शनिवार, 6 जून 2020

ऑपरेशन ब्लू स्टार -स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ना क्यों जरूरी था,operation blue star

सांध्य प्रकाश

     ऑपरेशन ब्लू स्टार -स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ना क्यों जरूरी था

                                                                              डॉ.ब्रह्मदीप अलूने 


इतिहास को दबाओं और पूर्वाग्रह से मुक्त कर यदि सभी भारतीय एक स्वर में आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग का ऐलान करने के किसी अवसर की तलाश कर रहे हो तो उनके लिए आज का दिन नजीर पेश करता है। 6 जून 1984  को भारतीय सेना ने आतंक के खिलाफ़ बिगुल बजाते हुए पवित्र स्वर्ण मंदिर में कब्ज़ा जमाएँ खालिस्तान समर्थक  चरमपंथियों को मार गिराया था।

यह वह दौर था जब पाकिस्तान की शह पर पंजाब आतंकवाद से जल रहा था और पृथकतावादी ताकतें खालिस्तान के नाम पर निरंतर सिर उठा रही थी।1984 में सिक्ख चरमपंथी जरनैलसिंह और उसके समर्थकों ने सिक्खों के सबसे पवित्र स्थान अमृतसर स्थित विश्वप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर पर कब्ज़ा कर भारतीय एकता,अखंडता और संप्रभुता को चुनौती दे डाली। पंजाब के ऐतिहासिक शहर अमृतसर को सिक्ख धर्म का पवित्र शहर माना जाता है। सिक्ख धर्मावलंबियों का पावनतम धार्मिक स्थल या सबसे प्रमुख गुरुद्वारा श्री हरिमंदिर साहिब जिसे दरबार साहिब या स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है, यहीं स्थित है। इसकी स्थापना दिसंबर 1585 में सिक्खों के पांचवे गुरु अर्जुनदेव ने की थी। सिक्ख गुरु को ईश्वर तुल्य मानते हैं.,स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सिर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं।

खालिस्तान समर्थकों को यह विश्वास था की वे सिक्खों के सबसे बड़े धार्मिक स्थल पर कब्ज़ा जमा कर सरकार से मनचाही मांगे मनवा लेंगे। लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी इतिहास में अपने सख्त फैसलों के लिए ही पहचानी जाती है। उन्होनें चरमपंथियों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ने का फ़ैसला कर स्वर्ण मंदिर को उनसे मुक्त करने का आदेश सेना को दे दिया और इस प्रकार 5 जून 1984 को शाम 7 बजे ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू हुआ।



जनरल के.एस.बरार के नेतृत्व में सेना का यह अभियान आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक कड़ा सन्देश था। हालांकि सेना स्वर्णमंदिर और अकाल तख्त की पवित्रता और सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थी और उन्हें किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती थी,लेकिन आतंकी सरगना भिंडरावाला इसकी आड़ में सेना को भारी नुकसान पहुंचा रहा था। ऐसी परिस्थितियों में सेना को अंततः टैंक का सहारा लेना पड़ा। चरमपंथियों के जबरदस्त प्रतिरोध के बावजूद सेना भारी पड़ी और भिंडरावाले को समर्थकों समेत मार गिराया गया। 6  जून 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार आतंक के खात्में के कड़े सन्देश के साथ समाप्त हो गया। न्याय के महान पथप्रदर्शक गुरु अर्जन देव द्वारा स्थापित ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर से आतंकवादियों को खदेड़ कर उसकी पवित्रता की रक्षा की गयी,और राष्ट्रहित के लिए ये आवश्यक भी था।लेकिन इस कार्रवाई से सिखों के आस्था के केंद्र की इमारत को भारी नुकसान हुआ।

ऑपरेशन ब्लू स्टार तो समाप्त हो गया लेकिन स्वर्ण मंदिर के आधार पर सिक्खों की धर्मिक भावनाएं भड़काने की पुरजोर कोशिश पाकिस्तान द्वारा लगातार की गयी। वास्तव में 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके इंदिरा गाँधी ने दुश्मन देश को जो घाव दिया था ,वह उनके लिए नासूर बन गया था। जुल्फिकार अली भुट्टों को फांसी पर चढ़ाकर भी पाक हुक्मरानों की आग ठंडी नहीं हुई तो उन्होंने खालिस्तान के नाम पर सिख आतंकवाद को बढ़ावा देना प्रारंभ किया। पाकिस्तान की यह चाल कामयाब रही और पंजाब आतंकवाद की आग में जलने लगा। लेकिन इंदिरा गाँधी राष्ट्र हित के लिए किसी भी कदम को उठाने से कभी पीछे हटती नहीं थी। उन्होनें स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ कर पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया को यह सन्देश दिया की भारत की एकता और अखंडता को तोड़ने की किसी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।


हालांकि ऑपरेशन ब्लू स्टार का सहारा लेकर सिक्खों को प्रभावित करने की पाकिस्तानी कोशिशें जारी रही जिससे कई युवा सरदार आतंकी गतिविधियों से जुड़ गये,उन्हें बड़े पैमाने पर आर्थिक मदद,सामरिक और आतंकी प्रशिक्षण सीमा पार से दिए गये। इस बीच सुरक्षा एजेंसियों द्वारा प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को चेतावनी दी गयी की वे सिक्खों से सावधान रहे और अपने सिक्ख अंगरक्षकों को बदल ले। इस देश की आन बान और शान की रक्षा के लिए सिक्खों ने कई बलिदान दिए है और प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को यह मंजूर नहीं था की वे उन पर भरोसा न करें। धर्म अफ़ीम के नशे से ज्यादा मदहोश कर देता है और अंततः पाकिस्तान अपनी साजिश में कामयाब रहा। 31 अक्तूबर 1984 को भारत की महान नेता इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही अपने सिक्ख अंगरक्षकों द्वारा कर दी गयी। स्वर्ण मंदिर को धार्मिक अपमान से जोड़कर पाकिस्तानी कुप्रचार के प्रभाव से इंदिराजी के अंगरक्षक भी बच नहीं पायें और उन्होनें देश की एक जांबाज नेता को गोलियों से भून दिया। भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उन्होंने बहादुरी, दिलेरी और साहस की जो मिसाल कायम की है उसे शायद ही कोई छू पाए।


इतिहास कितना निर्मम हो सकता है जब उसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाये। स्वर्ण मंदिर को आतंकियों से मुक्त करवानें की कार्रवाई को इंदिराजी के गलत निर्णयों में शुमार कर विष वमन करने की  कोशिशें कभी थमी नहीं। लेकिन देश को यह एहसास है की  भारत की सर्वप्रिय और कभी न झूकने वाले देशभक्तिपूर्ण जज्बें की प्रतीक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने एक उदार धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संकल्प और शक्ति के साथ स्वर्ण मंदिर को खालिस्तानी आतंकवादियों से आज़ाद करवाने का यह कड़ा और दूरगामी फ़ैसला किया था।


1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

Very correct assessment. Let this be a lesson for those who think of creating instability in the country.

brahmadeep alune

aakashwani sanvidhan koumi ekta Aajkal- 23rd November