गुरुवार, 3 सितंबर 2020

इस्लामिक दुनिया में पस्त पड़ा पाकिस्तान,islamik duniya pakistan

 प्रजातंत्र        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने        



बेनजीर भुट्टो बताया करती थी कि जब उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे और जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से वे मिलते थे,उस समय बेनजीर स्वयं जाकर अपने पिता से किसी प्रतिद्वंदी राष्ट्राध्यक्ष का फोन आने की बात कहती थी जुल्फिकार अली भुट्टो बेनजीर से यह कहा करते थे की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कभी किसी को पता ही नहीं चलना चाहिए की हम किसके साथ है और यह असमंजस हमेशा बना रहना चाहिए

दरअसल पाकिस्तान के नीति निर्माताओं ने दुनिया से अपने रिश्तों को आमतौर पर सामरिक दृष्टि से देखा और बदलते दौर के साथ यह नीति स्वयं उनके देश के लिए ही आत्मघाती बन गई। पाकिस्तान भारत विरोध के जूनून में यह समझने में नाकाम रहा कि आधुनिक समय में अंतर्राष्ट्रीय जगत में सैनिक शक्ति के स्थान पर आर्थिक हित महत्वपूर्ण हो गए है और राष्ट्रों के बीच परस्पर सहयोग और पारस्परिक हितों की भावना को प्रमुखता प्राप्त हैअत: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप भी परिवर्तित हो गया है



कूटनीति की दुनिया में पल प्रतिपल बदलती परिस्थितियों  के बीच ईरान स्थित चाबहार बन्दरगाह को भारत के प्रभाव से मुक्त कराकर चीन के हाथों में जाने के घटनाक्रम में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका रही और सामरिक दृष्टि से इसे पाकिस्तान की विजय के तौर पर बताया गया भारत के प्रमुख सहयोगी माने जाने वाले ईरान का इस तरह से भारत से दूर होना निराशाजनक था लेकिन इससे पाकिस्तान की विदेश नीति बहुत उत्साहित हुईइसके बाद पाकिस्तान के विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर पर सहयोग न करने को लेकर अपने परम्परागत मित्र सऊदी अरब की आलोचना कर दी

इस्लामिक दुनिया में सऊदी अरब और ईरान का विवाद बेहद पुराना है और मध्य पूर्व की आग इनकी प्रतिद्वंदिता से ही भड़कती रही है पाकिस्तान को कुछ समय पहले 3 अरब डॉलर की मदद देकर उसे कंगाली से उबारने को प्रयासरत सऊदी अरब को पाकिस्तान की चुनौती देने वाली विदेश नीति में ईरान से दोस्ती की छाया दिखाई देना स्वाभाविक थी और इसका जवाब पाकिस्तान को मिलना ही था सऊदी अरब ने न केवल पाकिस्तान की दी जाने वाली मदद को बंद करने का ऐलान कर दिया बल्कि बकाया कर्ज जल्दी देने की ताकीद भी दे दी इस समूचे घटनाक्रम से घबराएं पाकिस्तान ने एक बार फौज की और देखा तथा अपने सेना प्रमुख जनरल बाजवा को स्थितियां संभालने सऊदी अरब भेज दिया



यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि शिया ईरान और सुन्नी सऊदी अरब से समान सम्बन्ध रखने के लिए विदेश नीति में पारदर्शिता और तटस्थता होना चाहिए और भारत ने इसे बखूबी अंजाम दिया है महाशक्तियों के युद्द क्षेत्र से आमतौर पर दूर रहकर भारत ने पश्चिम एशिया में शांति की संभावनाओं को सदा टटोला और इस्लामिक दुनिया का विश्वास उस पर बना रहा वहीं पाकिस्तान ने इस्लाम की सुरक्षा के नाम पर अपने को इस्लामिक महाशक्ति के रूप में प्रचारित करने की नीति पर लगातार काम किया और इस्लामिक आर्गेनाइजेशन  के मंच का भारत विरोध के लिए उपयोग करने के अवसर भी ढूंढे

इस्लामी सहयोग संगठन 57 देशों का प्रभावशाली समूह हैसंयुक्त राष्ट्र के बाद यह दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में शुमार किया जाता है1969 में मोरक्को से इस्लामिक कांफ्रेंस आर्गेनाइजेशन की शुरुआत हुई और ओआईसी सदस्य देशों में रहनेवाले लोगों की कुल आबादी तकरीबन 1.9 खरब है 1972 में इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी ने चार्टर के जरिए बाकायदा अपने उद्देश्य बताते हुए साफ किया था की सदस्य देशों के मध्य आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्लामी एकजुटता को प्रोत्साहन दिया जाएगा और किसी भी रूप में विद्यमान उपनिवेशवाद की समाप्ति तथा जातीय अलगाव और भेदभाव की समाप्ति के लिये प्रयास किये जायेगेइसके साथ ही यह संकल्प भी किया गया की विश्व के सभी मुसलमानों की गरिमा,स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अधिकारों की रक्षा करने के लिये,उनके संघर्षों को मजबूती प्रदान करने के निरंतर प्रयास किये जाएंगे ओआईसी के सभी सदस्य देशों और अन्य देशों के मध्य सहयोग और तालमेल को प्रोत्साहित करने के लिये एक उपयुक्त वातावरण तैयार करना इस संगठन की प्राथमिकताओं में घोषित किया गया थाआतंकवाद के खात्मे के नाम पर ओआईसी ने पाकिस्तान को केंद्र में रखकर अपनी अलग सेना भी बनाई और इसकी अगुवाई पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ के हाथों में दी। यहां पर यह भी जानना जरूरी है कि ओआईसी को सुन्नी मुस्लिम देशों का संगठन समझा जाता है सऊदी अरब अपने प्रतिद्वंदी शिया राष्ट्र ईरान  के परमाणु शक्ति संपन्न  होने से चिंतित है और वह इस्लामी सैन्य गठबंधन को ईरान के खिलाफ उपयोग करना चाहता है



वहीं दूसरी और पाकिस्तान के नीति के केंद्र में भारत विरोध हैयुद्द कला में एक शब्द प्रचलित है काला प्रचार, जिसका उद्देश्य अफवाहों और गलत सूचनाओं से माहौल उत्पन्न किया जाता है। पाकिस्तान पिछले कई दशकों से कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहा है और उसने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को उछालने के लिए 1994 में एक कॉन्टैक्ट ग्रुप बनाया था,जिसमें पाकिस्तान के अलावा अज़रबैजान,नाइजर, सऊदी अरब और तुर्की शामिल है पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर को लेकर सऊदी अरब उसका साथ दे जबकि सऊदी अरब ने कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताकर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है पाकिस्तान इस बात को लेकर सऊदी अरब से चिढ़ा हुआ है वही हकीकत यह भी है कि सऊदी अरब को पाकिस्तान की इस्लामपरस्ती पर भरोसा ही नहीं है पाकिस्तान के पड़ोसी और विश्वस्त मित्र चीन के शिन्चियांग प्रान्त में तकरीबन 1 करोड़ उईगर मुसलमान रहते है,जिन पर रोजे रखने,महिलाओं के बुर्खा पहनने,खुले में नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है। यहाँ तक की उन्हें रोज मेंटल डिटेक्टर से चेक किया जाता है मुस्लिम बाहुल्य वाले इस प्रान्त को वहां बसने वाले मुस्लिम बाशिंदों के लिए  खुली जेल  तक कहा जाने लगा है। 



मुसलमानों के लिए अमानवीयता की हदें पार करने वाले चीन पर अमेरिका जैसा देश जहां मुखर होकर बोलता रहा है वहीं पाकिस्तान के हुक्मरान खामोश रहे है। जबकि भारत को लेकर पाकिस्तान का दावा इसलिए भी गलत नजर आता है क्योंकि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान रहते है और यहां रहने वाले मुसलमानों को समान अधिकार प्राप्त है और कश्मीर में भी ऐसा ही है। जबकि पाकिस्तान में ही मुसलमानों के विभिन्न फिरकों को लेकर अलग अलग कानून है। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की जेनेवा में हुई बैठक में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अहमदिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान की हुकूमत पर अत्याचार का आरोप  लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई थी पाकिस्तान में इस समुदाय की आबादी करीब 50 लाख है और वे मतदान के अधिकार से वंचित है। यूरोप का एकमात्र इस्लामिक देश तुर्की सऊदी अरब की बादशाहत को चुनौती देकर इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करना चाहता है और उससे भी पाकिस्तान की बड़ी मित्रता है। तुर्की मध्य पूर्व में रहने वाले कुर्द मुसलमानों पर रोज हमले करता है और इन कुर्द मुस्लिमों की सुरक्षा रूस की सेना कर रही है। इस मामलें में भी पाकिस्तान ने तुर्की को कभी नसीहत देने की जरूरत नहीं समझी। मध्यपूर्व में गृहयुद्द से जूझने वाले मुसलमानों के लिए यूरोप के देशों ने दरवाजें खोले लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें पनाह देने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।



जाहिर है सऊदी अरब समेत इस्लामिक दुनिया यह समझ गई है कि  पाकिस्तान इस्लामिक  देशों के समूह ओआईसी का इस्तेमाल अपनी बेहतरी के लिए और अपने अनुसार करना चाहता है,जिसका मतलब इस्लामिक दुनिया की बेहतरी से कतई नहीं है पाकिस्तान की बदनीयती के कारण ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन का भरोसा उससे उठता जा रहा है और वह तमाम प्रयासों के बाद भी कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ बहुमत से कोई प्रस्ताव पारित नहीं करवा सका है,पाकिस्तान के लिए यह स्थिति असहनीय हो गई है

 

 

कोई टिप्पणी नहीं:

brahmadeep alune

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति, nepal vampanth

जनसत्ता                                                     https://epaper.jansatta.com/c/55101595 संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति.......