मंगलवार, 1 सितंबर 2020

चीन के खिलाफ आक्रामक नीति की जरूरत,india china war

 राष्ट्रीय सहारा                                                   


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18 वी सदी के प्रख्यात सैन्य विचारक क्लाजविट्ज ने युद्द कर्मों की व्याख्या करते हुए कहा है कि युद्द न तो विज्ञान का कार्य है,न ही गणित का कार्य है,वरन युद्द तो हिंसा का कार्य है। चीन आधुनिक दौर का युद्द कला का वह माहिर खिलाडी है जो युदोंमाद की मनोवैज्ञानिक हिंसा की बदौलत दुनिया को ब्लैकमेल करता रहा है। भारत वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर चीन की युदोंमाद की कार्रवाइयों का लगातार सामना कर रहा है और इससे दोनों देशों के बीच अविश्वास बढ़ता जा रहा है।



दरअसल पूर्वी लद्दाख के इलाकें में चीन की सेना की घुसपैठ से वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर भारत और चीन के बीच कूटनीतिक स्तर पर शांति बहाली की कोशिशों को लेकर असमंजस बढ़ गया है। इस साल जून में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद सैन्य और राजनयिक स्तर पर इस मामलें को सुलझाने की बात लगातार की जा रही है लेकिन हालिया घटनाक्रम से ऐसा लगता है की चीन से सीमा विवाद सुलझाने के लिए किसी सुदृढ़ रणनीति पर काम करने की जरूरत है। भारत और चीन के बीच साढ़े तीन हजार किलोमीटर से ज्यादा वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर शांति की स्थापना के लिए राजनयिक और सैन्य स्तर पर बातचीत के कई दौर हो चुके हैं,जिनमे लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की वार्ता भी शामिल है लेकिन इसके ठोस नतीजे सामने नहीं आये है 

ऐसा लगता है कि चीन की भारत के साथ सीमा विवाद सुलझाने की मंशा है ही नहीं और वह बातचीत के साथ दबाव की दोहरी रणनीति पर काम कर रहा है। चीन कि बातचीत की पेशकश उसकी पारम्परिक नीति का ही हिस्सा है जिसके अंतर्गत प्रतिद्वंदी पर सैन्य बढ़त हासिल करके मनौवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली जाये और इसके बाद अपने हितों के अनुसार संतुलन साधने के लिए मजबूर कर दिया जाये। इस नीति को वह पूर्व में भी भारत के खिलाफ आजमाता रहा है। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का प्रश्न है वह समय के साथ जटिल होता जा रहा है आधुनिक  चीन उन नक्शों पर अपनी सीमाओं को सुलझाने को प्रतिबद्ध नजर आता है,जिन नक्शों पर इतिहास ने उन्हें छोड़ दिया थाइस काम में आधी शताब्दी से अधिक समय लगा21 वीं सदी के पहले दशक के अंत तक चीन ने अपने 12 राष्ट्रीय पड़ोसियों में से 10 के साथ सीमा समझौते पर परस्पर सहमति से बातचीत कर समाधान निकाल लिया,अपवाद थे भारत और भूटान

पिछलें कुछ सालों में भारत ने पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में विकास के लिए कई कार्य किये है और चीन के लिए यह असहनीय है।  चीन से सीमा विवाद के चलते और पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियों से जूझते भारत ने अब अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत किया है और रणनीतिक परियोजना के जरिए ब्रह्मपुत्र नदी पर बोगीबिल पुल का निर्माण पूर्ण कर लिया है,जो  ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिण तट को अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती धेमाजी ज़िले में सिलापथार के साथ जोड़ेगा। सुरक्षा के लिहाज से यह अति महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय सेना इस पुल के जरिए कम समय में अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती हिस्सों में पहुंचने सकेगीअसम के डिब्रूगढ़ शहर के पास बोगीबिल में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने इस पुल की लंबाई तक़रीबन 4.94 किलोमीटर हैपुल के नीचे की तरफ़ दो रेल लाइन बिछाई गई हैं और उसके ऊपर तीन लेन की सड़क बनाई गई है,जिस पर भारी सैन्य टैंक आसानी से गुजर सकेंगे। इस प्रकार यह पुल चीन से निपटने के लिए कारगर काम कर सकेगा।



पूर्वोत्तर में भारत के विकास कार्यों को लेकर चीन दबाव में है,लेकिन भारत के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि अन्य तरीकों से भी चीन पर दबाव डालने की नीति पर काम करने की जरूरत है। चीनी की भारत विरोधी नीति का  यह आलम है की वीजा विवाद ,कश्मीर,पाक प्रायोजित आतंकवाद,सीमा विवाद और एनएसजी में भारत के प्रवेश पर रोड़े अटकने के बाद भी वह भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और विवाद छोड़ो,व्यापार करो की तर्ज पर उसने भारत के बाजारों पर कब्ज़ा जमा लिया है। यहीं नहीं सुरक्षा के लिहाज से भी वह पाकिस्तान,श्रीलंका,बर्मा,नेपाल और मालद्वीप में मदद के जाल से भारत को घेर चूका है



इन सबके देखने में यह आया है कि भारत कि चीन को लेकर नीति बेहद तटस्थ रही है और यह चीन के लिए मुफ़ीद नजर आती है। मसलन वुहान लेब से निकले कोरोना को लेकर यूरोपीय देशों ने चीन कि आलोचना करने से गुरेज नहीं किया वहीं भारत ने इस मामलें में मौन साधे रखा जबकि भारत की मुखरता से चीन बेकफूट पर आ सकता था। ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद चीन और अमेरिका के बीच ट्रैड वार में भी भारत ने चीन से अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया,इसे विदेश नीति के तौर पर रणनीतिक चूक ही कहा जायेगा कि जब जब चीन पर वैश्विक दबाव के अवसर आये,भारत की ख़ामोशी और नीतियों से चीन को ही फायदा  मिला।


पिछले कुछ समय से चीन के विरोध को लेकर दुनिया भर में जो स्थिति बनी है उसका नेतृत्व करने का भारत ने कभी साहस नहीं दिखाया। चीन के भरोसेमंद साथी और भारत के पड़ोसी म्यांमार पर अमेरिकी असर बढ़ा है। सिंगापुर,फिलिपिन्स,इंडोनेशिया,थाईलैंड,ब्रुनेई,जापान,आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की अमेरिका से बढ़ती सैन्य निकटता से चीन दबाव महसूस करता है। भारत ने इन राष्ट्रों से रणनीतिक साझेदारी के साथ ही आर्थिक संबंधों को मजबूत करने पर प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए जिससे चीन को दबाव में लाने के साथ ही हमारी उस पर निर्भरता कम की जा सके। इस समय भारत आर्थिक हितों के लिए जापान एवं अन्‍य दक्षिण एशियाई रा‍ष्‍ट्रों की ओर देखे इससे चीन पर न केवल हमारी निर्भरता खत्म होगी बल्कि चीन से निपटने के लिए यह बेहतर जवाब भी हो सकता है।



जबकि चीन पर दबाव बनाएं रखने के लिए ताईवान से राजनीतिक संबंध स्थापित करने कि घोषणा कि जा सकती थी, तिब्बत को लेकर भारत की नीति में परिवर्तन किया जा सकता था,लेकिन भारतीय नीति में ऐसी आक्रामकता का अभाव रहा। इस समय हांगकांग में लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचला जा रहा है,अमेरिका,ब्रिटेन जैसे देश चीन का विरोध कर रहे है जबकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत से हांगकांग के लोगों के समर्थन में ऐसा कोई आक्रामक बयान सामने नहीं आया है

गोलवन में चीन कि दादागिरी के बाद भारत को सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाकर चीन को घेरने का प्रयास करना था,जो भारत ने नहीं किया,जबकि सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्य अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस और रूस भारत के इस रुख पर उसे समर्थन दे सकते है तिब्बत को लेकर चीन बैकफुट पर रहता है और भारत ने तुरंत तिब्बत के स्वायत्ता आंदोलन को राजनीतिक समर्थन देने की घोषणा करना चाहिए चीन से लगती सीमा पर सैन्य जमावड़े पर भारत ने राजनयिक विरोध जताया होता तो हिंसक झड़प की संभावना नहीं बनती यहाँ तक की गोलवन घाटी में 20 सैनिकों के मारे जाने के बाद देश से चीनी राजदूत को निकालने का निर्णय बेहद आक्रामक और प्रभावी हो सकता था



भारत को यह समझने की जरूरत है कि चीन की आक्रामकता का सामना करते हुए उसके साथ बातचीत  की मेज पर बैठने से साम्यवादी ताकत मजबूत ही होती है भारत की नीतियों में चीन को लेकर कूटनीतिक स्तर पर आक्रामकता,सीमा पर सैन्य दबाव और अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन साधे जाने की आवश्यकता है। भारत को चीन को जवाब देने के लिए अलग ताइवानी वीजा और हांगकांग को भी राजनयिक मान्यता की पेशकश कर दुनिया के सामने इन मुद्दों को लाना चाहिए साथ ही तिब्बत पर तुरंत अपना रुख बदलते हुए अलग तिब्बत का समर्थन करना चाहिए। जाहिर है चीन से बातचीत की मेज पर जब तक उदार भारत होगा,समस्या बढ़ती जाएगी।

 

 

 

 

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