गुरुवार, 24 सितंबर 2020

कूटनीतिक आक्रामकता से दूर भारत,kutnitik bharat

 

    सुबह सवेरे       


कूटनीतिज्ञों का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा महत्व रहा है कुशल तथा सक्रिय कूटनीति,एक देश की शक्ति को किस प्रकार घटा-बढ़ा सकती है इसका स्पष्ट उदाहरण संयुक्तराष्ट्र की आमसभा की बैठक में देखने को मिला तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने इसराइल पर फ़लस्तीनियों के साथ अत्याचार का आरोप लगाया तो अर्दोआन के उस भाषण के बीच संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के राजदूत गिलाड इर्दान बाहर चले गए  उन्होंने अर्दोआन के भाषण का न केवल बहिष्कार किया  बल्कि उन पर यहूदी विरोधी होने का आरोप लगाते हुए उन्हें झूठा भी बताया इसी भाषण में तुर्की के राष्ट्रपति ने कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के काले प्रचार को बढ़ावा देते हुए भारत की कड़ी आलोचना भी की लेकिन इसका जवाब भारत के द्वारा उच्च राजनयिक स्तर पर न देते हुए संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति ने दिया,उन्होंने इसे भारत के आंतरिक मामले में तुर्की का हस्तक्षेप बताया और भारत का विरोध यही पर समाप्त हो गया इसके पहले पिछले साल भी संयुक्तराष्ट्र की महासभा में अर्दोआन ने भारत की कश्मीर को लेकर आलोचना की थी तब भी इसका जवाब भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने दिया था,उन्होंने तुर्की के रवैया पर खेद जताते हुए भारत के विरोध को यही तक सीमित रखा था

दरअसल कूटनीति का लक्ष्य राष्ट्रीय हितों का अन्तर्राष्ट्रीय हितों से समायोजन है। पाकिस्तान से दोस्ती के कारण तुर्की के लगातार भारत विरोधी रुख को देखते हुए रेचेप तैय्यप अर्दोआन का भारत की आलोचना करना बिल्कुल भी अप्रत्याशित नहीं था लेकिन यह भी देखा गया है कि भारतीय कूटनीति लगातार यह साबित करने में नाकामयाब हो रही है कि वह वैश्विक मंचों पर भारत विरोध को अपने सामर्थ्य से रोक सकती हैइसके साथ ही यह लगातार महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक मंचों पर यदि कोई राष्ट्र भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है तो उसकी उच्च स्तर पर कूटनीतिक विरोध से गुरेज भी किया जाता है

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र,सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र और मुस्लिम जनसंख्या के लिहाज से दुनिया में अहम स्थान रखने वाले भारत की ग्रीस,फ़्रांस और सऊदी अरब जैसे तुर्की के प्रतिद्वंदी देशों से गहरी मित्रता रही है। मध्य पूर्व की अशांति में तुर्की का भी योगदान रहा है और वह हजारों कुर्द मुसलमानों का नरसंहार करता रहा है। पश्चिम एशिया की मुस्लिम लड़ाकू जनजाति कुर्द अपनी बहादुरी और दिलेरी के लिए दुनिया भर में विख्यात है। इसका प्रभाव सीरिया के उत्तरी इलाकों के साथ ही तुर्की,इराक और ईरान तक है। तुर्की से कुर्दों का विरोध पारंपरिक माना जाता है और कुर्द तुर्की को अपने दुश्मन की तरह देखते है। तुर्की के दक्षिण-पूर्व,सीरिया के उत्तर-पूर्व और ईरान  तथा इराक के पश्चिमी इलाकों में लगभग डेढ़ करोड़ कुर्द लोग रहते हैं। ये तुर्की में अपनी स्वायत्तता के लिए लड़ रहे हैं तो सीरिया और इराक़ में अपनी अहम भूमिका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये इस्लामिक स्टेट का भी प्रतिरोध कर रहे हैं। कुर्दों के प्रति अमेरिका की उदारता और असद के प्रति रूस प्रेम के चलते मध्य पूर्व में कुर्दिस्तान की बरसों पुरानी मांग के पूरी होने की परिस्थितियाँ मजबूत दिखाई पड़ रही है,यह स्थिति तुर्की के लिए असहनीय है।

भारत संयुक्तराष्ट्र की आमसभा में अलग कुर्द देश का समर्थन करके एक अलग देश की मांग को वैश्विक समर्थन दे सकता था,जिससे तुर्क समेत पूरी दुनिया में यह सन्देश जा सकता था की भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए अपनी परम्परागत नीति को त्यागकर आक्रामक निर्णय भी ले सकता हैकूटनीति वह कला है, जो राष्ट्रीय शक्ति के विभिन्न तत्वों का सामूहिक दृष्टि से इस प्रकार प्रयोग करती है कि तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों में राष्ट्रीय हित को अधिकाधिक लाभ हो। भारत ने तुर्की पर दबाव बनाने के लिए ऐसी कोई रणनीति नहीं अपनाई,यदि भारत ऐसा करता तो निश्चित तौर पर रेचेप तैय्यप अर्दोआन अपने देश में ही आलोचना का कारण बन जाते है और उन्हें विपक्षी दलों द्वारा यह कहकर निशाना बनाने की संभावना बनती की वे दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करके तुर्की की कुर्द समस्या को विश्व में प्रचारित करवा रहे है

यदि चीन और भारत के तनाव की बात करे तो संयुक्तराष्ट्र में चीन की कोरोना और साम्राज्यवादी नीति की आलोचना कर यह संदेश दिया जा सकता था की ड्रैगन का वैश्विक मंच पर विरोध करने का साहस भारत में है और इससे भारत को वैश्विक शक्ति बनने में मदद मिलतीलेकिन भारत ने यहां पर भी बेहद नपे तुले शब्दों का प्रयोग कियावहीं अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए चीन को ज़िम्मेदार ठहराते हुए चीन को इस महामारी के लिए ज़िम्मेदार ठहराये जाने की मांग कीअमरीकी राष्ट्रपति ने कहा,हमने एक अदृश्य दुश्मन,चाइना वायरस के ख़िलाफ़ एक बड़ी लड़ाई छेड़ रखी है,जिसने 188 देशों में अनगिनत लोगों की ज़िंदगी छीन ली है हमें उस देश को जवाबदेह ठहराना चाहिए,जिसने इस प्लेग को दुनियाभर में फैलाया- और वो है चीन।”

कश्मीर को लेकर पाकिस्तान के साथ ही चीन का रुख भारत के लिए बेहद असहज रहा है लेकिन वैश्विक मंचों पर भारत के वन चायना पालिसी को चुनौती देने से गुरेज ही किया हैभारत की सीमा से लगते शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों पर चीन की सरकार के द्वारा अत्याचार के खिलाफ दुनिया भर में उठती रही हैचीन भारत की संप्रभुता की अक्सर चुनौती देता रहा है लेकिन भारत ने चीन द्वारा आयातित कोरोना समेत वीगर मुसलमानों को लेकर कोई कभी बात नहीं की वहीं ट्रम्प कोरोना,व्यापार,तकनीक,हांगकांग और शिनजियांग में मुस्लिमों की कथित प्रताड़ना को लेकर चीन की सार्वजनिक आलोचना कर चुके हैं

महान कूटनीतिज्ञ मॉरगेन्थाऊ ने कहा है की एक कुशल राजनय जो शान्ति संरक्षण के लिए तत्पर है उसका अन्तिम कार्य है कि वह अपने ध्येयों की प्राप्ति के लिए उपयुक्त साधनों को चुने। भारत के द्वारा संयुक्तराष्ट्र की आमसभा में तुर्की की कुर्दों के खिलाफ नरसंहार की नीति और शिनजियांग प्रांत में वीगर मुसलमानों के अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करके यह संदेश तो दिया ही जा सकता था की भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने वाले देशों के प्रति भारत का रुख दोस्ताना नहीं हो सकता।

 

रविवार, 20 सितंबर 2020

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति, nepal vampanth

जनसत्ता                                                   

https://epaper.jansatta.com/c/55101595

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति..........


साम्यवादी सरकारें संस्कृतिवाद को दरकिनार कर वैचारिकतावाद के बाहुपाश में जकड़ने को बैचेन रहती है,चीन और नेपाल की राजनीति में यह बखूबी देखा जा सकता है हिमालय से जुड़े भारत और नेपाल के आपसी संबंधों का मजबूत आधार ऐतिहासिक तौर पर सांस्कृतिक सामीप्य रहा है,जिसे नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री चुनौती देकर लगातार समस्याएं बढ़ा रहे है कम्युनिस्ट  पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली चीन से इतने प्रभावित है कि मंत्रिमंडल की बैठक से लेकर राजनीतिक प्रशिक्षण तक में चीन की भागीदारी होने लगी हैऐसा लगता है कि शी जिनपिंग और ओली,अपने देश की घरेलू राजनीति में साम्यवादी कट्टरता को मजबूत करके सत्ता में बने रहना चाहते है




इन सबके बीच नेपाल और चीन की आंतरिक राजनीति का मिजाज़ अलग अलग है। चीन में जनवादी लोकतंत्र का आक्रामक स्वरूप है जिसे अभिव्यक्ति की आज़ादी से परहेज है,वहीं नेपाल का उदार समाज सत्ता की  निरंकुशता से अपने धार्मिक स्वभाव को बदल दे,यह संभव ही नहीं है। ओली के लिए यह स्थिति संकट बढ़ाने वाली है और इसका व्यापक प्रभाव नेपाल की आंतरिक राजनीति में सामने आ रहा है। ओली ने नेपाल के नये नक्शे में भारत के कुछ इलाकों को दर्शा कर भारत को चुनौती देने की कोशिश की,इस पर उन्हें अपने देश में राजनीतिक समर्थन तो खूब मिला। लेकिन चीन द्वारा कब्जाई नेपाली जमीन पर ओली की ख़ामोशी को लेकर विरोध के स्वर भी मुखरता से सामने आ रहे है।

दरअसल नेपाल की लोकतांत्रिक राजनीति में वामपंथियों का सत्ता में उभार जितनी तेजी से हुआ था,उतनी ही तेजी से वामपंथी सत्ता के खत्म होने की संभावनाएं भी बलवती हो गई हैवर्तमान प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ओली सत्ता में बने रहने के लिए जिस प्रकार भारत विरोध को बढ़ावा और चीन को अपने देश में हावी होने दे रहे थे,उसकी सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं वामपंथ के लिए ही जी का जंजाल बन गई है। उनकी चीनी राजदूत से निकटता के चलते ही विदेश मंत्रालय को विदेशी राजनयिकों के लिए नियम बदलने को मजबूर होना पड़ा। चीन की राजदूत हाओ यांकी की नेपाल के आंतरिक मामलों में बढ़ती दिलचस्पी और संलग्नता से वहां के आम जनमानस और राजनीतिक स्तर पर लगातार कड़ी आलोचना हो रही थी हाओ यांकी ने सत्तारूढ़ नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं के अलावा राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी तक से सीधे मुलाकात की थी ओली की सत्‍ता को बचाने के लिए पूरी शिद्दत से जुड़ी चीन की राजदूत हाओ यांकी के खिलाफ नेपाल में आम जनता से लेकर राजनीतिक रूप से विरोध हुआ और इसे नेपाल के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप माना गया। इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने विदेशी राजनयिकों के लिए नियमों में बदलाव करने का फैसला किया है,इसके तहत अब कोई भी विदेशी राजनयिक किसी भी शीर्ष नेता से सीधे मुलाकात नहीं कर सकेगा। नेपाल ने वैदेशिक राजनयिकों के लिए जो नये नियम बनाएं है,उसके व्यापक कूटनीतिक असर हो सकते है। इससे न केवल चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नेपाल को अपनी तर्ज पर ढालने का मंसूबा ध्वस्त होने की संभावनाएं बनी है बल्कि इसके साथ नेपाल की आंतरिक राजनीति में  भारी उथल पुथल और उदार जनतांत्रिक पार्टियों के उभरने की संभावनाएं भी मजबूत हो गई है।



कई शताब्दियों तक राजशाही को स्वीकार करने वाले इस देश में 2007 के अंतरिम संविधान बनने के बाद राजतंत्र को खत्म तो कर दिया गया लेकिन जिस उदार लोकतंत्र की परिकल्पना इस देश में की गई थी,वामपंथ के राजनीतिक उभार से उसे भारी धक्का लगा। कम्युनिज्म धर्म को नहीं मानता और बुद्ध की विचारों में सनातन धर्म की समानता निहित है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ नेता नेपाल को चीन जैसा बना देना चाहते है,जबकि नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास और परम्पराओं में सनातन धर्म और बुद्ध की मान्यताओं  के चलते उसकी भारत से निकटता खत्म हो ही नहीं सकती।  

2018 में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में कम्युनिस्ट पार्टी के कई धड़े आपस में मिल गये थे और इसे नेपाल के भविष्य के लिए बड़ी घटना माना गया था,इसके बाद सत्ता में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल अस्तित्व में आई जिसके नेता और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को बनाया गयाओली को अपनी कम्युनिस्ट पहचान मजबूत करने का इतना उतावलापन था कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए ईश्वर का नाम लेने से इंकार कर दिया,यह बुद्द और विष्णु की भूमि के लिए बेहद अप्रत्याशित घटना थीइसके बाद भारत के प्रधानमन्त्री जब नेपाल गये तो तब पीएम मोदी ने जनकपुर में पूजा की लेकिन ओली ने नहीं की। ओली यहीं नही रुके उन्होंने नेपाल में चीन की तेल,गैस एवं अन्य खनिजों  को खोजने की परियोजनाओं को बढ़ावा दिया,साथ ही सड़क और रेल के जरिए चीन नेपाल को जोड़ने की नीति को भी मजबूती दी। चीन नेपाल के लोगों में गहरी पैठ बनाने के लिए वहां हजारों की संख्या में स्कूल भी खोल रहा है। चीन के साथ संबंधों को मजबूती देने के साथ ओली ने भारत विरोध की नीति को बढ़ावा दिया। उन्होंने नेपाल का अपना नया नक्शा जारी कर भारतीय क्षेत्रों कालापानी,लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को 1816 की सुगौली संधि का आधार बताकर अपने देश का बतायाये क्षेत्र पहले से भारत के नक़्शे में शामिल रहे हैं। वहीं नेपाल की सरकार ने चीन और नेपाल सीमा मुद्दे पर अब तक अपनी आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की है। जबकि ओली के सामने चीन से अपनी जमीन वापस लेने की चुनौती है। नेपाल और चीन की तिब्बत क्षेत्र में 1439 किलोमीटर लंबी सीमा एक-दूसरे के साथ लगी हुई हैनेपाल के उत्तरी गोरखा में रुई गांव और उत्तरी संखुवासभा में च्यांग और लुंगडेक गांव कथित तौर पर 1960 के दशक से चीन  ने कब्जा कर  रखा हैहिमालय के क्षेत्रों में प्राकृतिक सीमाएं तेजी से बदलती है और इससे नेपाल पर सीमा का संकट गहरा गया हैमाउंट एवरेस्ट के आसपास के दुर्गम इलाकों पर चीन अपना दावा कर चूका है और सामरिक रूप से वह मजबूती के लिए उन्हें नेपाल को वापस कर दे यह नामुमकिन है



नेपाल के प्रधानमंत्री के भारत,चीन को लेकर अलग अलग दृष्टिकोण और रामजन्मभूमि को लेकर अप्रत्याशित बयान को उनकी अपनी ही पार्टी में विरोध झेलना पड़ रहा हैकभी चीन के समर्थक रहे वामपंथी नेता प्रचंड ने ओली की नीतियों को आत्मघाती बताया,वहीं नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के उप-प्रमुख बिष्णु रिजल ने ओली के राम जन्मभूमि नेपाल में ही होने के दावे की कड़ी आलोचना करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण और उकसावे का कृत्य बताया था। माओवादी सभासद के नाम से विख्यात नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.बाबूराम  भट्टराई ने यह कहने से गुरेज नहीं किया कि यह प्रधानमंत्री का असंगत और राष्ट्रहित के विपरीत आचरण है और उन्हें पद से बिदा करना ही होगा। 


 

इस समय ओली बेहद कठिनाई में है एनसीपी के चेयरमैन पुष्प कुमार दहल प्रचंड और प्रधानमंत्री केपी ओली के बीच गहरे मतभेद है 2018  में  कम्युनिस्ट पार्टियों की एकता का दावा करने वाले प्रचंड स्वयं असहज है और वे ओली को सत्ता से हटाना चाहते है सत्तारूढ़ ओली के पास पूर्ण बहुमत नहीं है,उन्हें  अपने सहयोगियों सीपीएन-यूएमएल और माओवादी सेंटर की सत्ता में बने रहने के लिए जरूरत हैं कम्युनिस्ट पार्टी के विभिन्न घटकों में टकराहट बढ़ी हुई है,प्रचंड भारत से बेहतर सम्बन्ध चाहते है और उन्हें ओली की भारत के खिलाफ नीतियां पसंद नहीं है। नेपाल के वरिष्ठ माओवादी नेता भट्टराई को भी ओली की नेपाल के सांस्कृतिक इतिहास को चोट पहुँचाने की कोशिशे रास नहीं आ रही है

स्पष्ट है कि यह गतिरोध अभी और आगे बढ़ सकता है,इससे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल के टूटने की संभावनाएं  गहरा गई है। नेपाल के कम्युनिस्ट पार्टी का एक धड़ा देश में लोकतंत्र और समाजवाद स्थापित करना चाहता है। ओली की विचारधारा नेपाल की धार्मिक प्रतिबद्धताओं को खत्म कर रही है और साम्यवाद  की तानाशाही संस्कृति को थोपना चाहती है,वे लगातार चीन को नेपाल के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का अवसर दे रहे है

नेपाल के तराई और मैदानी क्षेत्रों में मधेशी बड़ी संख्या में रहते है,ये इलाकें भारत की सीमा के आसपास है। मधेशियों के परिवार सीमा के दोनों और है,ओली उनके हितों को नजरअंदाज करके नेपाल की आंतरिक शांति को लगातार चोट पहुंचा रहे है।  नेपाल के लाखों लोग भारत में रहकर रोजगार के जरिये अपने परिवारों का पालन पोषण करते है। भारत की सेना में गोरखाओं की संख्या बहुतायत में है और उन्हें वहीं सहूलियतें प्राप्त है जो आम भारतीय को है। भारत नेपाल की सीमा खुली है और सदियों से उसमें कभी समस्याएं नहीं आई,लेकिन ओली की नीतियों से दोनों देशों के नागरिक असहज है। चार धाम की यात्रा दोनों देशों के नागरिकों की धार्मिक अनिवार्यता मानी जाती है,नेपाल के व्यापार व्यवसाय पर भी भारत का प्रभाव है।



केपी शर्मा ओली यह समझने में नाकाम रहे है की भारत उनका परम्परागत मित्र है जबकि चीन के लिए तिब्बत सामरिक मज़बूरी है और इसीलिए वह नेपाल को महत्व दे रहा है। नेपाल का आम जनमानस आशंकित है कि चीन नेपाल की आर्थिक सहायता करके उसे अपना उपनिवेश बना सकता है।



इस समय नेपाल की आंतरिक राजनीति में ओली की नीतियों को लेकर बैचेनी बढ़ रही है, नेपाल का उदार और धार्मिक समाज अपने देश में सत्ता की निरंकुशता और सांस्कृतिक बिखराव को रोकना चाहता है आम जनमानस अब अपने वर्तमान प्रधानमंत्री की चीन परस्त और भारत विरोधी नीतियों के दुष्प्रभाव को समझने लगा है तथा ओली की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आ रही है। इससे वामपंथी सरकार की बिदाई और कम्युनिस्ट पार्टी के गठबंधन के टूटने के संकेत मिलने लगे है। जाहिर है ओली की बिदाई से नेपाल और भारत के आर्थिक,सांस्कृतिक,राजनीतिक सम्बन्ध मजबूत होंगे तथा हिमालय क्षेत्र में दोनों देशों की सुरक्षा हितों की रक्षा को लेकर सामने आई चुनौतियां भी कम होने की उम्मीद बढ़ेगी।

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

फासीवादी पूंजीवाद के जंजाल में उलझते लोकतंत्र,fansivadi punji

 

राष्ट्रीय सहारा                                           



ब्रिटिश लेबर पार्टी के चेयरमेन और 20 सदी के महान राजनीतिक अर्थशास्त्री हेराल्ड लास्की ने फासीवाद का विश्लेष्ण करते हुए कहा था कि फासीवाद का असल उद्देश्य आर्थिक शक्ति के उपकरणों के स्वामियों के हित में उदार विचारों और संस्थाओं का विनाश करना है। जिससे पूंजीवाद को सशक्त किया जा सके।” लोकतंत्र को फासीवाद का जवाब माना  जाता है लेकिन दुनिया के कई देशों में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकारें जिस प्रकार बाज़ार में एकाधिकार के लिए पूंजीवादियों को संरक्षण दे रही है,उससे फासीवादी प्रवृतियां बिल्कुल नये रूप में सशक्त होकर सामने आ रही है।



रूस की सत्ता में बने रहने के लिए व्लादिमीर पुतिन ने पूंजीपतियों को छूट देकर ये तय कर दिया कि मुल्क के सियासी मामलों में अब वे दखल नहीं दे सकेंगेइससे पूंजीपति अपनी दौलत सुरक्षित रखने और उसे बढ़ाने में कामयाब तो हो रहे है लेकिन इससे रूस में उदारवाद का अंत हो गयारूस में पुतिन की लोकप्रियता तो शिखर पर है लेकिन इसके साथ ही रूस में उन्हें एक ऐसे राष्ट्रपति के तौर पर देखा जाने लगा जिसका लोकतंत्र के प्रति नज़रिया काफी हद तक संकीर्ण है पुतिन का यह प्रयास रहा है कि सत्ता के केंद्र में वे रहे और उन्हें कोई भी चुनौती नहीं दे सके। विदेशी मामलों में पुतिन की आक्रामकता से जनता उन्हें सशक्त रूस का निर्माता मानती है जिनके नेतृत्व में दुनिया में रूस का गौरव बढ़ा है। वहीं आर्थिक तौर पर रूस के हालात अस्त व्यस्त है और उसके बाज़ार में चीन का कब्जा हो गया है। दुनिया को आँख दिखाने वाले रूस को चीन पर आर्थिक निर्भरता की कीमत भी चुकानी पड़ी है और उसे अपनी बहुत सारी जमीन चीन को हस्तांतरित करने को मजबूर होना पड़ा।  कुछ दशकों पहले जमीन विवाद को लेकर चीन से युद्द करने वाला रूस अब बेबस और लाचार है।  इसका एक प्रमुख कारण रूस का सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था को पूंजीपतियों के हाथों में सौंपना भी रहा। नब्बे के दशक में सोवियत यूनियन के बिखरने के बाद बोरिस येल्तसिन ने रूस के प्राकृतिक संसाधन और राजनीतिक शक्तियाँ मुट्ठीभर लोगों में बाँट दी थी,इसके बदले में उन्होंने बोरिस येल्तसिन को दोबारा राष्ट्रपति बनने में मदद की 'ओलीगार्क' कहे जाने वाले इन पूंजीपतियों ने गैस और तेल कंपनियों के अलावा मीडिया कंपनियों को ख़रीद कर करोड़ों बनाएयेल्तसिन के समय इन पूंजीपतियों का प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ गया थाव्लादिमीर पुतिन ने राष्ट्रपति बनने के बाद पूंजीपतियों को अपने नियन्त्रण में ले लिया। पुतिन के सहयोगी इस समय रूस की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित कर रहे है,मतलब पुतिन ने सत्ता के साथ पूंजी को भी नियंत्रित कर लिया है।

दरअसल दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों की राजनीतिक सत्ताएं राजनीतिक शक्ति का उपयोग आर्थिक लाभ के लिए करने लगी है और यह मार्ग उन्हें फासीवाद के करीब ले जा रहा है। किसी देश में राजनीतिक सत्ता के द्वारा उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व और नियन्त्रण पूंजीवादी हाथों में सौंप दिया जाये,स्वतंत्र मजदूर संघ को खामोश रहने पर मजबूर कर दिया जाये,स्वतंत्र अभिव्यक्ति को रोक दिया जाये और सामाजिक सेवाओं में कटौती कर दी जाये। इस प्रकार का शासन फासीवाद में ही संभव है,लोकतांत्रिक देश में नहीं।



पूंजीवाद का लक्ष्य मुनाफा कमाना होता है जबकि लोकतंत्र का उद्देश्य सभी वर्गों के सर्वांगीण विकास से जुड़ा है। पूंजीवाद मजदूरी की दर करने,उद्योगों की दशा खराब रहने और पूंजी पर लगने वाले कर में कटौती का समर्थन करता है जबकि समाजवादी लोकतंत्र में यह मांग रहती है कि मजदूरी की दर बढ़ाई जाये,उद्योगों की परिस्थितियों को सुधारा जाये और सामाजिक सेवाओं का निरंतर विस्तार किया जाये।



द्वितीय विश्व युद्द के बाद पिछड़े और विकास शील देशों में राजनीतिक सत्ताओं के सामने यह चुनौती थी की सामाजिक और आर्थिक जीवन को बेहतर कैसे बनाया जा सके। भारत में पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत समावेशी विकास की दिशा में एक शानदार कदम था। 1971 में अस्तित्व में आये बंगलादेश को गरीब और अति पिछड़े देशों में शुमार किया जाता था। लेकिन ग्रामीण विकास,स्वयं सहायता समूह की भूमिका और छोटे उद्योगों को सरकारी सहायता के बूते वह दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में शुमार हो गया है। वहीं पाकिस्तान की राजनीतिक सत्ता में एकाधिकार की भावना मजबूत रही। इसी कारण वहां की व्यवस्था में पूंजीवाद और सामन्तवाद पनप गया और यह देश अब निजीकरण की जाल में बुरी तरह उलझकर चीन का नव उपनिवेश बनने की और अग्रसर है। पाकिस्तान के पूंजीवादी घरानों का राजनीतिक सत्ताओं में बड़ा प्रभाव रहा। उन्होंने निजीकरण को बढ़ावा देकर आम जनता को विकास के सपने दिखाएं और इस प्रकार आम जनमानस को गरीबी के जंजाल के धकेल दिया। 



अर्जेंटीना में रेलवे का निजीकरण करने के बाद देश की अर्थव्यवस्था और परिवहन व्यवस्था चरमरा गई। विकास और उदारीकरण के नाम पर सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण की जल्दबाजी से पस्त इस देश में सरकार को रेलवे समेत अन्य नियन्त्रण बाद में अपने हाथों में लेने को मजबूर होना पड़ा लेकिन इस सब कवायद में यह देश  पिछड़ गया।





यहां यह ध्यान देने योग है कि निजीकरण उन देशों में सफल रह सकते है जहां सामाजिक और आर्थिक असमानता का स्तर बहुत कम हो,शिक्षा का स्तर बहुत उच्च हो तथा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था हो। मध्य एशिया की अशांति में भी इजराइल जैसा देश मजबूत होकर इसीलिए खड़ा है क्योंकि वहां की राजनीतिक सत्ता ने कुछ की भागीदारी से ज्यादा सबकी भागीदारी को प्राथमिकता में रखा। इसके नतीजे बेहद शानदार आये और समावेशी विकास से वह विकास के नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। जबकि अधिकांश विकासशील और पिछड़े देशों में सामाजिक न्याय की स्थिति ठीक नहीं होती,भारी असमानता से जूझते इन देशों में निजीकरण से कुछ पूंजीवादी पूरे बाज़ार को अपने नियन्त्रण में ले लेते है और इसके बाद देश में गरीबी और बेरोजगारी बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है। मैक्सिकों की बर्बादी से यह तथ्य भी सामने आया कि विकास की दौड़ में शामिल होने की जल्दबाजी में देश को पूंजीवादी शक्तियों के हाथों में देने से बड़े निवेशकों  का आधिपत्य कायम हो जायेगा और यह स्थिति भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों के लिए खतरनाक है।





विकास के नाम पर भूमंडलीकरण,उदारीकरण और निजीकरण की नीति को पूंजीवादी ताकतों ने जिस प्रकार दुनिया में संगठित तरीके से थोप दिया था,उसके बहुत बुरे नतीजे सामने आये है। लैटिन अमेरिका,अफ्रीका और एशिया के कई देशों में गरीबी और असमानता बढ़ी है,संगठित क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम हुए है,ज्यादातर श्रमिक असंगठित क्षेत्रों में काम करने को मजबूर है। श्रम और उत्पादन का स्तर घटिया है तथा उत्पादकता और मजदूरी का स्तर निम्न है। इन सबके बीच यह भी सामने आया है कि आर्थिक असमानता बढ़ने से कई देशों में आंतरिक अशांति बढ़ने और राजनीतिक सत्ताओं के अस्तित्व पर संकट गहराया तो अराजक समूहों को प्रश्रय देकर जाति,नस्ल,धर्म और क्षेत्र के आधार पर हथियार बाँट दिए गये और इस प्रकार कई देश गृहयुद्द के जंजाल में फंस गए है।



रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर जनरल विमल जालान ने अपनी किताब इंडियाज़ इकानोमी इन द न्यू मिलेनियम में लिखा है कि, विश्व के पूंजी बाज़ार के एकीकरण से बाज़ार में कुशलता आई है परन्तु साथ साथ इससे विकासशील देशों के समक्ष अधिक खतरा और असुरक्षा भी उत्पन्न हो गई है।

पिछलें कुछ दशकों से दुनिया के कई विकासशील और पिछड़े देशों ने सार्वजनिक क्षेत्र की समस्याओं का वैकल्पिक समाधान उदारीकरण और निजीकरण में ढूंढने का प्रयास किया है।  इन देशों ने ऐसा करते हुए अपने देश की आंतरिक स्थिति का आंकलन न करते हुए विकसित देशों की तर्ज पर जुआ खेला और इसके परिणाम भयावह रूप से सामने आ रहे है। कई देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है,आंतरिक अशांति बढ़ गई है और करोड़ो लोग गरीबी और बेरोजगारी के कुचक्र में फंस गए है।



इस समय भारत निजीकरण की राह पर चल पड़ा है। यहां यह समझने की जरूरत है कि भारत जैसे विकासशील देश में सामाजिक और आर्थिक समानताएं व्यापक निजीकरण की इजाजत नहीं देती। अगर अर्थव्यवस्था बेहतर और सशक्त है तब तो निजीकरण लाभदायक हो भी सकता है। फ़िलहाल देश की अर्थव्यवस्था चरमरा हुई है और जल्दबाजी में  हुए निजीकरण से गरीबी और बेरोजगारी  बेतहाशा बढ़ सकती है।

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

बॉलीवुड की संतान है अंडरवर्ल्ड, bollywood-underworld

प्रदेश टुडे              

                   


 

माया नगरी मुंबई और माफिया तस्करों के रिश्ते बहुत मजबूत और पुराने है एक दौर में मुंबई और दुबई नशे के व्यापार के दो बड़े केन्द्रों के रूप में  जाने जाते थे और हाजी मस्तान के बाद दाउद इब्राहीम को नशे के कारोबार का बेताज बादशाह माना जाता था अंडरवर्ल्ड डॉन दाउद इब्राहीम का ड्रग्स का कारोबार पूरी दुनिया में फैला हुआ है। ड्रग माफिया इकबाल मिर्ची से लेकर अभिनेत्री ममता कुलकर्णी के पति विक्की गोस्वामी तक उसके रिश्ते कभी किसी से छिपे नहीं रहे। दाऊद अपने नशे के कारोबार से मोटा पैसा कमा रहा है और इस पैसे को पाकिस्तान स्टॉक एक्सचेंज में निवेश कर रहा है  पाकिस्तान के हबीब बैंक पर अमेरिका के वित्तीय सेवा विभाग ने 2017 में मनीलॉन्ड्रिंग और आतंकियों को पैसा पहुंचाने का आरोप भी लगाया था,यह बैंक नेपाल में भी आतंकियों को पैसे पहुंचाता था वास्तव में पाकिस्तान स्थित आतंकियों के वित्तीय लेनदेन पर नजर रखना मुश्किल है क्योंकि यह नगद पर आधारित होता है और इसमें मादक पदार्थों की तस्करी शामिल है। पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति इसके लिए मुफीद है। भारत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच गोल्डन क्रिसेंट या सुनहरे अर्द्ध चंद्रमा का इलाका है जो अफीम का स्वर्ग कहा जाता है और नार्को आतंकवाद की यह उपजाऊ जमीन मानी जाती है।



पाकिस्तान से यह ड्रग भारत आता है और इस प्रकार भारत में नशे के कारोबार को बेहद चालाकी और सावधानी से चलाया जाता है। इसमें पांधी की भूमिका होती है। “पांधी” ड्रग तस्करी की दुनिया में बेहद विश्वसनीय नाम है,ये वे एजेंट होते है,जो सीमा पार से आने वाले ड्रग को देश के विभिन्न स्थानों से बेहद विश्वसनीयता से पहुंचाते है। इस पूरी प्रक्रिया में शामिल लोगों को कमीशन दिया जाता हैइन्हें इसके सरगना या इस धंधे शामिल अन्य लोगों की कोई जानकारी नहीं होती और यही कारण है कि ड्रग्स के सरगना को पकड़ना आसान नहीं है। पैसे की चमक दमक इतनी की ट्रक ड्रायव्हर आसानी से मादक पदार्थों के एजेंटों के जाल में फंस जाते है. चाय,गैस,कोयला या अन्य मॉल ढोने वाले ट्रकों में गांजा पकड़े जाने की कई घटनाएं सामने आई है।



80 के दशक में तस्करी से बनने वाली फिल्मों को बहुत सफलता मिली थी और रुपहले पर्दे पर डॉन का कथित किरदार निभाकर लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ने वाले कलाकारों में अमिताभ बच्चन जैसे महानायकों को शुमार किया जाता है। माना जाता है कि इन फिल्मों को देखकर ही दाउद इब्राहीम को प्रेरणा मिली जिसका कितना पैसा इस समय बॉलीवुड में लगा है यह पता कर पाना बहुत मुश्किल है। नशे के व्यापार को लेकर लंबे समय तक मुम्बई में कुख्यात गैंगस्टर हाजी मस्तान का सिक्का चलता था,जिसके बारे में कहा जाता था कि वह बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाला शख्स था जो महज आठ साल की उम्र में तमिलनाडु से मुंबई  आया था। फूटपाथ पर जिंदगी बसर करते हुए उसने मुम्बई में उसने एक स्लम एरिया को अपना ठिकाना बनाया। यहां उसकी मुलाकात एक अरब के रहने वाले शख्स से हुई जो तस्कर था

इसके बाद मस्तान का सितारा ऐसा बुलंद हुआ कि वह मुम्बई का अंडरवर्ल्ड का बेताज बादशाह बन गया फ़िल्मी कलाकारों से उसके सम्बन्ध और राजनेताओं पर उसका प्रभाव कमाल का था  तस्करी की इस राह पर चल कर वो अमीरी की ऊंचाइयों तक पहुंच गया एक दौर में मस्तान का मुम्बई में इतना नाम था कि उसका काम करने में कोई रुकावट नहीं होती थी, वह पुलिसवालों और बाकी अधिकारियों को वह खूब तोहफे देता था दाउद इब्राहीम समेत कई गैंगस्टरों का गुरु हाजी मस्तान को ही माना जाता है



दरअसल बॉलीवुड की बेहिसाब चमक दमक में अंडरवर्ल्ड की बेतहाशा अवैध कमाई की भूमिका सामने आती रही है और नशे के व्यापार से आने वाला पैसा यहां लगाने के तथ्य भी सामने आये हैयह भी बेहद दिलचस्प है कि मादक पदार्थों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां पर्दे के पीछे यह स्वीकार करती है कि उनके द्वारा तस्करी का जो मॉल पकड़ा जाता है वह 2 फीसदी भी नहीं होता। साफ़ है कि मादक पदार्थों की तस्करी भारत में बड़ा व्यापार है बल्कि उसका उसका ढांचा इतना मजबूत है कि उसे खत्म किया जाना आसान नहीं है। देश के कई उद्योगपतियों और राजनेताओं को रियल स्टेट और स्टॉक एक्सचेंज में अपना व्यवसाय चलाने के लिए ढेर सारा पैसा चाहिए और उसका सबसे बड़े माध्यम मादक पदार्थों की तस्करी है। जिसमें उद्योगपतियों,राजनेताओं,पुलिस के चुनिंदा आला अधिकारियों और अपराधियों का मजबूत गठजोड़ होता है। 2016 में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने ड्रग्स तस्करी पर एक आंकड़ा साझा किया था जिसमें पुलिस और सुरक्षा से जुड़े जवानों के ड्रग्स तस्करी में उनकी संलिप्तता के आरोप में गिरफ़्तारी की बात कही गई थी।



नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2 करोड़ लोग अफीम,3 करोड़ से ज्यादा गांजा और पूरे देश में करीब 8.5 लाख लोग ड्रग्स इंजेक्ट करते हैंभारत में इस समय कैनाबिस से लेकर ट्रामाडोल जैसी नशीले पदार्थों का उपयोग हो रहा है देश में ड्रग्स पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल सीमा के माध्यम से या फिर अफ्रीका से होकर भारत पहुंचता हैफिर इन्हें दिल्ली या पंजाब लाया जाता है और फिर यह पूरे देश में फ़ैल जाता है, करोड़ो लोगों तक यह जानलेवा नशा कैसे पहुँचता है,इसको लेकर ख़ामोशी है।



बहरहाल सुशांत मामले में रिया,शौविक चक्रवर्ती की गिरफ़्तारी और कन्नड़ फ़िल्मों की अभिनेत्री की गिरफ़्तारी से फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स के इस्तेमाल और इनके कारोबार को लेकर चर्चा हो रही हैक्या ऐसी कोई जांच इतनी पारदर्शिता से काम कर सकती है जो उद्योगपतियों,राजनेताओं,पुलिस के चुनिंदा आला अधिकारियों और अपराधियों के मजबूत गठजोड़ को चुनौती दे सके। जाहिर है बॉलीवुड में लगने वाली बेतहाशा दौलत की जांच किये बिना ड्रग माफियाओं तक पहुंचना मुमकिन नहीं है

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

इस्लामिक दुनिया में पस्त पड़ा पाकिस्तान,islamik duniya pakistan

 प्रजातंत्र        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने        



बेनजीर भुट्टो बताया करती थी कि जब उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री थे और जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष से वे मिलते थे,उस समय बेनजीर स्वयं जाकर अपने पिता से किसी प्रतिद्वंदी राष्ट्राध्यक्ष का फोन आने की बात कहती थी जुल्फिकार अली भुट्टो बेनजीर से यह कहा करते थे की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कभी किसी को पता ही नहीं चलना चाहिए की हम किसके साथ है और यह असमंजस हमेशा बना रहना चाहिए

दरअसल पाकिस्तान के नीति निर्माताओं ने दुनिया से अपने रिश्तों को आमतौर पर सामरिक दृष्टि से देखा और बदलते दौर के साथ यह नीति स्वयं उनके देश के लिए ही आत्मघाती बन गई। पाकिस्तान भारत विरोध के जूनून में यह समझने में नाकाम रहा कि आधुनिक समय में अंतर्राष्ट्रीय जगत में सैनिक शक्ति के स्थान पर आर्थिक हित महत्वपूर्ण हो गए है और राष्ट्रों के बीच परस्पर सहयोग और पारस्परिक हितों की भावना को प्रमुखता प्राप्त हैअत: अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप भी परिवर्तित हो गया है



कूटनीति की दुनिया में पल प्रतिपल बदलती परिस्थितियों  के बीच ईरान स्थित चाबहार बन्दरगाह को भारत के प्रभाव से मुक्त कराकर चीन के हाथों में जाने के घटनाक्रम में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका रही और सामरिक दृष्टि से इसे पाकिस्तान की विजय के तौर पर बताया गया भारत के प्रमुख सहयोगी माने जाने वाले ईरान का इस तरह से भारत से दूर होना निराशाजनक था लेकिन इससे पाकिस्तान की विदेश नीति बहुत उत्साहित हुईइसके बाद पाकिस्तान के विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर पर सहयोग न करने को लेकर अपने परम्परागत मित्र सऊदी अरब की आलोचना कर दी

इस्लामिक दुनिया में सऊदी अरब और ईरान का विवाद बेहद पुराना है और मध्य पूर्व की आग इनकी प्रतिद्वंदिता से ही भड़कती रही है पाकिस्तान को कुछ समय पहले 3 अरब डॉलर की मदद देकर उसे कंगाली से उबारने को प्रयासरत सऊदी अरब को पाकिस्तान की चुनौती देने वाली विदेश नीति में ईरान से दोस्ती की छाया दिखाई देना स्वाभाविक थी और इसका जवाब पाकिस्तान को मिलना ही था सऊदी अरब ने न केवल पाकिस्तान की दी जाने वाली मदद को बंद करने का ऐलान कर दिया बल्कि बकाया कर्ज जल्दी देने की ताकीद भी दे दी इस समूचे घटनाक्रम से घबराएं पाकिस्तान ने एक बार फौज की और देखा तथा अपने सेना प्रमुख जनरल बाजवा को स्थितियां संभालने सऊदी अरब भेज दिया



यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि शिया ईरान और सुन्नी सऊदी अरब से समान सम्बन्ध रखने के लिए विदेश नीति में पारदर्शिता और तटस्थता होना चाहिए और भारत ने इसे बखूबी अंजाम दिया है महाशक्तियों के युद्द क्षेत्र से आमतौर पर दूर रहकर भारत ने पश्चिम एशिया में शांति की संभावनाओं को सदा टटोला और इस्लामिक दुनिया का विश्वास उस पर बना रहा वहीं पाकिस्तान ने इस्लाम की सुरक्षा के नाम पर अपने को इस्लामिक महाशक्ति के रूप में प्रचारित करने की नीति पर लगातार काम किया और इस्लामिक आर्गेनाइजेशन  के मंच का भारत विरोध के लिए उपयोग करने के अवसर भी ढूंढे

इस्लामी सहयोग संगठन 57 देशों का प्रभावशाली समूह हैसंयुक्त राष्ट्र के बाद यह दुनिया के सबसे बड़े संगठनों में शुमार किया जाता है1969 में मोरक्को से इस्लामिक कांफ्रेंस आर्गेनाइजेशन की शुरुआत हुई और ओआईसी सदस्य देशों में रहनेवाले लोगों की कुल आबादी तकरीबन 1.9 खरब है 1972 में इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी ने चार्टर के जरिए बाकायदा अपने उद्देश्य बताते हुए साफ किया था की सदस्य देशों के मध्य आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्लामी एकजुटता को प्रोत्साहन दिया जाएगा और किसी भी रूप में विद्यमान उपनिवेशवाद की समाप्ति तथा जातीय अलगाव और भेदभाव की समाप्ति के लिये प्रयास किये जायेगेइसके साथ ही यह संकल्प भी किया गया की विश्व के सभी मुसलमानों की गरिमा,स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अधिकारों की रक्षा करने के लिये,उनके संघर्षों को मजबूती प्रदान करने के निरंतर प्रयास किये जाएंगे ओआईसी के सभी सदस्य देशों और अन्य देशों के मध्य सहयोग और तालमेल को प्रोत्साहित करने के लिये एक उपयुक्त वातावरण तैयार करना इस संगठन की प्राथमिकताओं में घोषित किया गया थाआतंकवाद के खात्मे के नाम पर ओआईसी ने पाकिस्तान को केंद्र में रखकर अपनी अलग सेना भी बनाई और इसकी अगुवाई पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल राहिल शरीफ के हाथों में दी। यहां पर यह भी जानना जरूरी है कि ओआईसी को सुन्नी मुस्लिम देशों का संगठन समझा जाता है सऊदी अरब अपने प्रतिद्वंदी शिया राष्ट्र ईरान  के परमाणु शक्ति संपन्न  होने से चिंतित है और वह इस्लामी सैन्य गठबंधन को ईरान के खिलाफ उपयोग करना चाहता है



वहीं दूसरी और पाकिस्तान के नीति के केंद्र में भारत विरोध हैयुद्द कला में एक शब्द प्रचलित है काला प्रचार, जिसका उद्देश्य अफवाहों और गलत सूचनाओं से माहौल उत्पन्न किया जाता है। पाकिस्तान पिछले कई दशकों से कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहा है और उसने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को उछालने के लिए 1994 में एक कॉन्टैक्ट ग्रुप बनाया था,जिसमें पाकिस्तान के अलावा अज़रबैजान,नाइजर, सऊदी अरब और तुर्की शामिल है पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर को लेकर सऊदी अरब उसका साथ दे जबकि सऊदी अरब ने कश्मीर को भारत का आंतरिक मामला बताकर कोई भी प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है पाकिस्तान इस बात को लेकर सऊदी अरब से चिढ़ा हुआ है वही हकीकत यह भी है कि सऊदी अरब को पाकिस्तान की इस्लामपरस्ती पर भरोसा ही नहीं है पाकिस्तान के पड़ोसी और विश्वस्त मित्र चीन के शिन्चियांग प्रान्त में तकरीबन 1 करोड़ उईगर मुसलमान रहते है,जिन पर रोजे रखने,महिलाओं के बुर्खा पहनने,खुले में नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है। यहाँ तक की उन्हें रोज मेंटल डिटेक्टर से चेक किया जाता है मुस्लिम बाहुल्य वाले इस प्रान्त को वहां बसने वाले मुस्लिम बाशिंदों के लिए  खुली जेल  तक कहा जाने लगा है। 



मुसलमानों के लिए अमानवीयता की हदें पार करने वाले चीन पर अमेरिका जैसा देश जहां मुखर होकर बोलता रहा है वहीं पाकिस्तान के हुक्मरान खामोश रहे है। जबकि भारत को लेकर पाकिस्तान का दावा इसलिए भी गलत नजर आता है क्योंकि भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान रहते है और यहां रहने वाले मुसलमानों को समान अधिकार प्राप्त है और कश्मीर में भी ऐसा ही है। जबकि पाकिस्तान में ही मुसलमानों के विभिन्न फिरकों को लेकर अलग अलग कानून है। पिछले साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की जेनेवा में हुई बैठक में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अहमदिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान की हुकूमत पर अत्याचार का आरोप  लगाते हुए न्याय की गुहार लगाई थी पाकिस्तान में इस समुदाय की आबादी करीब 50 लाख है और वे मतदान के अधिकार से वंचित है। यूरोप का एकमात्र इस्लामिक देश तुर्की सऊदी अरब की बादशाहत को चुनौती देकर इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करना चाहता है और उससे भी पाकिस्तान की बड़ी मित्रता है। तुर्की मध्य पूर्व में रहने वाले कुर्द मुसलमानों पर रोज हमले करता है और इन कुर्द मुस्लिमों की सुरक्षा रूस की सेना कर रही है। इस मामलें में भी पाकिस्तान ने तुर्की को कभी नसीहत देने की जरूरत नहीं समझी। मध्यपूर्व में गृहयुद्द से जूझने वाले मुसलमानों के लिए यूरोप के देशों ने दरवाजें खोले लेकिन पाकिस्तान ने उन्हें पनाह देने में कभी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।



जाहिर है सऊदी अरब समेत इस्लामिक दुनिया यह समझ गई है कि  पाकिस्तान इस्लामिक  देशों के समूह ओआईसी का इस्तेमाल अपनी बेहतरी के लिए और अपने अनुसार करना चाहता है,जिसका मतलब इस्लामिक दुनिया की बेहतरी से कतई नहीं है पाकिस्तान की बदनीयती के कारण ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन का भरोसा उससे उठता जा रहा है और वह तमाम प्रयासों के बाद भी कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ बहुमत से कोई प्रस्ताव पारित नहीं करवा सका है,पाकिस्तान के लिए यह स्थिति असहनीय हो गई है

 

 

brahmadeep alune

aakashwani sanvidhan koumi ekta Aajkal- 23rd November