चाबहार पर चीनी दांव chhabhar china india

राष्ट्रीय सहारा

चाबहार पर चीनी दांव

                डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

अरब सागर के तट पर कराची बंदरगाह,ग्वादर बंदरगाह,कांडला बंदरगाह,मुंबई बंदरगाह और चाबहार भी हैभारतीय उपमहाद्वीप और अरब क्षेत्र के बीच हिन्द महासागर का हिस्सा है और भारत की कई नदियों का पानी फारस की खाड़ी में जाकर मिलता हैभारत के ईरान के साथ राजनीतिक,सांस्कृतिक,ऐतिहासिक और आर्थिक संबंधों के बाद  साल 2016 में  रणनीतिक क्षेत्र में अहम भागीदारी चाबहार के रूप में सामने आई थी जब ओमान की खाड़ी में स्थित चाबहार बंदरगाह पर भारत और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ थाइसे ईरान के दक्षिण समुद्र तट को भारत के पश्चिमी समुद्र तट से जोड़ने का रणनीतिक दांव माना गया था।  इस परियोजना से पाकिस्तान और चीन को न केवल सामरिक और आर्थिक तौर पर बेहतर जवाब दिए जाने की सम्भावना बढ़ी थी बल्कि अफगानिस्तान में भारत की स्थिति भी मजबूत हुई थी।


अब चाबहार बंदरगाह को लेकर 2016 में हुए भारत से समझौते को ईरान ने रद्द कर दिया है उसने हाल ही में चीन पर भरोसा जताते हुए उससे चार सौ अरब डॉलर के रणनीतिक निवेश को लेकर समझौता  किया है जिसके अनुसार ईरान भारत के साथ चाबहार से अफ़ग़ानिस्तान सीमा पर ज़ाहेदान तक रेल लाइन बिछाने को लेकर काम नहीं करेगा बल्कि अब इस प्रोजेक्ट को चीन के सहयोग से पूरा किया जायेगा

दरअसल मध्यपूर्व स्थित मेसोपोटामिया और फारस की खाई जैसी मरुभूमि  अपनी तेल संपदा के चलते वहां के नागरिकों के लिए वरदान भले ही हो लेकिन मध्य पूर्व  की शांति के लिए अभिशाप से कम नहीं हैयदि हम कहे कि इस क्षेत्र का तेल सारी समस्याओं का कारण और सारे तर्कों का जवाब है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं हो सकती ब्रिटेन के औपनिवेशिक प्रशासक सर औलेफ़ कैरो ने तेल के कुँओं को ‘शक्ति कूप या वेल्स ऑफ पावर’ का नाम दिया था। वास्तव में मध्य एशिया की राजनीति को तेल की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति से अलग कर देखना असंभव है वहीं मध्य पूर्व को लेकर भारत की विदेश नीति एक उलझी हुई गुत्थी के समान है जिस पर सम्भावनाएं तो अनन्त नजर आती है लेकिन यह सदैव आशंकित रहती हैइसका  प्रमुख कारण भौगोलिक,ऐतिहासिक,सामाजिक,धार्मिक,सामरिक और आर्थिक  तो है ही साथ ही इस समूचे परिक्षेत्र पर अमेरिका और पाकिस्तान  का प्रभाव भी है। ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक राजनीति में भारी बदलाव आये है और उससे भारत ईरान संबंधों को प्रभावित होना ही थाईरान के तेल बेचने पर अमेरिकी प्रतिबन्ध और सऊदी अरब की कड़ी सुन्नी प्रतिद्वंदिता के चलते यह देश बदहाल हैवह अपने आर्थिक जीवन के प्रमुख आधार तेल को बेचना चाहता है और उसकी अपेक्षा अपने पारम्परिक मित्र  भारत से बढ़ जाती है। साल 2016 में अमेरिकी सत्ता ट्रम्प के हाथों में आने के बाद ट्रंप ने दुनिया के देशों को धमकी देते हुए कहा था कि ईरान से व्यापार जो करेगा वो अमरीका से कारोबारी संबंध नहीं रख पाएगा। वैश्वीकरण के युग में भारत के विश्वस्त  सहयोगी बन चूके अमेरिकी  नीति का असर भारत पर पड़ना ही था। ईरान से सबसे ज्यादा  तेल खरीदने वाला देश भारत को न चाहते हुए भी वैश्विक मजबूरियों में इसका परिपालन करना पड़ा।  करीब आठ महीने पहले ईरान के  विदेशमंत्री ने भारत के पत्रकारों  के सामने ईरान को लेकर भारत की अमेरिका प्रभावित नीति को रणनीतिक भूल बताते हुए चाबहार के भविष्य पर चिंता जताई थी


भारत के लिए शिया बाहुल्य ईरान से मजबूत सम्बन्ध और इसकी स्थिरता सामरिक और आर्थिक रूप से बेहद जरूरी मानी जाती  है। ईरान न केवल भारत को तेल उपलब्ध कराता रहा है बल्कि पाकिस्तान को रोकने की भारत की सामरिक नीति का बढ़ा अहम सदस्य माना जाता है। देखा गया है कि चीन और पाकिस्तान की सामरिक प्रतिबद्धताएं भारत,ईरान और अफगानिस्तान के लिए संकट पैदा कर रही है। इसके जवाब में भारत ने आगे बढ़कर  अपने विश्वसनीय इस्लामिक देश ईरान का सहारा लिया था। 500 मिलियन डॉलर की भारी भरकम रकम खर्च कर भारत ने चाबहार पत्तन  से पाकिस्तान-चीन के महत्वाकांक्षी ग्वादर बंदरगाह के बहुत करीब पहुँच कर चीन की वन बेल्ट वन परियोजना को चुनौती देने की संभावना जगाई थी ईरान,यूरेशिया और हिन्द महासागर के मध्य एक प्राकृतिक प्रवेश द्वार है,जिससें भारत रूस और यूरोप के बाजारों तक आसानी से पहुंच सकता हैभारत,ईरान और रूस के मध्य 16 मई 2002 को इस सम्बन्ध में एक समझौता हुआ था जिसके द्वारा ईरान होकर मध्य एशियाई राज्यों तक निर्यात करने के लिए एक उत्तर दक्षिण कॉरिडोर का निर्माण किया जा सके भारत से यूरोप होते हुए सेंट पीट्सबर्ग और रूस जाने वाले पारंपरिक मार्ग के बजाय इस मार्ग से समय में लगभग 40 प्रतिशत और खर्च में 30 प्रतिशत की बचत होती।


यह अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में राजनीतिक अर्थव्यवस्था का आधिपत्यवादी स्थायित्व का सिद्धांत है,जिसके अंतर्गत एक प्रभुत्वकारी राष्ट्र व्यापारिक जहाजों के आवागमन के लिए अबाधित मार्ग उत्पन्न करता है तथा अन्य राज्यों की संरक्षणवादी नीतियों को परिवर्तित करने की क्षमता रखता है एशिया महाद्वीप की दो महाशक्तियां भारत और चीन की सामरिक प्रतिस्पर्धा समुद्री परिवहन और पारगमन की रणनीति पर देखी जा सकती है। चीन की पर्ल ऑफ स्प्रिंग के जाल को भेदने के तौर पर चाबहार बंदरगाह के रूप में भारत ने बेहद सामरिक दांव खेला था। चीन से चुनौती के बीच चाबहार  बंदरगाह भारत की आर्थिक ताकत बनने की आशा के प्रतीक कब तौर पर भी देखा जा रहा था गुजरात के कांडला बंदरगाह से केवल छह दिनों में चाबहार पहुंचना और वहां से रेल या सड़क के माध्यम से सामान आगे पहुंचाया जा सकने की संभावना भारत के लिए बहुत ही लाभदायक हो सकती थीभारत को ईरान से तेल,गैस और मध्य-एशिया के लिए कनेक्टिविटी चाहिए थी जिससे ताकि पाइपलाइन के ज़रिए गैस भारत लाई जा सके और इसके बदले में भारत का ईरान में निवेश बढने की संभावना भी मजबूत होतीभारत के लिए ईरान और अमेरिका से सम्बन्धों में नियन्त्रण और संतुलन कायम रखना मुश्किल था,अत: चीन को ईरान में बढ़त हासिल करने में कोई मुश्किल नहीं हुई और चाबहार का बदला घटनाक्रम इसी का परिणाम है।



बहरहाल भारत के लिए चाबहार पत्तन पर आधिपत्य का अवसर खोना रणनीतिक रूप से नुकसानदायक है तथा मध्यपूर्व में चीन की उपस्थिति से ईरान की मुश्किलें बढ़ सकती है। वहीं आने वाले समय में इजराइल और अमेरिका के साथ भारत का सामरिक सहयोग भी बढ़ सकता है और यह विविधता वाले भारत के लिए चुनौतीपूर्ण होगा।


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