रॉ की मजबूती जरूरी,raw and mission

राष्ट्रीय सहारा

                             रॉ की मजबूती जरूरी

                                                                       डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

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मनोवैज्ञानिक युद्दकला का कूटनीति से गहरा संबंध होता है,वैदेशिक संबंधों और खासकर प्रतिद्वंदी राष्ट्रों की नीतियों का पता लगाने,पहचानने और अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि के लिए उन्हें प्रभावित करने का काम ख़ुफ़िया तंत्र बखूबी करता है अंतराष्ट्रीय राजनीति में जहां कूटनीति राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख तत्व है,वहीं खुफियां तंत्र को कूटनीति का मस्तिष्क माना जाता है। 1968 में स्थापित भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के तेज तर्रार कार्यो से देश को सामरिक और राजनीतिक सफलताओं में बड़ी मदद मिली है,वर्तमान में पड़ोसियों की चुनौतियों के बीच रॉ के मजबूत होने की जरूरत महसूस की जा रही है।



दरअसल राष्ट्रीय हितों की प्रगति के लिए शक्ति के विभिन्न तत्वों को अधिक प्रभावी बनाना कूटनीति से ही संभव हो सकता है और कूटनीति की सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है वह गोपनीय सूचनाएं जिससे राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके भारतीय कूटनीति पर भौगोलिक और सांस्कृतिक तत्व हावी रहे है और इसीलिए यह आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच अधिकांश अनिर्णय की स्थिति में ही रही वैश्विक टकरावों के बीच राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए भारत ने 1968 में रॉ के गठन के साथ आक्रामक रणनीतिक कार्यों को अंजाम देना शुरू किया था पाकिस्तान में आंतरिक अशांति के बाद बांग्लादेश का उदय भारत की आक्रामक कूटनीति का परिणाम था और इसमें रॉ की अहम भूमिका को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से स्वीकार भी किया था। बांग्लादेश बनने के बाद  श्रीमती गांधी ने वहां के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान को यह कहते हुए रॉ प्रमुख से मिलवाया था कि आप चाहे तो हमारे  काव साहब से आपके देश के बारे में कोई भी जानकारी ले सकते है,वे बांग्लादेश के बारे में जितना जानते है शायद हम भी नहीं जानते। वास्तव में रॉ का ख़ुफ़िया तंत्र इतना मजबूत था कि रॉ के एक पूर्व अतिरिक्त सचिव बी.रमन ने अपनी किताब 'द काऊ बॉयज़ ऑफ़ रॉ' में लिखा है कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत के ऊपर हमला करने जा रहा है। 1975 में चीन और वैश्विक के दबाव के बाद भी सिक्किम का भारत में विलय भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी और इसमें रॉ की अहम  भूमिका थी।



इन सबके बीच रॉ के लिए भारतीय राजनीति में परिवर्तन से मुश्किलें भी आई। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे पहले रॉ ने ही पता लगाया था। रॉ एजेंट ने कहूटा में नाई की दुकान के फ़र्श से पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों के बालों के सैंपल जमा किएउनको भारत लाकर जब उनका परीक्षण किया गया तो पता चला कि उसमें रेडिएशन के कुछ अंश मौजूद हैं,जिससे पाक की परमाणु तैयारी का पता चलारॉ के एक एजेंट को 1977 में पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र का डिज़ाइन प्राप्त हो गया थालेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने न सिर्फ़ इसे दस हज़ार डॉलर में खरीदने की पेशकश ठुकरा दी,बल्कि ये बात पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल-हक़ को भी बता दीइस घटना का जिक्र मेजर जनरल वी.के.सिंह ने अपनी किताब ‘सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’में भी किया है वी.के.सिंह रॉ में कई सालों तक काम कर चुके है। 


बाद  में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर सर्विस इंटेलीजेंस की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई और रॉ को नये सिरे से अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ा इसके नतीजे घातक रहे,पंजाब में खालिस्तान की मांग का हिंसक रूप देश ने देखा और 1984 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी गई पाकिस्तान में रॉ के कमजोर होने का फायदा पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी को हुआ जिसने बिना युद्द लड़े भारत में जातीय और धार्मिक अशांति भड़काने की व्यापक योजना को अंजाम देते हुए ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू कर भारत में आतंकवाद बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक कर यह सुनिश्चित किया की पाकिस्तान की आतंकी नीतियों का  जवाब उसके अंदाज में ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत के नये सीक्रेट प्लान सीआईटी एक्स का आगाज हुआ और उसने पड़ोसी देशों को ध्यान में रखकर अपनी आक्रामक रणनीति को अंजाम देना शुरू कर दिया। 


यह वहीं दौर था जब चीन,पाकिस्तान,नेपाल,बांग्लादेश और श्रीलंका से हमारे सम्बन्ध बेहद असामान्य थे। बांग्लादेश में बढ़ती भारत विरोधी  गतिविधियों को रोकने के लिए 1985 में फरक्का को लेकर आपसी सहमति,नेपाल में भारत विरोध को खत्म कर मजबूत सम्बन्ध रखने के लिए नवम्बर 1986 में बंगलौर में सार्क सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सार्क का मुख्यालय काठमांडू में स्थापित करने का कूटनीतिक दांव और 1988 में मालद्वीप में भारतीय वायुसेना के 'ऑपरेशन कैक्टस' के अभियान के बाद भारत विरोधी ताकतों को करारा जवाब देने की कूटनीति के पीछे रॉ की ही अहम भूमिका थी। श्रीलंका भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है। भारतीय तमिलों की श्रीलंका में अच्छी खासी तादाद है और इस मामलें को लेकर दोनों देशों के सम्बन्ध अक्सर प्रभावित होते रहते है। 1986 में श्रीलंका के राष्ट्र प्रमुख जयवर्धने ने एक साल के भीतर तमिल आन्दोलन को कुचलने की घोषणा कर दी थीइस दौरान पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई और अमेरिका की सी.आई.. की श्रीलंका में मौजूदगी के संकेत से दक्षिण की और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी थी इस समय भारत ने श्रीलंका में शांति सेना भेजकर विरोधी देशों की भारत विरोधी रणनीति को खत्म कर दिया था

1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल में जंग चल रही थी,उस समय भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने जनरल मुशर्रफ की एक बातचीत टेप की थी और बाद में इसी से पाकिस्तान के बीजिंग से रणनीतिक संबंधों का खुलासा भी हुआ थायह रॉ की सफलता तो थी जिससे भारत को दुनिया में यह साबित करने में बड़ी मदद मिली की करगिल की घुसपैठ में पाकिस्तान की सेना का सीधा हाथ था लेकिन मलाल यह था कि आखिर पाकिस्तान के भारतीय सीमा में इतनी बड़ी घुसपैठ का सुराग रॉ को पहले क्यों नहीं मिला


इसके पीछे एक प्रमुख कारण 90 के दशक में भारत के विदेश मंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल का वह गुजराल सिद्धांत माना जाता है जिसके अंतर्गत पड़ोसी देशों का विश्वास जीतने के लिए अप्रत्याशित कदम भी उठाये गये थे और उसमें से एक था पाकिस्तान में रॉ की गतिविधियों को विराम दे देना। गुजराल के पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम कर चूके थे,अत: उन्होंने दुश्मन देश के प्रति बेहद सदाशयता दिखाई और इसके दूरगामी परिणाम भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हुए।

शक्ति संतुलन की नीति को विवेकपूर्ण ढंग से संचालित करने के लिए यह आवश्यक है कि नीति निर्धारक शत्रु राज्यों की भविष्य में होने वाली क्षमता और नियत के बारे में भविष्यवाणी कर सकें और यह काम अत्यंत कठिन है। ऐसे में कूटनीतिक सफलता के लिए ख़ुफ़िया एजेंसी निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है।


वर्तमान में नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियाँ चरम पर है,बंगलादेश और पाकिस्तान के संबंध अप्रत्याशित रूप से मजबूत हो रहे है,श्रीलंका,मालद्वीप और ईरान में चीन मजबूत हुआ है, वहीं गलवान घाटी में चीन द्वारा पक्का निर्माण कार्य कर लेने की खबर भी भारत को बहुत देर से मिली। कूटनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से यह चुनौतीपूर्ण है। बहरहाल ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ की मजबूती से भारत की पड़ोसियों पर श्रेष्ठता,महत्ता और कूटनीतिक सफलता सुनिश्चित हो सकती है,इस पर ध्यान देने की जरूरत है।


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