मंगलवार, 30 जून 2020

अमेरिकी सामरिक सहयोग समय की जरूरत है,ameriki samrik sahyog

पत्रिका

         अमेरिकी सामरिक सहयोग समय की जरूरत है

                                                                                    डॉ.ब्रह्मदीप अलूने                             

https://m.patrika.com/amp-news/opinion/us-strategic-cooperation-needs-time-6231224/?fbclid=IwAR3dP6H3t0qgebyMZdFZojifPqfh04Nj0_dVHrx9lvdo2oJ63gdYp1LDxcM

29/06/2020

निर्णायक  अंत से बचते हुए युद्द को लंबा खींचने की कला साम्यवादी चीन की विस्तारवादी नीति का पहला चरण माना जाता है। माओ का मानना था कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था वाली सरकारे दीर्घकाल तक चलने वाले अनिर्णयात्मक संघर्ष को राजनीतिक,आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों से अधिक समय जारी नहीं रख सकती है।

चीन की भारत को लेकर शुरू ही यहीं नीति रही है और भारत चीन की परम्परागत नीति में बिना किसी विशेष प्रतिकार के फंसता चला गया। चीन ने भारत पर सामरिक बढ़त बनाएं रखने के लिए निर्णायक युद्द न करके समय समय पर कुछ जगहों पर हिंसक सैन्य संघर्ष पर विश्वास किया। वह जानबूझ कर सीमा विवाद हल नहीं करना चाहता है और सीमा विवाद को समय-समय पर भारत पर दबाव बनाने के लिए उपयोग करता है।


साम्यवाद की नीतियाँ आक्रामक और तानशाही पूर्ण होती है वहीं लोकतंत्र मर्यादाओं और सीमाओं में बंधा होता है।  माओ के अनियंत्रित चीन के लिए भारत के आदर्श लोकतंत्र का कोई सम्मान नहीं है और इसी का फायदा चीन ने लगातार उठाया है।

भारत की अधिकांश लोकतांत्रिक सरकारों ने चीन से सीमा विवाद को लेकर सख्ती और सक्रियता नहीं दिखाई, वहीं चीन ने सामरिक बढ़त लेते हुए प्रतिद्वंदी देश को आर्थिक बाहुपाश में जकड़ लिया। सितम्‍बर 2014 में अहमदाबाद में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग गांधी की यादों को साझा कर रहे थे और दूसरी ओर जम्मू कश्मीर के चुमार इलाके में घुसकर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान भारत की अखण्डता को चुनौति देने का दुस्साहस कर रहे थे।


भारत के प्रति चीन की नीति में विस्तारवादी अहंकार का नजरिया शामिल रहा है। 60 के दशक में पहली बार तिब्बत को लेकर भारत और चीन आमने-सामने  हुए। 19 अप्रैल 1960 को चीन के प्रधानमंत्री चाऊ-एन लाइ और विदेश मंत्री मार्शल चेन यी प्रधानमंत्री नेहरू से बात करने के लिए दिल्ली पहुंचे। उस समय इस बैठक में तत्कालीन उप राष्ट्रपति राधाकृष्णन् भी थे। बेहद शालीन लेकिन सख्त लहेजे में उन्होंने चीनी प्रतिनिधिमंडल से कहा- 40 करोड़ भारतीयों की दोस्ती की तुलना में कुछ हजार वर्गमील के इलाके की क्या अहमियत है ? इस पर मार्शल चेन यी ने पलटवार किया - 60 करोड़ चीनियों की दोस्ती की तुलना में कुछ सौ मील इलाके की क्या अहमियत है? वास्तव में इस बहस से दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाले दो राष्ट्रों की दुश्मनी की शुरूआत देखी जा सकती थी। इस बैठक में जब तत्कालीन वित्त मंत्री लेकिन दक्षिण पंथी नेता मोरारजी देसाई भी शामिल हो गये तो गुस्साएं चाऊ-एन लाइ ने देसाई से मुखातिब होते कहा, “आप बहुत कह चुके हैं”मोरारजी ने उसी लहजे में जवाब दिया, “आप बहुत से ज्यादा कह चुके हैं।” नेहरू की शान्तिप्रिय विदेश नीति में भारतीय नेताओं के यह सख्त अंदाज चीनियों के लिए खतरनाक  मंसूबे के संकेत थे और वास्तव में चीन से निपटने के लिए आक्रामक अंदाज की जरूरत भी थी। फिलिपीन्स के पूर्व राष्ट्रपति बेनिग्रो एक्किनो ने एक बार कहा था यदि चीन आपको दबाता है और यदि आप झूके तो और अधिक दबाएगा। स्पष्ट है चीन को जवाब देने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और आक्रामक कूटनीति चाहिए।

चीन की नीतियों में पारम्परिक रूप से मिडिल किंगडम की भावना विद्यमान रही है। प्राचीन समय में चीन निवासी अपने आप को विश्व के केन्द्र के रूप में होने का दावा करते थे इसके तीन मौलिक तत्व अब भी चीन की विदेश नीति में पाये जाते हैं। पहला चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि चीन को कोई देश न मानकर विश्व ही माना जाए। दूसरा चीन बहुत उदार है और जो उसकी नीतियों के अंतर्गत चलता है उस पर चीन कृपा रखता है और तीसरा तत्व यह है कि चीन कभी भी बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता है। प्राचीन काल से चली आ रही इस परम्परा को चीन ने जीवित रखा है। वह अंतर्राष्‍ट्रीय न्‍यायालय के फैसलों को दरकिनार कर देता है तो उत्तर कोरिया पर संयुक्तराष्ट्र के प्रतिबन्ध के बाद भी उसे परमाणु हथियार और अन्य साजोसामान देने से कोई गुरेज नहीं। वह कई देशों के आतंकी संगठनों को हथियार बेचता है,उत्तर कोरिया को हथियारों की तस्करी में मदद करता है। संयुक्तराष्ट्र में पाकिस्तान के आतंकियों का बचाव करता है। दक्षिण चीन सागर से लगे कई देशों की भूमि और समुद्र पर अपना अतिक्रमण करता है।

चीन अरूणाचल प्रदेश पर दावा करते हुए वाले इस क्षेत्र को दक्षिणी तिब्बत कहता है। लद्दाख,अरूणाचल प्रदेश और सिक्किम उसकी घुसपैठ के प्रमुख इलाके है। वह वास्तविक नियन्त्रण रेखा को नजरअंदाज करता है। अब गलवान जैसी सामरिक रूप से मजबूत घाटी पर उसकी नजर है और यदि चीन को इस समय दबाया नहीं गया तो वह भारत पर मजबूती से हावी होगा,जिसके बेहद घातक परिणाम हो सकते है। चीन को जवाब देने के लिए मजबूत सहयोगी की जरूरत है और ऐसे में भारत के सामने अमेरिका एक बेहतर विकल्प हो सकता है। इस समय रूस की आर्थिक हालात उसे चीन से उलझने की इजाजत नहीं देते,अत: भारत को चीन से संघर्ष की स्थिति में रूस से कोई मदद मिले इसकी संभावना कम है। जाहिर है राष्ट्रीय हित में बड़े कदम उठाते हुए चीन पर दबाव डालने के लिए भारत को अमेरिका की सामरिक और आर्थिक मदद लेने से गुरेज नहीं होना चाहिए। अमेरिका ने चीन के खिलाफ भारत से सहयोग बढ़ाने के संकेत भी दिए है,यह निर्णायक कदम हो सकता है।

 


शुक्रवार, 26 जून 2020

कोरिया संकट से उभरती चुनौतियां,koriya problem

जनसत्ता

                         कोरिया संकट से उभरती चुनौतियां

                                                                   ब्रह्मदीप अलूने


https://epaper.jansatta.com/c/53033079

तानाशाही एक भयानक विचार है,जिसमें वैश्विक शांति,सुलह की उम्मीदें,समन्वय की सम्भावना और वैदेशिक सम्बन्धों के शिष्टाचार को नकारने की आशंका बनी रहती है,इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इसे मरो या मारो की दो टूक पद्धति भी माना जाता है। दरअसल पूर्वी एशिया में कोरिया प्रायद्वीप के देश उत्तर कोरिया की कथित समाजवादी शासन पद्धति साम्यवाद के अंतर्द्वंद में उलझकर तानाशाही को आत्मसात कर चूकी है और यह संकट विश्व के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया है



द्वितीय विश्वयुद्द के बाद महाशक्तियों के बीच कोरिया प्रायद्वीप का राजनीतिक बंटवारा बाद में वैचारिक प्रतिद्वंदिता का कारण बन गया और इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होकर विश्व शांति के लिए लगातार संकट बढ़ा रहे है इस प्रकार संयुक्तराष्ट्र के युग में भी उत्तरी और दक्षिणी कोरिया में साम्यवाद और लोकतंत्र के बीच का संघर्ष बदस्तूर जारी है  अमेरिका और सोवियत संघ के पूंजीवाद और साम्यवाद के असर से युद्द के मैदान में खून बहाने वाले दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच 1953 में युद्द रुक तो गया था लेकिन महाशक्तियों के हितों के कारण दोनों देशों के बीच कोई शांति समझौता नहीं हो सका और इसी कारण पिछले 7 दशक से दोनों देशों के नागरिक युद्द जैसे माहौल में रहने को मजबूर है और इस क्षेत्र में युद्द भड़कने की आशंका लगातार बनी रहती है

इस समय दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर चरम पर है और उत्‍तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया की सीमा से लगे संपर्क कार्यालय को विस्‍फोट करके उड़ा दिया है  तानाशाह किम का मानना है कि सीमा के उस पार से उत्तर कोरिया विरोधी पर्चे और गुब्बारें उड़ाएं जाते है और यह उत्तर कोरिया के लोगों को भड़काने का पड़ोसी दक्षिण कोरिया का प्रयास है। वहीं दक्षिण कोरिया सीमा पर शांति बनाएं रखने का पक्षधर नजर आता है। दक्षिण कोरिया से सम्बन्ध विच्छेद को लेकर उत्तर कोरिया का रुख उसकी विश्वसनीयता के लिए भी खतरनाक है। उत्तर कोरिया आवश्यकता अनुसार शांति के करार करने और उसे तोड़ने का माहिर खिलाडी हैइस देश में 1990 के दशक में भारी अकाल आया था तब उसने उससे उबरने के लिए उसने विश्व के साथ सहयोग का दिखावा किया थाजिसके अंतर्गत 1994 में परमाणु हथियारों के परीक्षण रोकने के लिए अमेरिका के साथ समझौता किया था और 1999 में मिसाइल टेस्टिंग प्रतिबंध पर उसने सहमति भी जताई थीलेकिन परिस्थितियां मुफीद होते ही 2006 में उसने एक बार फिर इसे तोड़ दिया  हाल के वर्षों में भी किम का यही रुख देखा गया है।



साल 2017 में दक्षिण कोरिया के नए  राष्ट्रपति बने मून जे-इन ने शपथ  लेते हुए राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले भाषण में अर्थव्यवस्था और उत्तर कोरिया से संबंधों पर बात की और प्योंगयांग जाने की इच्छा भी जताई थी  यह कोरिया प्रायद्वीप में शांति स्थापना के लिए सकारात्मक पहल माना गया,इसके बाद दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून-जे-इन और उत्तरी कोरियाई नेता किम-जोंग ने साल 2018 में एक सैन्य समझौता भी किया जिसे व्यापक रूप से दोनों देशों में रहने वाले कोरियाई लोगों के बीच तनाव को कम करने के उद्देश्य के लिए उठाया गया कदम माना  गया था इस समझौते में  उत्‍तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच एक संपर्क कार्यालय भी बनाया गया था,जिसे उत्तर कोरिया ने अब नष्ट कर दिया है।  उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच एक  असैन्य क्षेत्र भी है जिसे 1950-53 के कोरियाई युद्ध के बाद से कोरियाई प्रायद्वीप की विभाजक रेखा माना जाता है  पिछले साल इसी स्थान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग की मुलाकात हुई थी  कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु मुक्त बनाने के उद्देश्य से इस मुलाकात को भी ऐतिहासिक माना गया था लेकिन पिछले कुछ सालों में उत्तर कोरिया को शांति रखने की दक्षिण कोरिया और अमेरिका की कोशिशें अब धराशाई हो गई है और एक बार फिर कोरिया प्रायद्वीप युद्द के मुहाने पर खड़ा है। इसकी आशंका गहराने का कारण उत्तर कोरिया का बेहद खतरनाक तानाशाह किम जोंग रहा है और उसे मिलने वाले चीन और रूस के प्रश्रय की भी इसमें बड़ी भूमिका रही है।




उत्तर कोरिया के वर्तमान  तानाशाह किम जोंग  की कार्यप्रणाली बेहद  खतरनाक और विध्वंसक है। क्रुरता और नृशंसता इतनी की अपने रक्षा मंत्री को महज़ झपकी लेने के कारण एंटी एयर क्राफ्ट गन से उड़ा देने जैसे वहशियाना कृत्य करने से भी उसे गुरेज नहीं।  इस देश के लोग अपने तानाशाह से इतने भयभीत और आतंकित है की वे अपने तानाशाह का नाम तक जुबान पर नहीं आने देना चाहते। तकरीबन 2 लाख विरोधी जेलों में बंद है,इसमें से अनेक यातनाएं झेलते झेलते पागल हो चुके है या मर चुके है। ढाई करोड़ की आबादी में हर तीसरा बच्चा भूखा रहने को मजबूर है और किम हथियारों के बूते दुनिया को धमका रहा है। दक्षिण कोरिया के एक राजनयिक ने  साल 2017 में दावा किया था कि,उत्तर कोरियाई नागरिक पहले से ही आर्थिक बदहाली में जी रहे हैंसड़कों से कारें  कम हो गई हैं,जहां तक हो सके कम ईंधन से काम चलाया जा रहा है,ज़रूरत के सामानों में लगातार कमी आती जा रही है

उत्तर कोरिया के बदहाल जीवन से परेशान वहां के नागरिक दक्षिण कोरिया भाग कर आ जाते है और यह स्थिति किम जोंग को स्वीकार्य नहीं है। किम ऐसे लोगों को देशद्रोही मानता है और दक्षिण कोरिया से यह अपेक्षा करता है की वह उन्हें उत्तर कोरिया के ह्वालें कर दे,लेकिन ऐसा कभी दक्षिण कोरिया ने किया नहीं है।

वास्तव में दोनों देशों के जीवन स्तर में इस अंतर के पीछे राजनीतिक स्थिति रही हैउत्तर कोरिया किम राजवंश के शासन और तानाशही के रास्ते पर चला दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया ने अमरीकी मदद से इंडस्ट्री को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया दक्षिण कोरिया 1950 के युद्द से उबरकर एक संपन्न राष्ट्र के रूप में उभरा,यहां तक कि उसने 1988 में ओलंपिक खेलों की भी मेजबानी  करने में भी सफलता हासिल की

दक्षिण कोरिया लोकतांत्रिक देश होने और उच्च विकास दर के साथ दुनिया के विकसित देशों में शुमार किया जाता है। अमेरिका से मजबूत सामरिक और आर्थिक सम्बन्धों के चलते दक्षिण कोरिया मजबूत स्थिति में है और यह स्थिति चीन,रूस और उत्तर कोरिया को स्वीकार्य नहीं है।  चीन और रूस जैसे साम्यवादी देश एशिया में अमेरिका को चुनौती देने के लिए अस्थिर उत्तर कोरिया के बदनाम तानाशाह का उपयोग करते रहते है और अब यह स्थिति घातक हो गई है। उत्तर कोरिया में यहाँ के  सर्वसत्तावादी शासनतंत्र में कानून और न्याय व्यवस्था को भी माओ सिद्धांतों पर ढाला गया है जिसमें विरोधियों को कुचलने के लिए किसी भी  हद तक जाया जा सकता है।  संयुक्त राष्ट्र के तमाम प्रतिबंधों के बावजूद इसके 90 प्रतिशत बाजार पर चीनी कब्ज़ा है। अपने तानाशाहों की सनक का प्रारम्भ से ही बुरी तरह शिकार इस देश के प्रशासक सत्ता के किसी  निश्चित आदर्श या सिद्धांत को दरकिनार कर सत्ता की सर्वोच्चता और उसके उद्देश्यों की सर्वश्रेष्ठता को स्थापित किए हुए है जिसमें प्रजातंत्र और वैयक्तिक स्वतंत्रता का कोई स्थान नहीं है।  

कोरिया को लेकर महाशक्तियां लगातार आमने सामने रही है। 25 जून 1950 को उत्तर कोरिया की साम्यवादी सरकार ने जब दक्षिण कोरिया पर हमला किया था,तब उसे बचाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सेना की कमान एक अमेरिकी जनरल मैक ऑर्थर के हाथों में थी। लेकिन तब भी उस युद्ध का निर्णायक समाधान इसलिए नहीं हो सका था क्योंकि चीन का युद्ध में उतर आने का अंदेशा था और आज भी हालात जस के तस है। दक्षिण कोरिया की  1953 से अमरीका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अठ्ठाइस हजार से ज्यादा अमरीकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं मिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार है वहीं चीन और उत्तर कोरिया के बीच 1961 से पारस्परिक सहायता और सहयोग के रक्षा संधि हैं इससे  साफ है कि अगर दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच युद्द की परिस्थिति में अमेरिका और चीन आमने सामने हो सकते है


इस समय अमेरिका और चीन के संबंध बेहद ख़राब स्थिति में पहुँच गए है और ट्रम्प चीन को लेकर बेहद मुखर है कोरोना को लेकर चीन की वैश्विक आलोचना हो रही है और युद्द जैसे हालात  उत्पन्न कर साम्यवादी चीन स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने को कृत संकल्पित है। भारत से लगती सीमा पर तनाव के साथ कोरिया प्रायद्वीप की अशांति दुनिया के लिए परमाणु खतरे का कारण बन सकती है और इसे लेकर संयुक्तराष्ट्र समेत सभी देश बेहद संवेदनशील है। इस स्थिति का लाभ न केवल उत्तर कोरिया को मिल सकता है बल्कि चीन का प्रभाव मजबूत करने में मदद भी मिल सकती है।

उत्तर कोरिया के पश्चिम में पीला सागर है,पूर्वी चीन सागर दक्षिण में है और जापान सागर इसके पूर्व में हैउत्तर कोरिया के बहाने चीन की इन इलाकों पर नजर है और वह अपने कड़े प्रतिद्वंदी जापान को दबाएं रखने में इसका इस्तेमाल करने को दृढ संकल्पित नजर आता है। यह भी संभावना है कि आर्थिक स्थिति में बदतर हालात में पहुँच चूका उत्तर कोरिया युद्धोन्माद की कूटनीति से अपने ऊपर लगे वैश्विक प्रतिबंधों को हटाना चाहता हो। फ़िलहाल उसकी अर्थव्यवस्था चीन और रूस की सहायता से समुद्र में होने वाली तस्करी से चल रही है। ट्रम्प सनकी तानाशाह किम जोंग से कई बार मिले है और उन्हें शांति का पाठ भी पढ़ा दिया लेकिन प्रतिबंधों को भी बरकरार रखा है।


इस साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव होने वाले है और ट्रम्प उत्तर कोरिया को सबक सिखाने की हिमाकत कर सकते है।  उत्तर कोरिया में किम के स्वास्थ्य को लेकर रहस्य बरकरार है और उनका वंश सत्ता पर कब्जा जमाएं  रखने के लिए युद्द के विध्वंसक हथियार का इस्तेमाल कर सकता है जिससे उनके देश के लोगों की भावनात्मक संवेदनशीलता का फायदा मिल सके। वहीं चीन में शी जिनपिंग की स्थिति भी कमजोर होती दिख रही है। जाहिर है सत्ता पर अपना दावा मजबूत करने के लिए तीनों देशों के प्रमुख युद्द का सहारा ले सकते है और इसकी आशंका गहरा गई है।

 


गुरुवार, 25 जून 2020

सामरिक सहिष्णुता से साम्यवाद को परास्त करना संभव नहीं,samyvad

सुबह सवेरे

         सामरिक सहिष्णुता से साम्यवाद को परास्त करना संभव नहीं

                                                        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने                                                   

दलाई लामा को भारत के समर्थन के बाद 1959 से 1961 के बीच सीमा पर भारत और चीन की सेनाओं की झड़पें भी हुई,इसे लेकर माओ ने चीन कि सेना से साफ कर दिया था की,यह देखने में आ रहा है की चीनियों को पीछे हटने के लिए भारत दबाव बनाता है,अब ऐसा होगा तो पलटवार भी होगा।” इस चुनौती से बेखबर जहाँ भारतीय सरकार शांति और परस्पर सहयोग की बातों में मशगुल था वहीं  माओं ने अपने कमांडरों से मुखातिब होते हुए कहा,”ऐसा जरूरी नहीं की चीन और भारत के बीच हमेशा दुश्मनी बनी ही रहे,दोनो देश शांति के एक और लम्बे दौर का फ़ायदा उठा सकते है,लेकिन ऐसा करने के पहले चीन को अपनी ताकत का इस्तेमाल करके पहले भारत को कड़ा सैन्य सबक देना होगा जिससे उसे समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर किया जा सके।” अंततः 1962 के भारत चीन युद्द ने भारत की सामरिक कमजोरी को दुनिया के सामने सरेआम कर दिया और  हमेशा के लिए भारत पर निर्णायक बढ़त हासिल कर ली 



दरअसल भारत चीन सीमा पर गोलवन घाटी में भारत के 20 सैनिकों के हिंसक झड़प में मारे जाने के बाद चीन कि बातचीत की पेशकश उसकी पारम्परिक नीति का ही हिस्सा है जिसके अंतर्गत प्रतिद्वंदी पर सैन्य बढ़त हासिल करके मनौवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली जाये और इसके बाद अपने हितों के अनुसार संतुलन साधने के लिए मजबूर कर दिया जाये।

दूसरे विश्व युद्द के बाद बदलते राजनीतिक परिदृश्य में ब्रिटेन की दक्षिण एशिया से बिदाई के बाद चीन के माओ ने इस इलाके को अपनों गिरफ्त में लेने की साजिश को बेहद चुपके से अंजाम दिया और भारत को दोस्ती की भूल भुलैया में रख कर सबसे पहले 1949 में तिब्बत को अपना निशाना बनाया यह ठीक वैसा ही जैसे शी जिनपिंग ने भारत से मजबूत रिश्तों के बीच गोलवन घाटी समेत कई इलाकों में सड़क और अन्य निर्माण कर हिमालय में अपनी स्थिति मजबूत कर ली। चीन भारत की सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है,भारत के भू-राजनीतिक हितों के साथ उसका सीधा टकराव है और आर्थिक तौर पर वह भारत के लिए बड़ी चुनौती पेश करता रहा है। वास्‍तव में चीन भारत को संभावित खतरे के रूप मे देखता है और उसे हमेशा यह संदेह रहता है कि भारत विरोधी गुट में जा रहा है,इसीलिए वह भारत के प्रति आक्रामक नीति अपनाता है 


वर्तमान में चीन भारत,जापान,ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के बीच बढ़ती सामरिक साझेदारी से आशंकित है और इसे चीन के लिए वह बढ़ा खतरा समझता है। हिन्द महासागर में चीनी दादागिरी को नियंत्रित करने के लिए भारत के प्रयासों से चीन की चिंताएं बढ़ी हुई है और इसे आक्रामक स्तर पर किए जाने की जरूरत है। भारत –जापान और अमेरिका की के टोही विमानों और जहाजों का परिचालन करके चीन को दबाव में लाने कि रणनीति पर तुरंत काम करने कि जरूरत है। इस इलाके में समुद्री चुनौती चीन के लिए समस्या  को बढ़ा सकती है। कोरिया प्रायद्वीप में अमेरिका के लड़ाकू जहाज़ तैनात रहने से चीन उस क्षेत्र में अभी तक कुछ कर नहीं पाया है,हिन्द महासागर को भी उसी तर्ज पर चीन को जवाब देने के लिए तैयार करना होगा और इस सम्बन्ध में निर्णायक कदम भारत को ही उठाना होंगे।

चीनी की भारत विरोधी नीति का  यह आलम है की वीजा विवाद ,कश्मीर,पाक प्रायोजित आतंकवाद,सीमा विवाद और एनएसजी में भारत के प्रवेश पर रोड़े अटकने के बाद भी वह भारत का प्रमुख व्यापारिक साझेदार है और विवाद छोड़ो,व्यापार करो की तर्ज पर उसने भारत के बाजारों पर कब्ज़ा जमा लिया है। यहीं नहीं सुरक्षा के लिहाज से भी वह पाकिस्तान,श्रीलंका,बर्मा,नेपाल और मालद्वीप में मदद के जाल से भारत को घेर चूका है


इन सबके देखने में यह आया है कि भारत कि चीन को लेकर नीति बेहद तटस्थ रही है और यह चीन के लिए मुफ़ीद नजर आती है। मसलन वुहान लेब से निकले कोरोना को लेकर यूरोपीय देशों ने चीन कि आलोचना करने से गुरेज नहीं किया वहीं भारत ने इस मामलें में मौन साधे रखा जबकि भारत की मुखरता से चीन बेकफूट पर आ सकता था। ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद चीन और अमेरिका के बीच ट्रैड वार में भी भारत ने चीन से अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत करने पर जोर दिया,इसे विदेश नीति के तौर पर रणनीतिक चूक ही कहा जायेगा कि जब जब चीन पर वैश्विक दबाव के अवसर आये,भारत की ख़ामोशी और नीतियों से चीन को ही फायदा  मिला।

पिछले कुछ समय से चीन के विरोध को लेकर दुनिया भर में जो स्थिति बनी है उसका नेतृत्व करने का भारत ने कभी साहस नहीं दिखाया। चीन के भरोसेमंद साथी और भारत के पड़ोसी म्यांमार पर अमेरिकी असर बढ़ा है। सिंगापुर,फिलिपिन्स,इंडोनेशिया,थाईलैंड,ब्रुनेई,जापान,आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की अमेरिका से बढ़ती सैन्य निकटता से चीन दबाव महसूस करता है। भारत ने इन राष्ट्रों से रणनीतिक साझेदारी के साथ ही आर्थिक संबंधों को मजबूत करने पर प्राथमिकता से ध्यान देना चाहिए जिससे चीन को दबाव में लाने के साथ ही हमारी उस पर निर्भरता कम की जा सके। इस समय भारत आर्थिक हितों के लिए जापान एवं अन्‍य दक्षिण एशियाई रा‍ष्‍ट्रों की ओर देखे इससे चीन पर न केवल हमारी निर्भरता खत्म होगी बल्कि चीन से निपटने के लिए यह बेहतर जवाब भी हो सकता है।


पिछलें कुछ सालों में भारत कि सीमा में चीनी सैनिकों कि घुसपैठ बढ़ी है,यहाँ तक कि चीन ने भारत की अखंडता को चुनौती देते हुए और अपनी विस्तारवादी आकांक्षाओं को तेज करते हुए अरुणाचल प्रदेश के छह जगहों के नाम बदलकर वोग्यैनलिंग,मिला री,काईनदेन गाबरी,मेन क्यू का ,बूमो ला और नामका  पुबरी रखा है चीन कि इन हिमाकतों के बाद भी भारत ने वन चायना कि नीति को बदस्तूर स्वीकार किया। जबकि चीन पर दबाव बनाएं रखने के लिए ताईवान से राजनीतिक संबंध स्थापित करने कि घोषणा कि जा सकती थी, तिब्बत को लेकर भारत की नीति में परिवर्तन किया जा सकता था,लेकिन भारतीय नीति में ऐसी आक्रामकता का अभाव रहा। इस समय हांगकांग में लोकतांत्रिक आंदोलन को कुचला जा रहा है,अमेरिका,ब्रिटेन जैसे देश चीन का विरोध कर रहे है जबकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत से हांगकांग के लोगों के समर्थन में कोई बयान नहीं दिया गया।

गोलवन में चीन कि दादागिरी के बाद भारत को सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाकर चीन को घेरने का प्रयास करना था,जो भारत ने नहीं किया,जबकि सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्य अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस और रूस भारत के इस रुख पर उसे समर्थन दे सकते है तिब्बत को लेकर चीन बैकफुट पर रहता है और भारत ने तुरंत तिब्बत के स्वायत्ता आंदोलन को राजनीतिक समर्थन देने की घोषणा करना चाहिए चीन से लगती सीमा पर सैन्य जमावड़े पर भारत ने राजनयिक विरोध जताया होता तो हिंसक झड़प की संभावना नहीं बनती यहाँ तक की गोलवन घाटी में 20 सैनिकों के मारे जाने के बाद देश से चीनी राजदूत को निकलने का निर्णय बेहद आक्रामक और प्रभावी हो सकता था


जाहिर है चीन की आक्रामकता का सामना करते हुए उसके साथ बातचीत  की मेज पर बैठने से साम्यवादी ताकत मजबूत ही होती है भारत की नीतियों में चीन को लेकर कूटनीतिक स्तर पर आक्रामकता,सीमा पर सैन्य दबाव और अन्तर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन साधे जाने की आवश्यकता है। भारत को चीन को जवाब देने के लिए अलग ताइवानी वीजा और हांगकांग को भी राजनयिक मान्यता की पेशकश कर दुनिया के सामने इन मुद्दों को लाना चाहिए साथ ही तिब्बत पर तुरंत अपना रुख बदलते हुए अलग तिब्बत का समर्थन करना चाहिए। चीन से बातचीत की मेज पर जब तक उदार भारत होगा,समस्या बढ़ती जाएगी। साम्यवाद का सामना आक्रामकता से ही किया जा सकता है,भारत की कूटनीतिज्ञों को यह समझ कर नीतियों में अमल लाना होगा।

 


मंगलवार, 23 जून 2020

शिया-सुन्नी रक्तपात से घिरे इस्लामिक संगठन में कश्मीर की चिंता,islamik organisation and kashmir

नया इण्डिया      

 

     शिया-सुन्नी रक्तपात से घिरे इस्लामिक संगठन में कश्मीर की चिंता

                                                                              डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


मजहबी राजनय वैश्विक जगत में इस्लामिक देशों के संगठन ओ.आई.सी.की वह सच्चाई है जिसका मुख्य उद्देश्य धर्म की आड़ में अपने राजनयिक स्वार्थों की पूर्ति करना होता है। ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन की हालिया बैठक में भारत सरकार की उस नीति को गलत ठहराया है जिसके अंतर्गत पिछले साल धारा 370 को हटा दिया गया था ओआईसी के कॉन्टैक्ट ग्रुप के विदेश मंत्रियों की आपातकालीन बैठक में इसे संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव और अंतरराष्ट्रीय क़ानून जिसमें चौथा जिनेवा कंवेंशन भी शामिल है का उल्लंघन माना गया है



दरअसल युद्द कला में एक शब्द प्रचलित है काला प्रचार, जिसका उद्देश्य अफवाहों और गलत सूचनाओं से माहौल उत्पन्न किया जाता है। पाकिस्तान पिछले कई दशकों से कश्मीर को लेकर भारत के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रहा है और ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉपरेशन में उसने जम्मू कश्मीर के मुद्दे को उछालने के लिए 1994 में एक कॉन्टैक्ट ग्रुप बनाया था,उसमें पाकिस्तान के अलावा अज़रबैजान,नाइजर, सऊदी अरब और तुर्की शामिल है कथित मुस्लिम हितों की रक्षा के नाम पर स्थापित 57 देशों के इस समूह में पाकिस्तान इस्लामिक मंच का उपयोग भारत विरोध के लिए अक्सर करता रहा है। ओआईसी ने जम्मू-कश्मीर पर अपने पुरानी स्थिति और प्रस्तावना को लेकर प्रतिबद्धता ज़ाहिर की है और कश्मीरी अवाम के आत्मनिर्णय के अधिकार की क़ानूनी लड़ाई के समर्थन का फिर से दोहराया है



इसके पहले साल 2017 में भी ओ.आई.सी.ने संयुक्तराष्ट्र में कश्मीर में भारत द्वारा लोगों पर जुल्म करने का आरोप लगाया था। यह भी बेहद दिलचस्प है कि कश्मीर में रहने वाले मुसलमानों को मौलिक अधिकार,अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता और विकास की सारी सुविधाएँ दी गई है,यह ठीक वैसा है ही जैसा भारत के अन्य नागरिकों को प्राप्त है। इसके बाद भी ओ.आई.सी.का भारत पर कश्मीर में मुस्लिमों के मानव अधिकारों के उल्लंघन का आरोप बेबुनियाद और नासमझी है। जाहिर है यह सारी कवायद पाकिस्तान के दुष्प्रचार से सामने आई है।

इन सबके बीच यह जानना बेहद जरूरी है कि इस्लामिक संगठन की स्थापना का उद्देश्य क्या था और हकीकत में यह कहां खड़ा है।1969 में मोरक्को की राजधानी राबत से इस्लामिक कांफ्रेंस आर्गेनाइजेशन जी शुरुआत हुई1972 में इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी ने चार्टर के जरिए बाकायदा अपने उद्देश्य बताते हुए साफ किया था की सदस्य देशों के मध्य आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इस्लामी एकजुटता को प्रोत्साहन दिया जाएगा और किसी भी रूप में विद्यमान उपनिवेशवाद की समाप्ति तथा जातीय अलगाव और भेदभाव की समाप्ति के लिये प्रयास किये जायेगेइसके साथ ही यह संकल्प भी किया गया की विश्व के सभी मुसलमानों की गरिमा, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अधिकारों की रक्षा करने के लिये,उनके संघर्षों को मजबूती प्रदान करने के निरंतर प्रयास किये जाएंगे ओआईसी के सभी सदस्य देशों और अन्य देशों के मध्य सहयोग और तालमेल को प्रोत्साहित करने के लिये एक उपयुक्त वातावरण तैयार करना इस संगठन की प्राथमिकताओं में घोषित किया गया है

लेकिन देखने में यह आया है की इस्लामिक देशों के समूह ओआईसी का इस्तेमाल इसके सदस्य देश अपनी बेहतरी के लिए और अपने हितों के अनुसार करते है,जिसका मतलब इस्लामिक दुनिया की बेहतरी से कतई नहीं है। ओआईसी पर सुन्नी कट्टरपंथी ताकतें बुरी तरह हावी है और यह संगठन सऊदी अरब की अगुवाई और प्रभाव में काम करता है। ऐसे में शिया बहुल मुस्लिम देश इस संगठन को संदेह की दृष्टि से देखते है और ईरान आगे बढ़कर अपना विरोध कई मोर्चो पर दर्ज कराता रहा है।


पाकिस्तान के पड़ोसी मुल्क चीन के शिन्चियांग प्रान्त में तकरीबन 1 करोड़ उईगर मुसलमान रहते है,जिन पर रोजे रखने,महिलाओं के बुर्खा पहनने,खुले में नमाज पढ़ने की इजाजत नहीं है। यहाँ तक की उन्हें रोज मेंटल डिटेक्टर से चेक किया जाता है और अब तो मुस्लिम बाहुल्य वाले इस प्रान्त को वहां बसने वाले मुस्लिम बाशिंदों के लिए  खुली जेल  तक कहा जाने लगा है। मुसलमानों के लिए अमानवीयता की हदें  पार करने वाले चीन पर अभी तक इस्लामिक देशों की संस्था ओ.आई.सी.खामोश है।

वहीं इस्लामिक दुनिया पर पाकिस्तान जैसे देशों की चाटुकारिता और चापलूसी इस कदर हावी है की अपने आर्थिक और सामरिक हित बनाये रखने की जुगत में धार्मिक हितों को दरकिनार कर दिया जाता है। चीन और भारत के बीच सीमा पर तनाव है और ऐसा लगता है कि इस्लाम विरोधी साम्यवादी चीन की शह पर पाकिस्तान ने जानबूझकर ऐसा प्रस्ताव पास किया है जिससे ताजा हालात में भारत पर दबाव बढ़ाया जा सके।


कश्मीर पर प्रस्ताव पेश करने वाले कांटेक्ट ग्रुप के तीन महत्वपूर्ण सदस्यों पाकिस्तान,सउदी अरब और तुर्की के बारे में जानना भी जरूरी हैपिछले साल संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की जेनेवा में हुई बैठक में पाकिस्तान में अल्पसंख्यक अहमदिया मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान की हुकूमत पर अत्याचार का आरोप लगाया और न्याय की गुहार लगाई थी पाकिस्तान में इस समुदाय की आबादी करीब 50 लाख है और वे मतदान के अधिकार से वंचित है

आर्थिक जरूरतें बढ़ने और तेल का घाटा दूर करने के लिए सऊदी अरब ने  सीरिया और इराक को तबाह करने के लिए आईएसआईएस का दांव खेला था,जिससे  इन दोनों देशों का तेल भंडार नष्ट हो जाएं और तेल की दुनिया का सरताज सऊदी अरब हो जाएं। इराक और सीरिया में आतंकी संगठन द्वारा तेल के कुंओं में आग लगाकर उन्हें नष्ट करने की सच्चाई यहीं है। इस प्रकार ओआईसी के कथित आका सऊदी अरब अपने आर्थिक हितों के संवर्धन के लिए मजबूत इस्लामिक देशों को नेस्तनाबूद कर देने तक आमादा हो जाते है। तुर्की मध्य पूर्व में रहने वाले कुर्द मुसलमानों पर रोज हमलें करता है और इन कुर्द मुस्लिमों की सुरक्षा रूस की सेना कर रही है,जबकि रूस को इस्लाम के दुश्मन के तौर पर प्रचारित किया जाता रहा है


इस्लामिक दुनिया की यह कड़वी हकीकत है की वे आपसी विवादों और स्वार्थों के लिए किसी हद तक जा सकते है,जिसमें धर्म को भी दरकिनार कर दिया जाता है। अपने स्वार्थों के कारण ही इराक और सीरिया जैसे मुस्लिम देश तबाह हो चुके है और गृह युद्ध की आग में बुरी तरह झुलस रहे है। पिछलें कई दशकों से मध्य पूर्व में हजारों मुसलमानों के कत्लेआम और शरण की गुहार में मरते लोगों के लिए न तो पाकिस्तान के दरवाजें खुले और न ही इस्लाम के सबसे बड़े पैरोकार सऊदी अरब केइनसे बेहतर जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपियन राष्ट्र रहे जिन्होंने मानवीयता के नाम पर मुस्लिमों को प्रवेश दिया

जाहिर है कश्मीर पर ओ.आई.सी. के प्रस्तावों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इन प्रस्तावों को लाने वाले इस्लामिक देशों में रहने वाले मुसलमानों से बेहतर भारतीय मुसलमान और कश्मीरी है जो समान संवैधानिक अधिकारों के साथ धर्मनिरपेक्ष भारत में खुशहाल रह रहे है

 


रविवार, 21 जून 2020

असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां, rashtrvad aur vaishvik chunoutiyna

प्रजातंत्र                         

                 असंतुलित राष्ट्रवाद की वैश्विक चुनौतियां

                                                   डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


शक्ति,शस्त्र और युद्द की संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति को हिटलर और मुसोलिनी के पराभव के साथ दफनाने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को संयुक्तराष्ट्र ने मजबूती दी और पश्चिमी देश इस मान्यता पर निरंतर आगे बढ़ते रहे,जिसके अनुसार किसी भी समस्या के समाधान के रास्ते लोकतंत्र से खुलते है द्वितीय विश्व युद्द के बाद लोकतंत्र को विश्व शांति का पर्याय मान लिया गया और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को विकसित और मजबूत करने के औजार के रूप में इसका उपयोग होने लगा बीसवी सदी के आधे सफर से शुरू हुआ लोकतंत्र का आधुनिक सफर इक्कीसवी सदी के 20 साल पूरा करने की ओर है,लेकिन इसकी चुनौतियां नई आशंकाओं के साथ विश्व शांति के समक्ष खड़ी है


राष्ट्रवाद के उदय को इतिहास की एक निर्णायक घटना माना जाता है और इसके विकास और पोषण में उदारवाद और प्रजातंत्र की प्रमुख भूमिका रही.लेकिन आधुनिक राजनीतिक तंत्र ने लोकतांत्रिक सत्ता पर बने रहने के लिए जिस प्रकार राष्ट्रवाद का उपयोग किया है इससे लोकतंत्र की उपयोगिता पर ही गहरे सवाल उठ खड़े हुए है दरअसल 15 वी सदी में इटली में जन्में मैकियावली का राजदर्शन कूटनीति की धूर्तता को नैतिकता से जोड़कर आम जनमानस की अस्मिता को राजहित में दांव पर लगाने को प्रोत्साहित करता रहा। लेकिन 5 सौ साल बाद लोकतंत्र  को भी राज सत्ता की तरह संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति की तरह ढालने का प्रयास होगा,यह कल्पना शायद ही किसी ने कभी की होमैकियावली ने सत्ता को यथार्थवाद की छाया में रोपित करते हुए कहा था कि, “मनुष्य,शस्त्र,धन एवं रोटी युद्द की शक्ति है,परन्तु इन चारों में प्रथम दो अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि मनुष्य एवं शस्त्र,धन एवं रोटी प्राप्त कर सकते है,परन्तु रोटी तथा धन,मनुष्य एवं शस्त्र प्राप्त नहीं कर सकते” इस विचारधारा में शक्ति,शस्त्र और युद्द को मानव स्वभाव की विशेषताएं मानता है


वहीं लोकतंत्र को सामाजिक न्याय,आज़ादी,विकास और समानता के शासन तंत्र का आदर्श रूप माना जाता है जिसमें सत्ता से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समभाव रखकर नागरिकों के सर्वांगीण विकास में अपना सकारात्मक योगदान दे लोकतंत्र में शक्ति और युद्द को शांति के लिए खतरनाक माना गया इसीलिए संयुक्तराष्ट्र और पश्चिमी देशों ने लोकतांत्रिक पद्धति से चलने वाले देशों को समर्थन देकर इसमें विश्व शांति की संभावनाओं को मजबूत किया

लोकतंत्र उच्च प्रतिमानों  के साथ मानव सभ्यता के विकास को सुनिश्चित करता हुआ प्रतीत हुआ लेकिन समय के साथ लोकतंत्र पर भी संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति में परिवर्तित होने की आशंकाएं बलवती होने लगी कई देशों के शिखर राजनीतिक दलों और उनके नेताओं ने राष्ट्रवाद को हथियार की तरह उपयोग करके लोकतांत्रिक सत्ताओं पर जिस प्रकार कब्जा किया है उससे अंतर्राष्ट्रीय शांति के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है



नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. ओली की राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण रही है नेपाल में राजतंत्र की समाप्ति के बाद देश में राजनीतिक परिवर्तन हुए और बदले संविधान के साथ अंततः सत्ता उनके हाथ लगीभारत नेपाल में लोकतंत्र स्थापित हो इसका समर्थक रहा और नेपाल में राजतंत्र की समाप्ति का उसने स्वागत ही कियाओली के राजनीतिक जीवन और उनके विचारों  के लिए उनकी नीतियों को ओलीटिक्स कहा जाता है जिसके अनुसार इसमें राजनैतिक दृढता  और  राष्ट्रीय प्रतिज्ञा का भाव हैनेपाल से भारत के ऐतिहासिक सम्बन्धों के साथ यह हकीकत है कि वहां के सामान्य जनमानस में भारत के बड़े होने और स्वयं के छोटे होने का भाव रहा है जो समय समय पर कडुवाहट के रूप में सामने आता हैयह भावना वहां पर राजतंत्र के दौर से ही देखी गई है

गोरखा राज्य के रुप में 1742 में पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल राज्य की नींव रखते हुए,अपने राज्यनीति के निर्धारण में स्पष्ट किया था कि “हमारा देश एक कन्द की तरह है, जो कि दो चट्टानों के बीच उगा है,चीन साम्राज्य के साथ हमें दोस्ताना सम्बन्ध अवश्य रखना चाहिए और दक्षिण के शासक,जो कि बहुत चालाक है,उनके साथ भी अच्छे सम्बन्ध बनाए रखना होगा,भारत और चीन दोनों पड़ोसियों में से भारत ज्यादा खतरें का स्त्रोत है, इसलिए दक्षिण के पड़ोसी से हमें हमेशा सतर्क रहना होगा लगभग ढाई शताब्दी के बाद जब नेपाल में राजवंश का अंत हुआ और सत्ता पर माओवादी पुष्प कुमार दहल आसीन हुए तो उन्होंने कहा कि उनका देश भारत से असल दोस्ती चाहता है,लेकिन कोई नेपाल को यस मैन के रुप में देखे यह मुमकिन नहीं है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत और नेपाल के अत्यन्त मधुर संबंधों के बीच एक गहरी खाई रही है,जिसे ऐतिहासिक,सांस्कृतिक,सामाजिक,आर्थिक और सामरिक सम्बन्धों के बाद भी पाटा नहीं जा सका हैहालांकि भारत ने संयम का परिचय देकर नेपाल और भारत के बीच अद्भुत समन्वय को बनाए रखा। इस समय नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार भारत है,दोनों देशों के नागरिक एक दूसरे के देशों में  बिना वीजा के आ जा सकते है, यहीं नहीं भारत की सेना में बाकायदा एक गोरखा रेजिमेंट भी है जिसमें नेपाली नागरिक ही है।


भारत नेपाल संबंधों की इन विशेषताओं को जानते हुए भी के.पी.ओली ने सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने के लिए राष्ट्रवाद का दांव खेला। नेपालियों की युवा पीढ़ी की उच्च आकांक्षाओं को जगाने और सामने लाने के लिए ओली ने राष्ट्रवाद का सहारा लेकर भारत से सीमा विवाद को बढ़ाया और इसे राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़ दिया।  नेपाली के प्रधानमंत्री का यह कदम बेहद अप्रत्याशित रहा और उन्होंने ऐसा करके उन्होंने नेपाल के भविष्य को दांव पर लगा दिया बल्कि भारत से लगती हुई लगभग 18 सौ किलोमीटर की सीमा की शांति को भंग कर विश्व शांति के लिए नई चुनौती पेश कर दी।

ब्रिटेन से 1997 में चीन को हस्तांतरित हांगकांग में अशांति का कारण चीन के प्रधानमंत्री शी जिनपिंग का वह राष्ट्रवादी दांव है जिसके बूते वे चीन की सत्ता पर लंबे समय तक बने रहना चाहते है। भारतीय सीमा पर चीनी सेना का हिंसक संघर्ष अप्रत्याशित रूप से जिनपिंग की स्थिति को देश और उनकी पार्टी में मजबूत कर सकता है। यहां तक की मौलिक अधिकारों और लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार अमेरिका भी इससे अछूता नहीं है।  अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मैक्सिकों से लेकर यूरोपीय यूनियन से संबंध और हाल का वह घटनाक्रम जिसमें नस्लवाद के नाम पर हत्या के बाद आंतरिक सुरक्षा के लिए देश में पहली बार सेना की तैनाती की बात कही गई,सत्ता पर वापसी के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रदर्शन नजर आता है। श्रीलंका के महेंदा राजपक्षे ने अपने देश में हुए आतंकी हमलों को सत्ता पर स्थिति मजबूत करने के अवसर की तरह देखा और सिंहली राष्ट्रवाद के नाम पर जातीय और साम्प्रदायिक तनाव बढ़ाने से भी परहेज नहीं किया।


जाहिर है लोकतंत्र की शांति की मूल मान्यता पर प्रहार के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद को औजार की तरह प्रयोग किया जाने लगा है और इससे न केवल जनता की भावनाओं को उभार मिल रहा है बल्कि विपक्षी दलों को भी नतमस्तक होना पड़ रहा है। विपक्षी दलों  द्वारा विरोध न करने के पीछे यह डर भी होता है की उन्हें सत्ता के द्वारा राष्ट्र के विरोधी के तौर पर न प्रचारित कर दिया जाए।

इस समय समूची दुनिया में लोकतंत्र से अभिव्यक्ति और विरोध को खत्म करने तथा सत्ता पर एकाधिकार करने की प्रवृत्ति खतरनाक रूप से बढ़ी है भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में पिछले कुछ समय से यह चिंतन मनन का प्रमुख विषय रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने इस साल एक कार्यक्रम में विचारों के लोकतंत्र को मानव समाज के लिए संजीवनी बताते हुए कहा था कि असहमति का संरक्षण करना यह याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक रूप से एक निर्वाचित सरकार हमें विकास एवं सामाजिक समन्वय के लिए एक न्यायोचित औज़ार प्रदान करती है,वे उन मूल्यों एवं पहचानों पर कभी एकाधिकार का दावा नहीं कर सकती जो हमारी बहुलवादी समाज को परिभाषित करती हैं


केपी ओली,ट्रम्प,शी जिनपिंग से लेकर श्रीलंका के महेन्दा राजपक्षे की आंतरिक और वैदेशिक नीतियों में यह प्रतिबिम्बत होता है कि लोकतंत्र को औजार की तरह उपयोग करके सत्ता पर बना रहा जा सकता है और इसके लिए कोई भी कीमत अदा की जा सकती है। द्वितीय विश्व युद्द के बाद यह विश्वास बलवती हुआ था कि सभी तरह के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों का एक ही समाधान है और उसका नाम लोकतंत्र है लेकिन लोकतांत्रिक सत्ताओं ने बेहद चतुराई से इस मान्यता पर प्रहार करते हुए लोकतंत्र के प्रतिमानों को ही बदल दिया

इस प्रकार की राजनीति से लोकतांत्रिक देशों की मूल समस्यायें बढ़ गई है जिनका सरोकार आम जनता की रोटी कपड़ा,मकान और शांति से है। अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में चुनाव के समय लोककल्याणकारी उपलब्धियों या शिक्षा और स्वास्थ्य से ज्यादा सीमा,सुरक्षा और वैदेशिक राष्ट्रों से आक्रामक संबंधों को उभारा जाता है। मतदाता इसे पसंद करते है और इस प्रकार लोकतांत्रिक सत्ता को प्राप्त करने के लिए शक्ति,शस्त्र और युद्द को लोकप्रिय बना दिया गया है इस माहौल में संपूर्ण सत्तावादी शासन पद्धति को प्रश्रय देने वाले राजनीतिक दल की नीतियों का विरोध करना राष्ट्रद्रोह से जोड़ दिए जाने की राजनीतिक प्रवृत्ति भी बढ़ी है यह भी बेहद दिलचस्प है कि भारत की न्याय व्यवस्था ने भी इस पर ध्यान दिया है  असहमति को लोकतंत्र का सुरक्षा कवच बताते हुए जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा था कि असहमति पर लेबल लगाकर उन्हें राष्ट्र-विरोधी या लोकतंत्र विरोधी बताना जानबूझकर लोकतंत्र की मूल भावना पर हमला है। बहरहाल लोकतांत्रिक देशों में सत्ता के लिए आक्रामक राष्ट्रवाद का प्रयोग संतुलित राष्ट्रवाद की उस भावना को झुठला रहा है जो राष्ट्र की प्रगति में सहायक होता है। अब लोकतंत्र की वह असंतुलित अवधारणा लोकप्रिय हो रही है जो विषम परिस्थितियां उत्पन्न कर युद्द को जन्म देती है,यह अंतर्राष्ट्रीय शांति के लिए बड़ी चुनौती है

 

 


brahmadeep alune

संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति, nepal vampanth

जनसत्ता                                                     https://epaper.jansatta.com/c/55101595 संकट में नेपाल की वामपंथ राजनीति.......