शुक्रवार, 12 जून 2020

नेपाल पर भारत की कूटनीतिक खामोशी आत्मघाती,nepal-india vivad

नया इंडिया

                 नेपाल पर भारत की कूटनीतिक खामोशी आत्मघाती

                                                                                                डॉ.ब्रह्मदीप अलूने            

                                                                               

भूकंप से हिमालय की ऊंचाई कम होने का रहस्य भले ही बना रहे लेकिन भारत और नेपाल के संबंध कभी रहस्यमय नहीं हो सकते। यह सांस्कृतिक कारणों से मजबूत है,सामाजिक  दृष्टि से जरूरी है,भौगोलिक परिस्थितियाँ दोनों देशों को साथ रहने को मजबूर करती है,भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए नेपाल अनिवार्य है और धार्मिक दृष्टि से नेपाल के पशुपतिनाथ  के दर्शन किए बिना तो यह माना जाता है कि मुक्ति का मार्ग भी नहीं प्रशस्त होता।



लेकिन इन सबके दोनों संप्रभु देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संबंध समयानुसार बदलते रहते है और इनमे किसी भी स्थिति में असंतुलन उत्पन्न न हो इसे लेकर भारत खासतौर पर सजग रहा है। इस समय भारत और नेपाल के बीच सीमा का विवाद गहराता जा रहा है और वैश्विक राजनीति में भारत के लिए यह उसकी छवि खराब होने जैसा है। दरअसल आज़ाद भारत की विदेश नीति में प्रारम्भ से ही पड़ोसी देशों से अच्छे सम्बन्धों को प्राथमिकता दी गई और यही कारण रहा कि पाकिस्तान को छोड़कर अधिकांश देशों से भारत के मित्रवत संबंध रहे जिसक्का वैश्विक फायदा भी भारत को मिलता रहा। इन देशों में नेपाल बहुत कि महत्वपूर्ण माना जाता है।  



नेपाल भारत की भौगोलिक सुरक्षा मजबूरी रहा है और 1950 की शांति और मित्रता की संधि के जरिये भारत ने नेपाल को काबू में रखने की  एक शानदार कूटनीतिक कोशिश की थी। स्वतंत्रता के ठीक बाद  1950 में पंडित नेहरु ने नेपाल को लेकर यह स्पष्ट किया कि नेपाल पर किया जाने वाला कोई भी संभावित आक्रमण भारत की सुरक्षा के लिए निश्चित रुप से खतरा होगा। नेपाल को लेकर भारतीय राजनेताओं ने निरन्तर गंभीरता का परिचय दिया लेकिन इन सब के बावजूद नेपाल का रुख निरन्तर निराशावादी रहा। 1962  में भारत चीन युद्ध के दौरान नेपाल ने तटस्थता का परिचय दिया तो 1999 में काठमाण्डु के त्रिभुवन हवाईअड्डे पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. की साजिश से भारतीय विमान का अपहरण हो गया। नेपाल के ऐसे रूख के बावजूद भारतीय नेतृत्व बेहद संयमित होकर संबंधों को सौहाद्रपूर्ण बनाए रखने का निरन्तर प्रयास करता रहा है।

जाहिर है भारत का राजनीतिक नेतृत्व यह महसूस करता रहा है कि भारत के उत्तर पूर्व में स्थित नेपाल सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। नेपाल के साथ सद्भाव और सहयोगपूर्ण सम्बन्ध भारत के राजनीतिक,आर्थिक और सामरिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अभी तक नेपाल भारत के लिए एक ऐसा भूभाग से जुड़ा देश है जिसका लगभग सारा आयात और निर्यात भारत से होकर जाता है। नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है,भारत में बहने वाली नदियों का उदगम भी इन क्षेत्रों में पड़ता है। इस प्रकार दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर है। भारत और नेपाल के बीच अधिकांश सीमा खुली हुई है और बिना वीजा के नागरिक एक दूसरे के देशों में जा सकते है।


इस समय दोनों देशों के  बीच लिपुलेख को लेकर शुरू हुआ विवाद गहराता जा रहा है और यह असामान्य स्थिति की और तेजी से  बढ़ रहा है। हाल ही में भारत और नेपाल की सीमा पर नेपाली पुलिस  का निशाना भारतीय नागरिक बने है और यह पूरा घटनाक्रम भारत की सामरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। दोनों देशों के बीच विवाद की शुरुआत आठ मई को हुई थी जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो लिंक के ज़रिए 90 किलोमीटर लंबी एक सड़क का उद्घाटन किया था,यह पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में पड़ता है। कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले तीर्थयात्री इसी सड़क से जाते हैं।

यह इलाका लिपुलेख  दर्रे के अंतर्गत आता है और इसे भारत नेपाल और चीन के बीच ट्राई-जंक्शन  माना जाता है। भारत ने इस सड़क निर्माण के जरिए यह सुनिश्चित कर लिया कि भारत के हज़ारों तीर्थयात्री कैलाश मानसरोवर लंबे रास्तों से नहीं जाएंगे और लिपुलेख रूट उन्हें अपेक्षाकृत जल्दी कैलाश मान सरोवर पहुंचाएगा। नेपाल के पश्चिमी छोर पर स्थित कालापानी उत्तराखंड में स्थित है,भारत,नेपाल और तिब्बत से लगा यह समूचा इलाका भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  372 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में फिलहाल भारत का नियंत्रण है लेकिन नेपाल ने इस पर दावा कर इसे विवादित बनाने की कोशिश की है। जम्मू कश्मीर और लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद भारत ने जो नया नक्शा जारी किया था,नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने भारत के नए नक्शे का विरोध कर अप्रिय स्थिति उत्पन्न कर दी। इस नक्शे में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगितबाल्टिस्तान और कुछ हिस्सों को शामिल किया गया था तथा कालापानी को पहले की तरह ही भारत का भाग बताया गया है।


यह भी दिलचस्प है कि भारत और चीन के बीच मानसरोवर जाने के नए मार्ग को लेकर 2015 में ही बात शुरू हो गई थी,नेपाल तब से ही इसका विरोध कर रहा  था। उस समय चीन ने नेपाल विरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया था लेकिन भारत का चीन वाला रुख असामान्य था। भारत और नेपाल सम्बन्धों को ध्यान में रखते हुए नेपाल को विश्वास में लिया जाना अति आवश्यक था। अब नेपाल का नया नक्शा भारत कि चिंताएँ बढ़ाने वाला है और अभी तक भारतीय नेतृत्व इसे कोरोना संकट के बाद तक टाल देना चाहता है। यह स्थिति भारतीय सुरक्षा के लिए आत्मघाती हो सकती है। नेपाल जैसे पड़ोसी देश के साथ हमारा सीमा विवाद शुरू होना भारत के विरोधी देशों के लिए बेहद उपयोगी हो सकता है। अत: नेपाल भारत सम्बन्धों कि महत्ता को समझते हुए भारत को उच्च स्तर पर नेपाल से बातचीत कि प्रक्रिया को अविलंब शुरू करना चाहिए।


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