सोमवार, 31 अगस्त 2020

पश्चिम एशिया की नई चुनौतियां, paschim eshiya ki nyi chunoutiyan

 


बदलते अंतराष्ट्रीय परिदृश्य में धार्मिक संरक्षणवाद की परम्परागत नीति से राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना संभव नहीं रहा गया है,अब सामरिक और आर्थिक विवशता के कारण सम्बन्धों के प्रतिमान भी बदलते जा रहे हैदरअसल हाल ही में इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच राजनयिक संबंधों की बहाली को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐतिहासिक घोषणा की तो यह साफ हो गया कि हिंसा,तानाशाही और आतंकवाद से अभिशिप्त पश्चिम एशिया अरब राष्ट्रवाद को दरकिनार करने को कृतसंकल्पित है। इजराइल विरोधी अरब राष्ट्रवाद का छिन्न भिन्न होना दुनिया के लिए बेहद प्रभावकारी परिणाम लाने वाली घटना हो सकती है।

अंतराष्ट्रीय सम्बन्धों के यथार्थवादी सिद्धांत के अग्रणी विचारक हंस मोर्गेंथाऊ ने मजबूत कूटनीति के लिए चार कदम सुझाएं थे,सर्वप्रथम अपने राष्ट्र की राष्ट्रीय शक्ति को दृष्टिगत रखते हुए अपने लक्ष्यों को निर्धारित करना,दूसरा,दूसरे राष्ट्रों की राष्ट्रीय शक्ति और उद्देश्यों का समुचित मूल्यांकन करना। तीसरा,अलग अलग राष्ट्रों के विभिन्न उद्देश्यों के मध्य अनुकूलता और सामंजस्य स्थापित करना तथा चौथा और अंतिम यह कि अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अनुनय,समझौता  तथा बल प्रयोग की धमकी आदि साधनों का प्रयोग करना। इस समय वैश्विक कूटनीति में जो बदलाव आये है और इजराइल तथा संयुक्त अरब अमीरात के सम्बन्धों की जो शुरुआत हुई है,उसमें संतुलन,सामंजस्य,समझौता और इन दोनों देशों के कड़े प्रतिद्वंदी ईरान पर मनौवैज्ञानिक बढ़त लेने की भावना प्रतिबिम्बित हो रही है। इस समूची कूटनीति के केंद्र में अमेरिका भी है जिसके लिए ईरान आतंकवाद की धूरी है।



पश्चिमी एशिया को दुनिया की शांति के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता है और इस इलाके के दो परम्परागत शत्रु इजराइल और सऊदी अरब माने जाते थे। अरब राष्ट्रवाद के आक्रामक व्यवहार  के जरिये इजराइल को उखाड़ फेंकने का सपना गढ़ने वाले सुन्नी बहुल संयुक्त अरब अमीरात का इजराइल से राजनयिक सम्बन्ध स्थापित करना आधुनिक विश्व के लिए क्रांतिकारी परिणामों वाला कदम हो सकता है फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने इस समझौते के बाद अरब लीग की बैठक बुलाने का प्रस्ताव रखा हैउन्हें डर है कि इस समझौते के बाद खाड़ी के दूसरे देशों के भी इजराइल के साथ संबंध मज़बूत होंगे और  इससे फलस्तीन के अस्तित्व पर ही संकट गहरा जाएगा। वहीं पाकिस्तान जैसे देश के लिए यह इतना अप्रत्याशित है कि उसकी इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व की उम्मीदें ही ध्वस्त हो गई है।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कूटनीति को शांति का साधन माना जाता है,जो तर्क,समझौता,वार्ता तथा लेनदेन की भावना के आधार पर संघर्षों को रोकती है। अमेरिका ने इजराइल तथा संयुक्त अरब अमीरात के सम्बन्धों को लेकर कुछ ऐसा ही भरोसा जताया है। वास्तव में यह समझौता भले ही अभी अस्तित्व में आया हो लेकिन इसकी संभावनाएं कई दशकों पहले ही बन गई थी। इस्लामिक दुनिया में शिया-सुन्नी विवाद बहुत पुराना है और 1979 की ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद से यह नए और खौफनाक रूप में सामने आया है इस्लामिक जगत में सऊदी अरब की बादशाहत को लगातार चुनौती देने वाले ईरान को शिया हितों के लिए लड़ने वाले देशों का समर्थन प्राप्त है और इससे मध्यपूर्व का संकट लगातार गहराया है



मध्यपूर्व की अस्थिरता में ट्रम्प के लिए ईरान विरोध की स्थितियां बेहद मुफीद रही है। ट्रम्प का इजराइल प्रेम जगजाहिर है,वहीं सामरिक कारणों से शिया  ईरान के सामने अमेरिका का पारम्परिक दोस्त सऊदी अरब इस क्षेत्र में सुन्नी नेतृत्व की भूमिका में है। यमन गृहयुद्ध से जुझ रहा है और वहां पर सऊदी अरब के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की सेना है जो हूथी विद्रोहियों से मुकाब़ला कर रही हैसऊदी नेतृत्व को ये लगता है कि हूथी विद्रोहियों को ईरान से हथियारों की मदद मिल रही है 2016 में अमरीकी सेना ने बताया था कि ईरान से यमन भेजे गए हथियारों का बेड़ा दो महीने में तीसरी बार पकड़ा गया थासीरिया में जारी गृहयुद्ध में ईरान राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन कर रहा है। पश्चिम एशिया के एक और देश लेबनान में अस्थिरता है और यहां पर ईरान समर्थित शिया मिलिशिया समूह हिजबुल्लाह का प्रभाव सऊदी अरब के लिए जानलेवा है

यमन,सीरिया और लेबनान में ईरान का सामरिक मित्र रूस है और इसीलिए मध्यपूर्व में नियन्त्रण स्थपित रखने के लिए महाशक्तियां आमने सामने है। 2011  के बाद मध्यपूर्व के कई देशों में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी है और इसका व्यापक असर ईरान और सऊदी अरब की प्रतिद्वंदिता पर हुआ है। इन स्थितियों में नये राजनीतिक और सामरिक समीकरण भी बने और दुश्मन का दुश्मन दोस्त की तर्ज पर इजराइल तथा सऊदी अरब के सम्बन्धों में अप्र्तायाशित रूप से ईरान के विरोध को लेकर लगातार एकरूपता दिखाई दी।



2012 में नेतान्याहू ने ईरान के परमाणु बम की एक तस्वीर बनाई थी और लाल पेन से उसके शीर्ष पर एक रेखा खींच दी थी  यह इस बात का संकेत था कि ईरान का युरेनियम संवर्धन कार्यक्रम जिस दिशा में जा रहा है इजराइल उसे जाने नहीं देगा। 2018 में ईरान के गोपनीय परमाणु हथियार कार्यक्रम "प्रोजेक्ट अमाद" की हकीकत को बेहद सनसनीखेज तरीके से दुनिया के सामने लाकर इजराइल ने रणनीतिक दांव खेला था और इससे ईरान की मुश्किलें बढ़ गई। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू ने कहा था कि उनके पास तेहरान  के एक गुप्त स्टोरेज से इजराइली ख़ुफ़िया विभाग को मिली डेटा की "कॉपियां" हैंइस डेटा में 55 हज़ार पन्नों के सबूत के साथ 183 सीडी और 55 हज़ार फाइलें हैंनेतन्याहू ने इस डेटा को ईरान के गुप्त परमाणु हथियार कार्यक्रम "प्रोजेक्ट अमाद"से संबंधित  बताकर यह दावा किया था कि ईरान परमाणु समझौते को ठेंगा दिखाकर गुपचुप तरीके से परमाणु हथियारों का जखीरा बनाने की और अग्रसर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इसके बाद ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से अमरीका को अलग करने की घोषणा कर  साफ कर दिया कि 2015 में जब ईरान के साथ हुए समझौते के बाद आर्थिक प्रतिबंधों में जो रियायतें दी गई थीं,उन्हें खत्म करके ईरान को सबक सिखाने में वे भरोसा करते हैयहीं नहीं ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने की दिशा में किए गए इस ऐतिहासिक समझौते को ही अप्रासंगिक और बेकार बता दिया था 

इस साल जनवरी में इजराइल के दो एफ-35 लड़ाकू विमानों ने इराक-सीरिया सीमा पर इराक के सरहदी बोकमाल इलाके में घुस कर  ईरान समर्थित हशेद अल-शाबी पैरामिलिट्री फोर्स के ठिकाने पर बमबारी करके उसे तबाह किया तो इससे सऊदी अरब का खुश होना लाजिमी थाइजराइल के सेना प्रमुख ने एक इंटरव्यू में कहा भी था कि इसराइल ईरान के ख़िलाफ़ सऊदी अरब से ख़ुफ़िया सूचना साझा करने के लिए तैयार है तथा मध्य-पूर्व में सऊदी अरब और उनके देश के साझा हित हैं और वे साथ मिलकर लड़ने को तैयार है

1979 की ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति 40 साल बाद अरब राष्ट्रवाद के अस्तित्व पर इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के सम्बन्धों को कड़ा प्रहार माना जा रहा है और इस्लामिक जगत भी कई भागों में बंट गया हैखाड़ी के देशों में महाशक्तियों के व्यापक आर्थिक हित जुड़े है और धर्मतंत्र को लेकर बेहद संरक्षणवादी हित रखने वाले सऊदी अरब की इजराइल को लेकर ख़ामोशी व्यापक प्रभाव डालने वाली हैखासकर इस्लामिक जगत में सऊदी अरब की बादशाहत को लगातार चुनौती देने वाले ईरान के लिए यह सदमे जैसा है

इन सबके बीच भारत के लिए अमेरिका,अमीरात और इजराइल के सम्बन्धों का नया त्रिकोण नई संभावनाओं वाला है,हालांकि इसमें सजग रहने की भी जरूरत है। ईरान के प्रति इजराइल का यह रुख यूएई के लिए मुफीद रहा है जो ईरान को अपने लिए एक बड़े प्रतिद्वंदी के तौर पर देखता रहा है यूएई के हमकदम सऊदी अरब की नीतियों में भी इजराइल के प्रति नरम रवैया देखा गया,यहां तक की उसने भारत और इसराइल के बीच की विमान सेवा शुरू करने के लिए अपने एयर स्पेस के इस्तेमाल की इजाज़त भारत को देने में बिल्कुल संकोच नहीं दिखाया



2019 में संयुक्त अरब अमीरात ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से भी नवाज़ा था और इसे भारत के इस्लामिक देशों से मजबूत सम्बन्धों को भी नई दिशा मिली। इसके पहले भारत के लिए इस्लामिक दुनिया से सम्बन्धों में संतुलन लाना आसान नहीं था।  गौरतलब है कि 1969 में मोरक्को  के रबात शहर में विश्व के मुस्लिम राष्ट्रों का शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था और इसमें भारत को भी आमंत्रित किया गया था भारत के नेता फखरुद्दीन अली अहमद एक प्रतिनिधिमंडल के साथ वहां पहुंचे भी लेकिन पाकिस्तान के कड़े विरोध के बाद पूर्ण अधिवेशन में भारत को शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी40 साल बाद स्थितियां पूरी तरह से बदल गईपिछले साल अबु धाबी में आयोजित ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन की 46वीं बैठक में भारत की तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नेतृत्व में भारत के प्रतिनिधिमंडल ने इसमें भागीदारी करके पाकिस्तान के विरोध को पस्त कर दियाइसका प्रमुख कारण भारत की  सऊदी अरब तथा संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से स्थापित घनिष्ठ संबंध माने गए जिनका करीबी कभी पाकिस्तान को माना जाता था भारत अमेरिका की  बढ़ती मित्रता,सऊदी अरब के साथ ऊर्जा सुरक्षा तथा यूएई के साथ इकोनॉमिक अफेंडर प्रत्यर्पण समझौते अपना व्यापक असर दिखा रहे है। वहीं पाकिस्तान ने चाबहार बन्दरगाह को लेकर चीन और ईरान के बीच समझौता करवाकर सऊदी अरब से अपने मजबूत संबंधों की बुनियाद हिला दी। सामरिक दृष्टि से इसे पाकिस्तान ने अपनी विजय माना और इसके बाद पाकिस्तान के विदेशमंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर पर सहयोग न करने को लेकर अपने परम्परागत मित्र सऊदी अरब की आलोचना कर दीपाकिस्तान को कुछ समय पहले 3 अरब डॉलर की मदद देकर उसे कंगाली से उबारने को प्रयासरत सऊदी अरब को पाकिस्तान की चुनौती देने वाली विदेश नीति में ईरान से दोस्ती की छाया दिखाई देना स्वाभाविक थी और इसका जवाब पाकिस्तान को मिलना ही था सऊदी अरब ने न केवल पाकिस्तान की दी जाने वाली मदद को बंद करने का ऐलान कर दिया बल्कि बकाया कर्ज जल्दी देने की ताकीद भी दे दी



अब इजराइल और यूएई के सम्बन्ध मजबूत होने से अमेरिका की स्थिति एशिया में मजबूत होगी वहीं इन देशों के प्रमुख सहयोगी के रूप में भारत का उभरने की संभावनाएं बढ़ गई है। ईरान,पाकिस्तान और चीन जैसे  देशों को सामरिक रूप से मजबूत होने के लिए रूस का समर्थन बेहद जरूरी है लेकिन रूस के लिए यह बड़ी चुनौती होगी। 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ था उसके बाद तकरीबन 10 लाख यहूदी वहां से इसराइल  बस गए है, इस समय इजराइल में आबादी का तकरीबन 20 प्रतिशत विघटित सोवियत संघ से आये रूसी मूल के लोगों  का है। इन लोगों का प्रभाव इजराइल और रूस दोनों में है अत: पुतिन इजराइल के खिलाफ किसी सैन्य गठबंधन का समर्थन करें, यह मुश्किल होगा। जाहिर है कूटनीति की दुनिया में भारत,इजराइल,संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के मजबूत सम्बन्ध न केवल आर्थिक और सांस्कृतिक बदलाव ला सकते है बल्कि सामरिक दृष्टि से भी इनका सशक्त प्रभाव कायम हो सकता है।

 

 

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brahmadeep alune

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