बुधवार, 24 जून 2020

शिया-सुन्नी रक्तपात से घिरे इस्लामिक संगठन में कश्मीर की चिंता,islamik organisation and kashmir

नया इण्डिया      

 

     शिया-सुन्नी रक्तपात से घिरे इस्लामिक संगठन में कश्मीर की चिंता

                                                                              डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


मजहबी राजनय वैश्विक जगत में इस्लामिक देशों के संगठन ओ.आई.सी.की वह सच्चाई है जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म की आड़ में अपने राजनयिक स्वार्थों की पूर्ति करना होता है। ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन की हालिया बैठक में भारत सरकार की उस नीति को गलत ठहराया है जिसके अंतर्गत पिछले साल धारा 370 को हटा दिया गया था ओआईसी के कॉन्टैक्ट ग्रुप के विदेश मंत्रियों की आपातकालीन बैठक में इसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय क़ानून जिसमें चौथा जिनेवा कंवेंशन भी शामिल है का उल्लंघन माना गया है



दरअसल युद्द कला में एक शब्द प्रचलित है काला प्रचार, जिसका उद्देश्य अफवाहों और गलत सूचनाओं से माहौल उत्पन्न किया जाता है। पाकिस्तान पिछले कई दशकों से कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहा है और ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन में उसने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को उछालने के लिए 1994 में एक कॉन्टैक्ट ग्रुप बनाया था,उसमें पाकिस्तान के अलावा अज़रबैजान,नाइजर, सऊदी अरब और तुर्की शामिल है कथित मुस्लिम हितों की रक्षा के नाम पर स्थापित 57 देशों के इस समूह में पाकिस्तान इस्लामिक मंच का उपयोग भारत विरोध के लिए अक्सर करता रहा है। ओआईसी ने जम्मू-कश्मीर पर अपने पुरानी स्थिति और प्रस्तावना को लेकर प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है और कश्मीरी अवाम के आत्मनिर्णय के अधिकार की क़ानूनी लड़ाई के समर्थन का फिर से दोहराया है



इसके पहले साल 2017 में भी ओ.आई.सी.ने संयुक्तराष्ट्र में कश्मीर में भारत द्वारा लोगों पर जुल्म करने का आरोप लगाया था। यह भी बेहद दिलचस्प है कि कश्मीर में रहने वाले मुसलमानों को मौलिक अधिकार,अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता और विकास की सारी सुविधाएँ दी गई है,यह ठीक वैसा है ही जैसा भारत के अन्य नागरिकों को प्राप्त है। इसके बाद भी ओ.आई.सी.का भारत पर कश्मीर में मुस्लिमों के मानव अधिकारों के उल्लंघन का आरोप बेबुनियाद और नासमझी है। जाहिर है यह सारी कवायद पाकिस्तान के दुष्प्रचार से सामने आई है।

इन सबके बीच यह जानना बेहद जरूरी है कि इस्लामिक संगठन की स्थापना का उद्देश्य क्या था और हकीकत में यह कहां खड़ा है।1969 में मोरक्को की राजधानी राबत से इस्लामिक कांफ्रेंस आर्गेनाइजेशन जी शुरुआत हुई1972 में इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी ने चार्टर के जरिए बाकायदा अपने उद्देश्य बताते हुए साफ किया था की सदस्य देशों के मध्य आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्लामी एकजुटता को प्रोत्साहन दिया जाएगा और किसी भी रूप में विद्यमान उपनिवेशवाद की समाप्ति तथा जातीय अलगाव और भेदभाव की समाप्ति के लिये प्रयास किये जायेगेइसके साथ ही यह संकल्प भी किया गया की विश्व के सभी मुसलमानों की गरिमा, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अधिकारों की रक्षा करने के लिये,उनके संघर्षों को मजबूती प्रदान करने के निरंतर प्रयास किये जाएंगे ओआईसी के सभी सदस्य देशों और अन्य देशों के मध्य सहयोग और तालमेल को प्रोत्साहित करने के लिये एक उपयुक्त वातावरण तैयार करना इस संगठन की प्राथमिकताओं में घोषित किया गया है

लेकिन देखने में यह आया है की इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी का इस्तेमाल इसके सदस्य देश अपनी बेहतरी के लिए और अपने हितों के अनुसार करते है,जिसका मतलब इस्लामिक दुनिया की बेहतरी से कतई नहीं है। ओआईसी पर सुन्नी कट्टरपंथी ताकतें बुरी तरह हावी है और यह संगठन सऊदी अरब की अगुवाई और प्रभाव में काम करता है। ऐसे में शिया बहुल मुस्लिम देश इस संगठन को संदेह की दृष्टि से देखते है और ईरान आगे बढ़कर अपना विरोध कई मोर्चो पर दर्ज कराता रहा है।


पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क चीन के शिन्चियांग प्रान्त में तकरीबन 1 करोड़ उईगर मुसलमान रहते है,जिन पर रोजे रखने,महिलाओं के बुर्खा पहनने,खुले में नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है। यहाँ तक की उन्हें रोज मेंटल डिटेक्टर से चेक किया जाता है और अब तो मुस्लिम बाहुल्य वाले इस प्रान्त को वहां बसने वाले मुस्लिम बाशिंदों के लिए  खुली जेल  तक कहा जाने लगा है। मुसलमानों के लिए अमानवीयता की हदें  पार करने वाले चीन पर अभी तक इस्लामिक देशों की संस्था ओ.आई.सी.खामोश है।

वहीं इस्लामिक दुनिया पर पाकिस्तान जैसे देशों की चाटुकारिता और चापलूसी इस कदर हावी है की अपने आर्थिक और सामरिक हित बनाये रखने की जुगत में धार्मिक हितों को दरकिनार कर दिया जाता है। चीन और भारत के बीच सीमा पर तनाव है और ऐसा लगता है कि इस्लाम विरोधी साम्यवादी चीन की शह पर पाकिस्तान ने जानबूझकर ऐसा प्रस्ताव पास किया है जिससे ताजा हालात में भारत पर दबाव बढ़ाया जा सके।


कश्मीर पर प्रस्ताव पेश करने वाले कांटेक्ट ग्रुप के तीन महत्वपूर्ण सदस्यों पाकिस्तान,सउदी अरब और तुर्की के बारे में जानना भी जरूरी हैपिछले साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की जेनेवा में हुई बैठक में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अहमदिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान की हुकूमत पर अत्याचार का आरोप लगाया और न्याय की गुहार लगाई थी पाकिस्तान में इस समुदाय की आबादी करीब 50 लाख है और वे मतदान के अधिकार से वंचित है

आर्थिक जरूरतें बढ़ने और तेल का घाटा दूर करने के लिए सऊदी अरब ने  सीरिया और इराक को तबाह करने के लिए आईएसआईएस का दांव खेला था,जिससे  इन दोनों देशों का तेल भंडार नष्ट हो जाएं और तेल की दुनिया का सरताज सऊदी अरब हो जाएं। इराक और सीरिया में आतंकी संगठन द्वारा तेल के कुंओं में आग लगाकर उन्हें नष्ट करने की सच्चाई यहीं है। इस प्रकार ओआईसी के कथित आका सऊदी अरब अपने आर्थिक हितों के संवर्धन के लिए मजबूत इस्लामिक देशों को नेस्तनाबूद कर देने तक आमादा हो जाते है। तुर्की मध्य पूर्व में रहने वाले कुर्द मुसलमानों पर रोज हमलें करता है और इन कुर्द मुस्लिमों की सुरक्षा रूस की सेना कर रही है,जबकि रूस को इस्लाम के दुश्मन के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा है


इस्लामिक दुनिया की यह कड़वी हकीकत है की वे आपसी विवादों और स्वार्थों के लिए किसी हद तक जा सकते है,जिसमें धर्म को भी दरकिनार कर दिया जाता है। अपने स्वार्थों के कारण ही इराक और सीरिया जैसे मुस्लिम देश तबाह हो चुके है और गृह युद्ध की आग में बुरी तरह झुलस रहे है। पिछलें कई दशकों से मध्य पूर्व में हजारों मुसलमानों के कत्लेआम और शरण की गुहार में मरते लोगों के लिए न तो पाकिस्तान के दरवाजें खुले और न ही इस्लाम के सबसे बड़े पैरोकार सऊदी अरब केइनसे बेहतर जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपियन राष्ट्र रहे जिन्होंने मानवीयता के नाम पर मुस्लिमों को प्रवेश दिया

जाहिर है कश्मीर पर ओ.आई.सी. के प्रस्तावों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन प्रस्तावों को लाने वाले इस्लामिक देशों में रहने वाले मुसलमानों से बेहतर भारतीय मुसलमान और कश्मीरी है जो समान संवैधानिक अधिकारों के साथ धर्मनिरपेक्ष भारत में खुशहाल रह रहे है

 


कोई टिप्पणी नहीं:

brahmadeep alune

अस्पतालों के राष्ट्रीयकरण की जरूरत, india private hospital rashtriya sahara

राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप विशेषांक                 स्वास्थ्य सुरक्षा किसी भी देश की प्राथमिकता होनी चाहिए लेकिन भारत में ऐसा बिल्कुल भी नह...