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प्रदेश टुडे

                           जिंदगी है तो त्योहार है                                                                                                     डॉ.ब्रह्मदीप अलूने 



दुनिया में होना,रहना और जीना कितना जरूरी है इस पर सबका अपना अपना नजरिया हो सकता है,लेकिन राहत इन्दौरी ने जिंदा रहने को सबसे पहले और कुछ इस कदर जरूरी बताया की बाकी सारी गुंजाईशें ही खत्म हो गई,उन्होंने क्या खूब कहा है,ज़िन्दगी की हर कहानी बेअसर हो जाएगी,हम न होंगे तो यह दुनिया दर-ब-दर  हो जाएगी।”यकीनन जिंदगी है तो ख्वाइशें है,उम्मीदें है,रास्ते है,मंजिलें भी हैजिंदगी है तो चाहते भी होगी और उन्हें पूरी शिद्दत से पूरा करने का जज्बा भी होगा



हिंदुस्तान की सरजमीं पर तो जिंदगी का मतलब जिम्मेदारी है जो ताउम्र चलती रहती है यहां रिश्तों के साथ समाज और राष्ट्र भी ऐसे बंधे होते है कि खुद से ज्यादा सबकी परवाह करनी होती है भला और किसी देश में बूढी दादी को कंधों पर उठाकर वोट दिलवाने के दृश्य कभी देखे है श्रवण कुमार भी तो हिंदुस्तान में ही हुए है जाहिर है यहाँ जिंदगी को खुद की जागीर नहीं समझी जाती,बल्कि उसे समाज और राष्ट्र की सम्पत्ति मानकर उसके पैमाने भी तय किये गए है राजपूतों ने समाज और देश के लिए पीढ़ियों तक अपना खून बहाया,वे यदि खुद की परवाह करते तो महाराणा प्रताप को जंगल में न रहना पड़ता शाहजहाँ ने तो मुमताज को ताजमहल के सहारे सैकड़ों वर्षों से जिंदा रखा है

 

हिंदुस्तान की तहज़ीब पर पश्चिमी एशिया के एक भूगोलविद इदरीश ने तकरीबन एक हजार साल पहले एक दिलचस्प बात कही थी कि,हिंदुस्तानी स्वभाव से इंसाफ पसंद है और वे अपने व्यवहार से कभी नहीं डिगतेउनकी नेकी,ईमानदारी और अपने वादों की वफ़ादारी मशहूर है,और दरअसल वे इन गुणों के लिए इतने मशहूर है कि लोग उनके मुल्क में सब तरफ से आकर इकट्ठा होते है” हिन्दुस्तानियों के जीने का अलहदा लेकिन इंसान पसंद अंदाज सभी को भाता है और जब देश के सामने परेशानियां होती है तब सब ऐसे मिल जाते है कि उनमें हिंदू या मुसलमान की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो जाता है

कोरोना की महामारी के बीच दुनिया परेशान और खौफज़दा है लेकिन भारत के लोगों ने बेहद संयमित होकर इस चुनौती का लगातार सामना किया है। लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न इलाकों में हजारों की संख्या में राह से गुजरते मजदूरों की मदद के लिए कौन खड़ा रहा यह फर्क कर पाना मुश्किल था, वहीं गोधरा की आदम मस्जिद तो कोविड-19 से बचाने के लिए अस्पताल बना दी गई है।



इस दौरान होली और ईद ख़ामोशी से चली गई,जहां दिल और खुशियाँ दोनों मिलते हैक्रिसमस भी बीत गया और इस बार तो शहीदी का शर्बत भी नसीब नहीं हुआ हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में तो त्योहार के नाम पर नियमों की धज्जियां उड़ा दी गई लेकिन हिंदुस्तान की साझा संस्कृति और इसकी विरासत तो सादगी पसंद है

भारत में महामारी का सामना करने को लेकर जो एकता और जागरूकता दिखाई गई उसकी पूरी दुनिया कायल है। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कोरोना से बचाव को लेकर भारत की तारीफ करते हुए  कहा,आओ हम सब करें नमस्ते।” दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश गरीबी,बेकारी और ऐसी कई विषमताओं के साथ खड़ा हुआ है। लेकिन लोगों में लड़ने का जज्बा कमाल का है और इसीलिए कोरोना से बद से बदतर हालात के बाद भी भारत को अन्य देशों से बेहतर बताया जाता है। डब्ल्यूएचओ के अध्यक्ष डॉ. टेडरोज़ आध्यनोम गेब्रेयेसोस ने कोरोना को लेकर हाल ही में चिंता जताते हुए कहा है कि,कुछ देश क्षमता की कमी से जूझ रहे हैं,कुछ संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं और कुछ देश इच्छाशक्ति की कमी से जूझ रहे हैं।” वहीं हमारे लिए यह बेहद सुकून देने वाली भावना है कि भारत में क्षमता और संसाधनों की कमी है लेकिन इच्छा शक्ति गजब की है।


पिछलें कई महीनों से कोरोना का कहर जारी है और अब यह भयानक और इसके सबसे अंतिम दौर में पहुँच गया है। अब यह आसानी से लोगों में संक्रमित हो रहा  है और लोगों के बीच संपर्क से प्रभावी और निरंतरता से फैलने की आशंका बढ़ रही हैसबसे बड़ी चुनौती यह है कि अभी तक कोरोना वायरस का कोई इलाज या टीका नहीं है,ऐसे में इसके नुकसान से बचने के लिए वायरस के विस्तार को रोकना ही सबसे अहम है

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था कि पहले आपको खुद बदलना होगा,जैसा की आप दुनिया को देखना चाहते है। वाकई महामारी के दौर में भी कई लोगों की घर से निकलना मजबूरी है और वे जब वापस घर लौटते है तो असंख्य चिंताओं के साथ घर की चार दिवारी में प्रवेश करते है। इन चिंताओं के बीच भी कई घर उजड़ गए,कई दीप बुझ गए और कई उम्मीदें ध्वस्त हो गई। अभी और लड़ना है इस महामारी से,वह भी बेहद सावधानी से और संयमित होकर। अब ईद आ रही है, ईद-उल-अजहा हजरत इब्राहिम और उनके परिवार द्वारा दी गई स्वयं की इच्छाओं की कुर्बानी को याद करने का ही दूसरा नाम है दुनियाभर के मुसलमानों के लिए यह बहुत पवित्र त्योहार है जहां कुर्बानी के साथ सब मिलकर इसे मनाते है,लेकिन इस समय मानव अस्तित्व को बचाएं रखने की कठिन चुनौती हैईद-ए-कुर्बां का मतलब है बलिदान की भावना। इस बार ईद तो मनाना है लेकिन छोटी मोटी इच्छाओं का बलिदान भी देना होगा और अपने घरों में रहकर ही इसे मनाना होगा। 


आखिर हमारे साथ सबकी जिंदगी की भी तो परवाह करना है। रक्षा बंधन का भावुक कर देने वाला त्योहार भी है इस दौरान,लेकिन बहनें और भाई यह न भूलें कि जिंदगी है तो त्योहार है। इस बार की बची हुई खुशियाँ अगली बार के लिए बचाकर रखे,यकीन रखे, खुशियाँ दूगुनी हो जाएगी। बहरहाल त्योहार तो और भी आयेंगे,खुशियाँ और भी मनाएंगे लेकिन इस समय यह याद रखना जरूरी है कि खुद और दूसरों की नासमझी और गलतियों से अँधेरा हो सकता है,हमें रोशनी की उम्मीदों को अपने और सबके लिए बनाएं रखना है।

 


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