सोमवार, 25 मई 2020

कसौटी पर है संघवाद, kasouty par hai sanghvad

      सुबह सवेरे                             

                              कसौटी पर है संघवाद

                                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                   राजनीतिक विश्लेषक


चेन्नई में मजदूरी करने वाला हरिया अपनी विकलांग पत्नी को एक लकड़ीनुमा हाथ से खींचने वाली गाड़ी में बिठाता है और भूखा प्यासा बदहवास सा उस गाड़ी को खींचता पैदल चलता जाता है। तमाम परेशानियों से जूझते हुए भी उसकी आँखों में मंजिल पर पहुँचने की ललक है। उसकी मंजिल बहुत दूर है और उसे करीब एक हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करने के बाद मध्यप्रदेश के बालाघाट  पहुँचना होगा। हरिया उस तमिलनाडू को पार करता है जिसे सामाजिक न्याय का बड़ा मॉडल माना जाता है। इसके बाद वह कर्नाटक से गुजरता है जिसका  बैंगलौर दुनिया की आईटी कंपनी का हब है और भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी का यह प्रतीक माना जाता है। उसे तेलंगाना से भी गुजरना है जो पिछड़े से अगड़े बनने का ख्वाब लिए अलग प्रदेश बना है।  इसके बाद हरिया आंध्रप्रदेश से गुजरता है जो दक्षिण की फिल्मों और क्षेत्रीय विकास का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बाद वह मायानगरी के राज्य से गुजरता है जिसे राष्ट्र में महाराष्ट्र होने का बाद गुमान है और अंतत: वह कई दिनों के सफर के बाद बालाघाट की सीमा पर पहुँच जाता है। यहाँ पर तैनात एक पुलिस अधिकारी उस मजदूर को बालाघाट के एक छोटे से गाँव तक एक वाहन से पहुंचाते है। यही कहानी रामू की भी है जो हैदराबाद से अपनी बेटी को एक ऐसी ही हाथगाड़ी में खींचते हुए बालाघाट पहुंचता है।


दरअसल हरिया और रामू का संघर्ष देश के उस संघीय ढांचे को चुनौती दे रहा है जो एक राष्ट्र एक नागरिकता और सांस्कृतिक एकता के दावे के साथ स्वयं को स्थापित किए हुए है। हरिया और रामू व्यवस्था की खामियों के साथ उस क्षेत्रवाद का भी शिकार हो गए जिसमें सरकारों की संवेदनाएं कथित अपने क्षेत्र विशेष के नागरिकों के लिए होती है और यदि वह उनका वोट बैंक मजबूत करने वाला हो तो सुविधाएं भी जुट जाती है और सहूलियत भी मिल जाती है।  महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मध्य प्रदेश के बालाघाट और शहडोल के बाशिंदों की रेल पटरियों पर चिथड़े चिथड़े हुई लाशें असमानता के साथ क्षेत्रीय सरकारों की दूसरे राज्यों के नागरिकों के प्रति असंवेदना का बदतरीन उदाहरण है। हजारों मजदूर जिन भी राज्यों और उनके इलाकों से गुजरें वहां की सरकार,प्रशासन,सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं तब तक खामोशी से इसे देखती रही जब तक यह मीडिया में इसे प्रमुखता से उभारा नहीं गया लेकिन तमाम मानवीय पक्षों को दरकिनार करने से किसी ने भी गुरेज नहीं किया। रास्तों से गुजरने वाले मजदूर किसी अन्य प्रदेश के निवासी से थे,अत: किसी की भी ज़िम्मेदारी तय नहीं हो सकी।  

नेशन ऑफ द मेकिंग या भारत को बनता हुआ राष्ट्र बताते हुए डॉ.अंबेडकर ने नागरिकों और राजनेताओं को भारत को एक राष्ट्र बनाने  की जो चुनौती दी थी और वह आज़ादी के सात दशक बीता देने के बाद भी जस की तस कायम है।  संविधान कि अंतिम बैठक चल रही थी तथा इसका अंतिम और निर्णायक भाषण देते हुए डॉ.अंबेडकर ने कहा था कि हम सबसे अच्छा संविधान लिख सकते हैं, लेकिन उसकी कामयाबी आख़िरकार उन लोगों पर निर्भर करेगी,जो देश को चलाएंगे।


संविधान निर्माताओं के लिए विविधताओं मे बंटे भारत के नागरिकों को एक संवैधानिक प्रतिबद्धताओं का बांटना बेहद कठिन था,तमाम आशंकाओं और कुशंकाओं के बाद भारत एक ऐसे संघीय देश के तौर पर विकसित करने वाला संविधान बनाया गया जो समूचे भारत के नागरिकों की इच्छाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके भावी सपनों के पूरा करने की आशाएँ भी जगाता हो।  लेकिन अब जो तस्वीर सामने आई है वह संघवाद और उसकी भावना को चुनौती दे रही है। ऐसा प्रतीत हुआ है कि यह क्षेत्रवाद की संकल्पना पर आधारित राजनीतिक दलों के प्रभुत्व के रूप में उभरता नया भारत है जहां वोट के आधार पर सामाजिक सरोकार तय किए जाते है और मजदूरों की समस्या इसी बदनीयती का परिणाम है। इस समय मजदूरों की जो स्थिति सामने आ रही है वह क्षेत्रवाद से आगे निकलकर पृथकतावाद को बढ़ावा देने वाली है। दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूरों के हितों के प्रति राज्य सरकारों ने जो लापरवाही दिखाई है और उसकी अव्यवस्था से उपजा मानवीय संकट जिस प्रकार मजदूरों के लिए जानलेवा साबित हुआ है। इस दर्द को भोग कर ज़िंदा बचे लोग अपने घर लौटकर देश के संघीय ढांचे का कैसा सम्मान करेंगे,यह बड़ा प्रश्न सामने खड़ा है। 

इससे जो सबसे बड़ी चुनौती सामने आ सकती है वह भूमिपुत्र की भावना है जिसके अनुसार किसी भूभाग पर पैदा होने वाले व्यक्तियों का उस भूभाग और उसके संसाधनों पर पहला अधिकार है। महाराष्ट्र में शिवसेना ने जो नारा दिया था की महाराष्ट्र,मराठियों के लिए है,आने वाले समय में अन्य प्रदेश के राजनीतिक दलों को यह नारा देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और वे आसानी से इसे अपना भी लेंगे। अभी भारत के स्थानीय या क्षेत्रीय आंदोलनों को राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और इसका प्रमुख आधार भाषा रही है लेकिन आने वाले समय में संसाधनों को लेकर राजनीति होगी और इसमें प्रमुख भागीदारी मजदूरों की होगी। संकट यह भी है कि मजदूरों के रोजगार और संसाधनों के नाम पर खड़े होने वाले क्षेत्रीय आंदोलन आश्चर्य नहीं पृथकतावादी आंदोलनों में परिवर्तित हो जाएँ। उत्तर पूर्व के राज्यों में यह समस्या गहरी चिंता का कारण रही है। असम में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन का गठन बंगलादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए हुआ था लेकिन यह सांप्रदायिक होकर एक पृथकतावादी आंदोलन बन गया। हिन्दी विरोध के बूते दक्षिण भारत में डीएमके खड़ी हुई और सत्ता तक पहुँच गई। पंजाबी सूबा आंदोलन भी कुछ ऐसा ही था और इसे मजबूत करने वाले अकाली दल की पृथकतावादी सोच हम सब जानते है। बिहार का झारखंड आंदोलन बाहरी लोगों के विरुद्द था। जम्मू कश्मीर का क्षेत्रवादी आंदोलन भी ऐसे ही पृथकतावाद में परिवर्तित हो गया।

नक्सलवादी विचारधारा गैर बराबरी और सामंती दबदबे के कारण पुख्ता हुई और हिंसक होकर इस देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।  यहाँ पर यह भी बेहद महत्वपूर्ण है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन 1960 के दशक में ही समाप्त हो गया होता लेकिन वह राजनीतिक उदासीनता के साथ बाद में राजनीतिक जरूरत बन गया। जाहिर है हिंसक विचारधारा को भी राजनीतिक कारणों से स्थानीय समर्थन मिलने से यह समस्या बढ़ती गई

स्वतंत्र भारत का भावी भविष्य तय करते हुए बाबा आम्बेडकर को सामाजिक न्याय की बड़ी चिंता थीवे संविधान सभा को चेतावनी देते हैं कि अगर हमने इस ग़ैरबराबरी को ख़त्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे,जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया हैसंविधान सभा के आख़िरी भाषण में बाबा साहब आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के ख़ात्मे को राष्ट्रीय एजेंडे के रूप में सामने लाते हैं

इस समय करोड़ों मजदूर शहरों से कड़वी यादें लेकर गाँव में पहुंचे है। उनकी गरीबी उन्हें आराम से बैठने कि इजाजत नहीं दे सकती लेकिन राज्य भी अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते। तेलंगाना का क्षेत्र आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में पिछड़ा था इसलिए उसे अलग  प्रदेश बना दिया गया। असमान आर्थिक विकास और सांस्कृतिक पहचान खोने का भय क्षेत्रवाद उत्पन्न होने का प्रमुख कारण है। पूर्वी उत्तरप्रदेश  गरीब और पिछड़ा है,पश्चिमी उत्तर प्रदेश संपन्न है जबकि बुंदेलखंड पिछड़ा है। मध्यप्रदेश में बघेलखंड पिछड़ा है।  महाराष्ट्र में विदर्भ के हालात बहुत खराब है।  रोजगार की समस्या को देखते हुए देश में पिछड़े इलाकों को प्रदेश के रूप में मान्यता देने की जरूरत है। पिछड़ेपन का अभिशाप भोगने वाला छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद एक बेहतर प्रदेश के रूप में विकसित होने में सफल रहा है। 

आने वाले समय में रोजगार को लेकर जो चुनौतियाँ सामने आने वाली है उसे देखते हुए पिछड़े इलाकों को राज्यों के रूप में गठित करने के दूरगामी और सकारात्मक परिणाम हो सकते है। अंतत: एक संघीय राष्ट्र के तौर पर भारत का भविष्य है और यह रास्ता तय करने के लिए असमान विकास, पिछड़ापन और असमानता को खत्म करना ही होगा। बहरहाल भारत संघीय लोकतन्त्र के कई बदलावों से गुजरते हुए एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है,इसके आगे का सफर देश की दशा और दिशा बदलने वाला हो सकता है।

 


इसीलिए हिंदुस्तानी मुसलमान है सबसे अलहदा ,isliye hindustani muslman hai sbase alhada



दबंग दुनिया

                इसीलिए हिंदुस्तानी मुसलमान है सबसे अलहदा                                                

                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                              शिक्षाविद  




http://epaper.dabangdunia.co/NewsDetail.aspx?storyid=DEL-08-69462450&date=2020-05-25&pageid=1


यह मुहब्बत और इबादत की ईद है लेकिन इस त्योहार तक पहुँचते हुए जो सफर तय हुआ है वह हिंदुस्तान की तारीख में हमेशा याद किया जाएगा। कई धर्मों और संस्कृतियों से भरा हमारा महान लोकतंत्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवधारणाओं की गारंटी देता है। हिंदुस्तान की तारीख में शाही इमाम की रमज़ान की नमाज के दौरान कभी आंखे नम नहीं हुई,लेकिन इस बार ऐसा ही हुआ,हालांकि इसका कारण महामारी का प्रकोप था। रमज़ान के महीने की शामें बड़ी रंगीन और खुशबूदार होती है। इस बार फिजाँ में कोई रंगीनियां नहीं थी। हैदराबाद की होटलों में सैंकड़ों तरह की बिरयानी सजी नहीं थी,बघारे बैंगन और अंचारी सब्जी भी न नसीब हुई।  दक्कन का यह नवाबी इलाकें में सादी दाल और रोटी से ही लेकिन खामोशी से इफ्तार करके पूरा महीना बीता दिया। रोजे की कठिन चुनौती को मुस्कुराकर अपनाते नौनिहालों में शायद ही किसी ने महीने भर में मिठाई का जायका लिया हो लेकिन मिठाई की ज़िद में रोने की कहीं आवाज सुनाई नहीं दी।

तटीय कर्नाटक के लोग खाने के बड़े शौकीन होते है। यहाँ भोजन में समुद्री भोजन, नारियल और नारियल तेल का व्यापक उपयोग  के साथ शोरबे को चावल के साथ परोसा जाता है। दालों और सब्जियों को नारियल,मसालों के साथ पकाया जाता है और सरसों,करी पत्ता,हींग से छौंक लगाई जाती है जिसे हूली कहते हैं इसे भी चावल के साथ ही परोसा जाता है। मैसूर के आस पास के लोग मैसूर पाक,धारवाड़ पेड़ा,फेनी,चिरोती को पसंद करते है,इसके बिना तो इफ्तार होता ही नहीं,लेकिन इस बार इफ्तार ऐसे ही हुआ। केरल में न तो मीन तोरण या मालाबार बिरियानी मिली,न ही उत्तर भारत में आगरा की मिठाइयाँ। तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक रमज़ान का महीना बेहद खामोशी से बीता,बांग्ला मुसलमान आम बंगाली की तरह हिल्सा मछली का बेहद शौक़ीन होता है,लेकिन उसने इस मछ्ली के बिना ही रोजे छोड़े।




दरअसल यहीं तो हिंदुस्तानी तहज़ीब है जो अपनी आस्था में डूब जाने को पसंद करती है लेकिन उसकी प्रतिबद्धताओं में मुल्क और समाज के सभी तबकों की बेहतरी होती है। रहमत,बरकत और मगफिरत या मोक्ष के महीने भर के रमज़ान का यह सफर कड़ी तपस्या का होता है लेकिन इस बार यह चुनौतीपूर्ण भी रहा।

कोरोना की दहशत अभिशाप की तरह मानव जाति को निगलने को आमादा है और इससे बचाव का तरीका अपने को घर में कैद कर लेना बताया गया। रमज़ान की इबादत के साथ भारतीय मुसलमानों के लिए सरकार ने कुछ गाइडलाइंस जारी की, जिनमें यह हिदायत दी गई कि मस्जिदों के बजाय मुसलमान अपने घरों में नमाज़ पढ़ें और लॉकडाउन में मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अज़ान भी बंद कर दे। रोज़ा खोलने के बाद रात में पढ़ी जाने वाली नमाज़ भी घरों में पढ़े। मस्जिदों में इफ़्तार पार्टी का आयोजन न करे। रमज़ान की ख़रीदारी के लिए घरों से बाहर न निकले।  कश्मीर से कन्याकुमारी तक बसने वाले करोड़ों मुसलमानों ने सरकार कि गाइड लाइन का पालन करते हुए अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं का पूरा पालन किया और कानून व्यवस्था कि स्थिति बिल्कुल प्रभावित न हुई। हजारों वर्षों के इस्लामिक इतिहास में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि रमज़ान के महीने में नमाज मस्जिद में जाकर सामूहिक रूप से न पढ़ी जायें लेकिन इस बार ऐसा हुआ और इसका पालन भी किया गया।

इस्लामिक संस्कृति को अलग बताकर हिंदुस्तान से अलग हुए जिन्ना के पाकिस्तान का माहौल इस सबसे जुदा था। कोरोना के कहर से बचने कि सरकार कि हिदायत से इतर इस्लामाबाद की मशहूर लाल मस्जिद में जुमे की नमाज़ पढ़ी गई जिसमें भारी संख्या में लोग जमा हुए और कोरोना से जुड़े तमाम एडवाइज़री और सरकारी आदेशों का जमकर उल्लंघन हुआ।

कराची में हुई एक प्रेस वार्ता में दो नामी धर्म गुरुओं मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान और मुफ़्ती तकी उस्मानी ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि मस्जिदें और मदरसे अनिश्चित काल के लिए बंद नहीं रह सकते,इसलिए रमज़ान के महीने में इन्हें खोला जाएगा और सामान्य दिनों की तरह मस्जिदों में नमाज़ पढ़ी जाएगी। लॉकडाउन के दौरान पाकिस्तान में स्थानीय प्रशासन को मस्जिदों पर प्रतिबंध लगाने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। कोरोना के डर से बेखौफ मस्जिदों में भारी भीड़ जमा  हुई और पुलिस ने ऐसी मस्जिदों को बंद कराने की कोशिश की तो रूढ़िवादी लोगों के समूह ने पुलिस के साथ भीड़ बदसलूकी की। पाकिस्तान में कट्टरपंथियों से खौफ़जदा प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को मीडिया के सामने आकार सफाई देनी पड़ी और उन्होंने अपनी लाचारी को जाहिर करते हुए कहा कि हम आज़ाद देश है,हम कैसे लोगों को मस्जिदों में जाने से रोक सकते हैं अगर वो वहाँ जाना ही चाहते हैं।”

दरअसल कोरोना काल ने विश्व को एक नई दृष्टि दी है जिसमें इस बात को महसूस किया गया कि इस संकट से सही तरीके से नहीं निपटा गया तो मानव अस्तित्व खत्म हो जाएगा। ऐसी कठिन चुनौती से निपटने के सभी देशों को अपने नागरिकों से सहयोग कि अपेक्षा थी। भारत जैसे देश के लोगों का राष्ट्रीय चरित्र भी सामने आया और पाकिस्तान जैसे देशों का भी।

रमज़ान में साझा संस्कृति के सम्मान के साथ भारतीय समाज के सबसे सकारात्मक पहलू सहनशीलता और आशावाद की झलक बार बार दिखाई दी। भारतीय मुसलमानों ने बेहद संजीदा होकर रोजे भी रखे और व्यवस्थाओं को भी बनायें रखकर दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत की तहज़ीब नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों में आधारित है और यही इस देश की विशेषता है।


बहरहाल कोरोना काल की चुनौती की बीच रमज़ान का आना हमारी साझी संस्कृति को मजबूत करने वाला रहा। आधुनिक युग में देश की परम्पराओं से अंजान और भौतिकवाद की दौड़ में गुम होती पीढ़ी के लिए यह रमज़ान हमारे देश की साझी संस्कृति की खूबियों को जानने,समझने और परखने  का अवसर दे गया।

 


गुरुवार, 21 मई 2020

राष्ट्र के राजीव..rashtra ke rajiv

                                  राष्ट्र के राजीव

                                                                        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने  



तरक्की की राह पर रफ्तार से दौड़ते इस देश की युवा पीढ़ी डिजिटल क्रांति के बूते आसमान की ऊँचाइयों को छूती हुई नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रही है। अब इस देश में उत्कृष्ट शिक्षा भी है और हम संचार,गैर पारंपरिक ऊर्जा संसाधन,आणविकऊर्जा,सुपरकण्ड्क्टर,कम्प्युटर,बायोटेक्नोलोजी,इलेक्ट्रॉनिक्स,सागर विज्ञान,रक्षा,अंतरिक्ष, क्रायोजेनिक और रक्षा में आत्म निर्भर भी है।  नासा में भी भारतीय है और दुनिया के सबसे उन्नत देश अमेरिका और ब्रिटेन में सबसे ज्यादा डाक्टर भारतीय ही है।



दरअसल डिजिटल क्रांति से अभूतपूर्व परिवर्तन वाले इस भारत को ऐसा बनने की पीछे एक युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की व्यापक सोच थी जो उन्होंने तकरीबन 35 साल पहले अपनी सकारात्मक सोच,बेहतर नजरिये और शानदार सकारात्मक प्रयासों से इसकी बुनियाद रखी थी और इस सपने को साकार करने के लिए व्यापक सुधार भी किए थे।

एक पायलट के जिंदगी ऊंचाई पर होती है। वह खतरों से रोज खेलता है,अपनी जान को रोज दांव पर लगाता है। ऊंचाई पर ही उसकी जिंदगी कभी भी खत्म होने कि आशंकाओं के बीच भी वह सदा मुस्कुराता रहता है। भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा। इंडियन एयरलाइंस के पायलट राजीव गांधी अचानक सियासत में आये और सर्वोच्च सोपान तक पहुंचे। देश कि भीतरी और बाहरी चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला किया और हँसते हँसते बिदा हो गए।  अपनी माँ की आतंकी हमलें मे मौत के तुरंत बाद देश के सबसे युवा प्रधान मंत्री बने राजीव गांधी का राष्ट्र के नाम पहला  संबोधन बेहद नीतिगत विषयों पर केंद्रित था। राष्ट्र और स्वयं के लिए भी बेहद मुश्किल दौर में उन्होने इक्कस्वी सदी के आधुनिक भारत को बनाने के लिए विज्ञान और तकनीक पर बात की। उन्होने मिलजुल कर आगे बढ्ने का संदेश दिया। दरअसल राजीव गांधी दुनिया के किसी भी लोकतंत्र के सबसे युवा प्रधानमंत्री भी थे।



तमाम चुनौतियों के बीच 1985 में वे नई शिक्षा नीति लेकर आए जिसका लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना था वे समाज के सभी वर्गों को शिक्षित कर शैक्षणिक क्रांति से मजबूत आधुनिक भारत बनता देख रहे थे।

बेहद सहज और सरल राजीव अक्सर जनता के बीच होते थे। प्रधानमंत्री होते हुए भी राजीव गांधीको यह कतई पसंद नहीं था कि जहां वे जाएं, उनके पीछे-पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी पहुंचें गृह सचिव आर डी प्रधान बताते है कि एक बार आधी रात को प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी स्वयं उन्हें अपनी कार से उन्हें घर छोड़ने के लिए जा रहे थे। विश्व शांति के लिए उनके कदमों और प्रयासों कि संयुक्त राष्ट्र ने भी सराहना कि और उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण के लिए उन्हे 1985 में बियाण्ड वार अवार्ड से सम्मानित किया गया।


बेनजीर भुट्टों ने अपनी आत्मकथा में दावा किया है की दक्षिण एशिया और शायद सारी दुनिया हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच रिश्तों का एक नया ही स्वरूप देखता अगर राजीव गाँधी जिंदा रह जाते। भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अपने कार्यकाल में साहसिक फैसलों से दुनिया को यह एहसास कराया था की भारत जितना विनम्र है,राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा को लेकर उतना ही आक्रामक भी। इंदिराजी की हत्या के बाद जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने तो तो पड़ोसियों से मित्रता या शत्रुता को लेकर किसी भी देश के  प्रति किसी तरह का पूर्वाग्रह उनके मन में नहीं था।लेकिन आपनी माँ की हत्या और खालिस्तान के अनुभव से वह इतना जरुर समझ चुके थे की पड़ोसियों के साथ अनावश्यक नरम रुख को भारत की कमजोरी समझा जा सकता है। युवा राजीव के सामने अपने को भारत के राष्ट्रहित की रक्षा में समर्थ और देश में सर्वमान्य नेता के रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती भी थी। यह वहीं दौर था जब चीन,पाकिस्तान,नेपाल,बांग्लादेश और श्रीलंका से हमारे सम्बन्ध बेहद असामन्य थे।

श्रीलंका में तमिलों पर अत्याचारों का अंतहीन सिलसिला चल रहा था और उसे वहां की सिंहली समर्थित सरकार का समर्थन प्राप्त था। ये तमिल भारत के दक्षिण राज्य तमिलनाडू में रहने वाले लोगों के रिश्तेदार थे।जाहिर है राजीव गाँधी के मन में श्रीलंका में रहने वाले तमिलों के वैधानिक अधिकारों को  लेकर बड़ी सहानुभूति थी ।

भारत की समझाईश के बाद भी जब श्रीलंकाई सरकार ने तमिलों के अधिकारों के प्रति गंभीरता नही दिखाई तो राजीव गाँधी ने भारत की साफ्ट नीति को बदल कर श्रीलंका को उन्हीं की भाषा में जवाब देना आरम्भ किया। जनवरी 1985 में  श्रीलंका की एक गश्ती नौका ने भारतीय जल सीमा में प्रवेश कर मछुआरों पर हमला किया जिसमे दो मछुआरे मारे गये ।भारतीय नौसेना ने श्रीलंका की एक सशस्त्र नौका दल को पकड़ लिया और उसके बाद राजीव गाँधी ने श्रीलंका को भारत की सामरिक ताकत का एहसास कराया ।

श्रीलंका में बसने वाले तमिल मूलतः भारतीय और हिन्दू धर्म को मानने वाले है, इन 20 लाख तमिलों में असुरक्षा,अविश्वास और आतंक की भावना विद्यमान थी।तमिलों की सुरक्षा के लिए तमिल आन्दोलन जोरों पर था वहीं फरवरी 1986 में श्रीलंका के राष्ट्र प्रमुख जयवर्धने ने एक साल के भीतर तमिल आन्दोलन को कुचलने की घोषणा कर दी ।इस दौरान पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई. एस.आई,इस्राएल की मोसाद और अमेरिका की सी. आई. ए. की श्रीलंका में मौजूदगी के संकेत से दक्षिण की और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी। जाफना प्रायद्वीप में तमिलों की बदतर स्थिति पर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए भारत ने श्रीलंका से तुरंत युद्द विराम करने और तमिलों को सहायता देने को कहा।जब श्रीलंका ने इसे अनसुना कर दिया तो  भारत ने श्रीलंका को चेतावनी देते हुए अपने विमानों से जाफना में घुसकर भोजन पैकेट गिराए। अपनी सीमा में भारतीय विमानों के घुसने से सदमे में आये श्रीलंका ने भारत को चेतावनी भी दी  । श्रीलंकाई सरकार की चेतावनी और विरोध को दरकिनार कर भारत ने उसे यह एहसास कराया की भारत अपनी और अपने नागरिकों की  सुरक्षा के लिए किसी भी देश में प्रवेश कर सकता है । भारत की इस कार्यवाही के कारण ही श्रीलंका सरकार ने भारत के समक्ष घुटने टेके और तमिलों पर सैनिक कार्यवाही उसे बंद करनी पड़ी। जवाहरलाल नेहरु की 1954 में चीन यात्रा के 34 वर्ष  बाद राजीव गाँधी ने 1988 में चीन की पांच  दिवसीय यात्रा कर भारत और चीन के बीच 1962 के युद्द से बड़ी कडुवाहट को दूर करते हुए नये संबंधों की शुरुआत की । दुनिया को दो बड़ी जनसँख्या वाले देशों के बीच लम्बे समय से चली आ रही कटुता को दूर करने का राजीव गाँधी का यह अनूठा प्रयास था जिसके जरिये पाकिस्तान और चीन के प्रगाढ़ सम्बन्धों को बेधने की कोशिश के तौर पर देखा गया।


आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की प्रायोजित नीति ,इंदिरा गाँधी की हत्या,पंजाब के आतंकवाद में पाक की भूमिका और जिया उल हक की सैन्य तानाशाही से भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध रसातल में पहुँच गये थे और दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव चरम पर था।ऐसे समय में राजीव गाँधी ने आगे बढकर  दूरदर्शिता पूर्वक पड़ोसी से बेहतर सम्बन्धों को महत्व दिया। उनके इन्हीं प्रयासों की बदौलत  भारत और पाकिस्तान के बीच 10 जनवरी 1986 को पहली बार एक व्यापक व्यापारिक समझौता हुआ और इस प्रकार दोनों देशों के बीच एक नये व्यापारिक संबंधों की शुरुआत हुई                                                                       साथ ही दोनों देशो के बीच एक बार फिर सामाजिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध परवान चढ़े। स्वतंत्र भारत के इतिहास में दूसरी बार कोई प्रधानमंत्री पाकिस्तान पहुंचा और उन्होंने पाकिस्तान से एक दुसरे के परमाणु संयंत्रो पर हमला नही करने का समझौता भी किया।                               बहरहाल मजबूत और आधुनिक भारत के लिए  राजीव गाँधी के प्रयासों को हमेशा याद किया जाता है,वे असल में राष्ट्र के राजीव थे।                                       


बुधवार, 20 मई 2020

चीन की शह पर उछलता नेपाल



नेपाली चुनौती का संकट

                                                                             ब्रह्मदीप अलूने

साम्यवाद की हिंसक और कुटिल विचारधारा का जियो और जीने दो की मानवीय विचारधारा से कोई सामीप्य नहीं हो सकता लेकिन भौगोलिक परिस्थितियों की विषमताओं और भिन्नताओं के अनुसार राष्ट्रीय हितों की अभिवृद्धि करना किसी भी सम्प्रभू राष्ट्र की मजबूरी होती है। भारत के उत्तर पूर्व में स्थित नेपाल सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है,हिमालय से आने वाली अप्रत्याशित चुनौतियों का सामना करने और अपने पारंपरिक प्रतिद्वंदी चीन को रोकने के लिए भारत के लिए नेपाल से मजबूत संबंध और उसका सुरक्षित रहना अनिवार्य माना जाता है। भारत से सांस्कृतिक,भौगोलिक,आर्थिक और सामाजिक मजबूत सम्बन्धों के बाद भी यह देखा गया है कि नेपाल की वैदेशिक नीति लगातार भारत की सामरिक अनिवार्यता को नजरअंदाज करने को तत्पर रहती है।

दरअसल इस समय कालापानी की जमीन को लेकर नेपाल का आक्रामक रुख उसकी उन नीतियों की पुष्टि करता है जिसके अनुसार भारत विरोध उसकी राष्ट्रीय राजनीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। नेपाल के पश्चिमी छोर पर स्थित कालापानी उत्तराखंड में स्थित है,भारत,नेपाल और तिब्बत से लगा यह समूचा इलाका भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  372 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में फिलहाल भारत का नियंत्रण है लेकिन नेपाल ने इस पर दावा कर इसे विवादित बनाने की कोशिश की है। कैलाश पर्वत  मानसरोवर कि धार्मिक यात्रा के साथ प्राचीनकाल से व्यापारियों और तीर्थयात्रियों के लिए यह आवागमन का मार्ग है जो भारत और तिब्बत को जोड़ता है।

भारत और नेपाल के बीच सामरिक रिश्तों का बड़ा आधार दोनों देशों के बीच 1950 में हुई शांति और मैत्री संधि है जिसके अनुसार तिब्बत,नेपाल और भूटान के मध्य दर्रों पर भारत और नेपाली सैनिक संयुक्त रूप से नियुक्त किए जाएंगे। यह भी बेहद दिलचस्प है कि इस संधि के अंतर्गत ही काठमांडू में एक भारतीय सैनिक मिशन स्थापित किया गया था जिसका कार्य नेपाली सेना को प्रशिक्षण देना था लेकिन अब वही नेपाली सेना भारत को चुनौती देने का साहस करती हुई दिखाई दे रही है।

ब्रिटिश साम्राज्य के लिए नेपाल जारशाही वाले रूस तथा मांचू साम्राज्य वाले चीन के बीच एक ऐसा बफर राष्ट्र रहा जो अंग्रेजों के लिए रक्षा कवच का काम करता था। आज़ादी के बाद भी साम्यवादी चीन और भारत के बीच फंसे  नेपाल की सामरिक महत्ता बरकरार रही है। गोरखा साम्राज्य के संस्थापक महाराज पृथ्वी नारायण शाह ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया था कि नेपाल कि स्थिति दो बड़ी चट्टानों के बीच स्थित जिमीकंद के समान है,जो फालना फूलना चाहता है तो उसे निरंतर ध्यान में रखना होगा। नेपाल इस सिद्धांत पर आज भी चलना चाहता है और वह भारत और चीन के साथ समदूरी बनाकर रखना चाहता है जबकि भारत को यह स्थिति स्वीकार्य नहीं है।  भारत के नेपाल के साथ विशिष्ट संबंध है और भारत कि नीति उसे बरकरार रखने की है। तराई,जंगल,वन,नदियां भौगोलिक रूप से भारत और नेपाल को इस प्रकार जोड़ती है कि कई स्थानों पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल होता है कि यह किस देश में है। यही कारण है कि दोनों देशों के नागरिक बेरोकटोक एक दूसरे के यहाँ आते जाते रहे है। रोटी बेटी के संबंध के साथ है दोनों देशों के सांस्कृतिक,भाषाई और आर्थिक संबंध भी एक दूसरे के साथ ताने बाने में गूँथे हुए है।  भारत में बहने वाली अधिकांश नदियों का उदगम स्थल नेपाल में है,अत: नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रकार दोनों देश एक दूसरे पर निर्भर है। भारत लगातार नेपाल के विकास में अपना अहम योगदान देता रहा है। नेपाल में भूकंप के बाद उसके पुनर्निर्माण के लिए भारत ने बड़ी सहायता की लेकिन नेपाल की वामपंथी सरकार ने इसके विपरीत परिणाम दिये।

भारत द्वारा चीन की महात्वकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड का व्यापक विरोध नजरअंदाज करके नेपाल इस परियोजना में शामिल हो गया। नेपाल भारत पर से अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और इसके पीछे उसकी स्पष्ट नीति रही की चीन नेपाल में सड़कों,रेलमार्गों,बंदरगाहों और औद्योगिक क्षेत्रों के निर्माण में भारी निवेश करेगा। इस समय नेपाल के कई स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन को पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है और इस भाषा को पढ़ाने वाले शिक्षकों के वेतन का खर्चा नेपाल स्थित चीन का दूतावास उठा रहा है। चीन और नेपाल के बीच रेल लाइन भी बिछाई गई ताकि दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़े। अपने पहले कार्यकाल में भी ओली ने चीन का दौरा किया था और उन्होंने ट्रांज़िट ट्रेड समझौते पर हस्ताक्षर किए थे,इसके पीछे नेपाल की रणनीति यह थी की चीन तिब्बत से लगते हुए सड़कों का जाल फैलाएँ और नेपाल को भी जोड़े,जिससे भारत पर से उसकी निर्भरता कम हो। नेपाल और चीन  के बीच तिब्बत के केरुंग से लेकर काठमांडू तक रेलवे लाइन बिछाने के समझौते के बाद चीन की स्थिति बेहद मजबूत हो गई है और वह भारत की उत्तरी पूर्व की सीमा के और नजदीक तक आ जाने की स्थिति में आ गया हैइस प्रकार नेपाल चीन की भारत को घेरने की नीति में मददगार बन गया है।

कालापानी समेत पूर्वोत्तर के सरहदी इलाके और भारत और तिब्बत के बीच स्थित नेपाल की सुरक्षा भारत के लिए संवेदनशील विषय रहा है। 40 के दशक में भारत की आज़ादी और चीन मे साम्यवाद के उभार के समय भारत और चीन के संबंध बेहद मधुर थे लेकिन इसके बाद भी भारत ने नेपाल के सामरिक महत्व को समझते हुए नेपाली सीमा पर अपने सैनिक तैनात किए और नेपाली सेना का आधुनिकीकरण भी कियाभारत के पहले राष्ट्रपति ने 1956 में अपनी नेपाल यात्रा के दौरान यह साफ कहा था कि नेपाल के मित्र हमारे मित्र है और नेपाल के शत्रु हमारे शत्रु।  

भारत ने लगातार नेपाल की बेहतरी के लिए अपने दरवाजें खुले रखे है और उसका रुख लगातार सकारात्मक रहा है। दोनों देशों के बीच 1950 में शांति और मित्रता कि संधि भारत के नेपाल को दिये जाने वाले प्राथमिक और सामरिक महत्व को प्रतिबिम्बित करती है। इस संधि के अंतर्गत दोनों देशों के बीच खुली सीमा का सिद्धांत लागू है। 1850 किलोमीटर लम्बी इस सीमा पर दोनों देशों के नागरिक बिना पासपोर्ट के एक दूसरे के देशों में आ जा सकते है। वास्तव में भारत ने लगातार नेपाल की बेहतरी के लिए अपने दरवाजें खुले रखे है और उसका रुख लगातार सकारात्मक रहा है। अभी तक नेपाल भारत के लिए एक ऐसा भूभाग से जुड़ा देश है जिसका लगभग सारा आयात और निर्यात भारत से होकर जाता है,भारत के कोलकाता और अन्य बंदरगाहों से नेपाल को व्यापार सुविधा तथा भारत होकर उस व्यापार के लिए पारगमन की सुविधा प्रदान की गयी है। नेपाल जल संसाधन और प्राकृतिक संसाधन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योकि भारत में बहने वाली नदियों का उदगम भी इन क्षेत्रों में पड़ता है।

पिछलें कुछ सालों से नेपाल कि राजनीति में वामपंथी विचारधारा वाली राजनीतिक पार्टियों का प्रभाव बढ्ने से इसका असर भारत नेपाल सम्बन्धों पर पड़ा है। इस समय नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी.ओली जिस वामपंथी गठबंधन का नेतृत्व कर रहे है उसमें  यूसीपीएन-माओवादी जैसे चीन समर्थित दल शामिल है। ओली पुराने मुद्दों को उभार कर नेपाल में भारत विरोध को बढ़ाने की अपनी राजनीतिक विचारधारा को हवा दे रहे है। नेपाल 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच सुगौली संधि को आधार बताता रहा है वहीं भारत 1950 की शांति और मैत्री संधि को प्राथमिकता देता है। सुगौली संधि जो अब पूरी तरह से अप्रासंगिक है, उसके अनुसार काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था जबकि 1962 में भारत और चीन में युद्ध हुआ तो भारतीय सेना ने कालापानी में चौकी बनाई, यह स्थिति इस समय भी बनी हुई है। प्रधानमंत्री के.पी. ओली ने भारत के नए नक्शे का विरोध कर भी अप्रिय स्थिति उत्पन्न की है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद भारत ने नया नक्शा जारी किया था,इस नक्शे में पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगितबाल्टिस्तान और कुछ हिस्सों को शामिल किया गया था। इस नक्शे में कालापानी को पहले की तरह ही भारत का भाग बताया गया है।

नेपाली सैनिकों को भी भारतीय सैनिकों के समान ही वन रैंक-वन पेंशन योजना का लाभ, नेपाल के विद्यार्थियों के लिए आईआईटी में प्रवेश के साथ कई सुविधाओं के बाद भी भारत विरोध नेपाल में लगातार बढ़ रहा है। चीन ने नेपाल में आक्रामक परियोजनाएं शुरू करके अपने प्रभाव को भारत के तराई क्षेत्रों तक बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है। इसके साथ ही वह नेपाली कम्युनिस्ट और माओवादी गुटों को आर्थिक और सैनिक कर चीन का समर्थन और आम नेपालियों में उनके द्वारा भारत विरोधी भावनाएं भड़काने की साजिशें रचने में कामयाब होता दिखाई दे रहा है। इसके साथ ही नेपाल से भारत की खुली सीमा का भारी दुरुपयोग होकर अब यह समस्या का कारण भी बन गई है। चीनी सामानों की भारत में डम्पिंग,माओवाद की नेपाल से आंध्र तमिलनाडू तक रेड कॉरिडोर में  उपस्थिति और मजबूती,पाक की खुफियाँ एजेंसी आईएसआई की नेपाल में लगातार गतिविधियां तथा तस्करों और आतंकवादियों का प्रवेश नेपाल के रास्ते आसान माना जाता है।

पूर्वकाल से ही नेपाल के राजा महाराजाओं ने अपने देश कि पहचान को भारत से अलग रखने के लिए कई कोशिशें की है। यह  सब जानते हुए भी भारत ने नेपाल को लेकर लगातार बेहद उदार रवैया अपनाया,लेकिन इस समय भारत को अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के लिए नेपाल को सख्त संदेश देने की यथार्थवादी नीति अपनाने पर विचार करना चाहिए। 

                                                                          

शुक्रवार, 15 मई 2020

आत्मनिर्भरता का पहला पाठ गांधी जी का स्वदेशी था - डॉ.ब्रह्मदीप अलूने


प्रजातन्त्र

            गांधी के आचरण और व्यवहार की आत्मनिर्भरता में समाधान है

                                                                           डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                      [गांधी है तो भारत है,पुस्तक के लेखक] 

केंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और इतिहासकार एफ.डब्ल्यू.मीटलैंड अपने छात्रों को अक्सर याद दिलाते रहते थे कि,“जो कुछ भी अतीत है,वह भी कभी भविष्य की बात होगी।” दरअसल आधुनिक भारत की प्रगति के भौतिकवाद के कई दशकों को भोगने के साथ वैश्विक आर्थिक महाशक्ति होने का राजनीतिक दंभ एक महामारी के सामने कुछ महीनों में ही चूर चूर हो गया।

महात्मा गांधी भविष्यवक्ता  नहीं थे लेकिन भारत को लेकर उनकी दृष्टि अन्यों के मुक़ाबले साफ और जमीनी थी। पुरानी पीढ़ी के लिए गांधी एक धुंधली याद है वहीं युवा और नव चेतन पीढ़ी के लिए गांधी कोई विवादित रहस्य की तरह प्रगट होते है। इस समय देश की डूबती हुई नैया को पार लगाने के लिए जैसे ही आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की जरूरत महसूस करते हुए इसकी अनुगूंज हुई,वैसे ही गांधी एक बार फिर जरूरत की तरह सामने आ गए। जब जब मानवीय संकट होते है तब तब गांधी अक्सर याद आ ही जाते है।

डोमिनीक लापिएर ने फ़्रीडम -एट-मिडनाइट में महात्मा गांधी को याद करते हुए लिखा है कि उन्होंने गंगा जमुना का जल पी-पीकर कोका कोला पीने वाले ब्रिटेन को घुटने टेकने पर विवश कर दिया था। भारत की आत्मनिर्भरता महात्मा गांधी के लिए कभी न रुकने देने का एहसास था और वे इसे सही रास्ते पर लाने के लिए आचरण और व्यवहार से शुद्ध ग्रामीण भारतीय बन गए थे। वे मिट्टी को छानकर एक थैली में भर लेते थे और फिर उसे गीला करके अपने पेट पर या अपने गंजे सिर पर रख लेते थे। गोबर से लीपे घरों में शरीर की आंतरिक और बाहय ठंडक बनाएँ रखने का यह उनका बेहतरीन देशी तरीका था। देशी खान पान और रहन सहन के कारण ही गांधी वृद्धा अवस्था में कड़ी धूप में भी तेजी से कई किलोमीटर चल लिया करते थे और कभी थकते भी नहीं थे। ऐसा उनसे आधी उम्र के लोग भी नहीं कर पाते थे। गांधी के आश्रम में कुछ नियम थे जिनका सख्ती से पालन किया जाता था। वहाँ पर सभी काम आश्रम में रहने वाले स्वयं करते थे। इन सबके साथ यह भी जरूरी था कि आश्रमवासी अपनी रोज की जरूरतों से जुड़े दस्तकारी के कई काम भी सीखते थे,जैसे अगरबत्ती बनाना,चप्पलें बनाना,कपड़ा बुनना आदि। गांधी जी ने खुद भी लकड़ी की खड़ाऊँ बनाना सीखा था। आश्रम पूरे समुदाय को एक परिवार की तरह एक साथ रहने की प्रेरणा देते थे जहां सभी लोग मिलजुल कर काम करते थे और आत्म निर्भर थे। गांधी जी श्रम का सम्मान करते थे और उस पर अमल भी करते थे। स्वदेशी होना और स्वदेशी के उपयोग पर गर्व करने की क्रांतिकारी विचारधारा गांधी की ही देन है।



यह भी बेहद  दिलचस्प है की 1917 में भारत ने महामारी और अकाल का संकट झेला था और इससे भारतीय समाज पूरी तरह से टूट गया था। उपनिवेशवाद का दबाव तो था ही।  महात्मा गांधी ने उपनिवेशवाद का प्रभाव खत्म करने और लोगों में आशा का भाव जगाने के लिए स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का मंत्र फूंका। ठीक 100 साल पहले 1920 में भारत में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था,गांधी ने बिखरे पड़े स्वतन्त्रता के आंदोलन को भारतीय राष्ट्रवाद की माला में पिरोकर सभी को साथ लाने का हैरतअंगेज और नामुमकिन कार्य कर दिखाया था। उपनिवेश के अभिशाप से बाहर निकालने के लिए गांधी ने असहयोग आंदोलन में जो उद्देश्य निर्धारित किए थे उसके अनुसार विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाये तथा स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग और उसका प्रसार किया जाये, बेरोजगारों और अर्द्ध बेरोजगारों में करीब 20 लाख चरखों का वितरण तथा जनता द्वारा सूत कातना और खादी का निर्माण करना जैसे कार्य शामिल किए गए। गांधी के आह्वान पर आज़ादी का क्रांतिकारी आंदोलन जन आंदोलन बन गया और उनकी रचनात्मक प्रेरणा से राष्ट्रवाद के प्रसार के साथ-साथ राष्ट्रीय शिक्षा,स्वदेशी वस्त्र,स्वदेशी संस्थाओं एवं हिन्दी की लोकप्रियता में वृद्धि हुई। इसने भारतीयों में आत्मसम्मान तथा निर्भीकता की भावना उत्पन्न की।

गांधी के बाद के भारत ने आठवें दशक में प्रवेश कर लिया है और इस समय वह गहरे आर्थिक संकट से निकलने के लिए गांधी के आत्मनिर्भरता को आत्मसात कर लेना चाहता है। लेकिन क्या भारत ऐसा कर पाएगा और यहाँ यह भी विचार करना आवश्यक है कि गांधी कि योजना पर यह भारत आगे क्यों न बढ़ाया गया। निश्चित ही यदि गांधी के स्वदेशी मंत्र को अपनाया होता तो देश में प्रवासी मजदूरों कि बेबसी,लाचारी और गरीबी से उपजा जो मानवीय संकट सामने आया है,उसके गवाह बनकर हम स्वयं को लज्जित महसूस न करते।

आज़ादी के बाद भारत के विकास की सबसे वृहत कार्य योजना जो तैयार की गई थी उसे पंचवर्षीय योजना कहा जाता है,मोटे तौर पर इसके उद्देश्य,लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने के लिए ऊंची संवृद्धि दर,सामाजिक न्याय तथा आर्थिक स्वावलंबन या आत्म निर्भरता रही। हमारी ग्रामीण और कृषि अर्थव्यवस्था होने और देश कि बड़ी आबादी की कृषि पर निर्भरता होने के बाद भी एक उन्नत औद्योगिक और नगरीकृत समाज का निर्माण कैसे किया जाए,यह हमारी सरकारों की प्राथमिकता रही। अंग्रेजों ने सामंती अर्थव्यवस्था को उपनिवेशी रूपान्तरण करने का प्रयास किया।  हमने निजी पूंजीवाद को बढ़ावा देकर सामंती अर्थव्यवस्था को औद्योगिक पूंजीवाद के नए कलेवर में स्वीकार कर लिया।

गांधी गाँव के व्यक्ति को गाँव में ही रोजगार देने के हिमायती थे जबकि हमारी सरकारों की नीतियाँ निरंतर कॉरपोरेट सेक्टर को बढ़ावा देती रही और उसे ही  उन्होंने विकास का पैमाना माना। इन सब कारणों से गाँव का विकास अवरुद्द हो गया और गरीबों का पलायन शहर की और तेजी से होने लगा। गांधी आदर्श गाँव की कल्पना कर सभी आधारभूत सुविधाएं गांवों में उपलब्ध करने के हिमायती थे,वहीं भारत की लोकतांत्रिक सरकारें शहरों को शिक्षा,स्वास्थ्य और विकास की सौगात देती रही जबकि गाँव में लोगों को रोजगार न मिला,शिक्षा,स्वास्थ्य, ग्रामीण इलाक़ों में पीने के पानी की समस्या,सिंचाई समस्या,दूर संचार,सड़कें न होने से गांवों से पलायन बढ़ गया।

किसानों को लेकर भी देश की नीतियाँ उपनिवेशवादी भारत की याद दिलाती है। ब्रिटिश शासन काल में कृषि ऋणग्रस्तता में अभूतपूर्व और सतत वृद्धि हुई। केंद्रीय बैंक अन्वेषण  समिति 1932 का अनुमान था की 1930 के आरंभ में यह ऋण बढ़ कर 900 करोड़ रुपए हो गया था। किसान इस समय भी गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। उस पर करीब 13-14 लाख करोड़ रुपये का कर्ज हो चुका है। किसान करीब 65 फीसदी कर्ज ही फसल ऋण के रूप में लेता है। बैंकों में ही 7.68 करोड़ कृषि ऋण खाते हैं, कुल 7.68 करोड़ खातों में से 3.87 करोड़ खाते छोटे और सीमांत किसानों के हैं। किसान से ज्यादा कॉरपोरेट को तरजीह देने से यह स्थिति बनी है।

कोरोना महामारी के बाद हम लगभग 40-50 साल पिछड़ जाएंगे,इसका अंदेशा बना हुआ है। आज़ादी के बाद शुरू के तीस सालों में  हमारी संवृद्धि दर औसतन 3.73 फीसदी प्रतिवर्ष रही, यह उपनिवेश काल  से बहुत बेहतर थी। इस समय हालात कुछ ऐसे ही हो गए है की हमारी संवृद्धि दर घटकर 4 फीसदी तक चली जाएगी। इसका गहरा असर सवा अरब वाले इस देश पर पड़ेगा। 4 फीसदी प्रतिवर्ष संवृद्धि दर के साथ इतनी बड़ी जनसंख्या की निर्धनता,बेरोजगारी,आवास,शिक्षा,स्वास्थ्य,पिछड़ापन,सुरक्षा,प्रदूषित पर्यावरण, अशुद्ध पानी  जैसी विशाल समस्याओं को कैसे सुलझायेंगे,इन चुनौतियों से जूझना पड़ेगा।

इस समय की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि कॉरपोरेट सेक्टर को ज़्यादा पैसे न देकर असंगठित क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाए,गांवों के साथ शहरों में भी सरकार को रोज़गार गारंटी की स्कीम शुरू की जाए। छोटे और कुटीर उद्योग गाँव और शहर दोनों में ही प्राथमिकता में हो इससे जिनके पास काम नहीं है उनको भी काम मिलना शुरू हो जाएगा।

जो लोग शहरों से गांवों की ओर पलायन कर गए हैं और उनके पास रोज़गार नहीं है तो उन्हें अपने घर और गाँव में ही काम मिले,इसके लिए गांवों में शिक्षा,स्वास्थ्य, शुद्ध पेयजल,सिंचाई सुविधा,दूरसंचार,सड़कें बनाने के  साथ ठोस कार्य योजना बनानी होगी। इन सब को बेहतर बनाने में ख़र्च बढ़ाया जाए तो वहां से हालात बेहतर होंगे और असंगठित क्षेत्र की वजह से अर्थव्यवस्था की हालत सुधरेगी। गांवों में कृषकों,दस्तकारों और छोटे मझोले उद्योगों को स्वत: प्रेरित करने के लिए संगठित और समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए जिससे वित्तीय आत्म निर्भरता  बढ़ेगी और देश की विदेशी निधियों पर निर्भरता को खत्म किया जा सकेगा।


फ़्रीडम एट मिडनाइट में गांधी से जुड़े एक दिलचस्प किस्से का जिक्र किया गया है,1947 में दंगा प्रभावित बंगाल के श्रीरामपूरा की कच्ची पगडंडियों के रास्ते 77 वर्षीय वृद्ध अपने खोये हुए सपने की खोज में बांस की एक लंबी लाठी लिए लंबे लंबे डग भरता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था। जब गांधी जी की यह टोली कटे हुए धान के खेतों के पार आँख से ओझल होने लगी,तो गाँव वालों ने रवीन्द्रनाथ टैगोर की एक महान कविता बड़ी लय के साथ उन्हें गाते हुए सुना। यह इस वृद्द नेता की प्रिय कविता थी और जब वह आँख से ओझल हो गए तब भी वे धान के खेतों के पास से आती हुई उनकी ऊंची बेसुरी आवाज सुनते रहे। वह गा रहे थे,जोदि तोर दक शुने केऊ ना ऐसे तबे एकला चलो रे,एकला चालो,एकला चालो,एकला चालो।” इस बंगाली कविता का हिंदी में अर्थ है कि, यदि आपकी बात का कोई उत्तर नहीं देता है, तब अपने ही तरीके से अकेले चलो।”

गांधी भारत को दिशा दिखाते अकेले चलते रहे और इस विश्वास के साथ इस दुनिया से गए होंगे की भारत उनके बताएं रास्ते पर चलेगा। गांधी को जरूरत समझे या मजबूरी लेकिन वे हमेशा प्रासंगिक है। भारत के अतीत,वर्तमान और भविष्य को लेकर गांधी की समझ का और कोई विकल्प नहीं हो सकता। समय का पहिया घूमकर वहीं आ गया है और आसन्न संकट में गांधी की आत्मनिर्भरता की सीख सामने है।  


brahmadeep alune

aakashwani sanvidhan koumi ekta Aajkal- 23rd November