गुरुवार, 18 जून 2020

मोदी के लिए नायक बनने का अवसर,india-china-modi

 दबंग दुनिया                               

                             मोदी के लिए नायक बनने का अवसर

                                                                            डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


साम्यवादी क्रान्तिकारी लेनिन मानते थे कि युद्द कला केवल सैनिक आयाम नहीं है,बल्कि उसका चरित्र कूटनीतिक,वैज्ञानिक और आर्थिक भी होता है सीमा पर चीन से हिंसात्मक संघर्ष के बाद यह आशंका गहराने लगी है कि दोनों देशों के बीच यह वास्तविक संघर्ष में न बदल जाये भारत के प्रति चीन की नीति बहुआयामी रही हैवहीं भारत साम्राज्यवाद का घोर विरोधी रहा और सीमाओं के विस्तार को लेकर भारत की आक्रमणकारी नीति कभी न रही अत: भारत का चीन के प्रति नजरिया दोस्ताना होने के साथ नियंत्रण और संतुलन का रहा


वहीं 1949 में अस्तित्व में आये माओवादी चीन में राष्ट्रीय हित की सर्वोच्चता और चीन की प्रतिष्ठा को वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने के लिए अपने देश के सभी पुराने प्रदेशों को साम्यवादी शासन में शामिल करने का उद्देश्य निहित किया गया इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ही चीन की वैदेशिक नीति में चीनी सीमाओं का विस्तार शामिल किया गया चीन की इन्हीं नीतियों से उसकी सीमा से लगने वाले देश संकट में रहे है पड़ोसी देशों की सीमा में असीमित हस्तक्षेप का चीनी सिद्धांत रूस,कजाकिस्तान,वियतनाम,नेपाल,भूटान,म्यांमार से लेकर भारत तक के लिए जानलेवा रहा है इन सभी देशों में रूस की स्थिति मजबूत रही अत: इस सदी की शुरुआत में ही दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझा लिया गया भारत को छोड़कर बाकी देशों ने चीन का प्रतिकार तो किया है लेकिन वे चीन की आर्थिक और सामरिक ताकत से भयभीत भी रहे है


भारत और चीन के बीच मैक मोहन रेखा को वास्तविक नियंत्रण रेखा माना जाता है लेकिन चीन ने अंग्रेजों द्वारा जबरदस्ती इसे मोटी कूची से खींचा हुआ बताकर इस सीमा को मानने से ही इंकार कर दिया। चीन की स्वतंत्रता के एक साल बाद ही अर्थात् 1950 में पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संसद में यह साफ कहा कि भारत और चीन की सीमा का आधार मैकमोहन रेखा है और भारत इस पर अमल करने और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्द है। इन सबके बीच साम्यवाद की विध्वंसक विचारधारा से भारतीय विचारधारा से कोई मेल नहीं था,इसके साथ ही आज़ाद भारत के पुनर्निर्माण और विकास की असंख्य चुनौतियां भी थी,अत: भारत ने चीन से पंचशील जैसे शांतिप्रिय सिद्धांत के बूते सीमा पर शांति बनाए रखने को सुनिश्चित किया।

भारत और चीन के संबंध अहस्तक्षेप के आधार पर बेहतर संचालित हो सकते थे लेकिन चीन की तिब्बत के प्रति नीति ने सारे प्रतिमान बदल दिए। चीन का तिब्बत पर कब्ज़ा और तिब्बतियों के गुरु दलाई लामा को भारत का संरक्षण चीन के लिए असहनीय भी था और दोनों देशों के बीच असल चुनौती यही से खड़ी हुई। माओ मार्क्सवादी-लेनिनवादी की क्रांतिकारी विचारधारा को सैनिक रणनीति में जोड़कर संघर्ष से सब कुछ हासिल करने में भरोसा करते थेमाओ ने अपने प्रतिद्वंदी अमेरिका  की नब्ज जल्द ही टटोल ली कि वह चीन का सामरिक विरोध किस स्तर पर कर सकता हैभारत की गुटनिरपेक्षता को अमेरिका शक की दृष्टि से देखता था अत: माओ को यह विश्वास था कि अमेरिका भारत के साथ आसानी से खड़ा नहीं होगा वहीं रूस के समाजवादी मॉडल को अपनाने के बाद भी माओ को यह भरोसा था  कि रूस भारत का भले ही दोस्त हो लेकिन चीन का वह भाई है चीन ने 1962 में भारत पर अप्रत्याशित हमला करके लेनिन की  युद्द कला की उस विचारधारा  का पालन किया जिसके अनुसार युद्द के कारण सिर्फ अंतिम विजय नहीं होते। 1962 के युद्द में भारत से समझौते के बाद भी लड़ाकू विमानों की आपूर्ति में देरी करके स्वयं खुश्चेव ने इसकी पुष्टि कर दी  कि चीन उसके लिए भारत से ज्यादा महत्वपूर्ण है


चीन ने इस युद्द से एशिया की एक मात्र महाशक्ति होने का दावा मजबूत किया वहीं भारत की वैश्विक सशक्त छवि के मिथक को धराशाई भी कर दिया। इस युद्द में गुटनिरपेक्ष देशों की ख़ामोशी से भारत की शांति और युद्द प्रिय शक्तियों  पर रोक लगाने की कोशिशों को गहरा धक्का लगा। माओ भारत को चुनौती के रूप में देखते थे और उन्होंने भारत को सबक देने के लिए साम्यवादी आक्रामक नीति का सहारा लेने से कोई गुरेज नहीं किया। माओ इस युद्द से भारत को कमजोर करना चाहते थे लेकिन भारत का राजपुताना चरित्र अस्मिता पसंद रहा है और इसीलिए भारत मजबूत बनकर उभरा, इसी का परिणाम 1965 और 1971 के युद्द में सामने आया।


1960 के दशक और 2020 में स्थितियां एक जैसी है। माओ भारत को सबक देना चाहते थे जबकि शी जिनपिंग भारत की चुनौती को खत्म करना चाहते है जो उन्हें कूटनीतिक और आर्थिक तौर पर मिल रही है। 1962 की शिकस्त से सबक लेकर भारत एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बना और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की और कदम बढ़ाएं,जिसके कारण भारत आईटी से लेकर अन्तरिक्ष तक एक महाशक्ति बना। इस समय भारत चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है और भारत के बाज़ार पर उसका पूरा नियन्त्रण है। चीन की यही ताकत उसे भारत पर बढ़त दे रही है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असल परीक्षा यही है। भारतीय बाज़ार से चीन को बेदखल करना और आर्थिक रूप से भारत को आत्मनिर्भर बनाना उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता होना चाहिए।  यदि मोदी इसमें सफल रहे तो यह न केवल चीन पर यह हमारी निर्णायक बढ़त होगी बल्कि वे राष्ट्र के नायक के रूप में युगों युगों तक याद किये जायेंगे।

 


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