सोमवार, 25 जनवरी 2021

गणतंत्र बनने को बेताब भारत,gantnatra bharat

 मृदुभाषी

                         

महान दार्शनिक जान स्टुअर्ट मिल ने लगभग 200 साल पहले अपनी आत्मकथा में लिखा था की मुझे अब पक्का यकीन है कि मानव जाति की हालत में कोई सुधार मुमकिन नहीं है।  अगर उसके ख्याल के ढंग के बुनियादी ढांचे में कोई तब्दीली हो जाएं,तो दूसरी बात है।  इन दो सौ सालों में कहने को तो दुनिया बहुत बदली है,शिक्षा का व्यापक प्रवाह हुआ है और इससे प्रभावित हम सब हुए है। विज्ञान अवतार बनकर विकास की नित नई ऊँचाइयाँ छू रहा है और इन सबके बीच समाज खड़ा है। इन सालों में भारत का सफर भी बेहद दिलचस्प रहा है। राजतंत्र के साथ औपनिवेशिक तंत्र और करीब आठ दशक से गणतन्त्र।  जान स्टुअर्ट मिल के दावे की पड़ताल की जायें तो भारत अपने ख्यालों पर अडिग है और राजनीतिक सत्ता इससे इत्तेफाक भी रखती है।

मसलन भारत के इतिहास में राजतंत्र का असर खूब रहा है और गणतन्त्र होने के दावे भी साथ ही रहे है। सदियों पहले शुक्राचार्य द्वारा लिखी गई किताब नीति सार में भारत के गणतन्त्र को कुछ इस प्रकार समझाया गया है,गांव की पंचायत या चुनी हुई प्रतिनिधि सभा गांव के सर्वांगीण विकास के सारे निर्णय लेती थी,राजा को कर के रूप में एक हिस्सा दे दिया जाता थायद्यपि राजा का बहुत सम्मान था लेकिन गांव के स्वराज व्यवस्था में राजा भी हस्तक्षेप नही करते थेहिंदुस्तान में जमीन की कोई कमी नहीं थी,इसलिए किसान अपनी जमीन का मालिक होता था और सामंती प्रथा हावी नहीं थीप्रतिनिधि सभा के किसी भी सदस्य का आचरण ठीक नहीं होने पर उसे कभी भी पद से हटाया जा सकता था लोकमत को राजा के मुकाबले ज्यादा मजबूत माना जाता था।”यह विचार यूरोप की सामंती व्यवस्था के ठीक उलट था,जिसमें राजा को अपने राज्य के सब लोगों और वस्तुओं पर अधिकार हासिल था। नीतिसार की हमारे इतिहास में बहुत मान्यता है,वहीं इससे इतर भारत की असमानता गणतांत्रिक इतिहास की कुरूपता को सामने लाकर खड़ा कर देती है। यदि जमीन के महत्व और ग्राम स्वराज या गणतन्त्र के प्रति हमारा महाप्रतापी तंत्र इतना संवेदनशील होता तो ज़मीनें कुछ जमीदारों और सामंतों की जागीर बन कर न रह जाती और बाकी करोड़ों लोगों के भाग्य पीढ़ियों तक बंधुआ मजदूरी से शापित न रहे  होते। जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था तो नील की खेती के खिलाफ विद्रोह हुआ और जब आज़ाद होकर भारत गणतांत्रिक राष्ट्र बना तो भूदान के जरिए आर्थिक असमानता को दूर करने की कोशिशें शुरू हुई। लेकिन साथ ही किसानों की ज़मीनों पर विकास यात्राएं भी शुरू की गई। किसान कानून,प्रशासन और सत्ता के दबाव में जमीन देने को मजबूर थे। यह कार्य बदस्तूर जारी है। इन सबके बीच सामंती तंत्र और राजतंत्र अपनी हैसियत और प्रभाव को सत्ता के साथ कदम ताल मिलाकर बढ़ाने में कामयाब रहा। इन वर्गों ने जिसकी सत्ता उसका समर्थन के तर्ज पर अपनी बादशाहत कायम रखी।

गणतन्त्र का अर्थ बेहद सरल और स्पष्ट है, यहां राज्य की व्यवस्थाओं और सत्ता पर जनता का नियंत्रण होता है,यह किसी शासक की निजी संपत्ति नहीं होती है। राष्ट्र का मुखिया वंशानुगत नहीं होता है। भारत के गणतांत्रिक अतीत और वर्तमान को देखिये,भविष्य की दृष्टि साफ दिखाई देती है। लोकतंत्र के लिए न तो यह संभव है और न ही जरूरी की लोग सीधे शासन करें। लेकिन राजनीतिक दलों की विशिष्ट मान्यताओं ने गणतंत्र को अपने अनुसार ढालने को मजबूर कर दिया है। आप भारत के सभी राजनीतिक दलों को ऊपर से लेकर निचले स्तर तक देखिये। सरपंच का पद पुरुष के स्थान पर महिला हुआ तो सरपंच की पत्नी या मां का चुनाव लड़ना तय है और समाज इसे स्वीकार भी करता है। सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के परिवारों को देखिये। राजनीतिक धरोहर अपने परिवार में ही सौंप दी जाती है और राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था उनसे इतनी प्रभावित रहती है की इसका सामना करना आम जन मानस के लिए बेहद कठिन होता है।

इसके साथ व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए पूंजीवादी तंत्र हमेशा तैयार रहता है। कार्ल मार्क्स को खारिज इसीलिए तो नहीं किया जा सकता,उनका साफ कहना था की,पूंजीवादी समाज में अलगाव सर्वत्र व्याप्त है तथा समाज की सभी संस्थाओं जैसे धर्म,अर्थव्यवस्था और राजनीति आदि को नियंत्रित करता है। भारत के राजनीतिक दल देश की समस्याओं का समाधान पूंजीवादी घरानों से मिलकर करने को बेताब रहते है। जबकि कहने को भारत समाजवादी देश है। महात्मा गांधी भारत की भविष्य की राजनीति को लेकर आशंकित तो थे ही। बिना सत्तारूढ़ हुए भी जनता पर अधिकार हो सकता है और जनता में सर्वमान्य भी हो सकते है,महात्मा गांधी यही सिखाते है और भारत के नेताओं से ऐसी ही अपेक्षा किया करते थेभारत का गणतन्त्र कहने को सफलतापूर्वक कई साल गुजार चूका है लेकिन असल में ऐसा बिल्कुल नहीं है। असमानता के आंकड़े इसके गवाह है। जिस तंत्र में विकास अल्प वर्ग तक स्थापित करने की व्यवस्था हो वह गणतन्त्र हो भी नहीं सकता। महात्मा गांधी कहते थे की भारत को समझना हो तो रेल में तृतीय श्रेणी का सफर कीजिये। यह पैमाना अब भी नहीं बदला है। रेल का आधुनिकीकरण किया जा रहा है। वाकई,वातानुकूलित रेल के डिब्बे बढ़ाएँ जा रहे है,रेल स्टेशन के वेटिंग रूम आधुनिक करने के लिए करोड़ों रुपए भी खर्च किए जा रहे है। रेल के उच्च अधिकारी जब भी किसी रेलवे स्टेशन पर उतरते है तो सबसे पहले इन आधुनिक रेल के वेटिंग रूम देखने जाते है। इन सबकी निगाहों या प्राथमिकताओं में सबसे बड़ा रेल परिवहन का साधन तृतीय श्रेणी की सुविधाएं कभी नहीं होती और न ही उस और कोई देखने की तकलीफ करता है। रोजी रोटी की तलाश में सैकड़ों मील का सफर तय करने वाला मजदूर शायद ही कभी वातानुकूलित रेल के डिब्बे या आधुनिक वेटिंग रूम में बैठा होगा। बाकी तृतीय श्रेणी में बैठने का अनुभव महात्मा गांधी तो कर सकते थे लेकिन अब यह मुमकिन कहां है,अंतत: लोकतांत्रिक अधिनायकवाद जो कायम है। यह नीचे से ऊपर तक है।  महात्मा गांधी ने आज़ादी की लड़ाई को जब सामाजिक न्याय स्थापित करने के संघर्ष के तौर पर निरुपित किया तब एक बार फिर भारतीय चेतना अपने घर की अर्थव्यवस्था को ठीक करने और रोजी रोटी के समुचित प्रबंधन की और प्रवृत हुई  गांधी ने अर्थव्यवस्था को सामाजिक न्याय और समता के सिद्धांत पर आधारित करके स्वावलंबी और आत्मनिर्भर भारत की और कदम बढ़ाएं  महात्मा गांधी आम जनमानस को आत्मनिर्भरता से जोड़ते थे जबकि अब सरकारों के लिए आत्मनिर्भरता का अर्थ पूंजीवादी शक्तियां होती है जो स्वदेशी होने  का राजनीतिक लाभ लेकर वैश्विक स्तर पर अपना व्यापार बढ़ाती है। महात्मा गांधी की अर्थव्यवस्था की कल्पना उनके स्वदेशी आंदोलन में साकार होती है यह आंदोलन समुदाय में उपलब्ध संसाधनों और समुदाय के कौशल और हुनर का उपयोग करके रोजमर्रा के उपयोग की चीजों के उत्पादन और लोगों को आत्मनिर्भर बनाने पर आधारित थाप्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा करना उसका प्रमुख उदेश्य था। शोषण रहित समाज का निर्माण और अहिंसक विकास की भावना इसमें निहित थी।

आखिर महात्मा गांधी गणतांत्रिक देश ही तो चाहते थे। लेकिन गांधीवादी सिद्धांत राज्य के नीति निदेशक तत्वों में डाल दिये गए। इसका मतलब यह है की राज्य की इच्छा हो तो इसे लागू करें। भला कोई भी राजनीतिक व्यवस्था जन सामान्य का राज मजबूत करने की कोशिश कैसे कर सकती है। नतीजे सामने है, स्टालिन से लेकर अखिलेश तक। उत्तर से लेकर दक्षिण तक सत्ता के केंद्र में परंपरागत सत्ता ही है और परंपरागत सत्ता का विचार ही गणतन्त्र का विरोध है।

गोल्ड कोस्ट एक ब्रिटिश उपनिवेश था जो स्वतंत्र होकर 1957 में घाना के रूप में अस्तित्व में आयाइसके नेता एनाक्रुमा लोकतंत्र के जरिये देश में सुधार लाना चाहते थे,लेकिन वे आजीवन राष्ट्रपति भी बने रहना चाहते थे ऐसा उन्होंने क़ानूनी रूप से कर भी लिया रूस हो या चीन,सब दूर सत्ता पर नियंत्रण हासिल किया जा रहा है। भारत में तरीके पारंपरिक है लेकिन है तो सत्ता पर नियंत्रण ही। आज दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में लोकतंत्र स्थापित है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं की लोगों को बोलने,अपना नेता चुनने और सत्ता का विरोध करने की आज़ादी है।

भारत में लोकतंत्र स्थायी और टिकाऊ है,इसमें कोई संदेह नही है। यहां शांतिपूर्ण सत्ता का हस्तांतरण भी होता रहा है,यह भारत के लोगों का लोकतांत्रिक चरित्र है। लेकिन आज़ादी के आठवें दशक तक आते आते एक प्रश्न खड़ा हुआ है। क्या लोग अपने शासकों का चुनाव या उनमें बदलाव कर सकते है। लोकतंत्र का मतलब यदि यह है की सिर्फ लोगों द्वारा चुने गए नेताओं को ही देश पर शासन करना चाहिए तो फिर संसदीय या विधानसभा चुनावों में स्थानीय उम्मीदवार अलोकप्रिय होकर भी क्यों चुन लिए जाते है।  जाहिर है हमारे कथित गणतांत्रिक देश के लोग संसदीय प्रणाली को तो खारिज कर ही चूके है। वे उच्च स्तर पर नेतृत्व देखकर स्थानीय स्तर के गैर जरूरी प्रतिनिधित्व को स्वीकार कर लेते है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल आम जनमानस के सामने विकल्प की मजबूरी का खूब फायदा उठा रहे है। अब भला भारत वास्तविक गणतन्त्र होता तो न तो किसान सड़क पर होते,न ही देश में व्यापक गरीबी और असमानता होती और न ही गांव का गरीब सैकड़ों किलोमीटर दूर रोटी की तलाश में जाने को मजबूर होता। भारत में ऊंची अट्टालिकाओं को विकास का पैमाना मान लिया गया है,एक नजर बेतहाशा बढ़ती हुई झोपड़ियों,पूंजीपतियों और राजनेताओं की संपत्ति पर भी नजर डालिए,जनतंत्र और गणतंत्र होने के मायाजाल को समझने में आसानी होगी।

 

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

अली बाबा के संस्थापक जैक मा पर वैश्विक ख़ामोशी,china,jack ma

 राष्ट्रीय सहारा

साम्यवादी शासन में सर्वसत्तावाद और सर्वाधिकारवाद का वर्चस्व स्थापित करने की शी जिनपिंग की नीतियां बेलगाम होकर चीन के नागरिकों के मानव अधिकारों को निगल रही है वही वैश्विक मंच पर आर्थिक हित इतने हावी हो गए है की मानव अधिकार जैसे अहम मुद्दे दुनिया में बहुत पीछे छूटते जा रहे है चीनी सत्तावाद की यह स्पष्ट धारणा है की सत्तारूढ़ दल या विचारधारा को परम सत्य मानकर सच्चे मन से उसके निर्देशों का पालन किया जाये,उन पर कोई प्रश्न चिन्ह न लगाया जायेचीन के मशहूर उद्योगपति जैक मा ने लगभग ढाई महीने पहले चीन के कम्युनिष्ट शासन द्वारा नियंत्रित वित्‍तीय नियामकों और सरकारी बैंकों की नीतियों की आलोचना की थी  उन्होंने इन संस्थानों को उदार होकर नवाचारों को बढ़ाने और उन्हें प्रोत्साहित करने की नसीहत  देते हुए नीतियों में सुधार करने की जरूरत बताई थी

जैक मा के इस भाषण के बाद चीन की सत्‍तारूढ़ कम्‍युनिस्‍ट पार्टी ने मा के एंट ग्रुप सहित कई कारोबारों पर असाधारण प्रतिबंध लगाए दिए और इसके बाद  जैक भी अचानक गायब हो गए थे। दुनिया भर में यह खबर आने के बाद उन्हें चीन की साम्यवादी सरकार ने एक वीडियो शेयर कर दिखाया,लेकिन वे कहां है इसे लेकर अभी भी रहस्य बरकरार हैफोर्ब्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक शी जिनपिंग के कार्यकाल में चीन के कई अरबपति गायब हो गए थे। इस दौरान गायब हुए कई लोग कभी दोबारा सामने नहीं आए। जाहिर है जैक कभी लौट भी पाएंगे,इसे लेकर चीन के कम्युनिस्ट पार्टी को कोई सवाल पूछने का साहस भी नहीं कर सकता। अफ़सोस वैश्विक मंच पर भी ख़ामोशी है और यह मानव अधिकारों के लिए सबसे बड़ा झटका है। यह भी बेहद दिलचस्प है की जिस महीने में जैक गायब हुए थे उस समय चीन में अल्पसंख्यकों के साथ हो रहे व्यवहार की लगभग 40 देशों ने आलोचना की थी और हांगकांग में उसके नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के मानवाधिकारों पर पड़ने वाले असर पर गंभीर चिंता जताई थी इन देशों मे ज्यादातर पश्चिमी देश थे  जिन्होंने शिनजियांग और तिब्बत में अल्संख्यक समुदाय के साथ किए जा रहे सलूक पर सवाल उठाए थे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद मानव अधिकारों के उल्लंघन की निगरानी करती है और समय-समय पर प्रत्येक सदस्य देश में मानवाधिकार की स्थिति की समीक्षा करती है इसके प्रदर्शन पर भी अब सवाल उठने लगे है क्योंकि जैक जैसे तात्कालिक मामलों में भी चीन सरकार पर दबाव बढ़ाया जाना चाहिए थे,लेकिन संयुक्तराष्ट्र समेत किसी भी संस्था ने ऐसा अभी तक नहीं किया

दरअसल साम्यवादी शासन सर्वाधिकारवादी व्यवस्था को मजबूत करने में भरोसा करता है जिसके अनुसार राज्य की शक्ति को एक ही जगह केंद्रित रखने में विश्वास किया जाता है और लोगों के जीवन के सभी पक्षों पर पूर्ण या लगभग पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने का समर्थन करता है। ऐसे में शासन की किसी भी स्तर पर आलोचना को चुनौती की तरह  देखा जाता है।

चीन ने मानव अधिकारों की स्थिति इतनी खराब है की सामान्य नागरिक के लिए व्यवस्थाओं का विरोध करना भी  मुश्किल होता है। चीन के हूबे प्रांत में रहने वाले शाओ हुआंग के आंसू कई महीनों के बाद भी थम नहीं रहे है,वे  निराश और हताश हैइस शख्स ने अपने दादा को कोरोना से मरते हुए देखा था लेकिन इतने मजबूर थे की न तो वे अपने दादा को बचा सके और न ही अस्पताल प्रबंधन के खिलाफ आवाज उठा सके जिन्होंने समय पर मरीज को मूलभूत स्वास्थ्य  सेवाओं का लाभ नहीं दिया और नतीजा शाओ के दादा चल बसेचीनी नागरिकों के लिए वहां की सरकार द्वारा संचालित किसी भी व्यवस्था की आलोचना करना अपनी जान को जोखिम में डालने वाला माना जाता है अत: शाओ  बेबसी और लाचारी से अपने दादा को पल पल मरते हुए देखते रहेअंततः एक दिन उनके दादा का जीने का संघर्ष खत्म हो गया और शाओ ने अपना दुःख चीन के सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म वीबो पर व्यक्त करते हुए लिखा,“दादा, रेस्ट इन पीस, स्वर्ग में कोई कष्ट नहीं होता।” लेकिन अली बाबा के संस्थापक जैक मा,शाओ हुआंग की तरह शांत न रह सके, इसका परिणाम उनके लिए बेहद भयावह हुआ और शायद जानलेवा भी हो सकता है

चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के कड़े नियन्त्रण वाला शासन में जनमानस जीने को मजबूर है जहां मानव अधिकार और स्वतंत्रता जैसे शब्द प्रशासनिक शब्दावली से हटा दिए गए है बीसवीं सदी के महान दार्शनिक कार्ल पापर की विख्यात किताब द ओपन सोसाइटी एंड इट्स एनिमिस में यह तर्क दिया गया है की विचारधारा केवल सर्वाधिकार वादी समाज में ही पाई जाती है क्योंकि वहां सब मनुष्यों को एक ही सांचे में  ढालने की कोशिश की जाती है,मुक्त समाज में उसके लिए कोई जगह नहीं है। दुनिया के विकसित देशों को चुनौती देने वाला चीन विकास की नई इबारत तो गढ़ रहा है लेकिन साथ ही उसे मानव अधिकारों को कुचलने से भी कोई गुरेज नहीं है और न ही विश्व समुदाय उसे रोक पाया है। चीन से सबसे ज्यादा परेशान आसियान के देश रहे है लेकिन वे भी चीन की आर्थिक नीतियों के जाल में फंसते जा रहे है। चीन ने आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते आरसीईपी यानी रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप कर कूटनीतिक और आर्थिक जीत हासिल कर ली है इसे विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता बताया जा रहा है जो विश्व की 30 फ़ीसद आबादी को जोड़ने का काम करेगा कोरोना काल में चीन के खिलाफ मुखर होकर जांच की मांग करने वाला ऑस्ट्रेलिया भी आरसीईपी में शामिल हो गया है जापान,चीन, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड समेत आरसीईपी में दक्षिणपूर्व एशिया के दस देश शामिल हैं,इनमें सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया और म्यांमार शामिल हैं। दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा देश चीन से लिए कर्ज की गिरफ्त में फंसे है। हालात यह है की चीन अब विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से भी बड़ा कर्जदाता बन गया है। इन सबके बीच यह बड़ा संकट है की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश चीन यह समझना ही नहीं चाहता कि आर्थिक समृद्धि और आर्थिक सुधार पर आधारित नीतियों से सम्पूर्ण मानव अधिकारों की सुरक्षा नहीं हो सकती। जबकि वैश्विक समुदाय लोकतांत्रिक अधिकारों को दरकिनार करने वाले चीन को रोकने में नाकाम रहा है

नोबल शांति पुरस्कार विजेता ल्यू शियाबों लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थक चीन के ऐसे नागरिक  माने जाते है जो जीवनभर साम्यवादी नीतियों के मुखर आलोचक रहे और उसके अत्याचारों से जूझते रहे लेकिन उनका यह विश्वास अटल रहा कि चीन के नागरिक एक दिन साम्यवाद की हिंसक,आक्रामक और असभ्यता से मुक्ति पा लेगा इन सबके बीच चीन का आम नागरिक अपने सार्वभौम अधिकारों और मानवीय स्वतंत्रता को कुचलता हुआ रोज देखता है और साम्यवादी कड़ाई के आगे उसकी बेबसी बदस्तूर जारी है शी जिनपिंग आर्थिक सुधारों के साथ मानवाधिकारों का लगातार दमन कर रहे है सत्ता पर उन्होंने पूर्ण नियंत्रण हासिल कर लिया है और यह स्थिति उन्हें आक्रामक बना रही है

बहरहाल वैश्विक स्तर पर चीन के बढ़ते प्रभाव से मानव अधिकार समूह दबाव में है और वे चीन के खिलाफ प्रदर्शन नहीं कर पा रहे है कई देशों की सरकारें उन्हें ऐसा करने से बलपूर्वक रोक देती है। ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में चीन हांगकांग और वीगर मुसलमानों को लेकर चीन की नीति की आलोचना की गई थी, लेकिन जैक कहां है और कब लौटेंगे,इसे लेकर न तो कोई प्रदर्शन हुए है और न ही चीन पर दबाव बढ़ाया गया है,विश्व समुदाय की यह ख़ामोशी दुर्भाग्यपूर्ण है।

बुधवार, 20 जनवरी 2021

स्थानीय खूबियों को पहचान देकर बनेगा खुशहाल और आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश, khushhal aatmnirbhar madhyprdesh

 

मृदुभाषी                       

  


कला,साहित्य,संस्कृति,सर्वधर्म समभाव तथा और अतुल्य भौगोलिक और प्राकृतिक संपदा से सम्पन्न मध्यप्रदेश आत्मनिर्भरता के रास्ते पर चल पड़ा हैसरकार की पहली प्राथमिकता कौशल विकास और लोगों की आत्मनिर्भरता है तथा इस दिशा में प्रयास भी प्रारम्भ कर दिए गए हैभारत के हृदय प्रदेश में आत्मनिर्भरता की संभावनाएं भी अनंत है जिसे बेहतर योजनाओं और सकारात्मक प्रयासों से साकार किया भी जा सकता हैउत्तर में विन्ध्याचल और दक्षिण में सतपुड़ा पर्वतमाला से घिरा और माँ नर्मदा के तट पर बसा  होशंगाबाद प्राकृतिक संपदा से परिपूर्ण हैदेश के प्रमुख मार्गों को जोड़ने वाला इटारसी जंक्शन यही है,अत: आवागमन को लेकर कोई समस्या नहीं है पचमढ़ी.मड़ई जैसे प्राकृतिक क्षेत्र वन संपदा और औषधीय भंडार से परिपूर्ण हैं। यहां के आदिवासी गरीब है और वनौषधियों व वनोपजों को संग्रह व विक्रय कर जीवन यापन करते रहे हैं। इसके संग्रहण,परिषोधन व निर्यात से सैंकड़ों लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। कौशल विकास,स्वास्थ्य और पर्यटन से जोड़कर हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है।

राजधानी भोपाल अपनी खूबसूरती के लिए दुनिया भर में पहचानी जाती है।   भोपाल जिले में बांस बहुतायत से होते हैं। भोपाल में वर्षों से चिक के पर्दों का चलन था,वर्तमान में पुनः इसका उपयोग लोगों ने करना शुरू किया है,इस कारोबार को पुनः स्थापित करना चाहिए। भोपाल में मोती के पर्स बनाने का व्यवसाय बहुत पुराना है इस कला में दक्ष कर लघु उद्योग की इकाइयां बनाई जा सकती हैलघु उद्योग निगम से जोड़कर रोजगार विकसित किया जा सकता है। भोपाल में कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है,इसके सौंदर्य को संवर्धित कर पर्यटन के क्षेत्र में विकसित करना चाहिए जिससे कई लोगों को मजदूरों को रोजगार मिल सकता है। भोपाल से लगा रायसेन जिला है। यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सांची यहीं स्थित है,यहां भीमबेटका रॉक शेल्टर एक अन्य यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है लेकिन पर्यटन केंद्र के रूप में उभारने की कोशिशों की जरूरत यहां महसूस होती है।

राजगढ़ जिले की मिट्टी एवं जलवायु उपरोक्त प्रकार की खेती के लिए बहुत उपयुक्त हे। सीहोर जिले का गेहूं उत्कृष्ट क्वालिटी का है,पूरे भारत वर्ष में इसकी महत्ता है और मांग भी है। इस उत्पाद को विदेषों में भी निर्यात किया जाता है। उत्पादित गेहूं की ग्रेडिंग की जा सकती है, गेहूं के आटे से संबंधित अनेक  वस्तुएं बनाई जा सकती हैं। इससे बनने वाले उत्पादों दलिया, बिस्किट, ब्रेड आदि की छोटी-छोटी सूक्ष्म  इकाइयां खोली जा सकती हैं जिससे स्थानीय मांगों को न केवल पूरा किया जा सके बल्कि रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते है। विदिशा कृषि के क्षेत्र में उन्नत जिला है। यहां उत्तम किस्म का गेहूं,सोयाबीन और धान प्रचुर मात्रा में है। लेकिन यहां तेल निकालने की इकाइयों को बढ़ाने की जरूरत है।  छोटी इकाईयो को तहसील स्तर पर लगाकर रोजगार के अवसर बढ़ा सकते है। कुशाल,अकुशल दोनो ही प्रकार के लोगों लोगों को इसका लाभ मिलेगा। विदिशा जिला ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। यह हिन्दू, जैन एवं बौद्ध धर्म का प्राचीनतम केन्द्र रहा है। अत: इसके पर्यटन केन्द्रों को विकसित करने से स्थानीय व्यक्तियों के लिए रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध करवाये जा सकते है।

ग्वालियर को पर्यटन केंद्र के रूप में उभारने की जरूरत है,जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है यहां स्थित किले और झाँसी की रानी की समाधि को लोग दूर दूर से देखने आते है लेकिन यहां पर्यटन व्यवस्थाओं के अभाव में पर्यटन व्यवसाय नही बन सका है। श्योपुर में कूनों, सीप, कुवारीं, चम्बल एवं पार्वती जैसी नदियां है। यहां पशुपालन और मत्स्य पालन को बढ़ावा देने की जरूरत है।

आदिवासी बाहुल्य आलीराजपुर और झाबुआ जिला प्राकृतिक संसाधनों से  भरपूर है। यहां पर्याप्त मात्रा में वनपोज पाया जाता है।  वनों से प्राप्त होने वाली विभिन्न वस्तुऐं रोजगार मूलक है। तेंदूपता, लाख, गोद, जलाऊ-लकड़ी,मौसमी फल टेमरू, चारोली,जामून विभिन्न प्रकार की जड़ी-बुटीयां भी पायी जाती है। जिले में बहुतायत में ताड़ के पेड़ से प्राप्त ताड़ी रोजगार का प्रमुख साधन बन सकता है। यह स्वास्थ्य वर्धक माना जाता है तथा पथरी जैसी जानलेवा बीमारी को खत्म कर देता है। यहां महुआ का उत्पादन होता है। महुआ से एल्कोहल बनाई जाती है तथा इससे बड़े स्तर पर व्यापार किया जा सकता है। वर्तमान में वैष्विक महामारी कोविड-19 के बचाव हेतु सेनिटायजर जब जिले में समय पर उपलब्ध नहीं हुआ तो आदिवासी महिलाओं ने महुआ को वाष्पन विधी द्वारा एल्कोहल बनाकर सेनीटायजर बनाने में प्रयोग किया। इस प्रयोग को जिला प्रशासन एवं स्वास्थ विभाग ने जांच कर अनुमति दी । दूसरा महुआ के फूल के बाद फल लगता है,उसे क्षेत्रीय भाषा में डोली कहते है। इसका प्रयोग तेल निकालने व व्यवसायिक रूप में किया जाता है। जिले में प्राकृतिक संसाधन और वन संपदा भरपूर है लेकिन इसके बाद भी यहां गरीबी है। इस इलाके में वन संपदा के समुचित उपयोग से हजारों रोजगार बढ़ सकते है और आदिवासियों का पलायन भी रूक सकता है।

धार जिले में बाग में विश्वप्रसिद्व बाग प्रिन्ट का कार्य किया जाता हैं। इस कार्य में लगे लोगों को केन्द्र सरकार द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका हैं।  बाग प्रिन्ट में फूल व पत्तियों के रंग का निर्माण कर बेड-शीट, साड़ियों आदि पर प्रिन्ट का कार्य किया जाता हैं। लागत की अधिकता एवं मशीनों से प्रतियोगिता के कारण यह कला कई समस्याओं का आज कल सामना कर रही हैं। इस क्षेत्र में मिर्च, कपास व सोयाबीन प्रचुल मात्रा में उत्पन्न होता हैं। इन फसलों पर आधारित लघु एवं कटीर उद्योगो की स्थापना को प्रात्साहित कर क्षेत्र के विकास की गति  बढाई जा सकती हैं।  माण्डवगढ में लाखों पर्यटक आते है लेकिन इसका लाभ यहां के स्थानीय गरीब आदिवासियों को नही मिल पा रहा है। यहां गरीबी और बेरोजगारी बदस्तूर जारी है। यह जिला तेन्दूपत्ता के संग्रहण का बहुत बडा केन्द्र हैं। तेन्दू के वृक्षों के रख रखाव, पुनः रोपण तथा नये वृक्षों का रोपण करके अच्छी क्वालिटी का तेन्दू पत्ता प्राप्त किया जा सकता हैं। इसी तरह घावडे के गोंद, चारोली एवं औषद्यीय वनस्पति के उपार्जन के केन्द्र भी बनाये जा सकते हैं।

खंडवा जिले में आत्मनिर्भरता की अपार संभावनाएं हैयहां इंदिरा सागर बांध के बैक वाटर से जिले में नहरों के माध्यम से यदि पानी उपलब्ध कराया जाए तो कृषि से जुड़े हजारों परिवार न केवल आत्मनिर्भर होंगे साथ ही जिले से मजदूरों का पलायन और ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या भी दूर होगीसिंगाजी विद्युत ताप गृह से निकलने वाली राखड़ आसपास के सैकड़ों एकड़ की जमीन को बंजर बना रही है और फसलों को बरबाद कर रही है यदि यहां राखड़ से ईट बनाने की एक बड़ी सरकारी इकाई स्थापित हो तो न केवल उड़ने वाली राख की समस्या से किसानों को निजात मिलेगी साथ ही हजारों की संख्या में क्षेत्र के नौजवानों को रोजगार भी प्राप्त होगा। इंदिरा सागर बांध के कारण वर्ष भर निचले इलाकों में बैक वाटर भरा रहता है अतः मत्स्य पालन उद्योग, मत्स्य प्रसंस्करण इकाइयां, शीत ग्रह, वेयरहाउस की संभावनाएं भी यहां अत्यधिक बढ़ गई है इस हेतु  प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर बेरोजगारों को इनके लिए प्रशिक्षित कर स्वरोजगार हेतु प्रेरित किया जा सकता है।

मण्डला जिले में उपलब्ध वनोपजों   तेंदूपत्ता एवं तेंदूफल ,महुआ फूल एवं फल आम फल, अमचूर, गुठली,रस, अश्व गंधा मषरुम,पेहरी इत्यादि प्रमुख वनोपज है जो मण्डला जिले  के वनो में बहुतायत में सुलभ है। यद्यपि इनका संग्रहण अत्यधिक श्रमसाध्य होता है। अतः ऐसी कोई तकनीक विकसित नहीं हो पायी है कि आदिवासी के अलावा कोई दूसरा वर्ग वनोपज का संग्रह कर सके। यह कार्य आदिवासी ही कर सकते है। इसलिए उनके कौशल को परखकर दक्षतानुरुप प्रतिफल मिलना चाहिए तथा उसका समुचित मूल्य मिलना चाहिए। यदि निमाड़ क्षेत्र को देखे तो यहां फव्वारा पद्धति से खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रशिक्षण की जरूरत है इसके साथ ही  कपास की खेती को ज्यादा प्रोत्साहित करने की भी आवश्यकता है।

नरसिंहपुर जिले में वन लगभग 26 फीसदी है। यहां मिश्रित वन,कटीली झाड़ियों  वाले वन,पतझड़ वाले वन पाये जाते हैं। सतपुड़ा एवं विंध्याचल की पहाड़ियों पर सागौन, साल, बांस, साज तथा समतल स्थानों पर महुआ, आम,खैर,अचार,करोंदा, हर्र,बहेड़ा और आम के वृक्ष पाये जाते हैं। वनों से आंवला,चिरौंजी,हर्र,बहेड़ा गोंद एवं जड़ी बूटियां प्राप्त होती हैं। अत: यहां वन्य संपदा से मिलने वाले रोजगार के अनंत संभावनाएं है और इसके लिए छोटी छोटी इकाइयां स्थापित की जा सकती है। नरसिंहपुर जिले में स्टोन, डोलोमाईट, फायर क्ले, चूने का पत्थर आदि बहुतायत में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त ग्राम गोटीटोरिया के पास की चट्टानों से इमारती पत्थर निकाला जाता है। फायर क्ले मुख्यतः कन्हारपानी,बचई,हींगपानी व हिरणपुर की पहाड़ियों से मिलता है। जिले की पहाड़ियों से मुरम,गिट्टी प्राप्त की जाती हैं तथा नदियों से रेत एवं चूने के पत्थर से सीमेंट के पाईप बनाये जाते हैं। चीचली में तांबे में जस्ता मिलाकर पीतल के वर्तन बनाये जाते हैं। इस प्रकार यह जिला मध्य प्रदेश का खनिज और वन्य संसाधन केंद्र के रूप में प्रमुखता से उभर सकता है।

महाकाल की नगरी उज्जैन प्राचीनतम और पवित्र नगरी है। यहां लाखों लोग भगवान महाकाल के दर्शन करने आते है।उज्जैन से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर मंदसौर में भगवान पशुपतिनाथ का मन्दिर है। उज्जैन और इंदौर से लगे दो सौ किलोमीटर का क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में कई प्राचीन मंदिर है और गाइड का प्रशिक्षण देकर हजारों युवाओं को रोजगार मिल सकता है। यहीं नहीं कर्मकांड के आने वाली वस्तुओं को बनाने के लिए लघु उद्योग भी स्थापित किये जा सकते है। यहां आवागमन साधन भी भरपूर है। मालवा का मौसम बहुत सुहाना माना जाता है। यहां धार्मिक पर्यटन होने से यात्री रुकना भी पसंद करते है। लेकिन इसे लेकर कोई प्रभावी योजना अभी तक नहीं बन सकी है। समूचे मालवा क्षेत्र को धार्मिक कारिडोर के रूप में उभारने की योजना पर काम करने की जरूरत है। यह उज्जैन-इंदौर-मांडू-महेश्वर तथा इंदौर-उज्जैन-मंदसौर,इंदौर-उज्जैन-बगुलामुखी हो सकता है। मौसम और पर्यटन की दृष्टि से यह कारिडोर मध्यप्रदेश की वैश्विक पहचान बन सकता है।  

जाहिर है मध्यप्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों को उनकी स्थानीय खूबियों,भौगोलिक संरचना,धार्मिक पहचान और वन्य संपदा को ध्यान में रखकर उभारने और विकास करने की जरूरत है,यहीं से खुशहाल और आत्मनिर्भर प्रदेश के मार्ग खुल सकते है। 

 

 

 

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

अमेरिका को ट्रम्पवाद की चुनौती,america trumpvad

 

जनसत्ता

                                                                      


व्हाइट हाउस में इन दिनों एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है,यह ट्रम्प की उस  बूर्जुआ  और संकीर्णता पर आधारित विचारों और शासन व्यवस्था से उपजा राजनीतिक संकट है जिसने अमेरिकी लोकतंत्र की अस्मिता को तार तार कर दिया है। ट्रम्प के राजनीतिक कदमों से उपजी परिस्थितियों को लेकर अमेरिका इतना आशंकित है की फ़ेसबुक,यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफ़ॉर्म ने भी उनके अकाउंट को निलंबित कर दिया है,जिससे वे लोगों से संपर्क ही स्थापित न कर सके यह समूचा घटनाक्रम अति राष्ट्रवादी राजनीति के उभार के बाद आने वाले संकटों के संकेत दे रहा है। इसके प्रभाव से बाइडेन बच नहीं सकते क्योंकि ट्रम्प को अब भी अमेरिका के एक बड़े वर्ग का जनाधार प्राप्त है और इसे किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा झुठलाना अर्थात् देश को अराजकता में झोंक देने जैसा हो सकता है।



जर्मनी की महान दार्शनिक हन्ना आरेंट ने अपनी किताब “द ऑरिजिन्स ऑफ़ टोटिटेरियनिज़्म” में सर्वाधिकारवाद के संपूर्ण समाज में प्रभुत्व स्थापित करने की दो विशेषताएं बताई है,ये है विचारधारा और आतंक। सर्वाधिकारवाद की परिकल्पना ही लोकतंत्र के खिलाफ है। लेकिन अमेरिका की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में राष्ट्रपति ट्रम्प की पूर्ण सत्तावादी शक्ति से उभरे वैचारिक आतंक ने निर्देशित लोकतंत्र की नई परिभाषा गढ़ी है और इसकी मंजिल सर्वाधिकारवादी शासन व्यवस्था की ओर जाती हुई दिखाई पड़ती है।

दरअसल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सत्ता से बिदाई के ठीक पहले निर्देशित भीड़ को अमरीकी संसद में घुसने को प्रेरित करके तथा अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था को चुनौती देकर जिस प्रकार अराजकता फैलाई है,उससे दुनिया ने यह देखा की प्रभुत्ववादी सत्ता की चाह में हिंसा का तांडव मध्य पूर्व या विकासशील राष्ट्र तक ही सीमित नहीं है,यह अमेरिका जैसे अति विकसित राष्ट्र में भी हो सकता है। ट्रम्प की इस हिमाकत को अमेरिकी लोकतांत्रिक इतिहास का काला दिन माना गया। उनकी विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी ने महाभियोग से ट्रम्प को सत्ता से बेदखल करने की ओर मजबूती से कदम आगे बढ़ा दिए है जिसे ट्रम्प की पार्टी रिपब्लिकन के कुछ सांसदों का भी समर्थन प्राप्त है।

वहीं डोनाल्ड ट्रम्प इन सब घटनाओं से विचलित नहीं दिखाई दिए बल्कि उन्होंने इसे अपनी लोकप्रियता का प्रमाण माना। परम्परा के अनुसार आगामी 20 जनवरी को बाइडेन अमेरिका के नए राष्ट्रपति  के पद की शपथ लेने वाले है लेकिन एफबीआई ने चेतावनी जारी  की है कि पूरे देश में 20 जनवरी को ट्रंप के समर्थक हथियारों के साथ विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं। इसे अमेरिका के लिए अप्रत्याशित और व्यापक हिंसा भड़कने की आशंकाओं के रूप में देखा जा रहा है। ट्रम्प के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव के बाद भी ट्रम्प खामोश नहीं है और उन्होंने  वाशिंगटन डीसी में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी है जो आगामी 24 जनवरी तक लागू रहेगी। ट्रंप अमेरिका के इतिहास में पहले ऐसे राष्ट्रपति बन गए हैं,जिनके खिलाफ दो बार महाभियोग चलाया जा रहा है। यदि इस प्रस्ताव  पर सीनेट में मुहर लग गई तो ट्रम्प फिर कभी अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बन पाएंगे। इसके साथ ही वे पूर्व राष्ट्रपति को दिए जाने वाले विशेषाधिकार से भी वंचित हो जाएंगे। इसका मतलब यह भी होगा की ट्रम्प 2024 में पुनः राष्ट्रपति बनने का जो सपना पाले है उस पर भी  वैधानिक रोक लग जाएगी।

लेकिन बड़ा सवाल है की क्या सीनेट जहां रिपब्लिकन पार्टी को बहुमत हासिल है,वहां इस प्रस्ताव पर मुहर लग सकती है। वास्तव में ट्रम्प को अमेरिका के परम्परावादी समाज में जिस प्रकार लोकप्रियता हासिल है,उसे नजरअंदाज करना उनकी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों द्वारा आसान नहीं होगा। भले ही कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने इसका समर्थन किया हो लेकिन यह निर्णायक नहीं हो सकता। 2016 में सत्ता में आने वाले ट्रम्प पर अमेरिकी खुफियां एजेंसी सीआईए ने चुनाव जीतने के लिए रूस की सहायता लेने जैसे संगीन आरोप लगाएं थे 2019 में भी उन पर महाभियोग लाया गया था और उस समय एक भी रिपब्लिकन सांसद ने ट्रंप के ख़िलाफ़ वोट नहीं दिया था



इस समय महाशक्ति अमेरिका में सब कुछ असामान्य लग रहा है और इसके दूरगामी परिणाम दुनिया की राजनीति को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकते है। लोकतंत्र के बारे में यह सामान्य विचार है की इस शासन प्रणाली में लोगों को शासन व्यवस्था तक अपने विचार पहुँचाने के व्यापक अवसर मिलते है और वे जनमत को संगठित करके शासन के दृष्टिकोण को प्रभावित करने में समर्थ होते है,इसलिए विद्रोह की संभावनाएं कम हो जाती है। बाइडेन के सामने यह गहरा दबाव होगा की वे ट्रम्प की नीतियों को ख़ारिज न करें और इसकी छाया से बाइडेन का उबरना आसान भी नहीं होगा।

ट्रम्प ने 2016 का चुनाव अमेरिका के बहुप्रचारित बहुसांस्कृतिक परिवेश के समाज को चुनौती देकर लड़ा था और इसमें महती सफलता भी उन्हें हासिल हुई थी। ट्रम्प ने अपनी चुनावी रैलियों में अमेरिका की मूल पहचान बनाएं रखने के नाम पर लोगो का समर्थन माँगा था और ज्यादातर 50 से अधिक उम्र के लोगों ने ट्रम्प की नीतियों का खुलकर समर्थन किया। ट्रम्प ने राष्ट्रपति की दावेदारी में राष्ट्रवाद, बूर्जुआ तंत्र,संकीर्णता और अतिवाद पर आधारित नीतियों को उभारा था। पूरी दुनिया मे अमेरिका की छवि साझा संस्कृति वाले एक ऐसे राष्ट्र की रही है जहाँ सभी मिलजुलकर जीवन जीते है,लेकिन ट्रम्प ने अमेरिका के हितों के लिए व्यापक सुधारों की बात कहते हुए मुस्लिमों के अमेरिका में प्रवेश को प्रतिबंधित करने शुरुआत उन सात देशों से की जिन्हें दुनिया कथित तौर पर आतंक में मददगार समझती हैअमेरिका का ग्रामीण समाज मुस्लिमो को संदेह की नजर से देखता है और उनमे रंग भेद की भावना अभी भी विद्यमान है। अमेरिकी समाज के  बड़े तबके ने इसका खुल कर समर्थन किया, जबकि ट्रम्प की यह नीतियां नस्लवाद और भेदभाव पर आधारित थी। गौरतलब है की अमेरिका में प्रवासियों की अच्छी खासी तादाद है,वे ट्रम्प की नीतियों से सदा आशंकित रहे है।

राष्ट्रपति के तौर पर भी ट्रम्प की नीतियां आक्रामक ही रही। पिछले साल अमेरिका में एक काले नवयुवक की एक गोरे पुलिस अधिकारी द्वारा निर्मम हत्या के बाद पूरा देश हिंसा की चपेट में आ गया था देश भर में हिंसक प्रदर्शन  हुए और कम से कम 40 शहरों में कर्फ्यू लगाना पड़ा था कोरोना के कहर से बुरी तरह प्रभावित अमेरिका में नस्लीय भेदभाव को लेकर जिस प्रकार विरोध प्रदर्शन हो रहे थे,वह अभूतपूर्व थाइस समय अमेरिकी लोग चाहते थे कि राष्ट्रपति उनसे बात करे या देश के नाम उनका सम्बोधन हो,लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपने पद और दायित्व को दरकिनार कर अपनी परम्परावादी नीतियों का इजहार अपनी  बातों में भी किया  उन्होंने विरोध प्रदर्शनों की आलोचना करते हुए इसे आतंकवादी और अमेरिकी विरोधी ताकतों द्वारा पोषित बताया ट्रम्प यही नहीं रुके और उन्होंने देश में सेना तैनात करने की बात भी कह डाली अमेरिका में साल के अंत में राष्ट्रपति के चुनाव होने वाले थे और उनके इस बयान को देश के बिगड़े हालत को और बिगाड़ने की कोशिश के तौर पर देखा  गया। एक अश्वेत की मौत से उठे बवाल में ट्रम्प ने राष्ट्रवाद का पासा फेंककर अपने को उत्कृष्ट मानने वाले गोरे अमेरिकियों के समर्थन हासिल करने की कोशिश भी की थी।  अमेरिका में नस्लवाद की हकीकत से बराक ओबामा भी बच नहीं पाए थे। उन्होंने यह स्वीकार किया था की नस्लभेद अमेरिका के डीएनए में है और लोग नस्लीय मानसिकता से नहीं उबर पाएं है। लेकिन नस्लवाद का फायदा लेकर अमेरिकी समाज को कोई राष्ट्रपति बांटने की कोशिश करें, यह अमेरिका के अस्तित्व को ही संकट में डाल सकता है

वास्तव में ट्रम्प ने आधुनिक समाज की उस नब्ज को पकड़ कर अमेरिका की राजनीति में जगह बनाने में कामयाबी हासिल की जिसे लोकतंत्र का अधिनायकवादी दांव कहा जा सकता है। सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए दुनिया भर के कई राजनेता अपने देश में इस प्रकार की राजनीति को बढ़ावा दे रहे है। जहां अतिराष्ट्रवाद को राष्ट्रीय हितों के रूप में उभार कर उदारवाद को व्यापक संकट के रूप में पेश किया जाता है और जनता इसे अपना अस्तित्व का संकट समझ कर नेतृत्व पर अंधा भरोसा करने लगती है। ट्रम्प के पहले अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दुनिया में साथ रहने की जरूरत पर बल देते हुए कहा था की,“इस दुनिया का भविष्य इससे तय होगा की हममें क्या समानताएं है,उन बातों से नहीं जो हमे अलग करती है या संघर्ष की और ले जाती है।”

ओबामा के मुकाबले अमेरिका के नागरिकों ने ट्रम्प के अमेरिकन प्रथम के नारे को ज्यादा पसंद किया गया जिसमें अल्पसंख्यक मुसलमानों,कालों,एशियाई,अफ्रीकन,लेटिन अमेरिकन  जैसे लोगों के मुकाबलें गोरे अमेरिकन को तरजीह दी गई। ट्रम्प समर्थित ये ऐसे लोग है  जो अमेरिका की राजनीति को व्यापक रूप से प्रभावित करने की क्षमता रखते है और ट्रम्प ने अपनी इस ताकत का इजहार भी किया।

ट्रंप चुनाव हार गए लेकिन इसके बाद भी उन्होंने लगातार अमेरिकी चुनाव की वैधता को लेकर सवाल खड़े किये। चुनावी अधिकारी से लेकर अदालतों तक ने ट्रम्प के  दावों को ख़ारिज किया। इसके बाद भी ट्रम्प चुप नहीं रहे और उन्होंने नवंबर में आए चुनाव के नतीजों के ख़िलाफ़ वाशिंगटन डीसी में एक रैली में अपने समर्थकों से कहा था कि लड़ाई करो। इसकी परिणीति ही कैपिटल हिल  में हिंसा के रूप में सामने आई

अमेरिका के निचले सदन से ट्रम्प के राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगने की संभावना बहुत कम है और ऐसा कोई कार्य अमेरिका में नस्लवाद की भयावहता को नये तरीके से उभार सकता है। बाइडेन को इसका अंदाजा भलीभांति होगा। अंततः ट्रंप अमेरिका की बुजुर्ग आबादी और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बेहद परंपरावादी समाज की एकमात्र पसंद के तौर पर उभरे हैं जिसे क्रुद्ध श्वेत भी कहा जा सकता है। अब अमेरिका की राजनीति उस नये दौर में प्रवेश कर गई है जहां अमेरिका के ग्रामीण समाज की उस भावना को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा जो  मुस्लिमो को संदेह की नजर से देखती है तथा रंग भेद की भावना उनमें मजबूती से बनी हुई है। ट्रम्प सत्ता से बाहर होकर भी अमेरिका के समाज से  ख़ारिज नहीं हुए है, अत: वे अमेरिका की आगामी नीतियों को प्रभावित करने में मजबूत दबाव समूह की तरह काम कर सकते है।

बहरहाल अतिराष्ट्रवाद की भावना को हथियार बनाकर सत्ता के शीर्ष पर बने रहने के इतिहास में कई उदाहरण है,जिसमें जनता  को भ्रमित कर उनका विश्वास जीत लिया जाता है तथा जहां लोक कल्याण की भावना गौण हो जाती है। तानाशाहों के लिए सत्ता में बने रहने का यह प्रमुख अस्त्र माना जाता था। अब लोकतांत्रिक देशों में भी अधिनायकवाद मजबूत होकर कबीलाई संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है और यह दुनिया में अशांति बढ़ाने वाला प्रमुख कारक  बन सकता है

गोडसे ज्ञानशाला में महात्मा गांधी कहां कहां है,godse gyanshaa gandhi

 हम समवेत

14 janvari 2020

                 

ग्वालियर की गोडसे ज्ञानशाला में जब पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे तब महात्मा गांधी एक बार फिर याद आ गए। 31 मई 1947 को बापू ने अपनी प्रार्थना सभा में कहा था की यदि सम्पूर्ण भारत जलता रहे और मुस्लिम लीग यदि तलवार की नोंक पर इसे मांगती है तो भी हम पाकिस्तान स्वीकार नहीं करेंगे। जिन्ना गांधी को पाकिस्तान की राह मे सबसे बड़ा रोड़ा समझते थे। दरअसल गांधी विभाजन को आज़ादी के बाद तक टालना चाहते थे। वे कहते थे की आज़ादी के वातावरण में दोनों समुदाय मिलजुल कर रहना सीख लेंगे। गांधी की तमाम कोशिशों पर सांप्रदायिक ताकतों की ज़िद भारी पड़ी और अंतत: भारत का विभाजन हो गया।  बाद में जब गोडसे ने गांधी की हत्या की तो इसका बड़ा कारण भारत का विभाजन बताया गया और इसके लिए बापू को जिम्मेदार ठहरा दिया गया। अब बापू नहीं है लेकिन अखंड भारत की परिकल्पना अब भी हिलोरे मारती है,यह बात और है की बचे हुए भारत को सुरक्षित रखने की आशाएँ अक्सर धूमिल करने की कोशिशें भी होती रहती है। 


गोडसे को हिंदू महासभा से संबद्द बताया जाता है। महात्मा गांधी की हत्या में उपयोग की गई बंदूक से गोडसे की ज्ञानशाला तक के सफर में ग्वालियर का स्थान हिंदू महासभा के लिए बेहद अहम रहा है। निश्चित ही गोडसे ज्ञानशाला में हिन्दू महासभा ने देश के विभाजन को लेकर कहानियां सुनाई होगी,नाथुराम गोडसे की देशभक्ति का बखान किया गया होगा। महात्मा गांधी कहते थे कि असहमति के बिना आज़ादी अधूरी है, लिहाजा हिंदू महासभा के महात्मा गांधी के विचारों से असहमति और गोडसे के विचारों से सहमति की आलोचना अलोकतांत्रिक ही होगी। लेकिन इन सबके इतर इस संस्था के और भी उद्देश्य निर्धारित किए गए थे जिन पर प्रकाश डालना लाजिमी होगा। बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में अखण्ड हिन्दुस्तान की स्थापना को केंद्र में रखकर बनाई गई यह संस्था भारतीय संस्कृति की रक्षा करना,विभिन्न जातियों तथा उपजातियो को एक अविछिन्न समाज में संगठित करना, सामाजिक असमानता से दूर एक सामाजिक व्यवस्था का निर्माण तथा नारी सम्मान की रक्षा जैसे उद्देश्यों को अपना ध्येय बताती रही है।

महिला उत्पीड़न को लेकर भारत दुनिया भर में बदनाम है और  इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता की बेटियों की सुरक्षा को लेकर समाज में एक बेचैनी और दहशत का माहौल है। पिछले साल जारी राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते है की  देश में हर दिन बलात्कार की औसतन 87 घटनाएं हो रही है।   एनसीआरबी के मुताबिक,देशभर में 2018 के मुकाबले 2019 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में 73 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या हुई थी तब वे प्रार्थना सभा की और बढ़ रहे थे। बूढ़े बापू का बाँया हाथ मनु और दायाँ हाथ आभा के कंधे पर था। बाएं तरफ से ज्ञान शाला के मुख्य किरदार नाथूराम गोडसे गांधी की तरफ झुके,इस दौरान गोडसे ने मनु को धक्का दिया और उनके हाथ से माला और पुस्तक नीचे गिर गई। वह उन्हें उठाने के लिए नीचे झुकीं तभी गोडसे ने पिस्टल निकाल ली और एक के बाद एक तीन गोलियाँ गांधी के सीने और पेट में उतार दीं। इस दौरान भारतीय संस्कृति की अस्मिता के मुख्य तत्व नारी सम्मान,पुस्तक की गरिमा और बूढ़ी काया का सम्मान तार तार होते दुनिया ने देखा। हाथरस और बदायूं जैसी न जाने की वीभत्स घटनाएँ इस देश में रोज होती है,हिंदू महासभा के उद्देश्य के अनुसार इसके सदस्य इन घटनाओं को रोकने या इनका विरोध करते शायद ही कभी देखे गए हो।

हिंदू एकता और समानता स्थापित करने की बात करने वाली हिंदू महासभा की डायरी में झारखंड के आदिवासी भी होना चाहिए। जहां चालीस प्रतिशत से भी ज़्यादा की आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे रहती है,इनमें आदिवासी और पिछड़े तबक़े के लोग ज़्यादा हैं।  यहां पर भूख से आदिवासियों के मर जाने की खबरें आती रहती है। मरने वालों में ज़्यादातर वो लोग होते हैं जिनके पास रोज़गार के साधन नहीं हैं या फिर उन्हें समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 2017 में  झारखंड के सिमडेगा ज़िले के कारीमाटी में कोइली देवी की 11 साल की बेटी संतोषी की मौत भूख से हो गई थी।  अपने दर्द को बयां करते हुए इस बेबस माँ ने कहा था,“मैं मज़दूरी करती हूँ। तब ऐसा हुआ कि कई दिनों तक मुझे काम नहीं मिल पाया। घर में अनाज नहीं था। बेटी भूखी थी,वो बार बार भात मांग रही थी। मगर मैं कहाँ से लाती,मैंने उसे लाल चाय बना कर दी। मगर कुछ ही देर में उसने दम तोड़ दिया।”

कोइली देवी कहती हैं कि उन्हें गाँव के लोगों से भी मदद नहीं मिलती थी क्योंकि वो पिछड़े समाज से आती हैं। जब पानी भरने गाँव के चापाकल पर जाती हैं तो उसके बाद पानी भरने वाले उसे धोकर पानी भरते हैं। उसका कहना था, क्या मदद मांगूं? छुआछूत करते हैं गाँव के लोग। कोई चावल उधार भी नहीं देता,क्योंकि अगर हम उधार वापस लौटायेंगे तो वो हमारे छुए चावल को नहीं लेंगे।”

कोइली देवी आज भी उसी झोपड़ी में रहती है,उनकी समस्या जस की तस बनी हुई है। कहने के लिए वह हिंदू ही है लेकिन महासभा के सदस्य कोइली देवी की समस्याओं को देश के लिए किसी खतरे के रूप में न देखते। लेकिन गांधी को गरीबी और असमानता भारत के लिए बड़ी चुनौती लगती थी। गांधी अपने साथ लोगों के चलने का आह्वान करते हुए यह जरूर याद दिलाते थे की मेरे साथ चलना है तो सब कुछ त्याग कर चलना होगा,मोटा कपड़ा पहनना होगा,जल्दी उठना होगा,नीरस खाना खाकर अपना पेट भरना होगा तथा अपना मल स्वयं साफ करने को तैयार रहना होगा।



हिंदू महासभा का एक उद्देश्य सामाजिक असमानता को खत्म कर मजबूत हिंदू धर्म को निर्माण बताया जाता है। उनके इस उद्देश्य को गांधी ही पूरा करते नजर आते है। गांधी ने एक बार कहा था की यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो मैं अस्पृश्यों में ही जन्म लेना पसंद करूंगा जिससे मैं  उनके सम्मान के  लिए पुन: संघर्ष कर सकूँ। पूना पैक्ट के जरिए उन्होंने हिंदू धर्म का संभावित विभाजन टाल दिया था।  यही कारण है की भारत के दलित गांधी पर भरोसा करते है,हिंदू महासभा का अस्तित्व इनमें कहां है,किसी को नहीं मालूम।

हिंदू महासभा का उद्देश्य राष्ट्र को मजबूत करना बताया जाता है। राष्ट्र के मजबूत होने के लिए गरीबी को भी दूर करना पड़ेगा। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल आबादी का 30 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे ज़िंदगी बसर करता है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2020 के अनुसार वैश्विक सूचकांक में भारत का स्कोर 27.2 है। यह स्थिति गंभीर स्तर की मानी जाती है। दुनिया के 107 देशों में हुए इस सर्वेक्षण में भारत 94वें नंबर पर है,अति पिछड़े और गृह युद्द से बुरी तरह से प्रभावित देश सूडान के साथ। कोरोनाकाल में देश के 40 करोड़ मजदूर प्रभावित हुए। अनेक भूख प्यास से मर गए,पैदल चलते हुए मर गए,कई परिवार भूखे सोने को मजबूर हुए। 2017 में जब झारखंड में आदिवासियों के भूख से मरने की खबरें आई तब  झारखंड के तत्कालीन खाद्य व आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने कहा कि हमने हर आरोप की जाँच करायी लेकिन हमें भूख से मौत का कोई उदाहरण नहीं मिला। झारखंड पहला राज्य है,जिसने भूख से मौत की परिभाषा तय करने के लिए कमेटी बनायी और इसका एक प्रोटोकॉल निर्धारित किया। महात्मा गांधी यदि जीवित होते तो जरूर इन आदिवासियों की झोपड़ियों में जाते,किसी संस्था के लोग यहां तक गए न गए,पता नहीं है।

महात्मा गांधी जीवन भर व्यवस्थाओं को बेहतर करने के लिए जूझते रहे और उनके मरने के बाद उनके अनुयायी गांधी मार्ग पर चल पड़े।  गांधी की मृत्यु के बाद उनके बहुत सारे साथी और सहयोगी सेवाग्राम में जुटे,एक दूसरे से मिले और वापस अपने अपने क्षेत्रों में लौटकर दीन दुखियों की सेवा,गरीबों की बस्तियों में अध्यापन,जन जागृति,कुटीर और ग्रामोद्योग के प्रति चेतना बढ़ाने जैसे कार्यो में संलग्न हो गए

गांधी के प्रमुख सहयोगी रहे आचार्य विनोबा भावे ने आंध्रप्रदेश से भूदान आंदोलन प्रारम्भ किया। यह जमीदारों से जमीन दान में लेकर गरीबों और भूमिहीन लोगों को स्वेच्छा से जमीन दान करने का कार्यक्रम था उनका यह आंदोलन 13 सालों तक चलता रहा इस दौरान विनोबा भावे ने देश में 58 हजार किलोमीटर से ज्यादा का सफर तय किया। इसके नतीजे उत्साहवर्धक रहे  और वह गरीबों के लिए 44 लाख एकड़ भूमि दान के रूप में हासिल करने में सफल रहे। उन जमीनों में से 13 लाख एकड़ जमीन को भूमिहीन किसानों के बीच बांट दिया गया। एक और गांधीवादी बाबा आमटे को हम सब जानते है। महाराष्ट्र के चन्द्रपुर के आनंदवन में अब बाबा आमटे जीवित नहीं है लेकिन उनका आनंदवन पद दलित,वंचितों और  जरुरतमंदों का घर है जहां विश्व शांति का हर दिन संदेश दिया जाता है

गांधी की सहयोगी सरला बहन ने उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के हिमालयी जंगलों में पर्यावरणीय विनाश के बारे में लोगों में बड़ा जागरुकता अभियान चलाया और प्रख्यात चिपकों आंदोलन के विकास में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांधी मानते थे कि मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे पर निर्भर है और अभिन्न रूप से एक दूसरे से जुड़े हुए है सरला बहन  बापू की इस विचारधारा को आम जन तक पहुंचाती रही और इसका सकारात्मक प्रभाव हुआ विकास के नाम पर होने वाली कटाई पर काफी हद तक रोक लगी भारत में मैला ढोने की प्रथा के खिलाफ अभियान चलाने वाले और सुलभ शौचालयों के जनक बिंदेश्वर पाठक का जीवन और कार्य भी  गांधी के आदर्शों से प्रेरित रहे  उनके प्रयासों और सुलभ इंटरनेशनल की मदद से देशभर में सुलभ शौचालयों की श्रृंखला स्थापित की है।

यह माना जाता है की हिंदू महासभा भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार पर बल देती है,बापू के जीवन में यही सब तो दिखाई दिया था। उनके जीवन पर रामायण,राम चरित मानस और गीता का बड़ा प्रभाव था। बुराई पर अच्छाई का गुण उन्होने प्रभु श्री राम से ही सीखा था। पतंजलि से आत्म शुद्धि और अहिंसा जैन धर्म से सीखी थी। पवित्र आचरण और मन की शुद्दता के गुण उन्होने भारतीय मनीषियों से ही सीखे थे। बापू के सहयोगी विनोबा भावे ने कहा था कि  गांधी के विचारों में सदैव ऐसा मनुष्य और समाज रहा जहां वह करुणा मूलक,साम्य पर आश्रित स्वतंत्र लोक शक्ति के रूप में वह आगे बढ़े। यदि हम उसके योग्य नहीं बनते तो आज ही नष्ट हो जाने की नौबत है।

गांधी पर सवाल खड़े किए जाने चाहिए क्योंकि गांधी पर किए गए सवाल हमें गांधी के और करीब आते है। हमें और उनके बारे में समझाते है और हम अपने अंदर बैठे गांधी को उभार पाते है। गांधी को जब भी कटघरे में खड़ा किया जाता है तो गांधी के तरीकों,गांधी की नीतियों और गांधी के विचारों से ही जवाब मिलें है।

गांधी सिखाते है की उच्च नैतिक आदर्शों का पालन करते हुए भी नेतृत्व किया जा सकता है और लोकप्रियता हासिल की जा सकती है। हिंदू महासभा के लिए गांधी के गरीबों और वंचितों के लिए किए गए कार्य मार्गदर्शक हो सकते है।

 

 

 

 

 

 

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गणतंत्र बनने को बेताब भारत,gantnatra bharat

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