बुधवार, 29 जुलाई 2020

चीन की सामरिक घेराबंदी, Strategic siege of china

जनसत्ता 

                     चीन की सामरिक घेराबंदी                                                     

                                                         ब्रह्मदीप अलूने


साम्यवादी चीन का अपने देश की राष्ट्रीय सीमा का कोई स्पष्ट मानचित्र नहीं है। वह संयुक्तराष्ट्र में भरोसा नहीं रखता और इस देश की कम्युनिस्ट पार्टी उग्र राष्ट्रवाद की नीति से पोषित होकर प्राचीन चीनी सभ्यता,उसके राजवंश और इतिहास के आधार पर वृहत चीन साम्राज्य स्थापित करने की संकल्पना  के साथ संचालित है पड़ोसी देशों की संप्रभुता और समुद्र की स्वायत्ता को चुनौती देने की चीन की यह विस्तारवादी नीति अंतर्राष्ट्रीय शांति को लगातार खतरे में डाल रही हैद्वितीय विश्व युद्द के बाद संयुक्तराष्ट्र की स्थापना उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को खत्म करने तथा विश्व शांति की स्थापना के लिए की गई थी संयुक्तराष्ट्र में पांच महाशक्तियों के साथ  सुरक्षा परिषद का गठन इसीलिए किया गया था जिससे विश्व में सामूहिक सुरक्षा की भावना को बढ़ावा मिलेइसके साथ ही ऐसे राष्ट्रों के खिलाफ निरोधात्मक और दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सके जो अपनी तानाशाही और  आक्रामक प्रवृत्ति से अंतर्राष्ट्रीय शांति को भंग करते है तथा  अपनी विस्तारवादी नीति से छोटे और शांतिप्रिय राष्ट्रों की अखंडता को समाप्त करना चाहते है


चीन सुरक्षा परिषद का अहम सदस्य है और इसके बाद भी वह अपने वैश्विक दायित्व के प्रतिकूल व्यवहार कर संयुक्तराष्ट्र की शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की भावना को लगातार चुनौती दे रहा हैसंयुक्तराष्ट्र पर चीन आर्थिक और राजनीतिक रूप से हावी है अत: चीन को प्रतिसंतुलित करने के लिए अब दुनिया के कई देश लामबंद हो रहे है, इस समय अमेरिका भी एशिया की क्षेत्रीय ताकतों के बूते चीन की सामरिक घेराबंदी करने के लिए प्रयासरत है


अमेरिकी विदेश नीति में एशिया प्रशांत क्षेत्र को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है,चीन के उभार को रोकने के लिए कूटनीति और सामरिक रूप से अमेरिका एशिया के कई इलाकों में अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ा रहा हैओबामा काल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया थाओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को जोड़ने की नीति पर भी काम किया जो चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान है इन देशों में भारत समेत इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओ स और वियतनाम जैसे देश शामिल है इनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है कजाकिस्तान,कम्बोडिया और दक्षिण कोरिया की सम्प्रभुता को चुनौती  देते हुए चीन इन्हें ऐतिहासिक रूप से अपना बताता है,नेपाल और भारत के कई इलाकों पर तथा दक्षिण चीनी समुद्र पर भी चीन का इसी प्रकार का दावा है


दक्षिणी चीन सागर,प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच स्थित समुदी मार्ग से व्यापार का बेहद महत्वपूर्ण इलाक़ा है। इंडोनेशिया और वियतनाम के बीच पड़ने वाला समंदर का ये हिस्सा,क़रीब 35 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का 20 फ़ीसदी हिस्सा यहां से गुज़रता है।  सात देशों से घिरे दक्षिणी चीन सागर  को लेकर चीन और अन्य  देशों के बीच गहरा तनाव रहा है और कई बार युद्द जैसी स्थितियां भी निर्मित हुई है। फिलीपींस के पास स्कारबरो शोल एक छोटा सा द्वीप है,जिसका अपना रणनीतिक महत्व है चीन से यह 500 किलोमीटर दूर है लेकिन इसके बाद भी साल 2012 में चीन ने अपना लड़ाकू जहाज़ भेजकर उस पर कब्जा कर लिया था  इसे लेकर फिलीपींस से चीन की कई महीने तक तनातनी रही और हालात जंग जैसे बन गए थे यह विवाद अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में गया और फैसला जब फिलीपींस के पक्ष में हुआ तो चीन ने उसे मानने से इंकार कर संयुक्तराष्ट्र के नियमों की अनदेखी कर दी दक्षिण चीन सागर के मलक्का जल संधि और ताइवान जल संधि के मध्य लगभग 200 छोटे छोटे द्वीप है,जिनमें पारासेल और स्प्रेटले द्वीप प्रमुख है जिसका बेहद सामरिक महत्व है  जापान के तेल आयात का 75 फीसदी भाग इस क्षेत्र से होकर गुजरता है  तेल और प्राकृतिक गैस से भरपूर इस इलाके पर चीन और फिलीपींस दोनों दावा करते है अमेरिका फिलीपींस के दावे का समर्थन करता है जबकि पारसेल्स पर चीन का नियन्त्रण है जिस पर ताइवान और वियतनाम भी अपना दावा जा चूके है इसी क्षेत्र में वूडी द्वीप में चीन ने हवाई पट्टी का निर्माण किया है इस इलाके में चीन को लेकर भारी तनाव है और इसका असर दुनिया में हथियारों की खरीददारी पर भी पड़ा है पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के दस सबसे बड़े भारी हथियार खरीदने वाले देशों में से अग्रणी 6 एशिया और पैसेफिक इलाके के देश हैं जिसमें चीन,ऑस्ट्रेलिया,भारत,पाकिस्तान,दक्षिण कोरिया और वियतनाम शामिल है  यदि पाकिस्तान को छोड़ दे तो बाकी देशों ऑस्ट्रेलिया, भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम से चीन का दक्षिण चीन सागर पर आधिपत्य को लेकर विवाद है  चीन के दक्षिण में वियतनाम,लाओस तथा म्यांमार है तथा वियतनाम  के साथ उसका युद्ध भी हो चुका है। चीन के मुताबिक वियतनाम पर भी उसका हक है,चीन इसका आधार 14 वी सदी में मिंग राजवंश के यहाँ स्थापित शासन को बताता है। भारत और वियतनाम के बीच दक्षिण चीन सागर में प्राकृतिक गैस उत्खनन को लेकर समझौता हुआ था और इसका चीन ने विरोध भी किया था पिछले साल पेंटागन ने मलेशिया, इंडोनेशिया,फिलीपींस और वियतनाम को 34 स्कैन ईगल ड्रोन बेचने की घोषणा कर यह साफ  कर दिया था कि 4.7 करोड़ डॉलर का यह सौदा ड्रोन खुफिया जानकारी जुटाने में मददगार बनेगा जिससे दक्षिण चीन सागर पर चीन की बढ़ती दखलंदाजी को दबावपूर्वक रोका जा सके


पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू आइलैंड को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है,चीन ने इस आइलैंड में साल 2012  से अपने जहाज और विमान  भेजना शुरू किया और तब से ही जापान और चीन के बीच विवाद बढ़ गया है  चीन का कहना है कि वह इसी का द्वीप है जिसे जापान ने उससे 1895 के युद्द में चीन लिया था  चीन जापान विवाद के बीच अमेरिका जापान को खुला और मुखर समर्थन दे रहा है,जापान और अमेरिका के बीच साल 2004 में प्रक्षेपात्र रक्षा प्रणाली के संबंध में समझौता भी हुआ था  जापान की नई रक्षा नीति में दक्षिणी द्वीपों को प्राथमिकता देते हुए वहां  सैनिकों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी की गई है,यह दक्षिणी द्वीप चीन के निकट है  जापान अब चीन को बड़े खतरे की तरह देख रहा है और इसका प्रभाव उसकी सामरिक नीति पर भी देखा जा सकता है  अमेरिका के द्वारा जापान को भारत तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ बेहतर संबंध रखने को प्रेरित किया जा रहा है जिससे चीन को नियंत्रित किया जा सके इसके सामरिक प्रभाव भी देखे जा रहे है  इस वर्ष के अंत में भारतीय नौसेना,ऑस्ट्रेलियाई,अमरीकी और जापानी नौसेना के साथ मिलकर बंगाल की खाड़ी में अभ्यास करेगी। 2007 से ही इन देशों के बीच समुद्री सामरिक सहयोग बढ़ाया गया है और इस पर चीन नकारात्मक प्रतिक्रिया देता रहा है।


हिन्द महासागर में समुद्री संचार मार्गों पर इंडोनेशिया का प्रभाव है। मलक्का,सुंडा, और लौम्बोक संधि इंडोनेशिया के निकट है तथा इन्ही मार्गों से होकर चीन और जापान के लिए जाने वाले समुद्री जहाज गुजरते है। इंडोनेशिया के गश्ती जहाज़ों ने चीन के एक जहाज़ को पकड़ लिया था जिसके बाद  चीन ने बड़े जंगी जहाज़ इलाक़े में भेजकर इंडोनेशिया पर दबाव बनाया था और आख़िर में इंडोनेशिया को चीन के जहाज़ को छोड़ना पड़ा था। इस साल की शुरुआत में चीन और मलेशिया के जहाजों को लेकर भी दोनों देशों के बीच एक महीने तक स्टैंड ऑफ़ रहा था तथा अमरीका,ऑस्ट्रेलिया और जापान ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत चीन को चेतावनी भी दी थी

एशिया में चीन जमीन और समुद्र में लगातार आक्रामक नीतियां अपनाएं हुए है उसके बाद यह संभावना बढ़ गई है की जिस प्रकार अमेरिका ने रूस को घेरने के लिए नाटो का विस्तार कर रूस के पड़ोसी देशों के साथ सुरक्षा संधि की थी उसी तर्ज पर चीन को घेरने की नीति अपनाई जा सकती है। भारत,ऑस्ट्रेलिया,जापान और अमेरिका लगातार एशिया प्रशांत के समुद्र में अपनी शक्ति बढ़ा रहे है,अमेरिका के नेतृत्व में दि क्वाड्रिलैटरल सिक्युरिटी डायलॉग या क्वॉड की रणनीति पर काम किया जा रहा हैहाल ही में इसमें न्यूज़ीलैंड, दक्षिण कोरिया और वियतनाम को जोड़कर इसे क्वॉड प्लस नाम दिया गया हैअमरीका के आधुनिक युद्धपोत  चीन के सामने तैनात है यूएसएस निमित्स के कमांडर रियर एडमिरल जेम्स कर्क ने दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और चीन के जहाजों के आमने सामने आने की बात भी स्वीकारी है


चीन के उत्तर पूर्व में उत्तर कोरिया है तथा पूर्व में जापान है। कोरियाई प्रायद्वीप में चीन और उत्तर कोरिया को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैदक्षिण कोरिया की 1953 से अमरीका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अठ्ठाइस हजार से ज्यादा अमरीकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं मिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार है

चीन के दक्षिण में वियतनाम,लाओस तथा म्यांमार है तथा दक्षिण पश्चिम में नेपाल,भूटान तथा भारत है। इन सभी देशों से चीन का विवाद है,वियतनाम ने पिछलें कुछ सालों में हथियारों की संख्या में भारी इजाफा करके चीन को जवाब देने की तैयारी की है वहीं भारत गलवान के बाद ज्यादा मुखरता से सामने आया है। चीन के पश्चिम में ताजीकिस्तान तथा किर्गिस्तान है वहीं उत्तर पश्चिम में कजाकिस्तान है। ये सभी देश अमेरिका के सामरिक सहयोगी है और चीन से इनका सीमाई विवाद बना हुआ है। 


चीन के उत्तर में मंगोलिया है जिस पर चीन अपना अधिकार बताता रहा है,वहीं चीन के दक्षिण पूर्व में हांगकांग,ताइवान और मकाऊ है। हांगकांग को लेकर चीन पूरी दुनिया के निशाने पर है तथा ताइवान चीन के खिलाफ कोई भी कदम उठाने से गुरेज नहीं करता। अमेरिका से हथियार खरीदने की ताइवान की नीति चीन का प्रतिरोध कर रही है। चीन के दक्षिण पूर्व में इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया भी चीन के खिलाफ है,वहीं आसियान के देश में चीन की चुनौती को देख रहे है


आने वाले समय में इस बात की भरपूर संभावना है कि चीन की जमीनी सीमा से लगे अधिकांश देश और दक्षिण चीन सागर से लगे सभी देश अमेरिका,जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर सामूहिक रूप से किसी स्पष्ट सामरिक रणनीति के तहत् काम कर सकते है चीन से सीमाई विवादों में उलझे देश यह समझ गये है कि द्विपक्षीय सम्बन्धों और वार्ताओं से चीन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता,सामूहिक सुरक्षा की नीति पर चलकर और चीन की सामरिक  घेराबंदी करने  से ही चीन की विस्तारवादी नीति को रोका जा सकता है

 

 


रॉ की मजबूती जरूरी,raw and mission

राष्ट्रीय सहारा

                             रॉ की मजबूती जरूरी

                                                                       डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

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मनोवैज्ञानिक युद्दकला का कूटनीति से गहरा संबंध होता है,वैदेशिक संबंधों और खासकर प्रतिद्वंदी राष्ट्रों की नीतियों का पता लगाने,पहचानने और अपने राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि के लिए उन्हें प्रभावित करने का काम ख़ुफ़िया तंत्र बखूबी करता है अंतराष्ट्रीय राजनीति में जहां कूटनीति राष्ट्रीय शक्ति का प्रमुख तत्व है,वहीं खुफियां तंत्र को कूटनीति का मस्तिष्क माना जाता है। 1968 में स्थापित भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के तेज तर्रार कार्यो से देश को सामरिक और राजनीतिक सफलताओं में बड़ी मदद मिली है,वर्तमान में पड़ोसियों की चुनौतियों के बीच रॉ के मजबूत होने की जरूरत महसूस की जा रही है।



दरअसल राष्ट्रीय हितों की प्रगति के लिए शक्ति के विभिन्न तत्वों को अधिक प्रभावी बनाना कूटनीति से ही संभव हो सकता है और कूटनीति की सफलता के लिए सबसे ज्यादा जरूरी होता है वह गोपनीय सूचनाएं जिससे राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सके भारतीय कूटनीति पर भौगोलिक और सांस्कृतिक तत्व हावी रहे है और इसीलिए यह आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच अधिकांश अनिर्णय की स्थिति में ही रही वैश्विक टकरावों के बीच राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए भारत ने 1968 में रॉ के गठन के साथ आक्रामक रणनीतिक कार्यों को अंजाम देना शुरू किया था पाकिस्तान में आंतरिक अशांति के बाद बांग्लादेश का उदय भारत की आक्रामक कूटनीति का परिणाम था और इसमें रॉ की अहम भूमिका को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से स्वीकार भी किया था। बांग्लादेश बनने के बाद  श्रीमती गांधी ने वहां के पहले राष्ट्रपति मुजीबुर्रहमान को यह कहते हुए रॉ प्रमुख से मिलवाया था कि आप चाहे तो हमारे  काव साहब से आपके देश के बारे में कोई भी जानकारी ले सकते है,वे बांग्लादेश के बारे में जितना जानते है शायद हम भी नहीं जानते। वास्तव में रॉ का ख़ुफ़िया तंत्र इतना मजबूत था कि रॉ के एक पूर्व अतिरिक्त सचिव बी.रमन ने अपनी किताब 'द काऊ बॉयज़ ऑफ़ रॉ' में लिखा है कि 1971 में रॉ को इस बात की पूरी जानकारी थी कि पाकिस्तान किस दिन भारत के ऊपर हमला करने जा रहा है। 1975 में चीन और वैश्विक के दबाव के बाद भी सिक्किम का भारत में विलय भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी और इसमें रॉ की अहम  भूमिका थी।



इन सबके बीच रॉ के लिए भारतीय राजनीति में परिवर्तन से मुश्किलें भी आई। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम का सबसे पहले रॉ ने ही पता लगाया था। रॉ एजेंट ने कहूटा में नाई की दुकान के फ़र्श से पाकिस्तानी परमाणु वैज्ञानिकों के बालों के सैंपल जमा किएउनको भारत लाकर जब उनका परीक्षण किया गया तो पता चला कि उसमें रेडिएशन के कुछ अंश मौजूद हैं,जिससे पाक की परमाणु तैयारी का पता चलारॉ के एक एजेंट को 1977 में पाकिस्तान के कहूटा परमाणु संयंत्र का डिज़ाइन प्राप्त हो गया थालेकिन तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने न सिर्फ़ इसे दस हज़ार डॉलर में खरीदने की पेशकश ठुकरा दी,बल्कि ये बात पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल ज़िया उल-हक़ को भी बता दीइस घटना का जिक्र मेजर जनरल वी.के.सिंह ने अपनी किताब ‘सीक्रेट्स ऑफ़ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’में भी किया है वी.के.सिंह रॉ में कई सालों तक काम कर चुके है। 


बाद  में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी इंटर सर्विस इंटेलीजेंस की सक्रियता ज्यादा बढ़ गई और रॉ को नये सिरे से अपनी रणनीति पर विचार करना पड़ा इसके नतीजे घातक रहे,पंजाब में खालिस्तान की मांग का हिंसक रूप देश ने देखा और 1984 में भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी गई पाकिस्तान में रॉ के कमजोर होने का फायदा पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी को हुआ जिसने बिना युद्द लड़े भारत में जातीय और धार्मिक अशांति भड़काने की व्यापक योजना को अंजाम देते हुए ऑपरेशन जिब्राल्टर शुरू कर भारत में आतंकवाद बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1984 में भारत के प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक कर यह सुनिश्चित किया की पाकिस्तान की आतंकी नीतियों का  जवाब उसके अंदाज में ही दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत के नये सीक्रेट प्लान सीआईटी एक्स का आगाज हुआ और उसने पड़ोसी देशों को ध्यान में रखकर अपनी आक्रामक रणनीति को अंजाम देना शुरू कर दिया। 


यह वहीं दौर था जब चीन,पाकिस्तान,नेपाल,बांग्लादेश और श्रीलंका से हमारे सम्बन्ध बेहद असामान्य थे। बांग्लादेश में बढ़ती भारत विरोधी  गतिविधियों को रोकने के लिए 1985 में फरक्का को लेकर आपसी सहमति,नेपाल में भारत विरोध को खत्म कर मजबूत सम्बन्ध रखने के लिए नवम्बर 1986 में बंगलौर में सार्क सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सार्क का मुख्यालय काठमांडू में स्थापित करने का कूटनीतिक दांव और 1988 में मालद्वीप में भारतीय वायुसेना के 'ऑपरेशन कैक्टस' के अभियान के बाद भारत विरोधी ताकतों को करारा जवाब देने की कूटनीति के पीछे रॉ की ही अहम भूमिका थी। श्रीलंका भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है। भारतीय तमिलों की श्रीलंका में अच्छी खासी तादाद है और इस मामलें को लेकर दोनों देशों के सम्बन्ध अक्सर प्रभावित होते रहते है। 1986 में श्रीलंका के राष्ट्र प्रमुख जयवर्धने ने एक साल के भीतर तमिल आन्दोलन को कुचलने की घोषणा कर दी थीइस दौरान पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई.एस.आई और अमेरिका की सी.आई.. की श्रीलंका में मौजूदगी के संकेत से दक्षिण की और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी थी इस समय भारत ने श्रीलंका में शांति सेना भेजकर विरोधी देशों की भारत विरोधी रणनीति को खत्म कर दिया था

1999 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच करगिल में जंग चल रही थी,उस समय भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ ने जनरल मुशर्रफ की एक बातचीत टेप की थी और बाद में इसी से पाकिस्तान के बीजिंग से रणनीतिक संबंधों का खुलासा भी हुआ थायह रॉ की सफलता तो थी जिससे भारत को दुनिया में यह साबित करने में बड़ी मदद मिली की करगिल की घुसपैठ में पाकिस्तान की सेना का सीधा हाथ था लेकिन मलाल यह था कि आखिर पाकिस्तान के भारतीय सीमा में इतनी बड़ी घुसपैठ का सुराग रॉ को पहले क्यों नहीं मिला


इसके पीछे एक प्रमुख कारण 90 के दशक में भारत के विदेश मंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल का वह गुजराल सिद्धांत माना जाता है जिसके अंतर्गत पड़ोसी देशों का विश्वास जीतने के लिए अप्रत्याशित कदम भी उठाये गये थे और उसमें से एक था पाकिस्तान में रॉ की गतिविधियों को विराम दे देना। गुजराल के पिता अवतार नारायण गुजराल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य थे और वे अपने पिता के सहायक के तौर पर काम कर चूके थे,अत: उन्होंने दुश्मन देश के प्रति बेहद सदाशयता दिखाई और इसके दूरगामी परिणाम भारत की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए आत्मघाती साबित हुए।

शक्ति संतुलन की नीति को विवेकपूर्ण ढंग से संचालित करने के लिए यह आवश्यक है कि नीति निर्धारक शत्रु राज्यों की भविष्य में होने वाली क्षमता और नियत के बारे में भविष्यवाणी कर सकें और यह काम अत्यंत कठिन है। ऐसे में कूटनीतिक सफलता के लिए ख़ुफ़िया एजेंसी निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है।


वर्तमान में नेपाल में भारत विरोधी गतिविधियाँ चरम पर है,बंगलादेश और पाकिस्तान के संबंध अप्रत्याशित रूप से मजबूत हो रहे है,श्रीलंका,मालद्वीप और ईरान में चीन मजबूत हुआ है, वहीं गलवान घाटी में चीन द्वारा पक्का निर्माण कार्य कर लेने की खबर भी भारत को बहुत देर से मिली। कूटनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से यह चुनौतीपूर्ण है। बहरहाल ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ की मजबूती से भारत की पड़ोसियों पर श्रेष्ठता,महत्ता और कूटनीतिक सफलता सुनिश्चित हो सकती है,इस पर ध्यान देने की जरूरत है।


जिंदगी है तो त्योहार है ,zindgi,eid,rakhi

प्रदेश टुडे

                           जिंदगी है तो त्योहार है                                                                                                     डॉ.ब्रह्मदीप अलूने 



दुनिया में होना,रहना और जीना कितना जरूरी है इस पर सबका अपना अपना नजरिया हो सकता है,लेकिन राहत इन्दौरी ने जिंदा रहने को सबसे पहले और कुछ इस कदर जरूरी बताया की बाकी सारी गुंजाईशें ही खत्म हो गई,उन्होंने क्या खूब कहा है,ज़िन्दगी की हर कहानी बेअसर हो जाएगी,हम न होंगे तो यह दुनिया दर-ब-दर  हो जाएगी।”यकीनन जिंदगी है तो ख्वाइशें है,उम्मीदें है,रास्ते है,मंजिलें भी हैजिंदगी है तो चाहते भी होगी और उन्हें पूरी शिद्दत से पूरा करने का जज्बा भी होगा



हिंदुस्तान की सरजमीं पर तो जिंदगी का मतलब जिम्मेदारी है जो ताउम्र चलती रहती है यहां रिश्तों के साथ समाज और राष्ट्र भी ऐसे बंधे होते है कि खुद से ज्यादा सबकी परवाह करनी होती है भला और किसी देश में बूढी दादी को कंधों पर उठाकर वोट दिलवाने के दृश्य कभी देखे है श्रवण कुमार भी तो हिंदुस्तान में ही हुए है जाहिर है यहाँ जिंदगी को खुद की जागीर नहीं समझी जाती,बल्कि उसे समाज और राष्ट्र की सम्पत्ति मानकर उसके पैमाने भी तय किये गए है राजपूतों ने समाज और देश के लिए पीढ़ियों तक अपना खून बहाया,वे यदि खुद की परवाह करते तो महाराणा प्रताप को जंगल में न रहना पड़ता शाहजहाँ ने तो मुमताज को ताजमहल के सहारे सैकड़ों वर्षों से जिंदा रखा है

 

हिंदुस्तान की तहज़ीब पर पश्चिमी एशिया के एक भूगोलविद इदरीश ने तकरीबन एक हजार साल पहले एक दिलचस्प बात कही थी कि,हिंदुस्तानी स्वभाव से इंसाफ पसंद है और वे अपने व्यवहार से कभी नहीं डिगतेउनकी नेकी,ईमानदारी और अपने वादों की वफ़ादारी मशहूर है,और दरअसल वे इन गुणों के लिए इतने मशहूर है कि लोग उनके मुल्क में सब तरफ से आकर इकट्ठा होते है” हिन्दुस्तानियों के जीने का अलहदा लेकिन इंसान पसंद अंदाज सभी को भाता है और जब देश के सामने परेशानियां होती है तब सब ऐसे मिल जाते है कि उनमें हिंदू या मुसलमान की पहचान करना बड़ा मुश्किल हो जाता है

कोरोना की महामारी के बीच दुनिया परेशान और खौफज़दा है लेकिन भारत के लोगों ने बेहद संयमित होकर इस चुनौती का लगातार सामना किया है। लॉकडाउन के दौरान देश के विभिन्न इलाकों में हजारों की संख्या में राह से गुजरते मजदूरों की मदद के लिए कौन खड़ा रहा यह फर्क कर पाना मुश्किल था, वहीं गोधरा की आदम मस्जिद तो कोविड-19 से बचाने के लिए अस्पताल बना दी गई है।



इस दौरान होली और ईद ख़ामोशी से चली गई,जहां दिल और खुशियाँ दोनों मिलते हैक्रिसमस भी बीत गया और इस बार तो शहीदी का शर्बत भी नसीब नहीं हुआ हमारे पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में तो त्योहार के नाम पर नियमों की धज्जियां उड़ा दी गई लेकिन हिंदुस्तान की साझा संस्कृति और इसकी विरासत तो सादगी पसंद है

भारत में महामारी का सामना करने को लेकर जो एकता और जागरूकता दिखाई गई उसकी पूरी दुनिया कायल है। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने कोरोना से बचाव को लेकर भारत की तारीफ करते हुए  कहा,आओ हम सब करें नमस्ते।” दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश गरीबी,बेकारी और ऐसी कई विषमताओं के साथ खड़ा हुआ है। लेकिन लोगों में लड़ने का जज्बा कमाल का है और इसीलिए कोरोना से बद से बदतर हालात के बाद भी भारत को अन्य देशों से बेहतर बताया जाता है। डब्ल्यूएचओ के अध्यक्ष डॉ. टेडरोज़ आध्यनोम गेब्रेयेसोस ने कोरोना को लेकर हाल ही में चिंता जताते हुए कहा है कि,कुछ देश क्षमता की कमी से जूझ रहे हैं,कुछ संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं और कुछ देश इच्छाशक्ति की कमी से जूझ रहे हैं।” वहीं हमारे लिए यह बेहद सुकून देने वाली भावना है कि भारत में क्षमता और संसाधनों की कमी है लेकिन इच्छा शक्ति गजब की है।


पिछलें कई महीनों से कोरोना का कहर जारी है और अब यह भयानक और इसके सबसे अंतिम दौर में पहुँच गया है। अब यह आसानी से लोगों में संक्रमित हो रहा  है और लोगों के बीच संपर्क से प्रभावी और निरंतरता से फैलने की आशंका बढ़ रही हैसबसे बड़ी चुनौती यह है कि अभी तक कोरोना वायरस का कोई इलाज या टीका नहीं है,ऐसे में इसके नुकसान से बचने के लिए वायरस के विस्तार को रोकना ही सबसे अहम है

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था कि पहले आपको खुद बदलना होगा,जैसा की आप दुनिया को देखना चाहते है। वाकई महामारी के दौर में भी कई लोगों की घर से निकलना मजबूरी है और वे जब वापस घर लौटते है तो असंख्य चिंताओं के साथ घर की चार दिवारी में प्रवेश करते है। इन चिंताओं के बीच भी कई घर उजड़ गए,कई दीप बुझ गए और कई उम्मीदें ध्वस्त हो गई। अभी और लड़ना है इस महामारी से,वह भी बेहद सावधानी से और संयमित होकर। अब ईद आ रही है, ईद-उल-अजहा हजरत इब्राहिम और उनके परिवार द्वारा दी गई स्वयं की इच्छाओं की कुर्बानी को याद करने का ही दूसरा नाम है दुनियाभर के मुसलमानों के लिए यह बहुत पवित्र त्योहार है जहां कुर्बानी के साथ सब मिलकर इसे मनाते है,लेकिन इस समय मानव अस्तित्व को बचाएं रखने की कठिन चुनौती हैईद-ए-कुर्बां का मतलब है बलिदान की भावना। इस बार ईद तो मनाना है लेकिन छोटी मोटी इच्छाओं का बलिदान भी देना होगा और अपने घरों में रहकर ही इसे मनाना होगा। 


आखिर हमारे साथ सबकी जिंदगी की भी तो परवाह करना है। रक्षा बंधन का भावुक कर देने वाला त्योहार भी है इस दौरान,लेकिन बहनें और भाई यह न भूलें कि जिंदगी है तो त्योहार है। इस बार की बची हुई खुशियाँ अगली बार के लिए बचाकर रखे,यकीन रखे, खुशियाँ दूगुनी हो जाएगी। बहरहाल त्योहार तो और भी आयेंगे,खुशियाँ और भी मनाएंगे लेकिन इस समय यह याद रखना जरूरी है कि खुद और दूसरों की नासमझी और गलतियों से अँधेरा हो सकता है,हमें रोशनी की उम्मीदों को अपने और सबके लिए बनाएं रखना है।

 


बुधवार, 22 जुलाई 2020

खनिज और वन्य संसाधनों से भरपूर राज्यों में बदहाल आदिवासी, tribal

हम समवेत    

           खनिज और वन्य संसाधनों से भरपूर राज्यों में बदहाल आदिवासी

                                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

https://www.humsamvet.com/opinion-feature/adivasi-struggle-for-life-tools-in-india-3406

मेदिनीनगर की तटवर्ती नदी कोयल पर बंधे पुल की छांव में बैठकर आराम कर रहे मजदूरों के एक समूह पर लॉकडाउन के दौरान झारखंड पुलिस की नजर पड़ी और जब उनसे पूछा गया कि वे कौन है और कहाँ से आए है तो जवाब सुनकर पुलिस भी अवाक रह गई। दरअसल उन मजदूरों ने बताया कि वे हैदराबाद से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर पैदल सफर तय करते हुए 1 महीने में अपने गृह प्रदेश झारखंड लौटे है। हैदराबाद की एक निर्माण कंपनी में काम करने वाले इन मजदूरों को लॉकडाउन कि घोषणा के बाद मालिक ने अपने हाल पर छोड़ दिया तो वे भूखे प्यासे पैदल ही अपने घर कि और निकल पड़े। ये सभी पलामू के रहने वाले है और यह स्थान खनिज संसाधनों से भरपूर माना जाता है। आदिवासी बाहुल्य यह इलाका खूबसूरत वन,घाटियों और पहाड़ियों के लिए विख्यात है जहां सैकड़ों प्रजाति के वन्य प्राणी रहते है और यह स्थान पर्यटकों को बहुत आकर्षित  करता रहा है। यहाँ कि कोयले कि खदानें 9 सालों से बंद पड़ी है,यदि यह चालू हो जाए तो हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है। यही नहीं पर्यटन केंद्र के रूप में इसका विकास होने से भी बड़ी संख्या में रोजगार मिल सकता है लेकिन यहाँ के बदनसीब गरीब मजदूरी करने के लिए दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर है। यही  स्थिति पूरे झारखंड की है।  झारखंड में आदिवासियों की आबादी 26.2 फीसदी है। इसमें से अधिकांश मजदूरी करते है और अपनी जीने की मूलभूत सुविधाओं को भी नहीं जुटा पाते है।


साढ़े तीन करोड़ की आबादी वाला झारखंड पूरे देश के भौगोलिक क्षेत्र का 2.62 फीसदी है और पूरे देश का 40 फीसदी खनिज इस भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। घने वन,जंगल और झाड़ के कारण इस राज्य का नाम झारखंड पड़ा है। राज्य का पूरा प्रदेश पठारी है और यहाँ का छोटा नागपुर  पठार पर खनिज और ऊर्जा का विपुल भंडार है। खनिज की दृष्टि से सबसे संपन्न इस राज्य में देश का 57 फीसदी अभ्रक,34 फीसदी कोयला,33 फीसदी ग्रेफ़ाइट,18 फीसदी लौह अयस्क,48 फीसदी कायनाइट,26 फीसदी तांबा,32 फीसदी  बॉक्साइट तथा 95 से 100 फीसदी पाइराइट का उत्पादन होता है। राज्य के दक्षिणी छोटा नागपुर की तुलना जर्मनी की रूर घाटी से की जाती है। यूरोप के प्रमुख औद्योगिक केन्द्रों में रूर घाटी को शुमार किया जाता है,इस क्षेत्र में कई विशाल औद्योगिक नगर हैं। यहाँ यूरोप का सबसे बड़ा एवं विश्वविख्यात कोयला क्षेत्र है। जर्मनी का  80 फीसदी कोयला इसी क्षेत्र से निकाला जाता है। रूर घाटी को जर्मनी के विकास का केंद्र माना जाता है और यहां रहने वाले लोग बेहद संपन्न माने जाते है। वहीं खनिज संसाधन की उपलब्धता में रूर घाटी से कहीं बेहतर झारखंड को देश के सबसे गरीब,पिछड़े और अशिक्षित राज्यों में शुमार किया जाता है। इस क्षेत्र से स्वर्णरेखा,करकरी,कोयल दामोदरऔर सोन जैसी नदिया निकलती है जिसमें  स्वर्णरेखा नदी में सोने के कण मिलते है और यहां के कई इलाकों के आदिवासियों के रोजगार का यह प्रमुख साधन है। झारखण्ड में कई ऐसी जगह है जो अलग अलग वजहो से लोगों को आकर्षित करती हैं। एक तरफ जहां नेतरहाट वर्ष भर ठंडा रहता है और पर्यटको को गर्मी से बचने का मौका देता हैं वहीं देवघर में सावन के महीने में लाखों श्रद्धालू आते है।  झारखण्ड के बेतला और हजारीबाग के राष्ट्रीय उद्यान अपनी अप्रतिम  सुंदरता और जीव जन्तुओ में विभिन्नता के लिए प्रसिद्ध हैं।


राज्य में विपुल खनिज और वन्य संपदा होने के बाद भी नीतिगत खामियों के चलते यहाँ के लगभग 35 फीसदी दलित आदिवासी परिवार एक कमरे के कच्चे घरों में रहने को मजबूर है। 80 फीसदी परिवार महीने का मुश्किल से 5000 रुपया कमा पाते है,देश की औसत बेरोजगारी दर जहां 6.1 फीसदी है वहीं झारखंड के गांवों में बेरोजगारी दर 7.1 फीसदी और शहरों में बेरोजगारी दर 10.5 फीसदी है।  झारखंड में 38 लाख हेक्टेयर जमीन खेती योग्य है। राज्य में स्वर्णरेखा,करकरी  कोयल,दामोदर,और सोन जैसी कई बड़ी नदियां होने के बाद भी 29 फीसदी इलाके में ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है। जाहिर है राज्य के प्राकृतिक रूप से सम्पन्न होने के बाद भी व्यवस्थागत कमियों और बेहतर योजनाओं को  लागू न करने कि नाकामी के चलते यहाँ के लाखों दलित आदिवासी रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने को मजबूर है। प्रति व्यक्ति आय में देश के 28 प्रमुख राज्यों की रैंकिंग में झारखंड 25वें नंबर पर है। राज्य के ग्रामीण इलाकों में लगभग एक हजार स्वास्थ्य केंद्रों के अपने भवन नहीं हैं। ग्रामीण इलाकों में जरूरत के हिसाब से 41 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। 63.6 फीसदी स्वास्थ्य केंद्रों में प्रसव के कमरे नहीं हैं,42 फीसदी रूरल हेल्थ सेंटर में बिजली नहीं है और 35.8 फीसदी स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है।



बिहार से अलग करके झारखंड को एक अलग राज्य इसीलिए बनाया गया था कि आदिवासी बाहुल्य इस इलाके का विकास हो। इसका फायदा निर्माण कंपनियों को तो मिला लेकिन आदिवासियों कि स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। हथकरघा उद्योग को लेकर राज्य में बहुत संभावनाएं है,झारक्राफ्ट राज्य की पहचान है और मिट्टी की सुंदर मूर्तियां बनाना यहाँ की प्रमुख कला है। आदिवासी चित्रकला बेंत और बांस के सामान को सरकार यदि बड़ा बाज़ार दे तो यहाँ लाखों लोगों का जीवन स्तर सुधर सकता है और  इन सभी कलाओं में आदिवासी पारंपरिक तरीके से पारंगत है।  वन्य इलाकों को पर्यटन केंद्र के रूप में उन्नत करके और खनिज संसाधनों से लाखों आदिवासियों को रोजगार मिल सकता है,लेकिन यह योजनाएँ महज चुनावी नारा बनकर रह जाती है।

मध्यप्रदेश में आदिवासियों कि आबादी 21 फीसदी से ज्यादा है और उनकी आर्थिक स्थिति भी बेहद खराब है। मनरेगा के लिए पंजीयन कराने वाले मजदूरों में एक तिहाई से ज्यादा आदिवासी है।  शहडोल और उमरिया के जो मजदूर काम के सिलसिले में महाराष्ट्र गए थे,उन्हें इतनी दूर जाना ही नहीं पड़ता यदि इस इलाके को लेकर हमारी बेहतर योजनाएँ होती। शहडोल और उमरिया दोनों जिले वन्य संपदा से भरपूर है,पर्यटन केंद्र के रूप में पहचाने जाने वाला यह पूरा क्षेत्र हजारों रोजगार पैदा कर सकता है लेकिन व्यवस्थागत खामियों और विकास की कार्य योजना के अभाव में बदनसीब आदिवासी दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए जाने को मजबूर है। औरंगाबाद के पास पटरियों पर अपनी जान खोने वाले 16 मजदूर इसी इलाकों से थे।



नक्सल प्रभावित मध्यप्रदेश के बालाघाट के हजारों मजदूर हैदराबाद और चेन्नई से इन दिनों पैदल लौट रहे है। इन आदिवासी क्षेत्रों में वनोपज से रोजगार की असंख्य संभावनाएं है। बालाघाट का बांस तो लाखों आदिवासियों को रोजगार के साथ खुशहाली और बेहतर जिंदगी दे सकता है लेकिन इस और नीतियाँ सही तरीके से लागू ही नहीं की गई। बांस की कटाई के लिए आदिवासियों का उपयोग किया जाता है जबकि बांस से महंगे फर्नीचर,होटलें को सजाने और बेशकीमती घर बनते है। बांस से बने खिलौने न केवल पर्यावरण के संरक्षण  लिए बहुत उपयोगी हो सकते है बल्कि इससे आदिवासियों को बड़ा रोजगार भी मिल सकता है। जरूरत है बांस से बनी वस्तुओं के प्रशिक्षण को लेकर कौशल विकास केन्द्रों की। सरकार के ऐसे प्रयास इस क्षेत्र के आदिवासियों का जीवन बदल सकते है।  मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ और अलीराजपुर जिले मे पलायन बड़ी  समस्या रहा है। झाबुआ की आबादी करीब 11 लाख है जिसमें से 4 लाख मजदूर हर साल पड़ोसी राज्य गुजरात,महाराष्ट्र और राजस्थान में रोजगार की तलाश में पलायन कर जाते है। यह जिला आदिवासी हस्तशिल्प खासकर बांस से बनी वस्तुओं, गुडियों, आभूषणों और अन्य बहुत सारी वस्तुओं के लिए पहचाना जाता है,लेकिन इसे रोजगार का साधन बनाएँ जाने की कमी  के चलते इसका लाभ आदिवासियों को नहीं मिल पाता। यह बाघ प्रिंट का बड़ा सेंटर हैं,लेकिन इसे हथकरघा उद्योग को बढ़ावा न मिल पाने से कारीगरों की कमाई बहुत ज्यादा नहीं होती। आलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में डोलोमाइट के पत्थर बड़ी मात्रा में हैं लेकिन  मजदूर की मजबूरियां बदस्तूर जारी है। झाबुआ-आलीराजपुर इलाके में बनने वाली महुआ की शराब और ताड़ी बहुत ही स्वास्थ्यवर्धक मानी जाती है। इन क्षेत्रों में अंग्रेजी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध का बड़ा आर्थिक लाभ इस इलाके में रहने वाले आदिवासियों को मिल सकता है।


ओडिशा में करीब 22 फीसदी से ज्यादा आबादी आदिवासियों की है और यहाँ के करीब 15 लाख मजदूर अन्य राज्यों में रोजगार के लिए पलायन कर जाते है। इसमें अधिकांश आदिवासी ही है जो गुजरात की फैक्ट्रियों में काम करते है। ओडिशा भारत के महत्वपूर्ण राज्यों में से एक है, जो कई प्रकार के खनिज स्रोतों से पूरी तरह संपन्न है। उद्योगों के लिए ओडिशा के खनिज स्रोत उच्च स्तरीय हैं। यहाँ लौह अयस्क, क्रोमाइट,मैगनीशियम-अयस्क,बॉक्साइट,गैरकोकिंग कोयला,चीनी मिट्टी और टिन के भंडार है। यही वजह है कि यहां राउरकेला स्टील प्लांट,राष्ट्रीय एलुमिनियम कंपनी,नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन की स्थापना की गई है,जो न केवल देश में बल्कि विश्वभर के बाजारों में अपनी अलग पहचान रखते हैं। ओडिशा में नियमगिरि,कलिंगनगर,पोस्को जैसे इलाकों में जल,जंगल,जमीन चुनावी मुद्दा तो बनते है लेकिन यहाँ के संसाधनों पर पहला अधिकार इसी क्षेत्र के आदिवासियों का है। खनिज और वन्य संसाधनों का  फायदा बड़ी कंपनियाँ उठा रही है जबकि यहाँ का आदिवासी अन्य राज्यों में रोटी की तलाश में जाने को मजबूर है। यहां खैर या कत्था के वृक्ष बहुतायत में पाये जाते है,कत्था पान में लगाया जाता है।  मधुका इंडिका एक और उपयोगी वृक्ष है जिसके फल से अच्छा खाद्य तेल बनता है।  टर्मिनाला अर्जुना नामक वृक्ष की पत्तियों का अच्छा चारा बनता है। पेड़ों पर टसर के रेशमी कीड़े पाले जाते हैं और इससे देहातों में लाभकारी रोजगार मिलता है।  उड़ीसा का टस्सर, उत्कृष्ट सिल्क माना जाता है। सरकार सुविधाएं और कौशल विकास के जरिए न केवल लाखों लोगों को रोजगार दे सकती है बल्कि एक अच्छा बाज़ार भी मिल सकता है। 


तकरीबन 32 फीसदी आदिवासी आबादी वाला छत्तीसगढ़ राज्य साल और सागोन के वन के लिए पहचाना जाता है। कोयला,लौह अयस्क, बॉक्साइट, चुना पत्थर और टिनकी खनिज संपदा से भरा यह राज्य भारत में विशिष्ट स्थान रखता है। देश के कुल खनिज उत्पादन मूल्य का लगभग 16 प्रतिशत छत्तीसगढ़ में संचालित हो रहे खनन प्रक्रिया से प्राप्त होता है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में खनिज क्षेत्र का 11 प्रतिशत से अधिक का योगदान है और प्रदेश में 80 प्रतिशत से अधिक खनिज आधारित उद्योगों का संचालन हो रहा है। लेकिन यहाँ का आदिवासी नक्सलवादियों और सरकार के बीच बुरी तरह फंसा हुआ है।  देश की जनसंख्या जहां उतरोत्तर बढ़ी है वहीं छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की आबादी में कमी आई है। 2011 में हुई जनगणना में राज्य में कुल 78 लाख 22 हजार आदिवासी थी। यह राज्य की कुल आबादी का 30.62  फीसदी है, जबकि 2001 में हुई  जनगणना में आदिवासी कुल आबादी का 31.8 फीसदी थे। जाहिर है तुलनात्मक रूप से अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या में  सवा फीसदी की कमी आई है। इसका प्रमुख कारण राज्य से आदिवासियों का पलायन है जो रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में जाने को मजबूर है।  बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य नागरिकों का मूलभूत अधिकार है लेकिन रोजगार के लिए दर दर भटकते आदिवासियों को कैसे सुकून मिलेगा,इसकी कोई योजना दूर दूर तक नहीं दिखाई पड़ती।


 

छत्तीसगढ़ मे साल और सागोन के घने वन पाये जाते है,जिसका लकड़ी का उपयोग रेलवे के स्लीपर के साथ घरों के निर्माण में किया जाता है। तेंदुपत्ता,शहद,मोम, रेशम,हर्रा,आंवला और बांस जैसे बेशकीमती वनोपज़ पर आदिवासियों का पहला अधिकार है और इससे वे बेहतर जीवन अर्जन भी कर सकते है।

आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए आदिवासियों के लिए व्यापक कौशल केंद्र खोलने की जरूरत है। इससे न केवल आदिवासियों को रोजगार मिल सकता है बल्कि देश के पिछड़े इलाकों की तस्वीर भी बदल सकती है। स्थानीय स्तर पर वन्य और खनिज संपदा का उपयोग करने से पलायन को रोकने में बड़ी मदद मिल सकती है। बहरहाल जल,जंगल और जमीन के रखवालों  को लेकर कब सरकारें स्थानीयता पर आधारित योजनाओं को अंजाम देगी,यह कह पाना मुश्किल है।



brahmadeep alune

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति, nepal vampanth

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