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अमेरिकी सामरिक सहयोग समय की जरूरत है,ameriki samrik sahyog

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पत्रिका           अमेरिकी सामरिक सहयोग समय की जरूरत है                                                                                     डॉ.ब्रह्मदीप अलूने                              https://m.patrika.com/amp-news/opinion/us-strategic-cooperation-needs-time-6231224/?fbclid=IwAR3dP6H3t0qgebyMZdFZojifPqfh04Nj0_dVHrx9lvdo2oJ63gdYp1LDxcM 29/06/2020 निर्णायक   अंत से बचते हुए युद्द को लंबा खींचने की कला साम्यवादी चीन की विस्तारवादी नीति का पहला चरण माना जाता है। माओ का मानना था कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था वाली सरकारे दीर्घकाल तक चलने वाले अनिर्णयात्मक संघर्ष को राजनीतिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों से अधिक समय जारी नहीं रख सकती है। चीन की भारत को लेकर शुरू ही यहीं नीति रही है और भारत चीन की परम्परागत नीति में बिना किसी विशेष प्रतिकार के फंसता चला गया। चीन ने भारत पर सामरिक बढ़त बनाएं रखने के लिए निर्णायक युद्द न करके समय समय पर कुछ जगहों पर हिंसक सैन्य संघर्ष पर विश्वास किया। वह जानबूझ कर सीमा विवाद हल नहीं करना चाहता है और सीमा विवाद को समय-समय पर भारत पर दबाव बनाने के लिए उप

कोरिया संकट से उभरती चुनौतियां,koriya problem

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जनसत्ता                          कोरिया संकट से उभरती चुनौतियां                                                                     ब्रह्मदीप अलूने https://epaper.jansatta.com/c/53033079 तानाशाही एक भयानक विचार है,जिसमें वैश्विक शांति,सुलह की उम्मीदें,समन्वय की सम्भावना और वैदेशिक सम्बन्धों के शिष्टाचार को नकारने की आशंका बनी रहती है,इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इसे मरो या मारो की दो टूक पद्धति भी माना जाता है। दरअसल पूर्वी एशिया में कोरिया प्रायद्वीप के देश उत्तर कोरिया की कथित समाजवादी शासन पद्धति साम्यवाद के अंतर्द्वंद में उलझकर तानाशाही को आत्मसात कर चूकी है और यह संकट विश्व के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया है । द्वितीय विश्वयुद्द के बाद महाशक्तियों के बीच कोरिया प्रायद्वीप का राजनीतिक बंटवारा बाद में वैचारिक प्रतिद्वंदिता का कारण बन गया और इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होकर विश्व शांति के लिए लगातार संकट बढ़ा रहे है । इस प्रकार संयुक्तराष्ट्र के युग में भी उत्तरी और दक्षिणी कोरिया में साम्यवाद और लोकतंत्र के बीच का संघर्ष   बदस्तूर जारी है ।   अमेरिका और सोवियत संघ क

सामरिक सहिष्णुता से साम्यवाद को परास्त करना संभव नहीं,samyvad

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सुबह सवेरे          सामरिक सहिष्णुता से साम्यवाद को परास्त करना संभव नहीं                                                          डॉ.ब्रह्मदीप अलूने                                                       http://epaper.subahsavere.news/c/53010569 दलाई लामा को भारत के समर्थन के बाद 1959 से 1961 के बीच सीमा पर भारत और चीन की सेनाओं की झड़पें भी हुई,इसे लेकर माओ ने चीन कि सेना से साफ कर दिया था की,यह देखने में आ रहा है की चीनियों को पीछे हटने के लिए भारत दबाव बनाता है,अब ऐसा होगा तो पलटवार भी होगा ।” इस चुनौती से बेखबर जहाँ भारतीय सरकार शांति और परस्पर सहयोग की बातों में मशगुल था वहीं   माओं ने अपने कमांडरों से मुखातिब होते हुए कहा,”ऐसा जरूरी नहीं की चीन और भारत के बीच हमेशा दुश्मनी बनी ही रहे,दोनो देश शांति के एक और लम्बे दौर का फ़ायदा उठा सकते है,लेकिन ऐसा करने के पहले चीन को अपनी ताकत का इस्तेमाल करके पहले भारत को कड़ा सैन्य सबक देना होगा जिससे उसे समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सके ।” अंततः 1962 के भारत चीन युद्द ने भारत की सामरिक कमजोरी को दुनिया के सामने सरेआम कर दि

शिया-सुन्नी रक्तपात से घिरे इस्लामिक संगठन में कश्मीर की चिंता,islamik organisation and kashmir

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नया इण्डिया               शिया-सुन्नी रक्तपात से घिरे इस्लामिक संगठन में कश्मीर की चिंता                                                                                डॉ.ब्रह्मदीप अलूने मजहबी राजनय वैश्विक जगत में इस्लामिक देशों के संगठन ओ.आई.सी.की वह सच्चाई है जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म की आड़ में अपने राजनयिक स्वार्थों की पूर्ति करना होता है। ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन की हालिया बैठक में भारत सरकार की उस नीति को गलत ठहराया है जिसके अंतर्गत पिछले साल धारा 370 को हटा दिया गया था । ओआईसी के कॉन्टैक्ट ग्रुप के विदेश मंत्रियों की आपातकालीन बैठक में   इसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय क़ानून जिसमें चौथा जिनेवा कंवेंशन भी शामिल है का उल्लंघन माना गया है । दरअसल युद्द कला में एक शब्द प्रचलित है काला प्रचार, जिसका उद्देश्य अफवाहों और गलत सूचनाओं से माहौल उत्पन्न किया जाता है। पाकिस्तान पिछले कई दशकों से कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहा है और ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन में उसने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को उछालने के लिए

असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां, rashtrvad aur vaishvik chunoutiyna

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प्रजातंत्र                                           असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां                                                     डॉ.ब्रह्मदीप अलूने शक्ति,शस्त्र और युद्द की संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति को हिटलर और मुसोलिनी के पराभव के साथ दफनाने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को संयुक्तराष्ट्र ने मजबूती दी और पश्चिमी देश इस मान्यता पर निरंतर आगे बढ़ते रहे,जिसके अनुसार किसी भी समस्या के समाधान के रास्ते लोकतंत्र से खुलते है ।   द्वितीय विश्व युद्द के बाद लोकतंत्र को विश्व शांति का पर्याय मान लिया गया और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को विकसित और मजबूत करने के औजार के रूप में इसका उपयोग होने लगा ।   बीसवी सदी के आधे सफर से शुरू हुआ लोकतंत्र का आधुनिक सफर इक्कीसवी सदी के 20 साल पूरा करने की ओर है,लेकिन इसकी चुनौतियां नई आशंकाओं के साथ विश्व शांति के समक्ष खड़ी है । राष्ट्रवाद के उदय को इतिहास की एक निर्णायक घटना माना जाता है और इसके विकास और पोषण में उदारवाद और प्रजातंत्र की प्रमुख भूमिका रही.लेकिन आधुनिक राजनीतिक तंत्र ने लोकतांत्रिक सत्ता पर बने रहने के लिए जिस प्रकार र