डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

 सांध्य प्रकाश

#डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश


                     

                                                                         

डॉ.आम्बेडकर से जब यह पूछा गया की क्या भारत में लोकतंत्र सफल होगा,तो उनका जवाब था की यह नाम मात्र का होगा। #डॉ.आंबेडकर ने देश के पहले आम चुनावों के बाद ही यह सवाल उठा दिया था कि क्या आपने लोगों को मनपसन्द उम्मीदवार चुनने की आज़ादी दी है। राजनीतिक पार्टी के उम्मीदवार पर क्या जनता सोच पाती है? फिर भले ही वह गधा ही क्यों न हो। ये सिस्टम असमानता पर आधारित है। साथ ही डॉ.आंबेडकर ने यह दावा भी किया था कि वर्तमान व्यवस्था ढह जाएगी।


 

दरअसल #लोकतंत्र में स्वतंत्रता और समानता दोनों की व्यवस्था सुनिश्चित करना ज़रुरी है। भारत के लोकतंत्र के कथित पहरुओं पर एक सख्त टिप्पणी लखनऊ खंडपीठ ने की। इस साल जुलाई में बसपा सांसद #अतुल राय की ज़मानत अर्ज़ी ख़ारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा था कि यह संसद की सामूहिक ज़िम्मेदारी है कि अपराधिक छवि वाले लोगों को राजनीति में आने से रोके और लोकतंत्र बचाएंचूंकि संसद और निर्वाचन आयोग ज़रूरी क़दम नहीं उठा रहे हैं,इसलिए देश का लोकतंत्र अपराधियों,ठगों और क़ानून तोड़ने वालों के हाथों में जा रहा है अदालत ने हर चुनाव के बाद जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में अकूत इजाफा होने पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले बाहुबली और अपराधी चुनाव लड़ने वाले प्रत्‍याशियों को समर्थन देते थे लेकिन अब तो वे स्वयं राजनीति में आते हैं और पार्टियां उनको बेझिझक टिकट भी देती हैंअदालत ने कहा कि यह तो और भी आश्चर्यजनक है कि जनता ऐसे लोगों को चुन भी लेती है। यहां पर डॉ.आंबेडकर की इस आशंका की पुष्टि होती है कि लोगों को उम्मीदवार चुनने की आज़ादी नहीं है और वह बिना सोचे किसी पर भी मुहर लगा देती है। डॉ.आंबेडकर और अदालत की चिंता की पुष्टि यह आंकड़े करते है। 2004 की लोकसभा में चुने गए 24फीसदी,2009 में 30 फीसदी,2014 में 34 फीसदी तथा 2019 की लोकसभा में 43 फीसदी सदस्य आपराधिक छवि वाले हैं

 


संसद का प्रमुख कार्य होता है,कानून बनाना। लेकिन आंकड़ों से यह साफ होता है कि इस समय कानून बनाने वाले सबसे बड़े सदन में लगभग आधे से थोड़े ही कम लोग अपराधिक छवि के है। डॉ आम्बेडकर लोकतंत्र के विरोधी नहीं थे लेकिन उनका अंदेशा यह था कि लोकतंत्र चलाने वालों में सामन्तवाद हावी नहीं हो जाये। दरअसल सामन्तवाद के साये से ही भारत का लोकतंत्र अभिशिप्त हो रहा है। लोकतंत्र को मजबूत करने की अपेक्षा सांसदों से इसलिए नहीं की जा सकती क्योंकि सबसे ज्यादा असमानता को बढ़ावा देने वाले ये जनप्रतिनिधि ही है। इस समय आम आदमी के मुकाबले 1400 गुना रुपया आपके सांसद की जेब में है। डाटा इंटेलिजेंस यूनिट की एक खास रपट के मुताबिक 2019 में चुने गए सांसदों की औसत आय आम जनता की औसत आय से करीब 1400 गुना ज़्यादा है याने हर वो रुपया जो आपकी जेब में है,उसके लिए आपके सांसद की जेब में 1400 रुपए हैं 13 राज्य थे जहां सांसदों की संपत्ति राज्य की प्रति व्यक्ति आय से 100-1000 गुना के बीच थी15 राज्य ऐसे थे जहां नेताओं की आय राज्य की प्रति व्यक्ति आय से 1000 गुना से भी ज़्यादा थी। यह भी बेहद दिलचस्प है कि भारत के सबसे बड़े अमीर किसे और कितना चंदा देते है,पता नहीं चलता तथा इसमें पारदर्शिता की कमी समस्या को बढ़ा रही है

 


चंदा लेने से जुड़े नियमों के तहत राजनीतिक दलों को 20 हजार से ज़्यादा चंदा देने वाले दानकर्ताओं के नाम सार्वजनिक करना होता है सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट नाम की एक कंपनी ने बीजेपी को अकेले 251 करोड़ रुपये चंदे के तौर पर दिए ये बीजेपी को मिलने वाले कुल चंदे का 47 फीसदी हैइसी कंपनी ने  14 करोड़ रुपये कांग्रेस को भी दिए हैं सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट का नाम शायद पहले नहीं सुना होगा ये एक कंपनी है जो कॉरपोरेट दुनिया से पैसा लेकर राजनीतिक दलों को चंदा देती है। यदि राजनीतिक तौर पर जनकल्याण की बात कहीं जाएँ तो प्रत्येक राजनीतिक दल में धनबल को उच्च स्थान पर रखा जाता है। नई लोकसभा में कुल 475 सांसद करोड़पति हैं। 17वीं लोकसभा के 542 सांसदों में से 475 सदस्य करोड़पति हैं।


 

सत्तारूढ़ #भाजपा के 88 फीसदी सांसद और देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस के 96 फीसदी सांसद  करोड़पति है। इस बार #लोकसभा में 266 सदस्य ऐसे हैं जिनकी संपत्ति पांच करोड़ या उससे अधिक है। #बीजेपी के 303 सांसदों में 88  फीसदी करोड़पति हैं। वहीं #शिवसेना के सभी 18 सांसदों ने अपनी संपत्ति एक करोड़ रुपए से अधिक बताई है। कांग्रेस के जिन 51 सांसदों के हलफनामों दायर किए है। उनमें से 96 फीसदी सांसद करोड़पति हैं। इसी तरह डीएमके के 23 में से 96 फीसदी,#तृणमूल कांग्रेस के 91 फीसदी और #वाईएसआर कांग्रेस के 86 फीसदी की संपत्ति एक करोड़ से अधिक है।



 

अपराध और सम्पत्ति के गठजोड़ से बन रहा राजनीतिक रसूख को रोकने के लिए चुनाव आयोग से जनता आशा कर सकती है।  चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 2018 में कई याचिकाएं दायर की गईं थीसुप्रीम कोर्ट ने इन सब याचिकाओं को क्लब करते हुए इसे  पांच जजों की संविधान पीठ को रेफ़र कर दिया थासुनवाई के दौरान संविधान पीठ ने सरकार से कई गंभीर सवाल किएअदालत ने यहां तक कह दिया कि हर सरकार अपनी हां में हां मिलाने वाले व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त नियुक्त करती हैअदालत ने यह भी कह दिया कि देश को टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की ज़रूरत है

 


गौरतलब है कि तिरुनेल्लई नारायण अय्यर #शेषन 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे थे। इस दौरान उन्होंने बिहार की चुनावी गुंडागर्दी और राजनेताओं की मनमानी पर लगाम लगाकर इतिहास रच दिया थाटीएन शेषन ने चुनाव खर्च की सीमा और उम्मीदवारों को जांच के लिए अपने खर्चों का पूरा लेखा-जोखा देने का प्रावधान लागू कियाउन्होंने राजनेताओं  द्वारा सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग पर सख्त पहरा लगा दियाइन्हीं के कार्यकाल में लोगों ने भलीभांति जाना कि आचार संहिता को कितना प्रभावी बनाया जा सकता है शेषन के जमाने में ही मतदाता परिचय पत्र बने और बोगस वोटिंग पर एक तरह से विराम लगाशेषन ने बेहतर और पारदर्शी चुनाव के लिए बूथों पर  केन्द्रीय बलों की नियुक्ति,चुनाव में खर्च की सीमा,चुनाव के समय शराब की बिक्री पर प्रतिबन्ध और लायसेंसी हथियार जमा करने की कानून योजना को अमली जमा पहनाया

 


डॉ.आंबेडकर कानून का शासन  कायम हो इसलिए बेहतर  प्रतिनिधित्व की बात कहते थे वहीं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यदि नेता कानून तोड़ने वाले हैं,तो नागरिक जवाबदेह और पारदर्शी शासन की उम्मीद नहीं कर सकते हैं और ऐसे में कानून के शासन से चलने वाला समाज दूर की कौड़ी है। जाहिर है देश को लोक कल्याणकारी लोकतंत्र के संचालन के लिए #टी.एन.शेषन की जरूरत है लेकिन अफ़सोस अब न तो डॉ.आंबेडकर है और न ही टी.एन. शेषन।

#लाल #आतंक ,#ऐसे होती है #नक्सलियों की #भर्ती... nkasli bhrti politics

पॉलिटिक्स

                                                                                                                

बस्तर में नक्सलियों को आमतौर पर दादा लोग कहा जाता है,लेकिन इनके दादा बनने की शुरुआत बालपन से ही हो जाती है। #नक्सल गांवों में बाल संघ काम करता हैइसमें छह साल से करीब 13 साल के बच्चें होते हैनक्सली यह मानते है कि बच्चों पर सुरक्षा बल या पुलिस की पैनी निगाहें नहीं होती अत: यह बच्चें नक्सलियों के लिए सूचनाओं का बड़ा माध्यम होते हैबच्चों की नजरें #सीआपीएफ़ की मूवमेंट के साथ नये लोग के आगमन पर भी होती है और वे यह खबरें ग्राम रक्षा दल को देते हैग्राम रक्षा दल नक्सलियों को गांव गांव मजबूती देने का मजबूत आधार होता हैनक्सलियों की बैठक हो या उन्हें सहायता देना,#ग्राम रक्षा दल यह सुनिश्चित करता है की इसमें हर गांव की भागीदारी होवह बाल संघ के सदस्यों पर बारीकी से नजर रखता है और इसमें प्रतिभा के अनुसार उन्हें भिन्न भिन्न काम में लगाया जाता है। #बाल संघ में कभी लिंग भेद नहीं किया जाता और इसमें लड़कियों की संख्या अमूमन ज्यादा ही होती है इसका प्रमुख कारण यह भी है कि जनजातीय समाज में लड़कियों की हैसियत बहुत मजबूत होती है

 


बालसंघ के तेज तर्रार और आक्रामक माने जाने वाले सदस्यों को 14 साल तक होते होते हथियार चलाना सीखा दिया जाता है और वे #लोकल #गुरिल्ला #स्क्वाड में शामिल कर लिए जाते है यह स्क्वाड 12 से 15 लोगो की टीम होती है,जिसके पास हथियार भी होते हैयही टीम आईईडी प्लांट करने और छोटे छोटे हमलों को अंजाम देती है। हिंसा के इसी रास्ते को तय करते हुए नक्सली #एरिया कमांडर,#ज़ोन कमांडर से लेकर इंचार्ज और सलाहकार तक बन जाते है। #दरभा डिविजन,दक्षिण बस्तर में आता हैइसमें तीन एरिया कमेटी काम करती है,कटे कल्याण एरिया कमेटी,कांगेर वाली एरिया कमेटी और मलांगगिरी एरिया कमेटीइस साल मार्च में सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में #कांगेर वैली एरिया कमेटी की सदस्य #मुन्नी कटे कल्याण की पहाड़ियों में मारी गई थीवह उड़ीसा की #मलकानगिरि की पहाड़ियों के नीचे सुकमा जिले के गांव #चीतल नार कुंजामी पारा  की रहने वाली थीउसका पति  सुकराम मरकाम इस क्षेत्र का कुख्यात नक्सली हैसीआरपीएफ नक्सलियों की पहचान होने पर उनके घर वालों को जाकर समझाती है कि वे अपने परिवार के नक्सलियों को आत्मसमर्पण का कहें तो उनका पुनर्वास की व्यवस्था सरकार कर देगीहालांकि सीआरपीएफ को इसमें कम ही सफलता मिलती है


सुकमा जिले के अंतिम छोर पर एक गांव बसा है #कुमाकोलेंग। यहां बच्चों का स्कूल है। यह सीआरपीएफ के कैम्प से सटा हुआ है। स्कूल को लेकर नक्सली इलाकों में असमंजस होता है,नक्सलियों को लगता है कि बच्चें पढ़ लिखकर शहर चले जाएंगे जिससे उनका अभियान कमजोर हो सकता है। वे स्कूलों को जला देते है,फिर भी मास्टर साहब रास्ते में कहीं भी मिल जाते है और वे बेखौफ होते है। नक्सलियों को सीआरपीएफ को छोड़कर किसी से कोई परेशानी नहीं है,स्थानीय पुलिस से भी नहीं। वैसे भी नक्सली इलाकों में लेवी का बढ़िया कारोबार होता है। #लेवी एक प्रकार की सुरक्षा राशि है जो नक्सली सरकारी कर्मचारियों,व्यापारियों और ठेकेदारों से हर माह वसूल करते है। और यह काम लोग ख़ुशी ख़ुशी करते है,किसी झंझट से बचने के लिए।


इन सबके बाद भी यह समझने की बिल्कुल भूल नहीं होना चाहिए की नक्सली निरक्षर या कम पढ़े लिखे होते है। नक्सलियों के समूह में डॉक्टर,इंजीनियर से लेकर अच्छी अंग्रेजी बोलने वाले भी मिल जाएंगे। नक्सलियों में #मिलिशिया काम करता है और इसके बाद प्रत्येक नक्सली को कॉमरेड कहा जाता है। नक्सलियों में यह विश्वास किया जाता है कि नक्सली मूवमेंट में शामिल होने के बाद और #कामरेड बनते है जातिगत और वर्गीय पहचान से अलग एक नए नाम के साथ उसका दोबारा जन्म होता है। फिर यही पहचान आजीवन बनी होती है। नक्सलियों में  केंद्रीय समिति के सदस्यों की बड़ी प्रतिष्ठा होती है और यह लोग देश के विख्यात विश्वविद्यालयों से पढ़े लिखे होते है।


नक्सलियों के सही नाम का पता लगाना मुश्किल होता है। नये लोगों को अपने पक्ष में लाने के लिए नक्सली कई तरीके अपनाते हैं। इसमें से एक प्रमुख तरीका है किसी कामरेड की वीरता का बार बार बखान करके युवाओं को यह विश्वास दिलाना की लड़ाई में शामिल होना उनके सम्मान को बढ़ाता है और मरने पर समाज में शहीद का दर्जा मिलता है


नक्सलियों की अपनी गुप्तचर शाखा होती है और इसमें सब्जी,फल बेचने वाले या महुआ बीनने वाले शामिल होते हैउनकी नजर सीआरपीएफ के कैम्प और उनकी आवाजाही पर नजर रखने पर होती है नक्सलियों की कोशिश होती है कि बिना मोबाइल के सूचनाओं का आदान प्रदान हो जाएँनक्सलियों की यह गुप्तचर शाखा के लोग बाज़ार में जलेबी की दूकान लगाने समेत छोटे मोटे काम करते है


नक्सली इलाकों में  जब कोई युवा और युवती सुबह दौड़ने जाते है तो इसकी खबर नक्सलियों तक जल्द पहुंच जाती है कि कहीं वह पुलिस या सेना में जाने की तैयारी तो नहीं कर रहायदि इसकी संभावना लगती है तो परिवार और उस युवा को समझाया जाता है और दबाव डालकर नक्सल समूह में भर्ती कर लिया जाता हैइन इलाकों में नक्सलियों की बात न मानने का मतलब मौत ही हैइन इलाकों में रहने वाले परिवारों को समझाया जाता है कि सरकारी नौकरी का मतलब आदिवासियों का शोषण और अत्याचार हैअत: खुद की रक्षा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि नक्सली संगठन में शामिल होकर हथियार उठा लिए जाएं नक्सलियों  के मरने पर बड़े बड़े स्मारक बनाएं जाते है वहां पुलिस और सुरक्षाकर्मियों से बदला लेने की कसमें खिलाई जाती हैनक्सली स्मारक को लोकार्पित करने के लिए किसी बड़े नक्सली नेता को आमंत्रित किया जाता है और वहां जश्न मनाया जाता है। यह जश्न इतना व्यापक होता है कि युवा इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते और सबसे ज्यादा भर्ती इसी समय होती है।


नक्सली #रेड कोरिडोर के विभिन्न इलाकों में बाकायदा भर्ती सप्ताह मनाते है और इसकी जिम्मेदारी एरिया कमांडर को दी जाती है।

 

मुक्त व्यापार समझौते की चुनौती,जनसत्ता britain bharat janstta

जनसत्ता

                         

उदारवादी पूंजीवादी देश ब्रिटेन की भारत के साथ सहयोग उच्च स्तर पर ले जाने  और पसंदीदा भागीदार बनने की कोशिशें अब साकार हो सकती हैऋषि सुनक के ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने से उम्मीदें मजबूत हुई थी और जी-20 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात के बाद इस बात की संभावनाएं बढ़ गई है कि निकट भविष्य में दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता अस्तित्व में आ जायेगादरअसल बाली में जी-20 सम्मेलन के दौरान ऋषि सुनक ने तीन हजार भारतीयों को वीजा देने की घोषणा कर अपने सकारात्मक इरादें जाहिर कर यह संदेश देने की कोशिश की की उनकी अर्थव्यवस्था को ब्रेक्ज़ीट के बाद मिलने वाले झटकों से उबारने के लिए भारत एक महत्वपूर्ण सहयोगी बनने जा रहा हैयूरोप से दूर अपने आर्थिक भविष्य को तलाशने की ब्रिटिश कोशिशों को 2010 में ही साफ करते हुए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड केमरून ने कहा था कि भारत और ब्रिटेन के संबंध पसंदीदा भागीदारी वाले होने चाहिए इसके पहले 2005 में दोनों के बीच निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए संयुक्त आर्थिक और व्यापारिक स्थापना जो चुकी थीलेकिन वीजा नियमों,भारतीय समुदाय पर होने वाले नस्लीय हमलों और कश्मीर को लेकर ब्रिटेन की राजनीतिक नीतियों में दोहरापन समस्याओं को बढ़ाता रहाभारत के आंतरिक मामलों पर भी लेबर पार्टी का दृष्टिकोण नकारात्मक रहा है। इन सबके साथ पिछले कुछ वर्षों में ब्रिटिश राजनीतिक घटनाक्रम और अस्थिरता भी दोनों देशों के बीच रिश्तों में गर्माहट न आने का एक प्रमुख कारण रही

 

अब परिस्थितियां बदली है तथा भारत और ब्रिटेन के सम्बन्ध पहले से अधिक मजबूत और प्रभावी बनने की और अग्रसर दिखाई दे रहे है ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाएं जहां सिकुड़ रही हैं वहीं भारत की अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही हैतमाम चुनौतियों के बावजूद भी भारत ने अपनी विकास दर की रफ़्तार को बनाए रखा हैब्रिटेन में आई आर्थिक मंदी और भारत का उसे अर्थव्यवस्था में पछाड़ कर आगे निकल जाने से दोनों देशों के बीच आर्थिक सम्बन्ध मजबूत होने की संभावनाओं को और बढ़ा दिया इस समय ब्रिटिश अर्थव्यवस्था अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है अमेरिकन डॉलर  के मुकाबले ब्रिटिश पाउंड की कीमत निचले स्तर पर है नए टैक्स प्लान से ब्रिटेन पर कर्ज बढ़ रहा है,जो पहले ही बहुत है बढती महंगाई से आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैबेरोजगारी तेजी से बढ़ी है तथा लोगों की आमदनी कम हुई है शेयर बाज़ार में लगातार गिरावट से देश की साख भी गिर रही है। यूरोपीय संघ में साझा हितों के चलते ब्रिटेन के नागरिक मंदी के शिकार नहीं हुए थे जिससे उनका उच्च रहन सहन भी प्रभावित नहीं हुआ था।

 

ब्रिटेन जब तक यूरोपीय संघ के 27 देशों के संगठन में शामिल था तब तक इन देशों के नागरिक ईयू के सभी सदस्य देशों में आवाजाही,रहने,काम करने और कारोबार के लिए स्वतंत्र रहे ईयू के सदस्य देशों के कारोबारी सीमाओं पर बिना किसी रोक-टोक और बिना किसी टैक्स के अपने सामान ख़रीद और बेच सकते हैंब्रिटेन ईयू से बाहर निकलने वाला पहला देश बना और 31 जनवरी 2020 को ब्रिटेन आधिकारिक तौर पर यूरोपीय संघ से अलग हो गया था। ईयू से अलग होने से हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई के लिए ब्रिटेन भारत की और देख रहा है जो दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार है तथा निवेश के अवसर असीम हैं यह भी दिलचस्प है कि ब्रिटेन में बसने वाले अप्रवासियों में सबसे बड़ी तादाद भारतीयों की ही है जिनकी आबादी तकरीबन 16 लाख है भारतीय ब्रिटेन के कारोबार का अहम हिस्सा तो है ही,सांस्कृतिक,तकनीकी और राजनीतिक रूप से भी उनकी भागीदारी बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है ब्रिटेन में  भारतीयों का आना संयोग नहीं बल्कि राजनीतिक भी रहे हैभारत और ब्रिटेन के बीच 250 साल से भी अधिक पुराना संबंध हैदोनों ही देश सांस्कृतिक संस्थानों और अंग्रेज़ी से माध्यम से जुड़े हैं दोनों देशों के आपसी संबंधों को मज़बूत रखने में ब्रिटेन में रहने वाले प्रवासी भारतीयों की अहम भूमिका है ये प्रवासी भारतीय ब्रिटेन और भारत के बीच एक पुल का काम कर रहे हैं आज़ादी के पहले और बाद में कुछ समय तक भारत से लोगों को काम के लिए यहाँ बुलाया गया थाअफ़्रीकी देशों की आज़ादी के बाद  वहां से भारतीय ब्रिटेन आकर बसेवैश्वीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने काम के लिए भारत से पेशेवर लोगों को ब्रिटेन लाना शुरू किया 

 

दूसरी और ब्रिटेन में भारत की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। ब्रिटेन में विभिन्न स्तरों पर अनेक नई परियोजनाएं शुरू करने के मामले में भारत अग्रणी देशों में शुमार हैब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में भारत की कंपनियों की अहम भूमिका हैभारतीयों की 800 से ज़्यादा कंपनियों ने ब्रिटेन में 1 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार दिया हैभारत के 21 हज़ार से ज़्यादा छात्र ब्रिटेन में पढ़ाई कर रहे हैं ब्रिटेन के लिए शिक्षा आय बढ़ाने का  बड़ा माध्यम है,लेकिन उसकी वीजा को लेकर कड़ी नीतियों से परेशान भारतीय छात्र अब अमरीका,ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी में पढ़ाई या नौकरी के लिए जा रहे है 

 

भारत और ब्रिटेन के आर्थिक साझा हितों के साथ कई वैश्विक हित भी हैदोनों देश क्षेत्रीय स्तर पर अलगाव का सामना कर रहे हैं ब्रिटेन यूरोपीय संघ से बाहर हो गया है और भारत ने भी चीन-केंद्रित  क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी में शामिल होने से  इंकार कर दिया है इन चुनौतियों के बीच भारत और ब्रिटेन के लिये द्विपक्षीय संबंधों हेतु रोडमैप 2030 को लागू करने का एक अवसर है। भारत और ब्रिटेन के बीच एक मुक्त व्यापार समझौते से आयात और निर्यात प्रवाह में वृद्धि,निवेश प्रवाह में वृद्धि,संसाधनों के अधिक कुशल आवंटन के माध्यम से उत्पादकता में वृद्धि और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा के लिये अधिक खुलेपन से आर्थिक विकास एवं समृद्धि में वृद्धि होने की उम्मीद है। इस समझौते से 2035 तक दोनों देशों के बीच सालाना कारोबार 28 अरब पाउंड तक बढ़ जाएगा. साल 2021 में दोनों देशों के बीच 24 अरब पाउंड का कारोबार हुआ थाभारत के साथ कारोबारी समझौता करना ब्रिटेन सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी नीतियों में से एक है

 

पिछले दो दशकों में  ब्रिटेन और चीन ने उत्कृष्ट द्विपक्षीय संबंध साझा किए,इनमें से पहले दशक को वर्ष 2015 में चीन के साथ संबंधों का स्वर्णिम दशक घोषित किया गया था। लेकिन इस समय चीन और ब्रिटेन के संबंध अस्थिरता की और बढ़े है। खासकर ताइवान और वीगर मुसलमानों पर ब्रिटेन का रुख चीन विरोधी रहा है।  पिछले वर्ष चीन ने सात ब्रिटिश सांसदों पर यात्रा प्रतिबंध लगाए थे और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली थी चीन का कहना था कि ये सांसद वीगर मुसलमानों के साथ बर्ताव को लेकर झूठ और दुष्प्रचार फैला रहे थे बाद में ब्रिटेन में चीनी राजदूत को ब्रिटिश संसद में एक कार्यक्रम में बोलने से रोक दिया गया था इस कार्यक्रम की मेजबानी में ब्रिटेन के कई दलों के सांसद शामिल थे जाहिर है चीन से नाराज ब्रिटेन से भारत की रक्षा सम्बन्ध भी मजबूत हो सकते है भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बाज़ार हिस्सेदारी और रक्षा दोनों ही  क्षेत्रों में  ब्रिटेन के लिये एक प्रमुख रणनीतिक भागीदार है  हिंद प्रशांत में ब्रिटेन  एक क्षेत्रीय शक्ति है,उसके पास ओमान,सिंगापुर,बहरीन,केन्या और ब्रिटिश हिंद महासागर क्षेत्र में नौसैनिक सुविधाएं हैं। चीन की समुद्र में आक्रामक नीति से निपटने के लिए भारत और ब्रिटेन के बीच रणनीतिक सहयोग देश की सामरिक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है   

 

रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता हासिल करने में भी ब्रिटेन से क़रीबी तालमेल बहुत उपयोगी हो सकता है तथा मेड इन इंडिया के तहत इस क्षेत्र में विदेशी निवेश की भारी गुंजाइश है भारत को चाहिए कि ब्रिटेन से वह जैव प्रौद्योगिकी में नई खोजों के क्षेत्र में सहयोग करे  इस क्षेत्र में ब्रिटेन काफी आगे हैभारत के सामने चुनौती है कि ब्रिटेन जैसे देशों को अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अपनी नीति के निकट लाए भारत चाहता है कि ब्रिटेन संयुक्त राष्ट्र और दूसरे बहुराष्ट्रीय संस्थानों में भारत का साथ दे यहीं नहीं भारतीयों के लिए वीज़ा सुविधाएं आसान करने की भी अपेक्षा भारत करता रहा है भारत के व्यवसायी ब्रिटेन में रहकर ही यूरोप में कारोबार करते है भारत चाहता है कि भारतीयों के पास ब्रिटेन में काम करने और  वहां रहने के अधिक से अधिक अवसर हो ब्रिटेन के साथ किसी भी तरह के कारोबारी समझौते में भारत की प्राथमिकता भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए वीज़ा नियमों में राहत हासिल करना रही है अगर दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता हो जाता है तो कपड़ा,चमड़ा, आभूषण,आईटी,फ़ार्मा और कृषि जैसे क्षेत्रों में भारत के निर्यात को काफ़ी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है ब्रिटेन विश्व की  छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था,संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य,एक वैश्विक वित्तीय केंद्र,तकनीकी नवाचार का केंद्र और एक प्रमुख साइबर शक्ति है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की बात कहते रहे है। इसके लिए भारत को आर्थिक,सामाजिक और कूटनीतिक स्तर पर बहुत सशक्त होने की जरूरत है। भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी आगे बढ़ रही हैअगर अगले चार-पांच सालों तक भी भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती रही तब भी प्रति व्यक्ति आय के पश्चिमी देशों के स्तर तक पहुंचने में अभी बहुत वक़्त लगेगा। ब्रिटेन से मजबूत सम्बन्धों का लाभ भारत को कई स्तरों पर मिल सकता है। मुक्त व्यापार समझौते से दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं के आयात और निर्यात में रुकावटों को कम करना होगा। इस समझौते के तहत् वस्तुओं और सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार ख़रीदा और बेचा जा सकता है,जिसके लिए बहुत कम सरकारी शुल्क,कोटा तथा सब्सिडी जैसे प्रावधान किए जाते हैंइस समझौते से व्यवसाय करने वाले दोनों देशों को फ़ायदा होता है। लेकिन इसमें रुकावटें भी है। ब्रिटेन की राजनीतिक अस्थिरता कब करवट लें ले,यह कहा नहीं जा सकता वहीं आत्मनिर्भर भारत अभियान से वैश्विक स्तर पर इस भ्रम में वृद्धि हुई है कि भारत तेज़ी से एक संरक्षणवादी बंद बाज़ार अर्थव्यवस्था में बदलता जा जा रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि ब्रिटेन की मुक्त व्यापार समझौते की उच्च आकांक्षा और भारत में संरक्षणवादी बाज़ार व्यवस्था के भ्रम के बीच दोनों देश कैसे पसंदीदा भागीदार के रूप में आगे बढ़ेंगे।

 

 

सुकमा के आदिवासियों में महिला सम्मान बेमिसाल है, sukma mahilaye politics

 पॉलिटिक्स         



                                                    

नक्सलियों ने ग्राम सुराज अभियान की एक सभा पर हमला किया,अंगरक्षक का गला रेत दिया और फिर पूछा कलेक्टर कौन है...? एक शख्स  ने कहा,मैं हूँ कलेक्टर इसके बाद नक्सली उन्हें मोटर साइकिल पर बिठाकर साथ ले गए यह घटना 2012 की है जब सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनॉन का तब अपहरण हो गया था जब वे जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर मांझीपाड़ा गांव में ग्राम सुराज कार्यक्रम में भाग ले रहे थेसुकमा जिला छत्तीसगढ़ के दक्षिणी भाग में उडिशा-आंध्र प्रदेश की सीमा से सटा हुआ दुर्गम जंगलों वाला इलाका है ये रायपुर से लगभग 450 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित है  माओवादी आतंक से बूरी तरह से ग्रस्त इस इलाके में नक्सलियों के दुस्साहस की कई कथाएं है 2011 में सुकमा जिले से लगे उड़ीसा के मलकानगिरी जिले के कलेक्टर आरवी कृष्ण का भी अपहरण हुआ था वे दूरस्थ चित्रगोंडा क्षेत्र में एक पुलिया देखने गये थे और बाद में  उनका आंध्र प्रदेश की सीमा से लगते बडापाडा से नक्सलियों ने अपहरण कर लिया गया था। माओवादी केंद्रीय बलों को हटाए जाने और जेल में बंद अपने साथियों की रिहाई की मांग कर रहे थे


 

रेड कॉरिडोर के अंतर्गत आने वाले इस क्षेत्र को अतिसंवेदनशील माना जाता है लेकिन नक्सली आतंक से ग्रस्त इस इलाके की एक और सच्चाई महिला सम्मान है जिसकी कोई बराबरी नहीं हो सकती। सुकमा के घने जंगलों में कमर और शरीर के उपरी हिस्से पर सूती कपड़े का लुगड़ा बांधे अकेली आदिवासी महिलाओं को  महुआ बीनते या लकड़ी काटते आसानी से देखी जा सकती हैइन इलाकों में मुख्यतःगोंड,हल्बी या बैगा  महिलाएं आमतौर पर ऐसे ही वस्त्र पहनती है,जिन्हें स्थानीय भाषा में पाटा गंडा कहते हैगोंड का अर्थ तो वैसे भी पहाड़ माना जाता हैपिछड़ेपन,गरीबी और अशिक्षा के बाद भी इनके महिलाओं के प्रति आचरण पहाड़ की तरह ही  ऊंचे होते है महिलाएं न केवल घर का संचालन करती है बल्कि उनका मुखिया की तरह व्यवहार भी होता हैलड़की का रुतबा कुछ इस कदर होता है कि  गोंड़ जनजाति में विवाह के अवसर पर कहीं कहीं लड़की वाले बारात लेकर लड़के वाले के घर आते है। यहां पर विवाह का एक प्रकार लमसेना विवाह भी है,इस विवाह प्रथा में वर  अपने ससुराल में आ कर रहने लगता है। घने जंगलों में गुजर बसर करने वाले गोंडों का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन बेहद उत्कृष्ट है जहां महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण नजर आती है।

 


बस्तर में आदिवासी बाहुल्य है और यहां की संस्कृति में महिलाओं के प्रति गहरा सम्मान देखा जाता हैपुरुषों से ज्यादा महिलाएं काम करती हैघर,परिवार या समाज के विभिन्न उत्सवों में महिलाओं की भागीदारी,पुरुषों से कहीं ज्यादा होती हैबस्तर में हरियाली महोत्सव पर महिलाओं की सांस्कृतिक भागीदारी का बेहतरीन रूप उभर कर आता हैसावन मास में पहले इस उत्सव के साथ ही लोक पर्व,तीज-त्योहारों की बहार शुरू होती है। इस महोत्सव में किसान परिवार कृषि औजारों,अपने गाय-बैलों और ग्राम देवता की पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना करते है। जगह-जगह गैंड़ी दौड़ का उत्सव मनाते है। इन उत्सवों में महिलाओं की भागीदारी हर स्तर पर नजर आती है। वे पूजा अर्चना से लेकर सांस्कृतिक नृत्यों और लोक गायन को आकर्षक तरीके से मनाती है।

 


तीज त्यौहार के साथ ही यहां विवाह के स्वरूप बेहद निराले है। बस्तर में घोटुल परम्परा महिलाओं की स्वतन्त्रता का प्रतीक है। बस्तर की ऐसी परंपरा है जिसमें आदिवासी युवक युवतियों को अपने जीवन साथी को चुनने की पूरी आजादी होती हैइसमें कुछ दिन तक लड़का और लड़की को एक दूसरे के साथ रहने की इजाजत दी जाती हैवे एक दूसरे को समझते है और समन्वय होने पर परिवार उनकी धूमधाम से विवाह कर देता हैघोटुल,गांव के किनारे बांस या  मिट्टी  की बनी झोंपड़ी होती है। घोटुल को सुन्दर बनाने के लिए उसकी दीवारों में रंगरोगन करके उस पर चित्रकारी भी की जाती है। कई बार घोटुल में दीवारों की जगह खुला मंडप होता हैदेश के कई हिस्सों में भ्रूण हत्या या खाप पंचायतों का खौफ लड़कियों की पसंद पर कहर बनकर टूटता है,वहीं बस्तर में महिला अस्मिता की सुरक्षा और स्वतन्त्रता प्रेरणादायक हैइन क्षेत्रों में भाई की मृत्यु हो जाने पर विधवा परित्यकता,पुर्नविवाह  की मान्यता है। विधवा भाभी देवर के लिए चूड़ी पहन सकती है। इससे साफ होता है की महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का आदिवासी समाज में किस कदर ध्यान रखा जाता हैआजकल आदिवासी महिलाएं बांस की राखी बनाकर भी आर्थिक तौर पर मजबूर हो रही है। यह इतनी करीने से बनाई जाती है कि दिखने में बहुत आकर्षक और मजबूत होती है।


दंतेवाडा और सुकमा को जोड़ने वाली कटेकल्याण और प्रतापगढ़ की पहाड़ियों के नीचे एक हमीरगढ़ गांव हैनक्सल प्रभावित इस अतिसंवेदनशील इलाके में कोयला भट्टी से एक पगडंडी से यहां प्रवेश किया जाता हैइस इलाके में घने जंगल है और एक नदी हैदर्भा डिवीजन से जुड़े नक्सली इस क्षेत्र में नक्सली वारदात को अंजाम देकर कांकेर वैली और मलकानगिरी में इस रास्ते से भागते है कटेकल्याण की पहाड़ियां बड़े व्यापक क्षेत्र में फैली हुई है और यह नक्सलियों के छुपने का सुरक्षित ठिकाना मानी जाती है इस क्षेत्र में सीआरपीएफ के जवान तलाशी अभियान चलाते तो रहते है लेकिन पहाड़ियों के ज्यादा अन्दर जाना बड़ा चुनौतीपूर्ण होता हैयहां आईइडी ब्लास्ट होने की भरपूर संभावना बनी रहती हैलुडकीराज यहीं से पहाड़ियों से सटा इलाका है इन घने जंगलों में महिलाओं को महुआ बीनते या ताड़ी लेकर बाज़ार जाते हुए देखा जाता हैइस क्षेत्र में गोंडी और हल्बी बोली जाती है तथा आदिवासी हिंदी को नहीं समझ पातेइन इलाकों में महिलाएं पारम्परिक वस्त्रों ने दिखाई देती है


छत्तीसगढ़ की जीवन रेखा  माने जाने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग 30 नक्सल प्रभावित जगदलपुर से सुकमा होते हुए तेलंगाना को जोड़ता हैनक्सली हमलों के लिए कुख्यात दर्भा घाटी से नीचे उतरकर तोंग्पाल आता है,यहां से मलकानगिरी,उड़ीसा की पहाड़िया दिखाई देती हैमलकानगिरी और सुकमा नक्सली हमलों के केंद्र के रूप में देश भर में कुख्यात है। इस क्षेत्र में दूर दराज के इलाकों में बीज,फल या ताड़ी बेचते हुए महिलाएं ही मिलती है।


नक्सली हमलों में भी महिलाओं की भूमिका बेहद खतरनाक तरीके से सामने आती रही है। सुकमा और बस्तर के दूर दराज के इलाकों में अभी भी हर घर से एक बेटी को भेजने के लिए नक्सली दबाव बनाते है। इन आदिवासी इलाकों में लिंग भेद का कहीं नामोनिशान नहीं दिखाई देता। नक्सली केडर में महिलाओं को बड़े पद और दायित्व दिए जाते है। यह भी देखने में आया है कि माओवादी हमलों में बहुतायत महिलाओं की होती है। हालांकि नक्सलियों का सामना करने वाले बस्तर फाईटरस के दस्तें भी सुकमा के बस स्टेशन पर तैनात रहते है। नक्सलियों के खिलाफ सर्चिंग अभियान में भी उनकी भागीदारी बनी रहती है। कई मोर्चों पर वे सीआरपीएफ के साथ कंधा से कंधा मिलाकर लड़ती है और नक्सलियों को मार गिराती है।


दक्षिण बस्तर के सुकमा जिले के लेदा गांव में लिब्रू बघेल का टूटा फूटा स्मारक बना है। वे छत्तीसगढ़ की विशेष सशस्त्र बल के जवान थे। एक रोज जब वे घर लौटे तो नक्सलियों को इसकी भनक लग गई। नक्सलियों ने  लिब्रू बघेल पर दबाव बनाने की कोशिश की, की वह पुलिस की नौकरी छोड़कर नक्सलियों के साथ हो जाएँ। लिब्रू बघेल ने नक्सलियों को अपनी गोलियों से जवाब दिया और कुछ ही दिनों बाद वे शहीद हो गए। जवान भाई और बेटे की मौत भी इस परिवार को झुका नहीं सकी। अब  लिब्रू बघेल की बहन पुलिस की तैयारी कर रही है। जाहिर है बस्तर की महिलाओं का हौंसला कमाल का है जहां सम्मान और शौर्य की सामाजिक स्वीकार्यता बेमिसाल है।

 

 

brahmadeep alune

डॉ.आंबेडकर को टी.एन.शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश Ambedkar sheshan sandhaya praksh

  सांध्य प्रकाश #डॉ._आंबेडकर को _टी.एन._शेषन चाहिए,सांध्य प्रकाश                                                                      ...