रविवार, 20 सितंबर 2020

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति, nepal vampanth

जनसत्ता                                                   

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संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति..........


साम्यवादी सरकारें संस्कृतिवाद को दरकिनार कर वैचारिकतावाद के बाहुपाश में जकड़ने को बैचेन रहती है,चीन और नेपाल की राजनीति में यह बखूबी देखा जा सकता है हिमालय से जुड़े भारत और नेपाल के आपसी संबंधों का मजबूत आधार ऐतिहासिक तौर पर सांस्कृतिक सामीप्य रहा है,जिसे नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री चुनौती देकर लगातार समस्याएं बढ़ा रहे है कम्युनिस्ट  पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन से इतने प्रभावित है कि मंत्रिमंडल की बैठक से लेकर राजनीतिक प्रशिक्षण तक में चीन की भागीदारी होने लगी हैऐसा लगता है कि शी जिनपिंग और ओली,अपने देश की घरेलू राजनीति में साम्यवादी कट्टरता को मजबूत करके सत्ता में बने रहना चाहते है




इन सबके बीच नेपाल और चीन की आंतरिक राजनीति का मिजाज़ अलग अलग है। चीन में जनवादी लोकतंत्र का आक्रामक स्वरूप है जिसे अभिव्यक्ति की आज़ादी से परहेज है,वहीं नेपाल का उदार समाज सत्ता की  निरंकुशता से अपने धार्मिक स्वभाव को बदल दे,यह संभव ही नहीं है। ओली के लिए यह स्थिति संकट बढ़ाने वाली है और इसका व्यापक प्रभाव नेपाल की आंतरिक राजनीति में सामने आ रहा है। ओली ने नेपाल के नये नक्शे में भारत के कुछ इलाकों को दर्शा कर भारत को चुनौती देने की कोशिश की,इस पर उन्हें अपने देश में राजनीतिक समर्थन तो खूब मिला। लेकिन चीन द्वारा कब्जाई नेपाली जमीन पर ओली की ख़ामोशी को लेकर विरोध के स्वर भी मुखरता से सामने आ रहे है।

दरअसल नेपाल की लोकतांत्रिक राजनीति में वामपंथियों का सत्ता में उभार जितनी तेजी से हुआ था,उतनी ही तेजी से वामपंथी सत्ता के खत्म होने की संभावनाएं भी बलवती हो गई हैवर्तमान प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ओली सत्ता में बने रहने के लिए जिस प्रकार भारत विरोध को बढ़ावा और चीन को अपने देश में हावी होने दे रहे थे,उसकी सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं वामपंथ के लिए ही जी का जंजाल बन गई है। उनकी चीनी राजदूत से निकटता के चलते ही विदेश मंत्रालय को विदेशी राजनयिकों के लिए नियम बदलने को मजबूर होना पड़ा। चीन की राजदूत हाओ यांकी की नेपाल के आंतरिक मामलों में बढ़ती दिलचस्पी और संलग्नता से वहां के आम जनमानस और राजनीतिक स्तर पर लगातार कड़ी आलोचना हो रही थी हाओ यांकी ने सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं के अलावा राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी तक से सीधे मुलाकात की थी ओली की सत्‍ता को बचाने के लिए पूरी शिद्दत से जुड़ी चीन की राजदूत हाओ यांकी के खिलाफ नेपाल में आम जनता से लेकर राजनीतिक रूप से विरोध हुआ और इसे नेपाल के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप माना गया। इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने विदेशी राजनयिकों के लिए नियमों में बदलाव करने का फैसला किया है,इसके तहत अब कोई भी विदेशी राजनयिक किसी भी शीर्ष नेता से सीधे मुलाकात नहीं कर सकेगा। नेपाल ने वैदेशिक राजनयिकों के लिए जो नये नियम बनाएं है,उसके व्यापक कूटनीतिक असर हो सकते है। इससे न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नेपाल को अपनी तर्ज पर ढालने का मंसूबा ध्वस्त होने की संभावनाएं बनी है बल्कि इसके साथ नेपाल की आंतरिक राजनीति में  भारी उथल पुथल और उदार जनतांत्रिक पार्टियों के उभरने की संभावनाएं भी मजबूत हो गई है।



कई शताब्दियों तक राजशाही को स्वीकार करने वाले इस देश में 2007 के अंतरिम संविधान बनने के बाद राजतंत्र को खत्म तो कर दिया गया लेकिन जिस उदार लोकतंत्र की परिकल्पना इस देश में की गई थी,वामपंथ के राजनीतिक उभार से उसे भारी धक्का लगा। कम्युनिज्म धर्म को नहीं मानता और बुद्ध की विचारों में सनातन धर्म की समानता निहित है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेता नेपाल को चीन जैसा बना देना चाहते है,जबकि नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास और परम्पराओं में सनातन धर्म और बुद्ध की मान्यताओं  के चलते उसकी भारत से निकटता खत्म हो ही नहीं सकती।  

2018 में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में कम्युनिस्ट पार्टी के कई धड़े आपस में मिल गये थे और इसे नेपाल के भविष्य के लिए बड़ी घटना माना गया था,इसके बाद सत्ता में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल अस्तित्व में आई जिसके नेता और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को बनाया गयाओली को अपनी कम्युनिस्ट पहचान मजबूत करने का इतना उतावलापन था कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए ईश्वर का नाम लेने से इंकार कर दिया,यह बुद्द और विष्णु की भूमि के लिए बेहद अप्रत्याशित घटना थीइसके बाद भारत के प्रधानमन्त्री जब नेपाल गये तो तब पीएम मोदी ने जनकपुर में पूजा की लेकिन ओली ने नहीं की। ओली यहीं नही रुके उन्होंने नेपाल में चीन की तेल,गैस एवं अन्य खनिजों  को खोजने की परियोजनाओं को बढ़ावा दिया,साथ ही सड़क और रेल के जरिए चीन नेपाल को जोड़ने की नीति को भी मजबूती दी। चीन नेपाल के लोगों में गहरी पैठ बनाने के लिए वहां हजारों की संख्या में स्कूल भी खोल रहा है। चीन के साथ संबंधों को मजबूती देने के साथ ओली ने भारत विरोध की नीति को बढ़ावा दिया। उन्होंने नेपाल का अपना नया नक्शा जारी कर भारतीय क्षेत्रों कालापानी,लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को 1816 की सुगौली संधि का आधार बताकर अपने देश का बतायाये क्षेत्र पहले से भारत के नक़्शे में शामिल रहे हैं। वहीं नेपाल की सरकार ने चीन और नेपाल सीमा मुद्दे पर अब तक अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की है। जबकि ओली के सामने चीन से अपनी जमीन वापस लेने की चुनौती है। नेपाल और चीन की तिब्बत क्षेत्र में 1439 किलोमीटर लंबी सीमा एक-दूसरे के साथ लगी हुई हैनेपाल के उत्तरी गोरखा में रुई गांव और उत्तरी संखुवासभा में च्यांग और लुंगडेक गांव कथित तौर पर 1960 के दशक से चीन  ने कब्जा कर  रखा हैहिमालय के क्षेत्रों में प्राकृतिक सीमाएं तेजी से बदलती है और इससे नेपाल पर सीमा का संकट गहरा गया हैमाउंट एवरेस्ट के आसपास के दुर्गम इलाकों पर चीन अपना दावा कर चूका है और सामरिक रूप से वह मजबूती के लिए उन्हें नेपाल को वापस कर दे यह नामुमकिन है



नेपाल के प्रधानमंत्री के भारत,चीन को लेकर अलग अलग दृष्टिकोण और रामजन्मभूमि को लेकर अप्रत्याशित बयान को उनकी अपनी ही पार्टी में विरोध झेलना पड़ रहा हैकभी चीन के समर्थक रहे वामपंथी नेता प्रचंड ने ओली की नीतियों को आत्मघाती बताया,वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के उप-प्रमुख बिष्णु रिजल ने ओली के राम जन्मभूमि नेपाल में ही होने के दावे की कड़ी आलोचना करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण और उकसावे का कृत्य बताया था। माओवादी सभासद के नाम से विख्यात नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.बाबूराम  भट्टराई ने यह कहने से गुरेज नहीं किया कि यह प्रधानमंत्री का असंगत और राष्ट्रहित के विपरीत आचरण है और उन्हें पद से बिदा करना ही होगा। 


 

इस समय ओली बेहद कठिनाई में है एनसीपी के चेयरमैन पुष्प कुमार दहल प्रचंड और प्रधानमंत्री केपी ओली के बीच गहरे मतभेद है 2018  में  कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता का दावा करने वाले प्रचंड स्वयं असहज है और वे ओली को सत्ता से हटाना चाहते है सत्तारूढ़ ओली के पास पूर्ण बहुमत नहीं है,उन्हें  अपने सहयोगियों सीपीएन-यूएमएल और माओवादी सेंटर की सत्ता में बने रहने के लिए जरूरत हैं कम्युनिस्ट पार्टी के विभिन्न घटकों में टकराहट बढ़ी हुई है,प्रचंड भारत से बेहतर सम्बन्ध चाहते है और उन्हें ओली की भारत के खिलाफ नीतियां पसंद नहीं है। नेपाल के वरिष्ठ माओवादी नेता भट्टराई को भी ओली की नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास को चोट पहुँचाने की कोशिशे रास नहीं आ रही है

स्पष्ट है कि यह गतिरोध अभी और आगे बढ़ सकता है,इससे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल के टूटने की संभावनाएं  गहरा गई है। नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा देश में लोकतंत्र और समाजवाद स्थापित करना चाहता है। ओली की विचारधारा नेपाल की धार्मिक प्रतिबद्धताओं को खत्म कर रही है और साम्यवाद  की तानाशाही संस्कृति को थोपना चाहती है,वे लगातार चीन को नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का अवसर दे रहे है

नेपाल के तराई और मैदानी क्षेत्रों में मधेशी बड़ी संख्या में रहते है,ये इलाकें भारत की सीमा के आसपास है। मधेशियों के परिवार सीमा के दोनों और है,ओली उनके हितों को नजरअंदाज करके नेपाल की आंतरिक शांति को लगातार चोट पहुंचा रहे है।  नेपाल के लाखों लोग भारत में रहकर रोजगार के जरिये अपने परिवारों का पालन पोषण करते है। भारत की सेना में गोरखाओं की संख्या बहुतायत में है और उन्हें वहीं सहूलियतें प्राप्त है जो आम भारतीय को है। भारत नेपाल की सीमा खुली है और सदियों से उसमें कभी समस्याएं नहीं आई,लेकिन ओली की नीतियों से दोनों देशों के नागरिक असहज है। चार धाम की यात्रा दोनों देशों के नागरिकों की धार्मिक अनिवार्यता मानी जाती है,नेपाल के व्यापार व्यवसाय पर भी भारत का प्रभाव है।



केपी शर्मा ओली यह समझने में नाकाम रहे है की भारत उनका परम्परागत मित्र है जबकि चीन के लिए तिब्बत सामरिक मज़बूरी है और इसीलिए वह नेपाल को महत्व दे रहा है। नेपाल का आम जनमानस आशंकित है कि चीन नेपाल की आर्थिक सहायता करके उसे अपना उपनिवेश बना सकता है।



इस समय नेपाल की आंतरिक राजनीति में ओली की नीतियों को लेकर बैचेनी बढ़ रही है, नेपाल का उदार और धार्मिक समाज अपने देश में सत्ता की निरंकुशता और सांस्कृतिक बिखराव को रोकना चाहता है आम जनमानस अब अपने वर्तमान प्रधानमंत्री की चीन परस्त और भारत विरोधी नीतियों के दुष्प्रभाव को समझने लगा है तथा ओली की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आ रही है। इससे वामपंथी सरकार की बिदाई और कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन के टूटने के संकेत मिलने लगे है। जाहिर है ओली की बिदाई से नेपाल और भारत के आर्थिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक सम्बन्ध मजबूत होंगे तथा हिमालय क्षेत्र में दोनों देशों की सुरक्षा हितों की रक्षा को लेकर सामने आई चुनौतियां भी कम होने की उम्मीद बढ़ेगी।

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

Very Informative Article sir👌👌 well analyzed👍

Anant Jaiswal ने कहा…

Best blog

brahmadeep alune

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