बुधवार, 18 नवंबर 2020

इंदिरा मतलब शक्तिशाली भारत,indira bharat

 

नया इंडिया

                                            

                   

1965 में जब  इंदिरा गांधी को रोमन अकादमी द्वारा कुशल कूटनीतिज्ञ महिला होने का इजाबेला-द–एस्ते पुरस्कार से सम्मानित किया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसकी सराहना करते हुए यह स्वीकार किया था कि कूटनीतिक क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों से कही आगे है। लाल बहादुर शास्त्री की अकस्मात मृत्यु के बाद 24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने देश की तीसरी प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली और उसके बाद दुनिया में उन्होंने भारत कीसॉफ्ट पॉवर की छवि बदलकर अग्रगामी बना दिया। अमेरिका की पाकिस्तान परस्त नीति के जवाब में इंदिरा गांधी ने अपने राष्ट्रीय हितों को आगे कर गुटनिरपेक्षता को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। 1970 में भारत ने पूंजीवाद और साम्यवाद की कटुता को नजरअंदाज कर सोवियत संघ के साथ पांच वर्षीय व्यापार समझौता किया जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्रों में मजबूती मिल सके। उन्होंने साम्यवादी खेमे में जाने के वैश्विक आरोपों को झेलने का साहस दिखाते हुए हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए 1971 में सोवियत संघ के साथ शांति,मैत्री और सहयोग के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। उस समय यह समझौता भारतीय सुरक्षा और संप्रभुता के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इस संधि से यह सुनिश्चित किया गया था कि भारत के विरुद्द किसी आक्रमण की अवस्था में यह साम्यवादी देश भारत की सुरक्षा करेगा।यह राष्ट्रीय स्वाभिमान ही था कि इंदिरा गांधी ने अमेरिका के वियतनाम पर हमलों की कड़ी आलोचना करते हुए भारत में पांच स्थानों पर अमेरिकी सूचना केन्द्रों  को बंद करवा दिया। यहीं नहीं भारत ने उत्तर वियतनाम की राजधानी हनोई में भारतीय कार्यालय के दर्जे को ऊँचा करने की घोषणा कर महाशक्ति अमेरिका के दंभ को चुनौती देने से भी परहेज नहीं किया।

1971 में पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति वाहिनी को भरपूर समर्थन देकर महज चौदह दिनों तक युद्द करके पूर्वी पाकिस्तान का नामोनिशान मिटाने का कारनामा इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है और इसका श्रेय इस महान नेता की आक्रामकता और दूरदर्शिता को जाता है। कहते है भूगोल कभी बदला नहीं जा सकता,लेकिन इंदिरा गांधी ने अपने दृढ इरादों से दुश्मन देश के दो टुकड़े करके बांग्लादेश को स्थापित कर दिया। भारत को पूर्व और उत्तर से घेरने वाले पाकिस्तान को उत्तर तक सीमित करके भारत ने उस पर सदा के लिए निर्णायक बढ़त हासिल कर ली। पाकिस्तान को एक क्षेत्र से पूरी तरह काट देने से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के निर्धारण में मदद मिली और इसका लाभ भारत को राष्ट्रीय समृद्धि और विकास में लगातार मिल रहा है। जबकि पाकिस्तान का एक बड़ा उपजाऊ और खनिज संसाधनों से परिपूर्ण भाग उसके हाथ से छूट गया जिससे अब वह कंगाल होने की कगार पर पहुंच गया है।

चीन के प्रभाव को लेकर इंदिरा गांधी के मन में गहरी टीस थी। 1971 के युद्द में कूदने से पहले इंदिरा ने सोवियत रूस से प्रतिरक्षा का समझौता कर चीन पर नकेल कस दी। इसी कारण चीन और अमेरिका 1971 के युद्द में अपने पारम्परिक पारपरिक दोस्त पाकिस्तान की मदद करने में असहाय रहे। प्रतिरोधकता की अवधारणा को इंदिरा गांधी ने भारत के लिए बेहद जरूरी समझा और इसी का परिणाम आणविक शक्ति के रूप में सामने आया। 18 मई 1974 को प्रथम परमाणु विस्फोट कर भारत विश्व राजनीति का एक बड़ा ख़िलाड़ी बन गया। यह विस्फोट अंतर्राष्ट्रीय शक्ति संतुलन के लिए मिल का पत्थर साबित हुआ। भारत चीन संघर्ष से भारत को अपनी परम्परागत शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को त्यागने और आधुनिक अस्तित्व को बनाने की  प्रेरणा मिली। इंदिरा गांधी के सैन्यीकरण की नीति के कारण ही भारत आज दुनिया की अग्रणी सैन्य शक्तियों में शुमार है।

भारत की इस महान नेता ने अमेरिका,चीन और पाकिस्तान को एक और घाव दिया। दरअसल पूर्वी हिमालय में एक छोटा सा राज्य सिक्किम है।इस पर नामग्याल वंश का शासन हुआ करता था। इसके राजा चोग्याल की पत्नी होप अमेरिकी थी।चोग्याल की चीन,नेपाल,पाकिस्तान और अमेरिका से बड़ी नजदीकी थी। 1962 के भारत चीन युद्द से भारत को बहुत सीख मिली थी भारत के सामरिक विशेषज्ञों ने महसूस किया कि चीन की चुंबी घाटी के पास भारत की सिर्फ़ 21 मील की गर्दन है जिसे 'सिलीगुड़ी नेक'कहते हैं चुंबी घाटी के साथ ही लगा है सिक्किम भारत को लगता था कि चीन चाहें तो एक झटके में उस गर्दन को अलग कर उत्तरी भारत में घुस सकते हैं इस प्रकार सिक्किम को भारत में शामिल किए जाने की सोच 1962 में भारत चीन युद्ध के बाद शुरू हुई इंदिरा गांधी ने इस योजना को बहुत ही गोपनीयता और साहस से अंजाम दिया छह अप्रैल, 1975 की सुबह सिक्किम के चोग्याल को अपने राजमहल के गेट के बाहर भारतीय सैनिकों के ट्रकों की आवाज़ सुनाई दी वह दौड़ कर खिड़की के पास पहुंचे उनके राजमहल को चारों तरफ़ से भारतीय सैनिकों ने घेर रखा था5,000 भारतीय सैनिकों ने महज आधे घंटे में राजमहल के 243 गार्डों को काबू करके उस पर अधिकार जमा लिया भारत ने सिक्किम का आज़ाद देश का दर्जा ख़त्म  कर चोग्याल को उनके महल में ही नज़रबंद कर दिया गया जब सिक्किम के भारत में विलय की मुहिम शुरू हुई तो चीन ने इसकी तुलना 1968 में रूस के चेकोस्लोवाकिया पर किए गए आक्रमण से कीतब इंदिरा गांधी ने चीन को तिब्बत पर किए उसके आक्रमण की याद दिलाई दुनिया को दिखाने के लिए इंदिरा गाँधी ने वहां जनमत संग्रह करवा कर और चोग्याल की प्रासंगिकता समाप्त कर भारत में विलय को मोहर लगवा दी सिक्किम को भारत का 22वां राज्य बनाने का संविधान संशोधन विधेयक 23 अप्रैल, 1975 को लोकसभा में पेश किया गया उसी दिन इसे 299-11 के मत से पास कर दिया गया राज्यसभा में यह बिल 26 अप्रैल को पास हुआ और 15 मई, 1975 को राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने इस बिल पर हस्ताक्षर कर भारत की सीमाओं के विस्तार पर मोहर लगा दी

1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके इंदिरा गाँधी ने दुश्मन देश को जो घाव दिया था,वह उनके लिए नासूर बन गया थाजुल्फिकार अली भुट्टों को फांसी पर चढ़ाकर भी पाक हुक्मरानों की आग ठंडी नहीं हुई तो उन्होंने खालिस्तान के नाम पर सिख आतंकवाद को बढ़ावा देना प्रारंभ किया पाकिस्तान की यह चाल कामयाब रही और पंजाब आतंकवाद की आग में जलने लगा पाक की शह पर 1984 में सिक्ख चरमपंथी जरनैलसिंह और उसके समर्थकों ने सिक्खों के सबसे पवित्र स्थान अमृतसर स्थित विश्वप्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर पर कब्ज़ा कर भारतीय एकता,अखंडता और संप्रभुता को चुनौती दे डालीलेकिन इंदिरा गाँधी राष्ट्र हित के लिए किसी भी कदम को उठाने से कभी पीछे हटती नहीं थी उन्होनें स्वर्ण मंदिर से आतंकियों को खदेड़ कर पाकिस्तान समेत पूरी दुनिया को यह सन्देश दिया की भारत की एकता और अखंडता को तोड़ने की किसी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा

 

मंगलवार, 10 नवंबर 2020

बिना कैडर खाली हाथ है कांग्रेस, khali hath congress

 

दबंग दुनिया

                                                                      

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने बिहार के विधानसभा चुनावों में महागठबंधन से अपने लिए 70 सीटें चुनाव लड़ने के लिए तो ले ली लेकिन योग्य उम्मीदवार कहां से लाये,इस प्रश्न पर पार्टी हांफने लगी और नतीजा सामने हैकांग्रेस अक्सर विचारधारा को आगे करके जनता के बीच जाने की बात कहती है लेकिन जिस भी राज्य में कांग्रेस से मिलती जुलती विचारधारा किसी दूसरे दल की होती है,कांग्रेस का वोट उस पार्टी में ट्रांसफर हो जाता हैबंगाल में तृणमूल के आते ही कांग्रेस जमीदोंज हो गईदिल्ली में आप  ने कांग्रेस का पत्ता साफ कर दिया महाराष्ट्र में पार्टी अंतिम पायदान पर हैबिहार में सितारा बुलंद होने की कोई संभावना ही नहीं नजर आतीउत्तर प्रदेश में अमेठी का किला ढह चूका है और उसके डेमेज कंट्रोल की कोई कोशिश नहीं की जा रही है रायबरेली का किला ढहने की कगार पर है और अगले लोकसभा चुनावों में उसे बचा लेना आसान नहीं होगा



मध्यप्रदेश की सत्ता पर शिवराज का कायम रहना महज इत्तेफाक नही है,इसे झुठलाने की कोशिशें वास्तव में वे ख्याली पुलाव थे जिसका स्वाद महसूस तो किया जा सकता है लेकिन उससे पेट नहीं भरा जा सकता था 2018 में कांग्रेस को मिली संयोग की सत्ता को अवसर में न बदलने की शीर्ष नेताओं की गलती को बिकाऊ और टिकाऊ के बूते झुठलाने की लगातार कोशिशें पार्टी के ताबूत में अंतिम कील ठोकने जैसी होगी दरअसल 2018 के कमलनाथ केबिनेट को देखकर यह लगता था की यह किसी नामचीन कॉलेज के विद्यार्थियों का वह समूह है जिसे बिना अनुभव के लोकतंत्र के रण में झोंक दिया गया हैकेबिनेट में युवा चेहरों ओर उन्हें दिए जाने वाले विभाग भी दिलचस्प थेजो किसानों के बीच बढ़िया काम कर सकते थे उन्हें शिक्षा का सारथी बना दिया गया जिन्हें अपने संस्थानों की शहर में विकास करने से फुर्सत नहीं मिलती थी,उन्हें ग्रामीण विकास सौंप दिया गयामरहूम पिताजी किसानों के नेता थे सो बेटा किसानों का मंत्री बना दिया गयाकंसाना,गुर्जर और दत्तीगांव जैसे वरिष्ठ नेता दशकों से जीतते आ रहे थे,उन्हें दरकिनार कर नये नवेलों को मंत्री पद से नवाज दिया गयाइन सबके बाद अपने कुनबे को सम्हालने के लिए जो कौशल चाहिए था,उसे कौन दिखाए,यह भी यक्ष प्रश्न सामने थेजमीन पर संगठन कैसे खड़ा हो,इसकी परवाह किसी को नहीं थी,आखिर सत्ता की मलाई का रस्वादन जो करना था। ऐसी स्थिति में सरकार तो बनी लेकिन रेत के महल के समान,और अंतत: रेत का महल 15 महीने में ही भरभरा कर ढह गया।



वास्तव में बिना तैयारी के जो मैदान में उतरते है उनका वीर गति को प्राप्त होना निश्चित हैयह भी समझना होगा की कांग्रेस का सामना भाजपा से है जो  कैडर  से चलने वाली पार्टी हैजब तक मैदान में कोई मजबूत खिलाडी नहीं था,कांग्रेस मैदान मार लिया करती थी,लेकिन अब कैडर के मजबूत खिलाडी के सामने आते ही हाथ पैर फूल जाते है

अब आप इवीएम को दोष दे या सिस्टम को कोसे लेकिन सच तो यह है की आपका झंडा उठाने वाले कितने है उनकी गिनती भी कर लीजिये चुनाव के समय भीड़ इकट्ठा होने को अपनी जीत का प्रमाण मान लेना ठीक वैसा ही है जैसे भरी दुपहरी में दूर चमकते हुई वेगों को पानी समझ लेनाचुनाव जीतने का कौशल और कला अपने विरोधी दल भाजपा से ही सीख लीजिये,कम से कम अपने कार्यकर्ताओं से एक महीने में एक बार ही बात तो कर लीजियेकभी जाकर समाज के बीच ही बैठ जाइये,अपने  बेशकीमती सफेद कपड़ों से पिंड छुडाइयेरही बात विचारधारा की तो उसके लिए ऐसे नेता भी चाहिए जिनमे ज्ञान पिपासा और सीखने का संयम होइस दौर के कांग्रेस नेताओं से नेहरु इंदिरा पर बोलने के लिए 30 मिनट का समय दीजिये,यकीन मानिये वे बगले झांकने लगेगे जब आपके पास वैचारिक फौज ही नहीं है ओर न ही उसका नेतृत्व करने वाला सेनापति,फिर आप कैसे युद्द जीतने की कल्पना कर सकते हो

2018 का चुनाव कांग्रेस अपनी मेहनत या काबिलियत से बिलकुल नहीं जीती थी बल्कि चम्बल में माई का लाल और किसानों का कमाल थाभाजपा का मतदाता दिल्ली की और भी देखता है,मामा पर भी उसकी नजर होती है,परम्पराओं से लेकर मान्यताओं तक में उन्हें कमल नजर आता हैभाजपा का यह प्रभाव ही है कि घर में माँ बहने ओर बुजुर्ग भी कहते है की मोदी जी के सामने किसे वोट देयकीनन नरेंद्र मोदी इस देश का इतना बड़ा व्यक्तित्व बन चुके है कि उनके सामने कोई राजनीतिक नेतृत्व नजर ही नहीं आताराजनीति के मैदान में जब तक दूसरा मजबूत दावेदार नहीं होगा तब तक किसी की नैया पार कैसे हो सकती है न तो शीर्ष पर काम करने वाले लोकप्रिय नेता है  और न ही जमीन पर काम करने वाले लोगों को तैयार करने की कांग्रेस की कोई योजना



महज ट्विटर,फेसबूक और सोशल मीडिया से लोकप्रियता का आंकलन राजनीति में नहीं हो सकता आखिर जनता जनार्दन भी तो मन बहला लेती है बिहार में भाजपा के साथ लेफ्ट का भी वोट प्रतिशत बढ़ा है यह दोनों कैडर से चलने वाली पार्टियां है कांग्रेस को लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करने का नारा देने कि कोई जरूरत नहीं है और न ही जनता को वह ऐसा करके प्रभावित कर सकती हैकांग्रेस को जरूरत है अपना अस्तित्व बचाने के लिए कैडर तैयार करने की,अफ़सोस इस दिशा में उसका कोई प्रयास अब तक नजर नहीं आ रहा है फ़िलहाल यह समय कांग्रेस को भाजपा की विराट विजय पर बधाई देने का है और चुनाव प्रबंधन सीखने का है

 

सोमवार, 9 नवंबर 2020

बाइडन के साथ बदलेगी दुनिया,baiden, amerika duniya

 

जनसत्ता

                      

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अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक चिकन गेम मॉडल होता है इस गेम में खिलाड़ी का उद्देश्य अपने हितों को अधिकतम करना होता है,वह इस बात की परवाह नही करता की इससे दूसरे को कितना लाभ हो। दरअसल महाशक्ति अमेरिका की नीतियों में यह मॉडल सदैव प्रतिबिंबित होता है। यह एक ऐसा राष्ट्र है जहां की नीतियां वहां की राजनीतिक पार्टियां या राष्ट्रपति तय नहीं करते बल्कि तय वही होता है जो अमेरिकी हित में हो,चाहे सत्ता में कोई भी रहे।

डोनाल्ड ट्रंप को शिकस्त देने के साथ ही जो बाइडन की अगुवाई में अमेरिका को आगे का सफर तय करना है और इसके वैश्विक स्तर पर पड़ने वाले असर को लेकर संभावनाएं और आशंकाएं तलाशी जा रही है। ट्रंप को अन्य अमेरिकन राष्ट्रपतियों के मुक़ाबले अपेक्षाकृत असंतुलित और अनियंत्रित माना गया लेकिन इन सबके बाद भी अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को लेकर वे अग्रगामी नीति अपनाते रहे। जो बाइडन के लिए आंतरिक और बाह्य चुनौतियां सामने है और उनकी नीतियों पर परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक ट्रूमैन,बिल क्लिंट्न और बराक ओबामा का असर दिख सकता है। लेकिन इसके साथ ही यह याद रखना आवश्यक है की सामरिक नीति,आर्थिक नीति, अप्रवासन कानून,वित्तीय मामले और वैदेशिक नीति में अमेरिका के लिए उसके व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं। अमेरिका में किसी भी पार्टी की सत्ता रहे वे उसी रास्ते पर चलते हैं जिससे अमेरिका की सुरक्षा हो एवं उसकी प्रगति सुनिश्चित रहे।

द्वितीय विश्व युद्द के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डेमोक्रेटिक ट्रूमैन बने और उनकी नीतियों का प्रभाव इसके बाद लगातार अमेरिकी विदेश नीति पर प्रतिबिंबित होता रहा है। ट्रूमैन का साफ मत था की साम्यवादी प्रसार को अवरुद्द किया जाना चाहिए। इसके साथ ही रूस को लेकर उनकी यह स्पष्ट सोच रही की मास्को शांति की नीति को दुर्बलता समझता है,अत: उसके विरुद्द दृढ़ता की नीति ही अपनाई जानी चाहिए। जो बाइडन रूस को लेकर मुखर हो सकते है और इससे चीन भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। पिछले कुछ वर्षों में चीन और रूस के संबंध मजबूत हुए है और उनकी एक दूसरे पर निर्भरता भी बढ़ी है। आने वाले समय में रूस के आसपास के देशों में  नाटो का प्रभाव अमेरिका बढ़ा सकता है और यह चीन को मंजूर नहीं होगा। ट्रंप व्यापार को लेकर उत्सुक रहते थे वहीं  बाइडन की प्राथमिकताओं में सामरिक सहयोग हो सकता है और अमेरिका की यह नीति भारत के लिए मुफीद हो सकती है।

बाइडन के पहले डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति बराक ओबामा की एशिया-प्रशांत केंद्रित नीति के केंद्र में भारत रहा,अत: पूरी संभावना है की आने वाले समय में भी चीन और पाकिस्तान की तुलना में अमेरिका के द्वारा भारत को प्राथमिकता दी जाती रहेगी।  सामरिक और रणनीतिक रूप से क्वाड को लेकर भारत,जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिकी सहयोग जारी रहेगा। डेमोक्रेटिक मानव अधिकारों जैसे मुद्दों पर मुखर रहे है, बाइडन वीगर मुसलमानों की स्थिति को लेकर चीन की आलोचना कर सकते है। ऐसा बाइडन पहले भी कर चुके है अत: आने वाले समय में अमेरिकी चीन सम्बन्धों पर आशंकाएं बनी रह सकती है। इसका असर कोरिया प्रायद्वीप पर भी पड़ सकता है। उत्तर कोरिया चीन का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है। चीन उत्तर कोरिया को न केवल रोजमर्रा की जरूरतों का सामान मुहैय्या कराता हैं बल्कि उसे परमाणु ईंधन और हथियार बनाने के लिए धन, साधन और तकनीक भी देता हैं डोनाल्ड ट्रंप और किम जोंग की मुलाकातों से कुछ हासिल न हो सका, जबकि  बाइडेन उत्तर कोरिया पर और भी कड़े प्रतिबंध लगा सकते है।

सैनिक अड्डों की संख्या कम करने को लेकर बिल क्लिंट्न ने तत्परता दिखाई थी। बाइडन की अफगान और पाकिस्तान नीति बेहद दिलचस्प होने की संभावना है। ट्रंप ने अफगाननिस्तान में शांति बहाली को लेकर पाकिस्तान पर भरोसा नहीं दिखाया और वे पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता रोकने के पक्षधर रहे,वहीं बाइडन की वैश्विक मामलों में बेहतर समझ रही है। 2008 में जो बाइडन को पाकिस्तान के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान हिलाल-ए-पाकिस्तान से नवाज़ा गया थाबाइडन को यह सम्मान पाकिस्तान को अमेरिका से डेढ़ अरब डॉलर की आर्थिक मदद दिलवाने में अहम भूमिका निभाने के कारण दिया गया था। हो सकता है बाइडन पाकिस्तान को लेकर थोड़ा नर्म रुख अपनाएं,ऐसा होने पर तालिबान से बातचीत की राह खुल सकती है।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण मान्यता है। जिसके अनुसार राष्ट्रों के महत्वपूर्ण हितों को या तो खतरा उत्पन्न होता है या उनके लिए संकट की सम्भावना हमेशा बनी रहती है। यदि ऐसा न होता तो राष्ट्रों को उनकी रक्षा के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती। महाशक्तियों के हित और शक्ति संतुलन के बीच तेल संपदा का भी एक महत्वपूर्ण द्वंद है जो शह और मात के खेल को पश्चिम एशिया तक खींच लाता है। मध्य पूर्व में अपने हितों को लेकर अमेरिकी सतर्क रहे है,डेमोक्रेटिक ओबामा ने 2015 में अपने सहयोगियों के साथ ईरान से एक परमाणु समझौता किया था। जिसके तहत 2016 में अमरीका और अन्य पांच देशों से ईरान को तेल बेचने और उसके केंद्रीय बैंक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबार की अनुमति मिली थीअमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के इस समझौते  को ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने की कोशिशों के तौर पर देखा गया था

बाद में ट्रंप सरकार ने इस समझौते को बेकार बताकर अपने कदम वापस खींच लिए और इस इलाके में शांति की कोशिशों को भी धराशाई कर दिया था अमरीकी प्रशासन ने तो यह कहने से भी गुरेज नहीं किया कि उनका देश ईरान पर अभूतपूर्व वित्तीय दवाब डालना चाहता है  ट्रंप प्रशासन की ईरान को दबाने की कोशिशे दुनिया के अन्य देशों को बिलकुल रास नहीं आ आई थी दुनिया भर में परमाणु कार्यक्रमों पर नज़र रखने वाली संस्था इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के अनुसार ईरान 2015 के समझौते का पालन कर रहा था,ऐसे में ट्रंप के ईरान पर परमाणु जखीरे बनाने का आरोप पूरी तरह निराधार बताएं थे यूरोपियन यूनियन और ट्रंप के बीच व्यापारिक मतभेद जगजाहिर  रहे है,अमेरिका में ट्रंप के आने के बाद उनकी आर्थिक नीतियों से यूरोप के देश नाराज रहे ब्रिटेन,जर्मनी और फ्रांस जैसे देश ईरान से हुए  समझौते  का पालन करने के पक्षधर रहे है अब बाइडन ईरान से संतुलित सम्बन्धों की पुन: बहाली कर सकते है। बीते कुछ समय में ईरान और चीन सहयोग बढ़ा है,जबकि ईरान को साम्यवाद से दूर रखने की अमेरिका की पुरानी नीति रही है। बाइडेन को न केवल ईरान का विश्वास जितना होगा बल्कि यह कोशिश भी करना होगी की मध्य पूर्व में रूस और चीन के प्रभाव को संतुलित किया जाएं। मध्य पूर्व का भौगोलिक क्षेत्र तीन महाद्वीपों का संगम क्षेत्र है अमेरिका की मध्य पूर्व को लेकर व्यापक नीति रही है और इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।

अपने चुनाव प्रचार के दौरान बाइडन ने मुसलमानों के साथ बेहतर बर्ताव और ट्रंप प्रशासन के प्रवासी विरोधी नीतियों पर दोबारा विचार करने का वादा किया था। लेकिन यूरोप में इस्लामिक चरमपंथियों के बढ़ते हमलों का असर बाइडन की भावी योजनाओं को भी प्रभावित कर सकता है। माना जाता है की अमेरिकी पश्चिम की और मुंह करके जन्म लेते है,इस धारणा का मुख्य कारण यह है की अमेरिकी यूरोप की समस्या को खुद की समस्या समझ लेते है और यूरोप के किसी भी घटनाक्रम को लेकर उनकी बैचेनी बढ़ जाती है। ब्रिटेन  के यूरोपीय यूनियन से अलग होने का एक प्रमुख कारण अप्रवासन की समस्या रही। फ्रांस में बढ़ती इस्लामिक कट्टरता से अमेरिका आंखें नहीं मूँद सकता। इन समस्याओं को लेकर बाइडन इसलिए भी सतर्क रहेंगे,क्योंकि उन्हें अपने देश में भी दक्षिणपंथी ताकतों का व्यापक विरोध झेलना पड़ सकता है।

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में यह देखने में आया की वे रूस के पुतिन जैसे दुनिया के सत्तावादी नेताओं की प्रशंसा करते रहे,ट्रंप के आलोचकों ने तो उन्हें तानाशाही का समर्थक भी कह डाला। जबकि अमेरिकी जनतंत्र में इतना भरोसा करते है कि प्रथम विश्व युद्द उन्होने जनतंत्र कि रक्षा के नाम पर ही लड़ा था। द्वितीय महायुद्द के समय डेमोक्रेटिक रूज़वेल्ट ने अमेरिका का उद्देश्य हिटलर कि तानाशाही को नष्ट करना तथा संसार में अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतन्त्रता तथा अभाव  और भय से स्वतन्त्रता बताया था। बाइडन दुनिया में लोकतंत्र की मजबूती को लेकर प्रतिबद्धता दिखा सकते है। बिल क्लिंट्न ने संयुक्त राष्ट्र के पुनर्गठन का समर्थन किया था और इसे लेकर बाइडन भी सकारात्मक रुख अपनाएंगे,यह उम्मीद की जा सकती है। ऐसे में आने वाले समय में जापान,जर्मनी,ब्राज़ील और भारत जैसे देश सुरक्षा परिषद में पूर्ण सदस्यता के लिए अपनी कोशिशें बढ़ा सकते है।

पिछले दो दशकों से यह देखा गया है कि अमेरिका भारत के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देता है लेकिन सीएए,आर्टिकल 370 जैसे मसलों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के लेफ्ट मेंबर्स और ख़ासतौर पर कमला हैरिस ने काफ़ी आपत्ति जताई थीहालांकि इसका प्रभाव भारत अमेरिकी सम्बन्धों को प्रभावित करें,इसकी संभावना कम ही है। साल 2000  में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी एवं तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 21 वी शताब्दी के लिए भारत अमेरिकी सम्बन्धों पर एक संयुक्त दस्तावेज जारी किया था, जिसमें आने वाले समय में भारत अमेरिकी संबंधों को एक नई दिशा मिलने के संकेत दिए गए थे।

इस नीति को शीत युद्द के समय की अमेरिकी नीति से अलग नई शुरुआत माना गया था। शीत युद्द में अमेरिका पाकिस्तान को एक महत्वपूर्ण सहयोगी देश मानता था और पाकिस्तान को अरबों डॉलर की आर्थिक और सामरिक मदद देता रहा था। वर्तमान में जब भारत अमेरिकी संबंध सबसे बेहतर दौर में माने जा रहे हैं,अमेरिका में बसे लगभग 20 लाख भारतीय इंजीनियर,डॉक्टर और वैज्ञानिक होकर अमेरिका को मजबूत कर रहे हैं। दबाव समूह के रूप में काकस ऑन इंडिया एंड इंडियन अमेरिकन्स निचले सदन का सबसे बड़ा दबाव समूह है। ऐसे में आशा यह की जाती है कि अमेरिकी कूटनीति संतुलन की कूटनीति से ऊपर उठकर अपने दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन जारी रखेगी और बाइडन के काल में भी भारत अमेरिका संबंध मजबूत बने रहेंगे।

बहरहाल वैश्विक संदर्भ में बाइडन के सामने यूरोप की मजबूती,चीन,मध्य पूर्व,अफगानिस्तान,पाकिस्तान,आतंकवाद और अप्रवासन जैसे मुद्दे होंगे। वही अमेरिका में 1930 के बाद सबसे बड़ा आर्थिक संकट और 1960 के बाद सबसे बड़े नस्लवाद के मुद्दे पर अशांति खत्म करने की चुनौती। बाइडन को बेहद सतर्क रहकर आगे बढ़ना होगा।

सोमवार, 2 नवंबर 2020

इंडो पैसिफिक पर भारत अमेरिका गठजोड़,indo amerika

 

राष्ट्रीय सहारा

                         इंडो पैसिफिक पर भारत अमेरिका गठजोड़


http://www.rashtriyasahara.com/imageview_27384_169324114_4_3_03-11-2020_8_i_1_sf.html

संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए तय किए गए निश्चित मापदण्डों और नियमों के उलट चीन की सामरिक नीति इस सिद्धान्त पर आधारित है कि, शक्ति को सीमाओं में बांधकर हासिल नहीं किया जा सकता,यह राजनीति,नैतिकता और अन्तर्राष्ट्रीय विधि से नियंत्रित नहीं होती। चीन का वैश्विक व्यवहार असंतुलित और आक्रमणकारी माना जाता है और इसी कारण अमेरिका और भारत जैसे देश लामबंद होकर चीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए कृतसंकल्पित नजर आ रहे है।



हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू की बातचीत के मुद्दों से यह साफ हो गया कि अन्तर्राष्ट्रीय   स्तर   पर   चीन को रोकने के लिए सामूहिक   सुरक्षा  की नीति पर काम किया जाएगा और इसके केंद्र में इंडो पैसिफिक रीजन होगा। दरअसल इंडो पैसिफिक का समूचा क्षेत्र आर्थिक और भू सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और चीन इस क्षेत्र को लगातार घेर रहा है। ऐसे में विश्व राजनीति में अपना प्रभुत्व बनाएं रखने के लिए इस क्षेत्र की सुरक्षा बेहद जरूरी है। भारत अमेरिका ने बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट के जरिए चीन को यह संदेश दिया है कि,इस क्षेत्र में उसको नियंत्रित करने के लिए भारत और अमेरिका साझा और ठोस प्रयास  करेंगे। जिसमें एक दूसरे से संवेदनशील सूचनाओं को साझा करना,रक्षा संबंध मजबूत  करना,पड़ोसी देशों व तीसरी दुनिया के देशों में संभावित क्षमता निर्माण और अन्य संयुक्त सहयोग गतिविधियों का पता लगाना, अन्तर्राष्ट्रीय सागर में नेविगेशन के कानून और आजादी के नियम की इज्जत करने वाले नियम आधारित अन्तर्राष्ट्रीय आदेश कायम रखना और सभी राज्यों में क्षेत्रीय अखंडता व संप्रभुता बनाए रखना जरूरी है। यूएस स्टेट सेक्रेटरी माइक पॉम्पियो ने इस मौके पर खसतौर से चीन की कड़ी आलोचना करते हुए चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से पैदा किए गए चुनौतियों का जिक्र करते हुए उसे लोकतंत्र और अन्तर्राष्ट्रीय क़ानूनों के लिए समस्यापूर्ण बताया।


वास्तव में चीन की नीतियों में पारम्परिक रूप से मिडिल किंगडम की भावना विद्यमान रही है। प्राचीन समय में चीन निवासी अपने आप को विश्व के केन्द्र के रूप में होने का दावा करते थे इसके तीन मौलिक तत्व अब भी चीन की विदेश नीति में पाये जाते हैं। पहला चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि चीन को कोई देश न मानकर विश्व ही माना जाए। दूसरा चीन बहुत उदार है और जो उसकी नीतियों के अंतर्गत चलता है उस पर चीन कृपा रखता है और तीसरा तत्व यह है कि चीन कभी भी बाहरी प्रभाव से प्रभावित नहीं होता है। प्राचीन काल से चली आ रही इस परम्परा को चीन ने जीवित रखा है। वह अंतर्राष्‍ट्रीय न्‍यायालय के फैसलों को दरकिनार कर देता है और संयुक्तराष्ट्र के नियमों के उलट व्यवहार करता है।

भारत और अमेरिका के बीच टू प्लस टू की बातचीत पर चीन ने कड़ी प्रतिक्रिया दी लेकिन इससे यह भी साफ हुआ की चीन को रोकने के लिए लगातार कूटनीतिक और सामूहिक सुरक्षा के कदम उठाने होंगे। कूटनीति को राष्ट्रीय हित,राष्ट्रीय शक्ति और विदेश नीति के साथ ही साथ राष्ट्रों के मध्य शक्ति प्राप्ति के चल रहे संघर्षों में शक्ति प्रबन्धन और समायोजन द्वारा अंतर्राष्ट्रीय शांति को बनाये रखने का एक महत्वपूर्ण साधन बताया जाता हैकूटनीति अपने राष्ट्र के राष्ट्रीय हित के बीच प्रतिकूलता को कम करने और अनुकूलनता को स्थापित करने का एक शांतिपूर्ण साधन भी माना जाता है

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद चरम पर है और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों की सेनाएं आमने सामने है। राष्ट्रीय हित में बड़े कदम उठाते हुए चीन पर दबाव डालने के लिए भारत को अमेरिका की सामरिक और आर्थिक मदद की जरूरत है और अमेरिका ने चीन के खिलाफ भारत से सहयोग बढ़ाने के संकेत भी दिए है। चीन पाक के ग्वादर बंदरगाह,मालद्वीप के मराय,श्रीलंका हब्बन टोटा, म्यानमार के सीट-वे और बंग्लादेश के चटगांव बंदरगाह पर कब्जा कर हिंद प्रशांत महासागर की शांति और सुरक्षा को लगातार प्रभावित कर रहा है। प्रशांत महासागर दुनिया के एक तिहाई भू भाग पर फैला हुआ है,इसके प्रमुख द्वीप समूहों में जापान,इंडोनेशिया,मेलानेशिया,ताइवान,हैनान,मकाओं और हांगकांग है। इसके सीमांत सागर में जापान सागर,पीला सागर,दक्षिण चीन सागर शामिल है। वहीं हिंद महासागर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा महासागर है,यह उत्तर में एशिया,पशिम में अफ्रीका और पूर्व में ऑस्ट्रेलिया से घिरा हुआ है। हिंद महासागर के द्वारा विश्व के तेल और गैस का व्यापार होता है।

1980 के दशक के अंत में चीनी नौसेना के एक अधिकारी ल्यू हुआ किंग ने समुद्री इलाक़े पर चीनी प्रभुत्व बढ़ाने की एक रणनीति बनाई थी,जिसमें अपने जल क्षेत्र से बाहर काम करने में सक्षम पनडुब्बी बनाना,हिन्द महासागर में उसका संचालन करना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीनी धाक जमाना था,इसलिए इस योजना को अमल में  लाने के लिए चीन ने अपने रक्षा बजट में भी बेहताशा बढ़ोत्तरी की। हिन्द महासागर में चीन ने परमाणु शक्ति चालित हमलावर पनडुब्बी एसएनएन की तैनाती कर भारत की सामरिक घेराबंदी का संकेत साल 2013 में ही दे दिया था,यहीं नहीं उसने बेहद शातिराना ढंग से समुद्री डकैतों को रोकने के नाम पर साल 2008 से ही अदन की खाड़ी में अपने व्यापारिक जहाजों और नाविकों की सुरक्षा के लिए युद्धपोत तैनात कर दिए थे। भारत अदन की खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य के बीच पूरे क्षेत्र को अपने प्रभाव का हिस्सा मानता है,यह इलाका भारत के समुद्री व्यापार के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। देश की 80 फ़ीसदी ऊर्जा आपूर्ति यानि रोजाना करीब 38.6 लाख कच्चा बैरल तेल इसी इलाके से गुजरता है,इसलिये भारत के व्यापारिक और सामरिक हितों के लिए ये समुद्री क्षेत्र बहुत ही संवेदनशील है। दूसरी और हमारे रक्षा प्रतिष्ठान यह स्वीकार करते है की चीन को रोकने की भारत के पास अभी सामरिक क्षमता नहीं है,और यहीं कारण है की भारत ने अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया से मिलकर मालाबार युद्धाभ्यास की शुरुआत की और इसमें अपने सबसे उन्नत जंगी जहाजों को लगाया।



29 सितम्बर 2015 को अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सम्मेलन  के दौरान न्यूयार्क में पहली बार भारत और जापान के विदेश मंत्रियों के साथ त्रिपक्षीय वार्ता का आयोजन किया था। माना जाता है की उस बैठक से यह तय किया गया था की चीन के समुद्री प्रभुत्व को रोकने के लिए कड़े कदम उठाये जाने के संकेत दिये थे और इसके परिणाम ही भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता सामरिक सहयोग है।

अमेरिकी विदेश नीति में एशिया प्रशांत क्षेत्र को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है,चीन के उभार को रोकने के लिए कूटनीति और सामरिक रूप से अमेरिका एशिया के कई इलाकों में अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ा रहा है ओबामा काल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया था ओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को जोड़ने की नीति पर भी काम किया जो चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान है इन देशों में भारत समेत इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओस और वियतनाम जैसे देश शामिल है इनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है कजाकिस्तान,कम्बोडिया और दक्षिण कोरिया की सम्प्रभुता को चुनौती  देते हुए चीन इन्हें ऐतिहासिक रूप से अपना बताता है,नेपाल और भारत के कई इलाकों पर तथा दक्षिण चीनी समुद्र पर भी चीन का इसी प्रकार का दावा हैभारत,ऑस्ट्रेलिया,जापान और अमेरिका लगातार एशिया प्रशांत के समुद्र में अपनी शक्ति बढ़ा रहे है,अमेरिका के नेतृत्व में दि क्वाड्रिलैटरल सिक्युरिटी डायलॉग या क्वॉड की रणनीति पर काम किया जा रहा है


जाहिर है चीन की ओर से आक्रामक और अस्थिरता वाली गतिविधियां रोकने के लिए सभी देशों को मिलकर साझा प्रयास करने होंगे,वहीं चीन से सीमाई विवादों में उलझे देश यह समझ गये है कि द्विपक्षीय सम्बन्धों और वार्ताओं से चीन को नियंत्रित नहीं किया जा सकता। वैश्विक शक्तियों के साथ सामूहिक सुरक्षा की नीति पर चलकर और चीन की सामरिक  घेराबंदी करने  से ही चीन की विस्तारवादी नीति को रोका जा सकता है भारत अमेरिका के मजबूत होते सम्बन्ध चीन पर दबाव बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखे जाने चाहिए। 

brahmadeep alune

aakashwani sanvidhan koumi ekta Aajkal- 23rd November