रविवार, 21 जून 2020

असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां, rashtrvad aur vaishvik chunoutiyna

प्रजातंत्र                         

                 असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां

                                                   डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


शक्ति,शस्त्र और युद्द की संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति को हिटलर और मुसोलिनी के पराभव के साथ दफनाने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को संयुक्तराष्ट्र ने मजबूती दी और पश्चिमी देश इस मान्यता पर निरंतर आगे बढ़ते रहे,जिसके अनुसार किसी भी समस्या के समाधान के रास्ते लोकतंत्र से खुलते है द्वितीय विश्व युद्द के बाद लोकतंत्र को विश्व शांति का पर्याय मान लिया गया और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को विकसित और मजबूत करने के औजार के रूप में इसका उपयोग होने लगा बीसवी सदी के आधे सफर से शुरू हुआ लोकतंत्र का आधुनिक सफर इक्कीसवी सदी के 20 साल पूरा करने की ओर है,लेकिन इसकी चुनौतियां नई आशंकाओं के साथ विश्व शांति के समक्ष खड़ी है


राष्ट्रवाद के उदय को इतिहास की एक निर्णायक घटना माना जाता है और इसके विकास और पोषण में उदारवाद और प्रजातंत्र की प्रमुख भूमिका रही.लेकिन आधुनिक राजनीतिक तंत्र ने लोकतांत्रिक सत्ता पर बने रहने के लिए जिस प्रकार राष्ट्रवाद का उपयोग किया है इससे लोकतंत्र की उपयोगिता पर ही गहरे सवाल उठ खड़े हुए है दरअसल 15 वी सदी में इटली में जन्में मैकियावली का राजदर्शन कूटनीति की धूर्तता को नैतिकता से जोड़कर आम जनमानस की अस्मिता को राजहित में दांव पर लगाने को प्रोत्साहित करता रहा। लेकिन 5 सौ साल बाद लोकतंत्र  को भी राज सत्ता की तरह संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति की तरह ढालने का प्रयास होगा,यह कल्पना शायद ही किसी ने कभी की होमैकियावली ने सत्ता को यथार्थवाद की छाया में रोपित करते हुए कहा था कि, “मनुष्य,शस्त्र,धन एवं रोटी युद्द की शक्ति है,परन्तु इन चारों में प्रथम दो अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य एवं शस्त्र,धन एवं रोटी प्राप्त कर सकते है,परन्तु रोटी तथा धन,मनुष्य एवं शस्त्र प्राप्त नहीं कर सकते” इस विचारधारा में शक्ति,शस्त्र और युद्द को मानव स्वभाव की विशेषताएं मानता है


वहीं लोकतंत्र को सामाजिक न्याय,आज़ादी,विकास और समानता के शासन तंत्र का आदर्श रूप माना जाता है जिसमें सत्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समभाव रखकर नागरिकों के सर्वांगीण विकास में अपना सकारात्मक योगदान दे लोकतंत्र में शक्ति और युद्द को शांति के लिए खतरनाक माना गया इसीलिए संयुक्तराष्ट्र और पश्चिमी देशों ने लोकतांत्रिक पद्धति से चलने वाले देशों को समर्थन देकर इसमें विश्व शांति की संभावनाओं को मजबूत किया

लोकतंत्र उच्च प्रतिमानों  के साथ मानव सभ्यता के विकास को सुनिश्चित करता हुआ प्रतीत हुआ लेकिन समय के साथ लोकतंत्र पर भी संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति में परिवर्तित होने की आशंकाएं बलवती होने लगी कई देशों के शिखर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने राष्ट्रवाद को हथियार की तरह उपयोग करके लोकतांत्रिक सत्ताओं पर जिस प्रकार कब्जा किया है उससे अंतर्राष्ट्रीय शांति के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है



नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. ओली की राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण रही है नेपाल में राजतंत्र की समाप्ति के बाद देश में राजनीतिक परिवर्तन हुए और बदले संविधान के साथ अंततः सत्ता उनके हाथ लगीभारत नेपाल में लोकतंत्र स्थापित हो इसका समर्थक रहा और नेपाल में राजतंत्र की समाप्ति का उसने स्वागत ही कियाओली के राजनीतिक जीवन और उनके विचारों  के लिए उनकी नीतियों को ओलीटिक्स कहा जाता है जिसके अनुसार इसमें राजनैतिक दृढता  और  राष्ट्रीय प्रतिज्ञा का भाव हैनेपाल से भारत के ऐतिहासिक सम्बन्धों के साथ यह हकीकत है कि वहां के सामान्य जनमानस में भारत के बड़े होने और स्वयं के छोटे होने का भाव रहा है जो समय समय पर कडुवाहट के रूप में सामने आता हैयह भावना वहां पर राजतंत्र के दौर से ही देखी गई है

गोरखा राज्य के रुप में 1742 में पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल राज्य की नींव रखते हुए,अपने राज्यनीति के निर्धारण में स्पष्ट किया था कि “हमारा देश एक कन्द की तरह है, जो कि दो चट्टानों के बीच उगा है,चीन साम्राज्य के साथ हमें दोस्ताना सम्बन्ध अवश्य रखना चाहिए और दक्षिण के शासक,जो कि बहुत चालाक है,उनके साथ भी अच्छे सम्बन्ध बनाए रखना होगा,भारत और चीन दोनों पड़ोसियों में से भारत ज्यादा खतरें का स्त्रोत है, इसलिए दक्षिण के पड़ोसी से हमें हमेशा सतर्क रहना होगा लगभग ढाई शताब्दी के बाद जब नेपाल में राजवंश का अंत हुआ और सत्ता पर माओवादी पुष्प कुमार दहल आसीन हुए तो उन्होंने कहा कि उनका देश भारत से असल दोस्ती चाहता है,लेकिन कोई नेपाल को यस मैन के रुप में देखे यह मुमकिन नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत और नेपाल के अत्यन्त मधुर संबंधों के बीच एक गहरी खाई रही है,जिसे ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,सामाजिक,आर्थिक और सामरिक सम्बन्धों के बाद भी पाटा नहीं जा सका हैहालांकि भारत ने संयम का परिचय देकर नेपाल और भारत के बीच अद्भुत समन्वय को बनाए रखा। इस समय नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भारत है,दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के देशों में  बिना वीजा के आ जा सकते है, यहीं नहीं भारत की सेना में बाकायदा एक गोरखा रेजिमेंट भी है जिसमें नेपाली नागरिक ही है।


भारत नेपाल संबंधों की इन विशेषताओं को जानते हुए भी के.पी.ओली ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए राष्ट्रवाद का दांव खेला। नेपालियों की युवा पीढ़ी की उच्च आकांक्षाओं को जगाने और सामने लाने के लिए ओली ने राष्ट्रवाद का सहारा लेकर भारत से सीमा विवाद को बढ़ाया और इसे राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ दिया।  नेपाली के प्रधानमंत्री का यह कदम बेहद अप्रत्याशित रहा और उन्होंने ऐसा करके उन्होंने नेपाल के भविष्य को दांव पर लगा दिया बल्कि भारत से लगती हुई लगभग 18 सौ किलोमीटर की सीमा की शांति को भंग कर विश्व शांति के लिए नई चुनौती पेश कर दी।

ब्रिटेन से 1997 में चीन को हस्तांतरित हांगकांग में अशांति का कारण चीन के प्रधानमंत्री शी जिनपिंग का वह राष्ट्रवादी दांव है जिसके बूते वे चीन की सत्ता पर लंबे समय तक बने रहना चाहते है। भारतीय सीमा पर चीनी सेना का हिंसक संघर्ष अप्रत्याशित रूप से जिनपिंग की स्थिति को देश और उनकी पार्टी में मजबूत कर सकता है। यहां तक की मौलिक अधिकारों और लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार अमेरिका भी इससे अछूता नहीं है।  अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मैक्सिकों से लेकर यूरोपीय यूनियन से संबंध और हाल का वह घटनाक्रम जिसमें नस्लवाद के नाम पर हत्या के बाद आंतरिक सुरक्षा के लिए देश में पहली बार सेना की तैनाती की बात कही गई,सत्ता पर वापसी के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रदर्शन नजर आता है। श्रीलंका के महेंदा राजपक्षे ने अपने देश में हुए आतंकी हमलों को सत्ता पर स्थिति मजबूत करने के अवसर की तरह देखा और सिंहली राष्ट्रवाद के नाम पर जातीय और साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने से भी परहेज नहीं किया।


जाहिर है लोकतंत्र की शांति की मूल मान्यता पर प्रहार के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद को औजार की तरह प्रयोग किया जाने लगा है और इससे न केवल जनता की भावनाओं को उभार मिल रहा है बल्कि विपक्षी दलों को भी नतमस्तक होना पड़ रहा है। विपक्षी दलों  द्वारा विरोध न करने के पीछे यह डर भी होता है की उन्हें सत्ता के द्वारा राष्ट्र के विरोधी के तौर पर न प्रचारित कर दिया जाए।

इस समय समूची दुनिया में लोकतंत्र से अभिव्यक्ति और विरोध को खत्म करने तथा सत्ता पर एकाधिकार करने की प्रवृत्ति खतरनाक रूप से बढ़ी है भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पिछले कुछ समय से यह चिंतन मनन का प्रमुख विषय रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने इस साल एक कार्यक्रम में विचारों के लोकतंत्र को मानव समाज के लिए संजीवनी बताते हुए कहा था कि असहमति का संरक्षण करना यह याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक रूप से एक निर्वाचित सरकार हमें विकास एवं सामाजिक समन्वय के लिए एक न्यायोचित औज़ार प्रदान करती है,वे उन मूल्यों एवं पहचानों पर कभी एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती जो हमारी बहुलवादी समाज को परिभाषित करती हैं


केपी ओली,ट्रम्प,शी जिनपिंग से लेकर श्रीलंका के महेन्दा राजपक्षे की आंतरिक और वैदेशिक नीतियों में यह प्रतिबिम्बत होता है कि लोकतंत्र को औजार की तरह उपयोग करके सत्ता पर बना रहा जा सकता है और इसके लिए कोई भी कीमत अदा की जा सकती है। द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह विश्वास बलवती हुआ था कि सभी तरह के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों का एक ही समाधान है और उसका नाम लोकतंत्र है लेकिन लोकतांत्रिक सत्ताओं ने बेहद चतुराई से इस मान्यता पर प्रहार करते हुए लोकतंत्र के प्रतिमानों को ही बदल दिया

इस प्रकार की राजनीति से लोकतांत्रिक देशों की मूल समस्यायें बढ़ गई है जिनका सरोकार आम जनता की रोटी कपड़ा,मकान और शांति से है। अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चुनाव के समय लोककल्याणकारी उपलब्धियों या शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा सीमा,सुरक्षा और वैदेशिक राष्ट्रों से आक्रामक संबंधों को उभारा जाता है। मतदाता इसे पसंद करते है और इस प्रकार लोकतांत्रिक सत्ता को प्राप्त करने के लिए शक्ति,शस्त्र और युद्द को लोकप्रिय बना दिया गया है इस माहौल में संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति को प्रश्रय देने वाले राजनीतिक दल की नीतियों का विरोध करना राष्ट्रद्रोह से जोड़ दिए जाने की राजनीतिक प्रवृत्ति भी बढ़ी है यह भी बेहद दिलचस्प है कि भारत की न्याय व्यवस्था ने भी इस पर ध्यान दिया है  असहमति को लोकतंत्र का सुरक्षा कवच बताते हुए जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि असहमति पर लेबल लगाकर उन्हें राष्ट्र-विरोधी या लोकतंत्र विरोधी बताना जानबूझकर लोकतंत्र की मूल भावना पर हमला है। बहरहाल लोकतांत्रिक देशों में सत्ता के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रयोग संतुलित राष्ट्रवाद की उस भावना को झुठला रहा है जो राष्ट्र की प्रगति में सहायक होता है। अब लोकतंत्र की वह असंतुलित अवधारणा लोकप्रिय हो रही है जो विषम परिस्थितियां उत्पन्न कर युद्द को जन्म देती है,यह अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए बड़ी चुनौती है

 

 


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