भारत की सामरिक नीति में परिवर्तन की जरूरत indian diplomacy

   प्रजातंत्र      

          भारत की सामरिक नीति में परिवर्तन की जरूरत

                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


                                                                 

शक्ति संतुलन की व्यवस्था अस्थाई और अस्थिर होती है,वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को शांति और स्थिरता बनाये रखने का एक साधन माना जाता है,इसके लिए सबसे ज्यादा जरूरी है वैदेशिक नीति में आवश्यकता के अनुसार बदलाव करना और उसकी गतिशीलता को बनाये रखना। भारत के महान कूटनीतिज्ञ कौटिल्य ने कहा था कि शत्रुओं के प्रयत्नों की समीक्षा करते रहना चाहिए। यह बहुत ही आश्चर्यजनक है कि मध्यकाल में जिस महान अर्थशास्त्री ने अपनी कूटनीति की बदौलत तत्कालीन समय के सबसे सशक्त राजघराने को नष्ट कर दिया था]उस महान कूटनीतिज्ञ को समझने का दावा करने वाले भारतीय वर्तमान में अपने सामरिक हितों की रक्षा करने के लिए संघर्षरत है और इसका प्रमुख कारण यथार्थवादी वैदेशिक नीति का अभाव रहा है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यथार्थवादी सिद्धांत यह कहता है कि किसी सम्प्रभु राष्ट्र के लिए शक्ति,शक्ति संतुलन,राष्ट्रीय हित और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी संकल्पनाएं महत्वपूर्ण है और राष्ट्र की सुरक्षा उसका स्वयं का दायित्व है।



दरअसल सीमा पर चीन की लगातार चुनौतियों से उत्पन्न हुई परिस्थितियां भारत के वैदेशिक सम्बन्धों को नये सिरे से परिभाषित कर रही है और इसका प्रभाव आने वाले समय में देखने को मिल सकता है। विश्व राजनीति में पिछले कुछ दशकों में तेजी से परिवर्तन आया है तथा इन परिवर्तनों ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रतिमानों को भी बदल दिया है। बदलती विश्व व्यवस्था ने नए वैश्विक किरदारों को जन्म दिया है और सोवियत संघ के विघटन के बाद तो पूरा वैश्विक परिदृश्य ही बदल गया है। 1962 में चीन युद्ध के बाद भारत चीन युद्ध और भारत की नाकामी ने यह एहसास कराया था कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति स्वप्नलोक से नहीं बल्कि सतर्क नीतियों से चलती है तथा किसी भी देश की विश्व राजनीति में भूमिका उसके आर्थिक] राजनीतिक व सैनिक शक्ति के रुप में विकास व स्थिति पर निर्भर करती है। खासकर 1962 के युद्ध ने भारत के आर्थिक और सामरिक कमजोरी को उजागर किया तथा यह स्पष्ट हो गया कि ऐसी कमियों के चलते विश्व राजनीति में स्थान बनाना नामुमकिन है।

70 का दशक भारत की विदेशनीति में बदलाव लेकर आया जब 1971 में इंदिरा गांधी ने एक रणनीतिक रक्षा संधि कर भारत की पारम्परिक गुटनिरपेक्ष नीति को बदल दिया। इस दौर में यह कहा जाने लगा कि भारतीय विदेश नीति यथार्थवाद की ओर बढ़ रही है। सोवियत संघ से मैत्री संधि तथा बंगलादेश के स्वतंत्र राज्य के रुप में उदय में उसकी निर्णायक भूमिका ने अंतर्राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर भारत के कद को बढाया। यह सोवियत संघ से मित्रता ही थी कि अमेरिकी नौसैनिक बेड़ा हिन्द महासागर से ही लौट गया और चीन को खामोशी से अपने मित्र राष्ट्र पाकिस्तान के टुकड़े होते देखना पडा। संयुक्त राष्ट्र संघ में अनेक मौकों पर भारत का रुस ने सहयोग कर अप्रिय स्थिति से बचाएं रखा। यहां तक कि सुरक्षा परिषद में सदस्यता को लेकर भारत के दावे को रुस पुरजोर तरीके से उठाता रहा है और कश्मीर को लेकर अमेरिका ने कई बार भारत को घेरने की कोशिश की लेकिन रुस के कारण उसे नाकाम होना पडा।



वर्तमान में रुस भारत का एक प्रमुख सामरिक सहयोगी देश है। भारतीय नौसेना लगभग पूरी तरीके से रुसी उपकरणों तथा रुसी हथियारों से लैस है और भारतीय वायुसेना में भी 70 प्रतिशत हथियार और उपकरण रुस में उत्पादित है। दुनिया के किसी भी दूसरे देश के साथ भारत का इतने विशाल स्तर पर सामरिक सहयोग नहीं है।1974 में भारत द्वारा किया गया परमाणु परीक्षण हो या युद्धपोत पनडुब्बी,आधुनिकतम टैंक]मिसाइल तकनीकी]स्पेस तकनीकी या पंचवर्षीय योजनाएं रुस ने एक अच्छे मित्र की तरह सदैव भारत के पक्ष में आवाज बुलन्द की है। पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा भी था कि रुस एक भरोसेमंद विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार है और हमारी विदेश नीति का स्तम्भ है। वास्तव में रुस ने लगातार भारत से मित्रता को साबित भी किया।

लेकिन इन सबके बीच इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि विश्व मंच पर भारत के पारम्परिक मित्र रूस की भूमिका चीन को लेकर अलग रही है और भारत के लिए इसके घातक परिणाम हुए है। चीन और भारत के बीच सीमा पर हाल में हिंसक संघर्ष के बाद युद्द जैसी स्थितियों में भारत के परम्परागत मित्र रूस ने ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं की जिसकी उससे अपेक्षा की जाती है। 2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी और रुस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की मुलाकात हुई थी तो नरेन्द्र मोदी की वह बात सबसे ज्यादा चर्चित हुई थी की,भारत में बच्चा भी जानता है कि रुस भारत का सबसे अच्छा दोस्त है।

भारत के सबसे बड़े सामरिक दोस्त रूस पर भारत का भरोसा संकटकाल में बहुत ज्यादा बढ़ जाता है लेकिन चीन को लेकर स्थितियां भयानक रूप से विपरीत देखी गई है। 1962 के भारत चीन युद्द में रूस के सर्वोच्च नेता खुश्चेव ने भारत को लड़ाकू विमानों की खेप भेजने में देरी करके अप्रत्यक्ष रूप से चीन की मदद की थी। इस समय यह माना गया कि रूस यह मानता है कि भारत उसका दोस्त है लेकिन चीन उसका छोटा भाई है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि यह वह दौर था जब चीन,तत्कालीन सोवियत संघ को अपना पारम्परिक शत्रु बताता रहता था और यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी की रूस भारत की कीमत पर चीन को मदद दे सकता है। भारत से युद्द के बाद चीन  का 1969 में आमूर और उसुरी नदी के तट पर रूस से युद्द हुआ था और रूस की परमाणु हमलें की धमकी के बाद चीन ने वहां से कदम पीछे खींच लिए थेलेकिन 1991 में सोवियत संघ के विघटन और वैश्वीकरण की नीति के बाद वैश्विक परिस्थितियां बदलने के साथ चीन का आर्थिक दबदबा बढ़ा और उसे रूस पर बढ़त हासिल हो गई इसी का प्रभाव है कि चीन का रूस से सीमा विवाद लगभग समाप्त हो चूका है2004 में  रूस और चीन के बीच हुए समझौते में सेंट्रल एशिया के कई द्वीपों को रूस ने चीन को सौंप दिया था इस समय चीन और रूस आर्थिक साझेदारी को लगातार बढ़ा रहे है,चीन रूस से गैस और हथियार खरीद रहा है,वहीं चीन की कई कम्पनियां रूस में बड़े पैमाने पर निर्माण में मदद कर रही है



दुनिया के सबसे बड़े आर्थिक गलियारे ‘वन बेल्ट-वन रोड’ परियोजना को लेकर 2017 में चीन में  द्वारा आयोजित शिखर सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन शामिल हुए थे जबकि भारत ने इसके मार्ग को विवादित बताकर इस सम्मेलन का बहिष्कार किया गौरतलब है कि पाकिस्तान और चीन के बीच सीपीईसी और काराकोरम हाइवे का जो संबंध है उसमें भारत का विरोध हैभारत का विरोध इसलिए है कि चीन ने बिना भारत की अनुमति के पीओके से रास्ता निकाल दिया,जबकि यह इलाका भारत के अंतर्गत आता है। भारत चीन के बीच सीमा विवाद में यह क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण है और भारत ने अब अपने नक्शे में अक्साई चीन को अपना इलाका बताकर चीन की विस्तारवादी नीति को कड़ा संदेश भी दिया है।

पिछले एक दशक में चीन ने दक्षिण चीन सागर में चीन ने अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए आक्रामक नीति का सहारा लिया है,अमेरिका समेत हिन्द महासागर के तटीय देशों से चीन के सम्बन्ध बेहद खराब है,अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वॉर हो या अन्य विवादित मुद्दे,रूस को कभी भी चीन  का  विरोध करते नहीं देखा गया। उत्तर कोरिया और ईरान जैसे मुद्दों पर भी रूस और चीन के एक सुर देखने को मिले। यहाँ तक कि कोविड-19 को लेकर चीन पर वैश्विक शिकंजे के बीच रूस ने अमेरिका को नसीहत दे डाली की वह बिना सबूत के चीन पर दबाव बनाने की कोशिश न करें।

 

बदली हुई वैश्विक परिस्थितियों का प्रभाव रूस और भारत के सम्बन्धों पर भी पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने लडाकू विमान खरीदने में फ्रांस,अमेरिका और इजराईल से समझौते किए है। भारत का रूस सबसे बड़ा सामरिक साझेदार है अत: भारत के अन्य देशों से रक्षा समझौतों को उसके लिए  बड़ा नुकसान माना गया। इस बीच रूस ने चीन के साथ ही पाकिस्तान से सामरिक सहयोग करने में दिलचस्पी दिखाई और पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष और नेताओं ने रुस की लगातार  यात्राएं भी की। इस प्रकार रूस का हथियारों की बिक्री को लेकर व्यवसायिक दृष्टिकोण सामने आ रहा है। रुस हमारा पुराना मित्र और बड़ा सहयोगी रहा है लेकिन चीन और पाकिस्तान ने रूस से मजबूत सम्बन्ध करके भारत-रूस सम्बन्धों की विश्वसनीयता को प्रभावित किया है।

इस समय भारत की सबसे बड़ी चुनौती चीन का सामना करने को लेकर है और इसके लिए भारत को सामरिक,आर्थिक और वैश्विक मोर्चे पर एक मजबूत मित्र की जरूरत है।  भारत-चीन की प्रतिद्वंदिता में रूस का रुख जहां भारत के अनुकूल नहीं माना जा सकता वहीं इस मामलें में अमेरिका ने मजबूती से भारत का साथ दिया है।1962 के युद्द में भी अमेरिका ने अपने युद्दक विमानों को भारत की मदद के लिए भेजने का विश्वास दिलाकर चीन पर ऐसा मनौवैज्ञानिक दबाव डाला कि वह युद्द से पीछे हटने  को मजबूर हो गया था। हाल के भारत चीन सीमा तनाव के बीच अमेरिकी प्रशासन ने भारत के कदमों की सराहना करते हुए चीन की आलोचना की थी।

वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है और न ही कोई स्थाई शत्रु होता है। 1991 में सोवियत संघ के विघटन और उदारीकरण की शुरुआत ने विश्व को एक ध्रुवीय किया तथा एक बाजार के रुप में भारत की पहचान बनी। अपने आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अमेरिका का भारत को गले लगाना लाजमी था और आज वह भारत का सबसे विश्वसनीय मित्र कहा जाता है,इतना विश्वसनीय कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा को दुनिया मिस्टर ओबामा कहती थी जबकि भारतीय प्रधानमंत्री ने उन्हें बराक कहने में भी संकोच नहीं  किया।


तिब्बत,हांगकांग,ताईवान और दक्षिण चीन सागर पर चीन के आक्रामक नीतियों को लेकर अमेरिका मुखर रहा है और उसकी यह नीति भारत के अनुकूल है। चीन वन चाईना नीति को लेकर सजग रहा है और भारत उसे इसी आधार पर चुनौती दे सकता है।  कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन की अलग वीजा देने की नीति भारत के लिए असहज रही है। यही वह मौका है जब भारत को हांगकांग में लोकतंत्र की बहाली की मांग करना चाहिए,ताईवान को अलग से वीजा और तिब्बत की स्वायतता का समर्थन करना चाहिए। जाहिर है इन मुद्दों पर भारत और अमेरिका मिलकर चीन को घेर सकते है,चीन पर दबाव डालने के लिए भारत की विदेश नीति में यथार्थवादी बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है।

बहरहाल दक्षिण एशिया और हिमालय में मिलने वाली चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारत को मजबूत सामरिक भागीदारी की जरूरत है। अमेरिका इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन के लिए न केवल एक बेहतर विकल्प बन सकता है बल्कि चीन और पाकिस्तान को रोकने के लिए अमेरिकी आक्रामकता भारत की थल और जल सीमा के लिए भी बेहद मददगार और कारगर हो सकती है। राष्ट्रहित सर्वोपरी होते है और भारत को सीमा की सुरक्षा के लिए अपनी सामरिक नीति में परिवर्तन करने की और मजबूती से आगे बढ़ना  चाहिए।

 

 


1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

Very informative Article sir...Well analysed.

brahmadeep alune

खालिस्तान का खेल khalistan panjab rashtriya sahara

  राष्ट्रीय सहारा                                                                                                         रॉकेट प्...