तर वृद्धि ही देखी गई है। 2017 में चीन में आयोजित ओबीओआर सम्मेलन का भारत ने सीधे तौर पर बहिष्कार किया  था जबकि जापान और अमेरिका जैसे देश तो इसमें शामिल भी हुए थे। इस समय वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन की सेनाएं आमने सामने है। क्वाड के सदस्य देश लेह जैसे सामरिक स्थल पर सैनिक अड्डा बनाकर चीन पर सीधे दबाव डाल सकते थे। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में भारत का नौ सैनिक अड्डा है। क्वाड के सभी सदस्य देश इस नौसैनिक अड्डे पर अपने जंगी जहाज सामूहिक रूप से तैनात करने का साहसिक निर्णय करते तो संभवत: चीन पर दबाव बढ़ सकता था।

लेकिन न तो भारत ने ऐसा प्रस्ताव किया और न ही क्वाड की कार्ययोजना में इस प्रकार की रणनीति पर विचार किया गया। पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू आइलैंड को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है,यह दक्षिणी द्वीप चीन के निकट है। यहां पर जापान चीन के खिलाफ आक्रामक है लेकिन क्वाड की किसी भी भूमिका को लेकर आपसी सहमति नहीं देखी गई। हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए भारत और ऑस्ट्रेलिया ने एक दूसरे के सैन्‍य अड्डों के इस्‍तेमाल का एक अहम समझौता तो किया है लेकिन चीन पर इसका कोई प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं देता।

एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों से अमेरिका की बड़ी व्यापारिक भागीदारी है। इसे मजबूत करने के लिए ओबामा काल में ट्रांस पैसिफिक सहयोग पर खास ध्यान दिया गया था। इसके अंतर्गत अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया था क्वाड की टोक्यों में हुई बैठक में ओबामा की चीन के खिलाफ रणनीति को ध्यान में रखा गया होता,तब उसमें इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओस और वियतनाम जैसे देश भी आमंत्रित किए जा सकते थे। यह सभी देश चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान हैइनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है कजाकिस्तान,कम्बोडिया और दक्षिण कोरिया की सम्प्रभुता को चुनौती  देते हुए चीन इन्हें ऐतिहासिक रूप से अपना बताता है,नेपाल और भारत के कई इलाकों पर तथा दक्षिण चीनी समुद्र पर भी चीन का इसी प्रकार का दावा हैदक्षिण कोरिया और वियतनाम से चीन का दक्षिण चीन सागर पर आधिपत्य को लेकर विवाद है चीन के दक्षिण में वियतनाम,लाओस तथा म्यांमार है तथा वियतनाम  के साथ उसका युद्ध भी हो चुका है। चीन के पश्चिम में ताजीकिस्तान तथा किर्गिस्तान है वहीं उत्तर पश्चिम में कजाकिस्तान है। ये सभी देश अमेरिका के सामरिक सहयोगी है और चीन से इनका सीमाई विवाद बना हुआ है। चीन के परंपरागत विरोधी यह देश क्वाड का हिस्सा कब बनेगे,यह भी स्पष्ट नहीं है। भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया सप्लाई चेन रेज़ीलियन्स इनिशिएटिव के जरिए चीन पर निर्भरता कम करना चाहते है,लेकिन यह कब होगा इसकी क्वाड कोई योजना प्रस्तुत नहीं कर पाया है। कोरोना से दुनिया भर में तबाही मची है और शुरुआती दौर में ऑस्ट्रेलिया ने इसे लेकर चीन पर निशाना साधा था। टोक्यो की बैठक में कोरोना के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराते हुए संयुक्त राष्ट्र से चीन पर कड़े प्रतिबंधों की मांग की जा सकती थी,लेकिन यह भी नहीं किया गया।



एशिया में प्रभाव कायम करने को और चीन को दबाने के लिए अमेरिका का सख़्त रुख बार बार सामने आता है,लेकिन चीन से जल और थल सीमा विवाद में उलझे देश मुखर होकर चीन की आलोचना से बचते रहे है। चीन की विस्तारवादी नीति से जूझने वाले ताइवान,वियतनाम, म्यांमार,लाओस ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,दक्षिण कोरिया जैसे क्वाड से अभी तक दूर है।



स्पष्ट है की आर्थिक प्रतिबद्धताओं को बनाएँ रखते हुए या महज द्विपक्षीय बातचीत और सम्बन्धों के आधार पर चीन की विस्तारवादी नीति को नहीं रोका जा सकता है। चीन को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए,चीन और हिंद महासागर से लगे सभी राष्ट्रों को क्वाड से जोड़ने तथा आपस में आर्थिक और सुरक्षा संधि करने की जरूरत है।

 

brahmadeep alune

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