बुधवार, 27 मई 2020

यदि नेहरु नहीं होते, ydi nehru na hote..

सांध्य प्रकाश

                              यदि नेहरु नहीं होते

                                                                   डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

27 मई 1964,दोपहर के ठीक दो बजेलोकसभा में केबिनेट मंत्री सी सुब्रमण्यम ने रुंधे गले से अचानक यह घोषणा कि की रोशनी चली गई है,हमारे प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु अब नहीं रहेसंसद में सन्नाटा छा गयाकई सांसद और मंत्री रोने लगेजैसे जैसे यह समाचार फैला,लोग रोते हुए प्रधानमन्त्री निवास की और भागने लगेलोगों में निराशा छा गई,बाज़ार बंद हो गएपूरे भारत में मजदूर,किसान,महिलाएं,बच्चें ,आम नागरिक और सभी वर्गो में यह मायूसी और निराशा फ़ैल गईऐसे लाखों लोग अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शन करना चाहते थेआधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु गुलामी से बदहाल भारत को अपने 17 साल के कार्यकाल में आधुनिक और सशक्त भारत की और मार्ग प्रशस्त करते हुए जब बिदा हुए तो उनकी अंतिम यात्रा में शामिल ढाई लाख लोगों की भीड़  बिलख बिलख कर रो रही थी

जून 1920 में प्रतापगढ़ के देहात में नेहरु ने किसानों पर अत्याचार और अमानुषिक व्यवहार की करुण गाथा सुनी थीउस समय से ही किसान के हित और उनके  सम्मान  की रक्षा के लिए नेहरु कृतसंकल्पित रहेउन्हें सामने उत्पीड़ित किसानों का चित्र हमेशा होता था,इसीलिए स्वतंत्र भारत के इस स्वप्नदृष्टा ने किसानों के जीवन में खुशियां भर दीकिसानों के प्रति उनका सम्मान मरने से भी कम नहीं हुआउनकी अंतिम इच्छा के अनुसार ही उनकी राख की मिट्टी को  को खेतों के ऊपर डाला गया

जब जवाहरलाल नेहरू ने 3 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया तो उन्होंने आनंद भवन को छोड़ कर अपनी सारी संपत्ति देश को दान कर दीनेहरू को पैसे से कोई खास लगाव नहीं थाउनके सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज में लिखते हैं कि 1946 के शुरू में उनकी जेब में हमेशा 200 रुपए होते थे, लेकिन जल्द ही यह पैसे ख़त्म हो जाते थे क्योंकि नेहरू यह रुपए पाकिस्तान से आए परेशान शरणार्थियों में बांट देते थे

ख़त्म हो जाने पर वह और पैसे मांगते थे इस सबसे परेशान हो कर मथाई ने उनकी जेब में रुपए रखवाने ही बंद कर दिएलेकिन नेहरू की भलमनसाहत इस पर भी नहीं रुकी,वह लोगों को देने के लिए अपने सुरक्षा अधिकारी से पैसे उधार लेने लगे

जहाँ तक सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का सवाल है जवाहरलाल नेहरू का कोई सानी नहीं थानेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के शौक बहुत ख़र्चीले थेएक बार वह शिमला के सर्किट हाउस में ठहरींवहाँ रहने का बिल 2500 रुपए आयानेहरु को मालूम हुआ तो उन्होंने अपनी बहन से कुछ नहीं कहा बल्कि वह पैसा किसी सरकारी मद से नहीं अपनी तनख्वाह में से देने को कहाउन्होंने पंजाब सरकार को एक पत्र लिखते हुए कहा कि  वह एक मुश्त इतने पैसे नहीं दे सकते इसलिए वह पंजाब सरकार को पांच किश्तों में यह राशि चुकाएंगेनेहरू ने अपने निजी बैंक खाते से लगातार पांच महीनों तक पंजाब सरकार के पक्ष में पांच सौ रुपए के चेक काटे नेहरू के सुरक्षा अधिकारी रहे केएम रुस्तमजी अपनी किताब 'आई वाज़ नेहरूज़ शैडो' में लिखते हैं, "जब मैं उनके स्टाफ़ में आया तो वो 63 साल के थे लेकिन 33 के लगते थेलिफ़्ट का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं करते थे, और तो और एक बार में दो सीढ़ियाँ चढ़ा करते थेएक बार डिब्रूगढ़ की यात्रा के दौरान मैंने देखा कि उनका सहायक हरि उनके फटे मौज़ों की सिलाई कर रहा है उन्हें चीज़ों को बरबाद करना पसंद नहीं था

वे विश्व बन्धुत्व के स्वप्न दृष्टा थे,इसीलिए वे दुनिया में जहां कही भी जाते लोग उन्हें देखकर खड़े होकर ताली बजाने लगतेवे बीसवी शताब्दी के लोकप्रिय नेताओं में से एक थे और  उनकी महानता तक लेनिन, जोसेफ स्टालीन या माओत्सेतुंग नहीं पहुँच पाये।महात्मा गांधी के बाद वे इस देश के ऐसे सर्वमान्य नेता रहे जिन्होंने देश को दिशा दीपंचवर्षीय योजनाओं के जरिए भारत का औद्द्यौगिकीकरण किया गया और भारत को उत्पादक और सम्पन्न राष्ट्र बना दियानेहरु ने भांखडा और नागार्जुन जैसे बड़े बड़े बांध बनवाएं जो सिंचाई और बिजली का विपुल साधन बनेआज कृषक को खाद,बीज,खेती के उपकरण,बिजली,नवीन कृषि प्रक्रिया,तथा प्रचुर धन राशी जो उपलब्ध हुई है,वह देश के बिना औद्द्यौगिकीकरण किए संभव नहीं हो सकती थीअन्न में आज भारत आत्म निर्भर बना है और दुनिया की प्रमुख लोकतांत्रिक शक्ति के रूप में जो पहचान है उसका श्रेय नेहरु को जाता है

एक बार सऊदी अरब की यात्रा के दौरान वो उस महल के हर कमरे में जा कर बत्तियाँ बुझाते रहे, जिसे ख़ासतौर से उनके लिए बनवाया गया था"उसी यात्रा के दौरान नेहरू को रसूल-अस-सलाम कह कर पुकारा गया था जिसका अरबी में अर्थ होता है शाँति का संदेश वाहकलेकिन उर्दू में ये शब्द पैग़म्बर मोहम्मद के लिए इस्तेमाल होता है नहरू के लिए ये शब्द इस्तेमाल करने के लिए पाकिस्तान में शाह सऊद की काफ़ी आलोचना भी हुई थी।गुटनिरपेक्षता,तटस्थता,शांति और मानवीय विकास के लिए उनके प्रयासों को दुनिया भर में सराहा जाता है,उन्हें 11 बार नोबेल शांति अवॉर्ड के लिए नामित भी किया गया था

पंडित नेहरु ने स्वतंत्र भारत के अपने पहले भाषण में कहा था कि "भविष्य हमें बुला रहा हैहमें किधर जाना चाहिए और हमें क्या करना चाहिए,जिससे हम आम आदमी, किसानों और कामगारों के लिए आज़ादी और अवसर ला सकेंहम ग़रीबी,हम एक समृद्ध,लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील देश बना सकेंहम ऐसी सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं को बना सकें जो हर आदमी-औरत के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सके।"

भारत की खुशहाली और मजबूती की उनकी प्रतिबद्धता उनकी नीतियों में परिलक्षित होती हैदेश के विकास और सशक्तिकरण के लिए नेहरु की कल्पना आज भी प्रतिबिम्बित होती है।लोकतांत्रिक व्यवस्था,समाजवादी मॉडल, विकेंद्रीकरण,तटस्थ वैदेशिक नीति,धर्म-निरपेक्षता, सामाजिक सुधार और आर्थिक विकास उन्हीं की धरोहर हैजवाहरलाल नेहरू गाँधी के उत्तराधिकारी थे तो भारत का भविष्य बनकर उभरे भी।उन्होंने जर्जर अवस्था से निकालकर सशक्त और आधुनिक भारत बनाने का सपना संजोया।उन्होंने पूँजीवाद को कठिन समय में अंगुली दिखाई और सोवियत माडल को अपनाने का साहस दिखाया।नियोजित विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं, हरित क्रांति, औद्योगीकीकरण और वैज्ञानिक प्रगति की नेहरू की जिद ने भारत को विश्वभर में पहचान दी।स्वयं नेहरू के शब्दों में - ‘‘जब कभी मैं उदास और थकान अनुभव करता हूँ, मैं व्यक्तियों के बीच चला जाता हूँ और वहां से ताजगी लेकर लौटता हूँ।‘‘ जन शक्ति को प्रेरणा मानने वाले नेहरू की विकास की कल्पना राष्ट्र के लिए असीम ऊर्जा का संचय बनी।जहां नेहरु और उनकी शांति की नीतियां दुनिया में भारत की पहचान बनी वहीं हमारे साथ स्वतंत्र हुआ पाकिस्तान राजनीतिक सौदेबाजी,अव्यवस्थित लोकतंत्र,अति महत्वकांक्षी वैश्विक सैन्य गठबन्धनों, कट्टरता और संकीर्णता में फंसकर नाकाम हो गया।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


सोमवार, 25 मई 2020

कसौटी पर है संघवाद, kasouty par hai sanghvad

      सुबह सवेरे                             

                              कसौटी पर है संघवाद

                                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                   राजनीतिक विश्लेषक


चेन्नई में मजदूरी करने वाला हरिया अपनी विकलांग पत्नी को एक लकड़ीनुमा हाथ से खींचने वाली गाड़ी में बिठाता है और भूखा प्यासा बदहवास सा उस गाड़ी को खींचता पैदल चलता जाता है। तमाम परेशानियों से जूझते हुए भी उसकी आँखों में मंजिल पर पहुँचने की ललक है। उसकी मंजिल बहुत दूर है और उसे करीब एक हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय करने के बाद मध्यप्रदेश के बालाघाट  पहुँचना होगा। हरिया उस तमिलनाडू को पार करता है जिसे सामाजिक न्याय का बड़ा मॉडल माना जाता है। इसके बाद वह कर्नाटक से गुजरता है जिसका  बैंगलौर दुनिया की आईटी कंपनी का हब है और भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी का यह प्रतीक माना जाता है। उसे तेलंगाना से भी गुजरना है जो पिछड़े से अगड़े बनने का ख्वाब लिए अलग प्रदेश बना है।  इसके बाद हरिया आंध्रप्रदेश से गुजरता है जो दक्षिण की फिल्मों और क्षेत्रीय विकास का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बाद वह मायानगरी के राज्य से गुजरता है जिसे राष्ट्र में महाराष्ट्र होने का बाद गुमान है और अंतत: वह कई दिनों के सफर के बाद बालाघाट की सीमा पर पहुँच जाता है। यहाँ पर तैनात एक पुलिस अधिकारी उस मजदूर को बालाघाट के एक छोटे से गाँव तक एक वाहन से पहुंचाते है। यही कहानी रामू की भी है जो हैदराबाद से अपनी बेटी को एक ऐसी ही हाथगाड़ी में खींचते हुए बालाघाट पहुंचता है।


दरअसल हरिया और रामू का संघर्ष देश के उस संघीय ढांचे को चुनौती दे रहा है जो एक राष्ट्र एक नागरिकता और सांस्कृतिक एकता के दावे के साथ स्वयं को स्थापित किए हुए है। हरिया और रामू व्यवस्था की खामियों के साथ उस क्षेत्रवाद का भी शिकार हो गए जिसमें सरकारों की संवेदनाएं कथित अपने क्षेत्र विशेष के नागरिकों के लिए होती है और यदि वह उनका वोट बैंक मजबूत करने वाला हो तो सुविधाएं भी जुट जाती है और सहूलियत भी मिल जाती है।  महाराष्ट्र के औरंगाबाद में मध्य प्रदेश के बालाघाट और शहडोल के बाशिंदों की रेल पटरियों पर चिथड़े चिथड़े हुई लाशें असमानता के साथ क्षेत्रीय सरकारों की दूसरे राज्यों के नागरिकों के प्रति असंवेदना का बदतरीन उदाहरण है। हजारों मजदूर जिन भी राज्यों और उनके इलाकों से गुजरें वहां की सरकार,प्रशासन,सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं तब तक खामोशी से इसे देखती रही जब तक यह मीडिया में इसे प्रमुखता से उभारा नहीं गया लेकिन तमाम मानवीय पक्षों को दरकिनार करने से किसी ने भी गुरेज नहीं किया। रास्तों से गुजरने वाले मजदूर किसी अन्य प्रदेश के निवासी से थे,अत: किसी की भी ज़िम्मेदारी तय नहीं हो सकी।  

नेशन ऑफ द मेकिंग या भारत को बनता हुआ राष्ट्र बताते हुए डॉ.अंबेडकर ने नागरिकों और राजनेताओं को भारत को एक राष्ट्र बनाने  की जो चुनौती दी थी और वह आज़ादी के सात दशक बीता देने के बाद भी जस की तस कायम है।  संविधान कि अंतिम बैठक चल रही थी तथा इसका अंतिम और निर्णायक भाषण देते हुए डॉ.अंबेडकर ने कहा था कि हम सबसे अच्छा संविधान लिख सकते हैं, लेकिन उसकी कामयाबी आख़िरकार उन लोगों पर निर्भर करेगी,जो देश को चलाएंगे।


संविधान निर्माताओं के लिए विविधताओं मे बंटे भारत के नागरिकों को एक संवैधानिक प्रतिबद्धताओं का बांटना बेहद कठिन था,तमाम आशंकाओं और कुशंकाओं के बाद भारत एक ऐसे संघीय देश के तौर पर विकसित करने वाला संविधान बनाया गया जो समूचे भारत के नागरिकों की इच्छाओं और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए उनके भावी सपनों के पूरा करने की आशाएँ भी जगाता हो।  लेकिन अब जो तस्वीर सामने आई है वह संघवाद और उसकी भावना को चुनौती दे रही है। ऐसा प्रतीत हुआ है कि यह क्षेत्रवाद की संकल्पना पर आधारित राजनीतिक दलों के प्रभुत्व के रूप में उभरता नया भारत है जहां वोट के आधार पर सामाजिक सरोकार तय किए जाते है और मजदूरों की समस्या इसी बदनीयती का परिणाम है। इस समय मजदूरों की जो स्थिति सामने आ रही है वह क्षेत्रवाद से आगे निकलकर पृथकतावाद को बढ़ावा देने वाली है। दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूरों के हितों के प्रति राज्य सरकारों ने जो लापरवाही दिखाई है और उसकी अव्यवस्था से उपजा मानवीय संकट जिस प्रकार मजदूरों के लिए जानलेवा साबित हुआ है। इस दर्द को भोग कर ज़िंदा बचे लोग अपने घर लौटकर देश के संघीय ढांचे का कैसा सम्मान करेंगे,यह बड़ा प्रश्न सामने खड़ा है। 

इससे जो सबसे बड़ी चुनौती सामने आ सकती है वह भूमिपुत्र की भावना है जिसके अनुसार किसी भूभाग पर पैदा होने वाले व्यक्तियों का उस भूभाग और उसके संसाधनों पर पहला अधिकार है। महाराष्ट्र में शिवसेना ने जो नारा दिया था की महाराष्ट्र,मराठियों के लिए है,आने वाले समय में अन्य प्रदेश के राजनीतिक दलों को यह नारा देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा और वे आसानी से इसे अपना भी लेंगे। अभी भारत के स्थानीय या क्षेत्रीय आंदोलनों को राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और इसका प्रमुख आधार भाषा रही है लेकिन आने वाले समय में संसाधनों को लेकर राजनीति होगी और इसमें प्रमुख भागीदारी मजदूरों की होगी। संकट यह भी है कि मजदूरों के रोजगार और संसाधनों के नाम पर खड़े होने वाले क्षेत्रीय आंदोलन आश्चर्य नहीं पृथकतावादी आंदोलनों में परिवर्तित हो जाएँ। उत्तर पूर्व के राज्यों में यह समस्या गहरी चिंता का कारण रही है। असम में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन का गठन बंगलादेशी घुसपैठियों को बाहर निकालने के लिए हुआ था लेकिन यह सांप्रदायिक होकर एक पृथकतावादी आंदोलन बन गया। हिन्दी विरोध के बूते दक्षिण भारत में डीएमके खड़ी हुई और सत्ता तक पहुँच गई। पंजाबी सूबा आंदोलन भी कुछ ऐसा ही था और इसे मजबूत करने वाले अकाली दल की पृथकतावादी सोच हम सब जानते है। बिहार का झारखंड आंदोलन बाहरी लोगों के विरुद्द था। जम्मू कश्मीर का क्षेत्रवादी आंदोलन भी ऐसे ही पृथकतावाद में परिवर्तित हो गया।

नक्सलवादी विचारधारा गैर बराबरी और सामंती दबदबे के कारण पुख्ता हुई और हिंसक होकर इस देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन गई है।  यहाँ पर यह भी बेहद महत्वपूर्ण है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन 1960 के दशक में ही समाप्त हो गया होता लेकिन वह राजनीतिक उदासीनता के साथ बाद में राजनीतिक जरूरत बन गया। जाहिर है हिंसक विचारधारा को भी राजनीतिक कारणों से स्थानीय समर्थन मिलने से यह समस्या बढ़ती गई

स्वतंत्र भारत का भावी भविष्य तय करते हुए बाबा आम्बेडकर को सामाजिक न्याय की बड़ी चिंता थीवे संविधान सभा को चेतावनी देते हैं कि अगर हमने इस ग़ैरबराबरी को ख़त्म नहीं किया तो इससे पीड़ित लोग उस ढांचे को ध्वस्त कर देंगे,जिसे इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया हैसंविधान सभा के आख़िरी भाषण में बाबा साहब आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के ख़ात्मे को राष्ट्रीय एजेंडे के रूप में सामने लाते हैं

इस समय करोड़ों मजदूर शहरों से कड़वी यादें लेकर गाँव में पहुंचे है। उनकी गरीबी उन्हें आराम से बैठने कि इजाजत नहीं दे सकती लेकिन राज्य भी अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकते। तेलंगाना का क्षेत्र आंध्र प्रदेश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में पिछड़ा था इसलिए उसे अलग  प्रदेश बना दिया गया। असमान आर्थिक विकास और सांस्कृतिक पहचान खोने का भय क्षेत्रवाद उत्पन्न होने का प्रमुख कारण है। पूर्वी उत्तरप्रदेश  गरीब और पिछड़ा है,पश्चिमी उत्तर प्रदेश संपन्न है जबकि बुंदेलखंड पिछड़ा है। मध्यप्रदेश में बघेलखंड पिछड़ा है।  महाराष्ट्र में विदर्भ के हालात बहुत खराब है।  रोजगार की समस्या को देखते हुए देश में पिछड़े इलाकों को प्रदेश के रूप में मान्यता देने की जरूरत है। पिछड़ेपन का अभिशाप भोगने वाला छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद एक बेहतर प्रदेश के रूप में विकसित होने में सफल रहा है। 

आने वाले समय में रोजगार को लेकर जो चुनौतियाँ सामने आने वाली है उसे देखते हुए पिछड़े इलाकों को राज्यों के रूप में गठित करने के दूरगामी और सकारात्मक परिणाम हो सकते है। अंतत: एक संघीय राष्ट्र के तौर पर भारत का भविष्य है और यह रास्ता तय करने के लिए असमान विकास, पिछड़ापन और असमानता को खत्म करना ही होगा। बहरहाल भारत संघीय लोकतन्त्र के कई बदलावों से गुजरते हुए एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है,इसके आगे का सफर देश की दशा और दिशा बदलने वाला हो सकता है।

 


इसीलिए हिंदुस्तानी मुसलमान है सबसे अलहदा ,isliye hindustani muslman hai sbase alhada



दबंग दुनिया

                इसीलिए हिंदुस्तानी मुसलमान है सबसे अलहदा                                                

                                                                 डॉ.ब्रह्मदीप अलूने

                                                                                              शिक्षाविद  




http://epaper.dabangdunia.co/NewsDetail.aspx?storyid=DEL-08-69462450&date=2020-05-25&pageid=1


यह मुहब्बत और इबादत की ईद है लेकिन इस त्योहार तक पहुँचते हुए जो सफर तय हुआ है वह हिंदुस्तान की तारीख में हमेशा याद किया जाएगा। कई धर्मों और संस्कृतियों से भरा हमारा महान लोकतंत्र व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवधारणाओं की गारंटी देता है। हिंदुस्तान की तारीख में शाही इमाम की रमज़ान की नमाज के दौरान कभी आंखे नम नहीं हुई,लेकिन इस बार ऐसा ही हुआ,हालांकि इसका कारण महामारी का प्रकोप था। रमज़ान के महीने की शामें बड़ी रंगीन और खुशबूदार होती है। इस बार फिजाँ में कोई रंगीनियां नहीं थी। हैदराबाद की होटलों में सैंकड़ों तरह की बिरयानी सजी नहीं थी,बघारे बैंगन और अंचारी सब्जी भी न नसीब हुई।  दक्कन का यह नवाबी इलाकें में सादी दाल और रोटी से ही लेकिन खामोशी से इफ्तार करके पूरा महीना बीता दिया। रोजे की कठिन चुनौती को मुस्कुराकर अपनाते नौनिहालों में शायद ही किसी ने महीने भर में मिठाई का जायका लिया हो लेकिन मिठाई की ज़िद में रोने की कहीं आवाज सुनाई नहीं दी।

तटीय कर्नाटक के लोग खाने के बड़े शौकीन होते है। यहाँ भोजन में समुद्री भोजन, नारियल और नारियल तेल का व्यापक उपयोग  के साथ शोरबे को चावल के साथ परोसा जाता है। दालों और सब्जियों को नारियल,मसालों के साथ पकाया जाता है और सरसों,करी पत्ता,हींग से छौंक लगाई जाती है जिसे हूली कहते हैं इसे भी चावल के साथ ही परोसा जाता है। मैसूर के आस पास के लोग मैसूर पाक,धारवाड़ पेड़ा,फेनी,चिरोती को पसंद करते है,इसके बिना तो इफ्तार होता ही नहीं,लेकिन इस बार इफ्तार ऐसे ही हुआ। केरल में न तो मीन तोरण या मालाबार बिरियानी मिली,न ही उत्तर भारत में आगरा की मिठाइयाँ। तमिलनाडु से लेकर बंगाल तक रमज़ान का महीना बेहद खामोशी से बीता,बांग्ला मुसलमान आम बंगाली की तरह हिल्सा मछली का बेहद शौक़ीन होता है,लेकिन उसने इस मछ्ली के बिना ही रोजे छोड़े।




दरअसल यहीं तो हिंदुस्तानी तहज़ीब है जो अपनी आस्था में डूब जाने को पसंद करती है लेकिन उसकी प्रतिबद्धताओं में मुल्क और समाज के सभी तबकों की बेहतरी होती है। रहमत,बरकत और मगफिरत या मोक्ष के महीने भर के रमज़ान का यह सफर कड़ी तपस्या का होता है लेकिन इस बार यह चुनौतीपूर्ण भी रहा।

कोरोना की दहशत अभिशाप की तरह मानव जाति को निगलने को आमादा है और इससे बचाव का तरीका अपने को घर में कैद कर लेना बताया गया। रमज़ान की इबादत के साथ भारतीय मुसलमानों के लिए सरकार ने कुछ गाइडलाइंस जारी की, जिनमें यह हिदायत दी गई कि मस्जिदों के बजाय मुसलमान अपने घरों में नमाज़ पढ़ें और लॉकडाउन में मस्जिदों से लाउडस्पीकर से अज़ान भी बंद कर दे। रोज़ा खोलने के बाद रात में पढ़ी जाने वाली नमाज़ भी घरों में पढ़े। मस्जिदों में इफ़्तार पार्टी का आयोजन न करे। रमज़ान की ख़रीदारी के लिए घरों से बाहर न निकले।  कश्मीर से कन्याकुमारी तक बसने वाले करोड़ों मुसलमानों ने सरकार कि गाइड लाइन का पालन करते हुए अपनी धार्मिक प्रतिबद्धताओं का पूरा पालन किया और कानून व्यवस्था कि स्थिति बिल्कुल प्रभावित न हुई। हजारों वर्षों के इस्लामिक इतिहास में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि रमज़ान के महीने में नमाज मस्जिद में जाकर सामूहिक रूप से न पढ़ी जायें लेकिन इस बार ऐसा हुआ और इसका पालन भी किया गया।

इस्लामिक संस्कृति को अलग बताकर हिंदुस्तान से अलग हुए जिन्ना के पाकिस्तान का माहौल इस सबसे जुदा था। कोरोना के कहर से बचने कि सरकार कि हिदायत से इतर इस्लामाबाद की मशहूर लाल मस्जिद में जुमे की नमाज़ पढ़ी गई जिसमें भारी संख्या में लोग जमा हुए और कोरोना से जुड़े तमाम एडवाइज़री और सरकारी आदेशों का जमकर उल्लंघन हुआ।

कराची में हुई एक प्रेस वार्ता में दो नामी धर्म गुरुओं मुफ़्ती मुनीबुर्रहमान और मुफ़्ती तकी उस्मानी ने सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि मस्जिदें और मदरसे अनिश्चित काल के लिए बंद नहीं रह सकते,इसलिए रमज़ान के महीने में इन्हें खोला जाएगा और सामान्य दिनों की तरह मस्जिदों में नमाज़ पढ़ी जाएगी। लॉकडाउन के दौरान पाकिस्तान में स्थानीय प्रशासन को मस्जिदों पर प्रतिबंध लगाने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा। कोरोना के डर से बेखौफ मस्जिदों में भारी भीड़ जमा  हुई और पुलिस ने ऐसी मस्जिदों को बंद कराने की कोशिश की तो रूढ़िवादी लोगों के समूह ने पुलिस के साथ भीड़ बदसलूकी की। पाकिस्तान में कट्टरपंथियों से खौफ़जदा प्रधानमंत्री इमरान ख़ान को मीडिया के सामने आकार सफाई देनी पड़ी और उन्होंने अपनी लाचारी को जाहिर करते हुए कहा कि हम आज़ाद देश है,हम कैसे लोगों को मस्जिदों में जाने से रोक सकते हैं अगर वो वहाँ जाना ही चाहते हैं।”

दरअसल कोरोना काल ने विश्व को एक नई दृष्टि दी है जिसमें इस बात को महसूस किया गया कि इस संकट से सही तरीके से नहीं निपटा गया तो मानव अस्तित्व खत्म हो जाएगा। ऐसी कठिन चुनौती से निपटने के सभी देशों को अपने नागरिकों से सहयोग कि अपेक्षा थी। भारत जैसे देश के लोगों का राष्ट्रीय चरित्र भी सामने आया और पाकिस्तान जैसे देशों का भी।

रमज़ान में साझा संस्कृति के सम्मान के साथ भारतीय समाज के सबसे सकारात्मक पहलू सहनशीलता और आशावाद की झलक बार बार दिखाई दी। भारतीय मुसलमानों ने बेहद संजीदा होकर रोजे भी रखे और व्यवस्थाओं को भी बनायें रखकर दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत की तहज़ीब नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों में आधारित है और यही इस देश की विशेषता है।


बहरहाल कोरोना काल की चुनौती की बीच रमज़ान का आना हमारी साझी संस्कृति को मजबूत करने वाला रहा। आधुनिक युग में देश की परम्पराओं से अंजान और भौतिकवाद की दौड़ में गुम होती पीढ़ी के लिए यह रमज़ान हमारे देश की साझी संस्कृति की खूबियों को जानने,समझने और परखने  का अवसर दे गया।

 


गुरुवार, 21 मई 2020

राष्ट्र के राजीव..rashtra ke rajiv

                                  राष्ट्र के राजीव

                                                                        डॉ.ब्रह्मदीप अलूने  



तरक्की की राह पर रफ्तार से दौड़ते इस देश की युवा पीढ़ी डिजिटल क्रांति के बूते आसमान की ऊँचाइयों को छूती हुई नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रही है। अब इस देश में उत्कृष्ट शिक्षा भी है और हम संचार,गैर पारंपरिक ऊर्जा संसाधन,आणविकऊर्जा,सुपरकण्ड्क्टर,कम्प्युटर,बायोटेक्नोलोजी,इलेक्ट्रॉनिक्स,सागर विज्ञान,रक्षा,अंतरिक्ष, क्रायोजेनिक और रक्षा में आत्म निर्भर भी है।  नासा में भी भारतीय है और दुनिया के सबसे उन्नत देश अमेरिका और ब्रिटेन में सबसे ज्यादा डाक्टर भारतीय ही है।



दरअसल डिजिटल क्रांति से अभूतपूर्व परिवर्तन वाले इस भारत को ऐसा बनने की पीछे एक युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की व्यापक सोच थी जो उन्होंने तकरीबन 35 साल पहले अपनी सकारात्मक सोच,बेहतर नजरिये और शानदार सकारात्मक प्रयासों से इसकी बुनियाद रखी थी और इस सपने को साकार करने के लिए व्यापक सुधार भी किए थे।

एक पायलट के जिंदगी ऊंचाई पर होती है। वह खतरों से रोज खेलता है,अपनी जान को रोज दांव पर लगाता है। ऊंचाई पर ही उसकी जिंदगी कभी भी खत्म होने कि आशंकाओं के बीच भी वह सदा मुस्कुराता रहता है। भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी का जीवन भी कुछ ऐसा ही रहा। इंडियन एयरलाइंस के पायलट राजीव गांधी अचानक सियासत में आये और सर्वोच्च सोपान तक पहुंचे। देश कि भीतरी और बाहरी चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला किया और हँसते हँसते बिदा हो गए।  अपनी माँ की आतंकी हमलें मे मौत के तुरंत बाद देश के सबसे युवा प्रधान मंत्री बने राजीव गांधी का राष्ट्र के नाम पहला  संबोधन बेहद नीतिगत विषयों पर केंद्रित था। राष्ट्र और स्वयं के लिए भी बेहद मुश्किल दौर में उन्होने इक्कस्वी सदी के आधुनिक भारत को बनाने के लिए विज्ञान और तकनीक पर बात की। उन्होने मिलजुल कर आगे बढ्ने का संदेश दिया। दरअसल राजीव गांधी दुनिया के किसी भी लोकतंत्र के सबसे युवा प्रधानमंत्री भी थे।



तमाम चुनौतियों के बीच 1985 में वे नई शिक्षा नीति लेकर आए जिसका लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना था वे समाज के सभी वर्गों को शिक्षित कर शैक्षणिक क्रांति से मजबूत आधुनिक भारत बनता देख रहे थे।

बेहद सहज और सरल राजीव अक्सर जनता के बीच होते थे। प्रधानमंत्री होते हुए भी राजीव गांधीको यह कतई पसंद नहीं था कि जहां वे जाएं, उनके पीछे-पीछे उनके सुरक्षाकर्मी भी पहुंचें गृह सचिव आर डी प्रधान बताते है कि एक बार आधी रात को प्रधानमन्त्री राजीव गाँधी स्वयं उन्हें अपनी कार से उन्हें घर छोड़ने के लिए जा रहे थे। विश्व शांति के लिए उनके कदमों और प्रयासों कि संयुक्त राष्ट्र ने भी सराहना कि और उनके प्रगतिशील दृष्टिकोण के लिए उन्हे 1985 में बियाण्ड वार अवार्ड से सम्मानित किया गया।


बेनजीर भुट्टों ने अपनी आत्मकथा में दावा किया है की दक्षिण एशिया और शायद सारी दुनिया हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच रिश्तों का एक नया ही स्वरूप देखता अगर राजीव गाँधी जिंदा रह जाते। भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अपने कार्यकाल में साहसिक फैसलों से दुनिया को यह एहसास कराया था की भारत जितना विनम्र है,राष्ट्रीय हित और देश की सुरक्षा को लेकर उतना ही आक्रामक भी। इंदिराजी की हत्या के बाद जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने तो तो पड़ोसियों से मित्रता या शत्रुता को लेकर किसी भी देश के  प्रति किसी तरह का पूर्वाग्रह उनके मन में नहीं था।लेकिन आपनी माँ की हत्या और खालिस्तान के अनुभव से वह इतना जरुर समझ चुके थे की पड़ोसियों के साथ अनावश्यक नरम रुख को भारत की कमजोरी समझा जा सकता है। युवा राजीव के सामने अपने को भारत के राष्ट्रहित की रक्षा में समर्थ और देश में सर्वमान्य नेता के रूप में प्रस्तुत करने की चुनौती भी थी। यह वहीं दौर था जब चीन,पाकिस्तान,नेपाल,बांग्लादेश और श्रीलंका से हमारे सम्बन्ध बेहद असामन्य थे।

श्रीलंका में तमिलों पर अत्याचारों का अंतहीन सिलसिला चल रहा था और उसे वहां की सिंहली समर्थित सरकार का समर्थन प्राप्त था। ये तमिल भारत के दक्षिण राज्य तमिलनाडू में रहने वाले लोगों के रिश्तेदार थे।जाहिर है राजीव गाँधी के मन में श्रीलंका में रहने वाले तमिलों के वैधानिक अधिकारों को  लेकर बड़ी सहानुभूति थी ।

भारत की समझाईश के बाद भी जब श्रीलंकाई सरकार ने तमिलों के अधिकारों के प्रति गंभीरता नही दिखाई तो राजीव गाँधी ने भारत की साफ्ट नीति को बदल कर श्रीलंका को उन्हीं की भाषा में जवाब देना आरम्भ किया। जनवरी 1985 में  श्रीलंका की एक गश्ती नौका ने भारतीय जल सीमा में प्रवेश कर मछुआरों पर हमला किया जिसमे दो मछुआरे मारे गये ।भारतीय नौसेना ने श्रीलंका की एक सशस्त्र नौका दल को पकड़ लिया और उसके बाद राजीव गाँधी ने श्रीलंका को भारत की सामरिक ताकत का एहसास कराया ।

श्रीलंका में बसने वाले तमिल मूलतः भारतीय और हिन्दू धर्म को मानने वाले है, इन 20 लाख तमिलों में असुरक्षा,अविश्वास और आतंक की भावना विद्यमान थी।तमिलों की सुरक्षा के लिए तमिल आन्दोलन जोरों पर था वहीं फरवरी 1986 में श्रीलंका के राष्ट्र प्रमुख जयवर्धने ने एक साल के भीतर तमिल आन्दोलन को कुचलने की घोषणा कर दी ।इस दौरान पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आई. एस.आई,इस्राएल की मोसाद और अमेरिका की सी. आई. ए. की श्रीलंका में मौजूदगी के संकेत से दक्षिण की और भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ गयी। जाफना प्रायद्वीप में तमिलों की बदतर स्थिति पर गंभीर चिंता प्रकट करते हुए भारत ने श्रीलंका से तुरंत युद्द विराम करने और तमिलों को सहायता देने को कहा।जब श्रीलंका ने इसे अनसुना कर दिया तो  भारत ने श्रीलंका को चेतावनी देते हुए अपने विमानों से जाफना में घुसकर भोजन पैकेट गिराए। अपनी सीमा में भारतीय विमानों के घुसने से सदमे में आये श्रीलंका ने भारत को चेतावनी भी दी  । श्रीलंकाई सरकार की चेतावनी और विरोध को दरकिनार कर भारत ने उसे यह एहसास कराया की भारत अपनी और अपने नागरिकों की  सुरक्षा के लिए किसी भी देश में प्रवेश कर सकता है । भारत की इस कार्यवाही के कारण ही श्रीलंका सरकार ने भारत के समक्ष घुटने टेके और तमिलों पर सैनिक कार्यवाही उसे बंद करनी पड़ी। जवाहरलाल नेहरु की 1954 में चीन यात्रा के 34 वर्ष  बाद राजीव गाँधी ने 1988 में चीन की पांच  दिवसीय यात्रा कर भारत और चीन के बीच 1962 के युद्द से बड़ी कडुवाहट को दूर करते हुए नये संबंधों की शुरुआत की । दुनिया को दो बड़ी जनसँख्या वाले देशों के बीच लम्बे समय से चली आ रही कटुता को दूर करने का राजीव गाँधी का यह अनूठा प्रयास था जिसके जरिये पाकिस्तान और चीन के प्रगाढ़ सम्बन्धों को बेधने की कोशिश के तौर पर देखा गया।


आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान की प्रायोजित नीति ,इंदिरा गाँधी की हत्या,पंजाब के आतंकवाद में पाक की भूमिका और जिया उल हक की सैन्य तानाशाही से भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध रसातल में पहुँच गये थे और दोनों देशों के बीच सीमा पर तनाव चरम पर था।ऐसे समय में राजीव गाँधी ने आगे बढकर  दूरदर्शिता पूर्वक पड़ोसी से बेहतर सम्बन्धों को महत्व दिया। उनके इन्हीं प्रयासों की बदौलत  भारत और पाकिस्तान के बीच 10 जनवरी 1986 को पहली बार एक व्यापक व्यापारिक समझौता हुआ और इस प्रकार दोनों देशों के बीच एक नये व्यापारिक संबंधों की शुरुआत हुई                                                                       साथ ही दोनों देशो के बीच एक बार फिर सामाजिक और सांस्कृतिक सम्बन्ध परवान चढ़े। स्वतंत्र भारत के इतिहास में दूसरी बार कोई प्रधानमंत्री पाकिस्तान पहुंचा और उन्होंने पाकिस्तान से एक दुसरे के परमाणु संयंत्रो पर हमला नही करने का समझौता भी किया।                               बहरहाल मजबूत और आधुनिक भारत के लिए  राजीव गाँधी के प्रयासों को हमेशा याद किया जाता है,वे असल में राष्ट्र के राजीव थे।                                       


brahmadeep alune

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