शुक्रवार, 14 मई 2021

खस्ताहाल कांग्रेस को क्रांतिकारी बदलावों की जरूरत,congress badlav

 सुबह सवेरे      

    

मसला ये नहीं की दर्द कितना है,मुद्दा ये हैं की परवाह किसको है। कांग्रेस का हाल कुछ ऐसा ही है। वह किस ओर जा रही है किसी को खबर नहीं लेकिन यह भी हकीकत है की पतवार थामने वाले बेखबर भी नहीं।  दरअसल चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के हाल ही में जो चुनाव परिणाम आएं है वह देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के  लिए बहुत निराशाजनक है। यह देखा गया है कि उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत,पूर्व से लेकर पश्चिम तक कांग्रेस विरोधियों से ज्यादा गुटीय राजनीति से परेशान है। आपसी कलह और  अंतर्द्वंद से जूझती कांग्रेस के लिए स्थायी अध्यक्ष का न होना मुश्किलें बढ़ा रहा है और इसका सीधा असर पार्टी के परंपरागत वोटरों पर पड़ा है। जनाधार लगातार खिसकता जा रहा है,कार्यकर्ता हताश हो रहे है,राज्यों की राजनीति क्षेत्रीय नेताओं के हित में उलझ गई है और अंतत: इसका असर चुनावों परिणामों पर भी देखना को मिल रहा है। केंद्र हो या राज्य,कांग्रेस सत्ता से दूर होती जा रही है।


   

नेतृत्व का मसला

राहुल गांधी कहते है की कांग्रेस के अध्यक्ष का चुनाव कांग्रेस के कार्यकर्ता करेंगे। लेकिन यह इंतजार बहुत लंबा हो गया है,जिसका खामियाजा पार्टी भोगने को मजबूर है। यह इंतजार जितना लंबा होता जा रहा है उतना ही उसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे है। कांग्रेस का वोट बैंक खिसकता रहा है और अनिर्णय कि स्थिति से क्षुब्ध और प्रभावित नेता पलायन करने को मजबूर हो रहे है। भारत में यह किस्सा मशहूर रहा है की राजनीति का ककहरा सीखना है तो कांग्रेस में आइये और जब मन करें,चले जाइये। आपको कोई रोकेगा नहीं। तीन दशक पहले जब कांग्रेस मजबूत थी तब तक न रोका जाता था,वह चल जाता था। लेकिन अब जब वह मैदान में बने रहने के लिए खुद ही संघर्षरत है,फिर भी कार्यकर्ताओ और नेताओं को न रोक पाना आत्मघाती साबित हो रहा है।    

 



पश्चिम बंगाल में फुरफुरा शरीफ से बेड़ा गर्क करवाया

पिछले विधानसभा चुनावों में 44 सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी का इस बार पश्चिम बंगाल में खाता भी नहीं खुला है जबकि इसकी ज़िम्मेदारी अधीर रंजन चौधरी को दी गई थी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी पश्चिम बंगाल में लोकप्रिय है और मालदा,मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में उनकी गहरी पकड़ मानी जाती है।  राहुल गांधी की सिर्फ दो सभाएं करवाई गई और अब परिणामों से साफ हो गया है की राज्य से कांग्रेस का जनाधार कितनी तेजी से सिमट गया है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस पार्टी को इस बार सिर्फ़ 3.02 प्रतिशत वोट ही मिल सके,जबकि पिछले चुनावों में पार्टी को यहाँ 12.25 प्रतिशत वोट मिले थे। कांग्रेस ने इस बार के चुनाव लेफ्ट और  एक नए  राजनीतिक संगठन इंडियन सेकुलर फ्रंट के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इंडियन सेकुलर फ्रंट का संबंध बंगाल की फुरफुरा शरीफ दरगाह से है। इस गठबंधन को लेकर कांग्रेस की खूब आलोचना हुई और उसे सांप्रदायिक बताया गया। चुनाव परिणामों से साफ है की इस गठबंधन पर मुस्लिमों ने भी भरोसा नहीं जताया और कांग्रेस के पास की सारी सीटें भी  चली गई। 


 

असम में बदरुद्दीन के सहारे कश्ती डूबोई

असम की सत्तारूढ़ भाजपा की सरकार के खिलाफ एंटी इन्कम्बेंसी का माहौल बताया जा रहा था,लेकिन कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ़ से गठबंधन करके अपनी बनती उम्मीदों को ध्वस्त कर दिया। असम में एआईयूडीएफ़ को बंगलादेशी घुसपैठियों का हिमायती माना जाता है और कांग्रेस यह जानने के बाद भी उसके साथ चुनावी मैदान में कूद पड़ी। नतीजा चारो खाने चित्त हो गई और पिछले चुनावों के मुक़ाबले पार्टी का वोट शेयर कम हो गया। घुसपैठियों को लेकर समूची पूर्वोत्तर की राजनीति में उबाल आता रहता है जाहिर है अब कांग्रेस के लिए उत्तर पूर्व की राजनीति की डगर ही मुश्किल में पड़ गई है।

 



केरल में सीएम चेहरा न दे पाने की नाकामी

केरल में हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन की परंपरा टूट गई और इसके साथ ही एलडीएफ ने सत्ता बरकरार रखते हुए इतिहास रच दिया। दरअसल कोरोना काल में केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की मुस्तैदी और लोगों से सीधा संवाद का तरीका जनता को खूब पसंद आया। ऐसा लगता है कि कांग्रेस के गठबंधन वाली यूडीएफ ने पिनराई विजयन की लोकप्रियता को नजरअंदाज किया। पिनराई विजयन से मुकाबले के लिए विपक्ष का कोई लोकप्रिय चेहरा मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के लिए जरूरी था। लेकिन केरल कांग्रेस में ओमान चांडी कैंप और रमेश चेन्नीथला कैंप दोनों एक-दूसरे को पछाड़ने में लगे रहते है और ऐसे में किसी एक चेहरे पर कोई एक फैसला हो ही न सका। अंतत: इसका खामियाजा यही हुआ कि हाथ में आती हुई सत्ता छिटक गई।


  

 तमिलनाडू में जूनियर हैसियत

तमिलनाडु में कांग्रेस ने जीत तो हासिल की है लेकिन वह इस अहम दक्षिण भारत के राज्य में द्रमुक गठबंधन के जूनियर सहयोगी के तौर पर ही पहचानी जाएगी। द्रमुक के साथ कांग्रेस का साथ बहुत पुराना रहा है लेकिन कांग्रेस के स्वयं के बल पर खड़ा करने के लिए कोई लोकप्रिय चेहरा कांग्रेस के पास नहीं है।   



 

पांडिचेरी में पूराने कांग्रेसियों की सरकार

दक्षिण भारत के छोटे से राज्य पांडिचेरी में कांग्रेस पार्टी का आंतरिक कलह इतना बढ़ गया है की पार्टी का अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है।   इस साल की शुरुआत में चार विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी। कांग्रेस में दरार की शुरुआत मंत्री ए नमास्सिवयम और ई थीप्पैनजान से शुरू हुई। उसके बाद दो और विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी जिसके बाद वी. नारायणसामी की सरकार अल्पमत में आ गई थी। इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सिर्फ दो विधायक जीत कर आएं है और कांग्रेस को हराने वाले अधिकांश उम्मीदवार कांग्रेस से ही टूट कर आएं है। 


 

 

राज्य स्तर पर टूट को न रोक पाने की कांग्रेस की नाकामी  

मध्यप्रदेश,गुजरात,महाराष्ट्र,तेलंगाना,असम,मिजोरम,नागालैंड से लेकर गोवा तक में कांग्रेस छोड़कर जाने वाले विधायकों की लंबी फेहरिस्त है। इसका एक प्रमुख कारण कांग्रेस के स्थायी अध्यक्ष का न होना रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर एकमत,निर्णय और त्वरित कदम न उठा पाने से देश भर में पार्टी टूट रही है। इसका असर पार्टी की नीतियों और योजनाओं पर भी लगातार पड़ रहा है। संगठनात्मक तौर से पार्टी कैडर खड़ा करने में नाकाम रही है। अधिकांश राज्यों में क्षेत्रीय स्तर पर नेतृत्व का अभाव देखा जा रहा है। नए और युवा नेतृत्व को ज़िम्मेदारी न देने का असर यह हो रहा है की पार्टी जमीनी स्तर पर कमजोर होकर सत्ता से दूर जाती दिख रही है और निकट भविष्य में कोई आस न दिखने पर कार्यकर्ता और नेता पाला बदलने में ही भलाई समझने लगे है।


कई राज्यों में कांग्रेस अभी भी बेहतर स्थिति में है और वहां संगठनात्मक बदलाव से बेहतर रास्ते निकल सकते है। देश और राज्यों में सत्ता से लगातार दूर होती कांग्रेस बूरी तरह से अनिर्णय की स्थिति से जूझती नजर आती है और इससे संकट बढ़ता जा रहा है। क्षेत्रीय दल जिस भी राज्य में विकल्प बने वहां कांग्रेस का लौटना मुश्किल रहा है। जाहिर है कांग्रेस को रीति,नीति,निर्णय और नेतृत्व में अतिशीघ्र बदलाव करना ही होगा नहीं तो इसके अंतिम किले भी ढहने में ज्यादा वक्त न लगेगा। 

 

शार्ली हेब्दो का आस्था पर अवांछित प्रहार,Charlie-cartoon-on-coronavirus-oxygen-crisis-in-india

 दबंग दुनिया


                 

आस्थाओं पर तर्क और बहस बेहद विवादास्पद विषय रहा है लेकिन फ्रांस की पत्रिका शार्ली हेब्दो  पिछलें कुछ वर्षों से इसे अभिव्यक्ति के अधिकार से जोड़कर वैश्विक बहुलतावादी समाज को चुनौती देती रही है। भारत की कोरोना के कहर से उत्पन्न स्थिति और सरकार की नाकामियों को लेकर वैश्विक किरकिरी हो रही है,वहीं शार्ली एब्दो ने इस व्यवस्थागत और मानवीय त्रासदी को देवी देवताओं से जोड़कर धार्मिक भावनाओं को निशाना बनाने कि कोशिश की है। यह भी तब हुआ है जब देश के करोड़ों लोग जिंदगी की जंग को लड़ने के लिए मजबूर है। हर दिन हजारों मौते होने से लोग दहशत में है,अपनों को खोने और न बचा पाने के गम में डूबे हुए है। लोगों के पास अपनो का दाह संस्कार करने के लिए संसाधन नहीं है। नदियों में लाशों को बहा दिया जा रहा है और इस मानवीय त्रासदी को दुनिया देख रही है।


मानव अस्तित्व पर ऐसे संकट इतिहास में आते रहे है लेकिन इन संकटों से जूझने में आस्थाएं सबसे ज्यादा मददगार रही है। आस्थाएं भिन्न भिन्न हो सकती है लेकिन अंतत: उसके पीछे संस्कृति और सभ्यता की छाप होती है और आस्था का यही गुण मनुष्य को वह ऊर्जा देता रहा है जिससे उसका विकास हो सके। अभिव्यक्ति के अंतर्द्वंद को समालोचना,आलोचना और असहमति के आधार पर अपने अपने अनुसार परिभाषित किया जा सकता है। अभिव्यक्ति की अंगड़ाई से ही सर्वकालीन मानव इतिहास गढ़े गए है लेकिन यह भी यथार्थ है कि वैचारिक प्रतिबद्धताओं  का रुख देशकाल समय और परिस्थितियों की प्रासंगिकताओं के अनुसार तय होता रहा है। जहां तक अभिव्यक्ति का संबंध है तो इसके विविध आयाम हो सकते है लेकिन अभिव्यक्ति कभी पीड़ा का कारण नहीं बनना चाहिए,इसे सभ्य समाज को समझने की जरूरत है। ऐसा भी नहीं है कि शार्ली हेब्दो  ने पहली बार यह किया हो यह पहले भी सत्ता विरोधी व्यंग्य छापती रही है तथा  अति दक्षिणपंथी ईसाई,यहूदी और इस्लामिक मान्यताओं पर प्रहार करने को लेकर यह पत्रिका लंबे समय से विवादों में रही है।


2006 में इस पत्रिका ने पैगंबर मोहम्मद साहब पर आधारित कार्टून छापा था और इसके बाद शुरू हुआ विवाद डेढ़ दशक बाद भी दुनिया को प्रभावित करता रहा है। 2015 में इस्लामिक कट्टर पंथियों ने इस पत्रिका के कार्यालय पर हमला करके वहां काम करने वाले कई लोगों को मार डाला था। इन सबके बीच इस पत्रिका को फ्रांस की सरकार का अभूतपूर्व समर्थन विवादों को बढ़ाता रहा है।  गौरतलब है कि पिछले साल एक धर्मांध नवयुवक द्वारा फ्रांस में एक शिक्षक का गला रेत कर हत्या कर दी गई थी और इसके पीछे इस पत्रिका में छपे कार्टूनों को लेकर उनका समर्थन ही बताया जाता है। इसकी प्रतिक्रिया जिस प्रकार से सामने आई वह मानवीय अस्तित्व के लिए संकट पैदा करने वाली है। मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने इस  हत्या को न्यायोचित ठहराते हुए कहा की,‘मुस्लिमों को गुस्सा करने का और लाखों फ्रांसीसी लोगों को मारने का पूरा हक है।फ्रांस में पैंगबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर छिड़ी बहस के बीच ही नाइस शहर में एक और हमला हुआ था। जहां हमलावर ने अल्लाह हूँ अकबर के नारे लगाते हुए स्थानीय चर्च पर हमला किया,इसमें तीन लोगों की मौत हो गई एक महिला का गला काट कर निर्मम हत्या कर दी गई थी। इन घटनाओं से साफ है कि शार्ली हेब्दो  कि अभिव्यक्ति को लेकर अनियंत्रित विचार आस्थाओं को प्रभावित करते रहे है और इसका खामियाजा समाज के सभी वर्गों को भोगना पड़ रहा है।


इन सबके बीच यह भी बेहद दुखद है कि शार्ली हेब्दो  का धर्म को लेकर नजरिया कभी भी सकारात्मक नहीं रहा है। जबकि धर्म अलग अलग मान्यताओं के साथ जीवन जीने का एक तरीका है जिसमें आम तौर पर आस्था के सहारे शांति को खोजा जाता है और जहां शांति की परिकल्पना हो वहां सदाचार,सहिष्णुता,सादगी,दया,करुणा जैसे मानवीय गुण स्वत: आचरण और व्यवहार में आ जाते हैप्राचीनकाल से भारतीय समाज इस अवधारणा  पर विश्वास और पालन करता रहा है की धर्म का सर्वस्व यह है की सुनो और सुनकर उस पर चलो,अपने को जो अच्छा न लगे,वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये। धर्म को लेकर स्वामी विवेकानन्द का नजरिया बेहद साफ था वे कहते थे,धर्म वाद-विवाद में नहीं है,वो तो प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है जिस प्रकार गुड़ का स्वाद खाने में है,उसी तरह धर्मको अनुभव करो,बिना अनुभव किए कुछ भी न समझोगे


इस समय पाकिस्तान में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन शार्ली हेब्दो को लेकर ही विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं,तहरीक--लब्बैक का विरोध प्रदर्शन पाकिस्तान की इमरान ख़ान सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है। भारत का समाज उदार माना जाता है अत: यहां से ऐसे किसी विरोध की संभावना कम ही है। भारतीय समाज में न तो किसी के गले काटे जाते है और न ही यहां किसी कि पत्थर मार कर हत्या  की जाती है। इसलिए निश्चित ही भारत में ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं होंगी। लेकिन शार्ली हेब्दो को अपने उद्देश्य के प्रति जिम्मेदार,पारदर्शी और सजग होने कि जरूरत है।


शार्ली हेब्दो को मेडिकल ऑक्सीजन को लेकर भारत की सरकार कि नाकामी को उभारा,वह अभिव्यक्ति को लेकर उसका अधिकार हो सकता है लेकिन जिस प्रकार मानवीय आपदा को धर्म से जोड़ा वह दुखद और शर्मनाक है। बेहतर होता शार्ली हेब्दो अपने कार्टूनों के जरिये कोरोना काल के बीच चुनावी सभाएं करते नेताओं पर कटाक्ष करती। अंतत: यह पत्रिका सत्ता विरोधी व्यंग्य  छापती है और उसे धर्म पर अवांछित हमलें करने से परहेज करना चाहिए।

शुक्रवार, 7 मई 2021

वैदेशिक सहायता का दंश,india covid 19 foreign help

 राष्ट्रीय सहारा


                                

राष्ट्रीय हितों को शुद्ध लक्ष्य माना जाएं तो इस समय हमारी वैदेशिक नीति सिर के बल खड़ी हुई नजर आती है। भारत में कोरोना से हाहाकार और लोगों की चित्कार के चित्र पूरी दुनिया को विचलित कर रहे है वहीं भारत सरकार कि महामारी से निपटने की विफलता को राजनीतिक अदूरदर्शिता की तरह देखा जा रहा है। दरअसल भारत के द्वारा स्वयं की आपातकालीन स्वास्थ्य जरूरतों को नजरअंदाज कर विदेशों से संबंध मजबूत करने के लिए सरकार की वैक्सीन डिप्लोमेसी की नीति,और उसके बाद देश में हालात बद से बदतर होने पर विदेशों से सहायता की गुहार से एक मजबूत नजर आने वाले राष्ट्र की छवि को गहरा धक्का पहुंचा है।


चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के ए सोशल मीडिया अकाउंट से भारत में जारी कोरोना संकट का मजाक बनाया गया है। इसमें एक चित्र दिखाई दे रहा है जिसमें एक और भारत में चिताएं जल रही है वहीं चीन का राकेट अंतरिक्ष में जाने को तैयार है। इसके पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर महामारी से निपटने के लिए मदद का भरोसा दे चूके है।  इन दिनों दुनियाभर के समाचार पत्रों में भारत के अस्पतालों की बदहाली,रोते बिलखतें लोग, जलती चिताओं के ढेर,ऑक्सीज़न के लिए लगती हुई लंबी पंक्तियां,शमशान घाटों के बाहर अपने परिजनों की अंत्येष्टि की प्रतीक्षा करते लोग,लाशों के बोझ से जल चूकी चिमनियाँ और सरकारी विफलता को प्रमुखता से छापा जा रहा है। जाने माने अखबार गार्जियन ने विशेषज्ञों के हवाले से इस संक्रमण की वजहें बताते हुए लिखा है,वायरस ग़ायब हो गया है। यह ग़लत तरीक़े से समझते हुए सुरक्षा उपायों में बहुत जल्दी ढील दे दी गई। शादियों और बड़े त्योहारों को आयोजित करने की अनुमति थी और मोदी स्थानीय चुनावों में भीड़ भरी चुनावी रैलियाँ कर रहे थे।  


इसके पहले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने करीब डेढ़ दशक पहले विदेशी स्रोतों से अनुदान एवं सहायता न लेने का फैसला किया था। इसके बाद इस नीति का पालन आपदाओं के समय भारत ने बखूबी किया भी था।  2013 में आई उत्तराखंड बाढ़ और 2014 की कश्मीर बाढ़ के समय भारत ने विदेशी सहायता लेने से इंकार कर दिया था। इस समय दुनियाभर से भारत के लिए मदद के लिए हाथ तो बढ़ाएँ गए है लेकिन सरकार की अदूरदर्शिता पर भी निशाना साधा जा रहा है। यह अस्वाभाविक भी नहीं है। प्रसिद्ध साइंस जर्नल नेचर में रिपोर्ट आई है कि भारत की सरकार ने वैज्ञानिकों की सलाह न मानकर कोरोना नियंत्रण का अच्छा मौका खो दिया।  


वास्तव में भारत ने अपने नागरिकों की सुरक्षा को उम्र के अनुसार तय करते हुए 80 से ज़्यादा देशों में कोरोना वैक्सीन की तकरीबन साढ़े छह करोड़ डोज पहुंचाई है,इसमें अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देश भी शामिल है। यहीं नहीं भारत में इस साल ऑक्सीज़न का बेहतर उत्पादन हुआ लेकिन इसे विदेशों में निर्यात कर दिया गया। इसी प्रकार भारतीय कंपनियों से वैक्सीन को लेकर भारत की सरकार ने ऐसा कोई करार नहीं किया जिससे देश के सभी नागरिकों को वैक्सीन की उपलब्धता जल्दी सुनिश्चित हो पाती। कोरोना से निपटने की योजनाओं में गंभीर खामी का ही नतीजा है की भारत को विदेशों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर होना पड़ा। भारत में करीब तीन महीने तक रेमेडिसिवर का उत्पादन बंद था,अब इसकी जरूरत बढ्ने पर मांग के अनुसार आपूर्ति कर पाने में कंपनियाँ असमर्थ है। इस मामले में भी भारत को मिस्र,बांग्लादेश,उज़्बेकिस्तान और यूएई से मदद लेने को मजबूर होना पड़ा है। इस समय अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस,जर्मनी, रूस,आयरलैंड,बेल्जियम,रोमानिया,लक्जमबर्ग,पुर्तगाल,स्वीडन,ऑस्ट्रेलिया,

सिंगापुर,सऊदी अरब,हांगकांग,थाइलैंड,फिनलैंड,स्विटजरलैंड,नार्वे,इटली और यूएई मेडिकल सहायता भारत भेज रहे हैं। इसमें   ऑक्सीज़न,  वेंटिलेटर, मोबाइल ऑक्सीजन जेनेरेटर, बाईपैप और अन्य जरूरत के मेडिकल साजोसामान शामिल है। हालात यह है कि भारत को पहली बार पड़ोसी देशों से मदद लेने को मजबूर होना पड़ा है। असम सरकार भूटान कि ओर ऑक्सीज़न के लिए देख रही है।  भारत को मदद केवल पाकिस्तान ही नहीं बल्कि बांग्लादेश से भी मिल रही है। पाकिस्तान में यूरोपियन यूनियन की राजदूत एंद्रोउला कामिनारा ने ट्वीट कर पाकिस्तान कि भारत के लिए एयर स्पेस का उपयोग करने की अनुमति देने की सराहना की है वहीं बांग्लादेश ने एंटी-वायरल दवाई,पीपीई किट्स और ज़िंक,कैल्सियम,विटमीन सी के साथ अन्य ज़रूरी  सामान भारत को उपलब्ध कराने को कहा है।


वैश्विक मदद की चर्चा पूरी दुनिया में अलग अलग प्रकार से हो रही है। इसके मानवीय रूपों के साथ भारत की राजनीतिक और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर भी निशाना साधा जा रहा है।  यूरोपीय कमीशन ने यह कहने से गुरेज नहीं किया कि भारत से मदद की गुज़ारिश मिलने के बाद वह जल्द से जल्द ज़रूरी दवाएं और मेडिकल सप्लाई भारत भेजने की तैयारी कर रहा है। वहीं सिंगापुर के हेल्थ केयर ट्रेड एसोसिएशन की सीईओ हरजीत गिल ने यह स्वीकार किया है कि भारत के लोग उनकी ओर मदद के लिए देख रहे है। जिसमें ख़ासकर ऑक्सीजन,पीपीई किट्स,दवाएं,वेंटीलेटर्स या अस्पताल में काम आने वाली अन्य चीजों की मांग की जा रही है। इन सबके बीच वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा है कि उन्हें धमकी के कारण भारत छोड़ना पड़ा है। उन्होंने कई राजनीतिज्ञों,कई राज्यों के मुख्यमंत्री और  भारत के कई प्रभावशाली लोगों पर निशाना साधते हुए कहा है कि वे उन पर वैक्सीन जल्दी देने के लिए दबाव बना रहे है।


यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल अक्तूबर में  कनाडा इंडिया इन्वेस्ट सम्मेलन में कहा था कि कोरोना के दौर में भारत ने दुनिया के करीब 150 देशों में कई दवाइयों का निर्यात करके फार्मेसी के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। वास्तव में भारतीय फार्मा उद्योग मात्रा के आधार पर दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार है और भारत विश्व को सबसे अधिक जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने वाला देश है। भारत अकेला ऐसा देश है, जिसके पास अमेरिकी दवा नियामक यूएसएफडीए के मानकों के अनुरूप अमेरिका से बाहर सबसे अधिक संख्या में दवा बनाने के संयंत्र हैं। जाहिर है सवाल यह भी है कि यदि भारत की इन क्षमताओं का अपने ही देश में योजनाबद्द उपयोग किया जाता तो  भारत में लाखों लोगों की ज़िंदगी को बचाया जा सकता था।


इस समय भारत स्याह सच्चाइयों से रूबरू हो रहा है जिसमें एक यह भी है कि स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भारत लंबे समय से जूझ रहा है और यही कारण है की देश में लाखों लोग ऑक्सीज़न,दवाइयों और बेड की कमी से मर गए है। भारत को क्यूबा जैसे देशों से सीखना चाहिए जहां वैश्विक प्रतिबंधों के बाद भी स्वास्थ्य कि मुफ्त और उच्च कोटि कि सेवाएं अपने नागरिकों को दी जाती है। इसे वहां की सरकार ने कई दशकों से अपनी प्राथमिकता में रखा और उसके उजले परिणाम भी रहे है।


बहरहाल कोरोना महामारी से निपटने की असफलता से भारत के राष्ट्रीय हित और वैश्विक छवि को गहरा नुकसान हुआ है। दक्षिण एशिया के देशों में चीन की स्वीकार्यता और उस पर निर्भरता बढ्ने से भारत के सामने सामरिक चुनौतियां बढ़ सकती है वहीं वैश्विक महाशक्ति और मजबूत अर्थव्यवस्था के दावों की असलियत सामने आ गई है।

क्यूबा पर अमेरिकी छाया,cuba america

 

जनसत्ता



                    

                                                                        

मुक्केबाज़ी भले की आक्रामक खेल हो लेकिन उसका नियम यह है की इसमें एक ही वजन के दो लोग अपनी मुट्ठी का प्रयोग कर लड़ाई लड़ते है। कैरिबियन देश क्यूबा के मुक्केबाज़ इस नियम से भलीभांति परिचित रहे है लेकिन वहां के शासकों ने अपने से कहीं ज्यादा ताकतवर अमेरिका को चुनौती देने से गुरेज नहीं किया। क्यूबा में छह दशक बाद साम्यवाद के घोर समर्थक रहे कास्त्रो परिवार से अलग कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च पद की कमान नए हाथों में आई है। यह न केवल क्यूबा बल्कि अमेरिका के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका लंबे समय से क्यूबा में लोकतांत्रिक और उदार शासन व्यवस्था स्थापित करने के लिए प्रयासरत रहा है।  फिदेल कास्त्रो के शासन और जीवनकाल में साम्यवादी प्रभाव को खत्म करने के तमाम कूटनीतिक,राजनीतिक,खुफिया और आर्थिक प्रयास नाकामयाब रहने के बाद क्यूबा में राजनीतिक नेतृत्व में हालिया बदलाव पर अमेरिका की गहरी नजर है और इसके दूरगामी परिणाम सामरिक रूप से शक्ति संतुलन की नई संभावनाओं को जन्म दे सकते है। देखना यह है कि इस साम्यवादी देश पर इसका कितना असर पड़ेगा और वैश्विक राजनीति इससे कितनी प्रभावित हो सकती है।


क्यूबा इस समय गहरे आर्थिक संकट से गुजर रहा है और वहां के लोग अमेरिकी प्रतिबंधों से राहत चाहते है। ओबामा ने क्यूबा से संबंध सामान्य करने कि कोशिशें भी की थी जिसे ट्रंप ने नकार दिया था। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिकी प्रशासन ने देश के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के फैसले को पलटते हुए क्यूबा को आतंकवाद प्रायोजित करने वाले देशों की सूची में फिर से शामिल कर दोनों देशों के बीच संबंध सामान्य होने की कोशिशों को करारा झटका दिया था। अब बाइडेन की अगुवाई में बेहतर सम्बन्धों की आस बनती दिखाई तो दे रही है लेकिन क्यूबा का नया नेतृत्व इसके लिए किस सीमा तक तैयार होगा,यह देखना दिलचस्प रहेगा।    



दरअसल दुनिया की सबसे बड़ी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था संयुक्त राज्य अमरीका की दक्षिण पूर्व सीमा से महज़ 366 किलोमीटर दूर स्थित साम्यवादी देश क्यूबा आबादी और क्षेत्रफल के हिसाब से अमेरिका से बहुत छोटा है। फिदेल कास्त्रो ने जब 1959 में साम्यवादी क्रांति लाकर सत्ता संभाली तो अमरीका ने क्यूबा की वामपंथी सियासत को कड़ी चुनौती के रूप में देखते हुए उससे अपने राजनयिक संबंध तोड़ डाले थे। पूंजीवाद और साम्यवाद की घोर प्रतिद्वंदिता के युग में तत्कालीन सोवियत संघ के लिए अमेरिका पर दबाव बढ़ाने का यह बढ़िया मौका हाथ लगा था और उसने क्यूबा को अपना रणनीतिक भागीदार बनाकर अमेरिका और यूरोप के लिए सुरक्षा का नया संकट भी पैदा कर दिया था। फिदेल कास्त्रो को पूंजीवादी साम्राज्यवाद से इतनी चिढ़ थी कि उन्होंने अपने देश में आर्थिक रूप से शक्तिशाली अमेरिकी व्यापारियों और संस्थाओं को उखाड़ फेंकने के लिए सभी निजी उद्योग,बैंकों और व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर दिया,इस प्रकार इन सब पर सरकारी नियंत्रण हो स्थापित हो गया। इस समय क्यूबा के संबंध अमेरिका से इतने बिगड़े की कई दशकों तक दोनों देशों में तनातनी बनी रही और इसका व्यापक असर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ा। 1960 में अमेरिका ने क्यूबा पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर दबाव बढ़ाने की कोशिश तो की लेकिन तत्कालीन सोवियत संघ कि आर्थिक मदद के बूते फिदेल कास्त्रो ने पूंजीवादी ताकतों के सामने झुकने से इंकार कर दिया। कास्त्रो ने 1962 में सोवियत यूनियन को अपने देश में परमाणु मिसाइल लगाने की इजाज़त देकर तृतीय विश्व युद्द की आशंका को बढ़ा दिया था। कास्त्रो ने अफ्रीका में अपने सैनिकों को भेजा और अंगोला समेत मोजाम्बिक के मार्क्सवादी छापामार लड़ाकों का समर्थन कर अमेरिका के लिए लगातार मुश्किलें बढ़ायी। 1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद वैश्विक स्थितियां भी बदली लेकिन फिदेल कास्त्रो का रुख अमेरिका को लेकर आक्रामक बना रहा।


एक समय ऐसा भी आया जब फिदेल कास्त्रो साम्यवाद और अमेरिकी विरोध का मुखर चेहरा बन गए और वैश्विक मंच पर उन्होंने अमेरिकी नीतियों की खुलकर आलोचना भी की। अमेरिका के प्रतिबंधों के बाद भी फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व में क्यूबा ने कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व सफलताएं अर्जित की। लोककल्याणकारी राज्य की दिशा में अहम कदम उठाते हुए अनेक सैन्य संस्थानों को स्कूल में बदल दिया गया, देश में अच्छी चिकित्सा व्यवस्था को लोगों को मुफ़्त मुहैया कराया गया। इसने क्यूबा की शिशु मृत्यु दर को बड़े विकसित देशों के बराबर ला खड़ा कर दिया। जमीन का बंटवारा छोटे किसानों में किया गया और विदेशियों के लिए खेती करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। ऐसे कदमों से उनकी लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। क्यूबा चीनी और काफी का बड़ा उत्पादक और निर्यातक रहा है,इसके साथ ही पर्यटक भी इस खूबसूरत देश को पसंद करते है लेकिन अमेरिकन प्रतिबंधों के चलते क्यूबा की अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान हुआ।  इन सब चुनौतियों से जूझते हुए भी फिदेल कास्त्रो इसीलिए सत्ता में बने क्योंकि उन पर जनता का गहरा विश्वास था और वे सामाजिक कल्याण की अपनी कोशिशों को बनायें रखने के लिए कृत संकल्पित भी दिखाई देते थे। ख़ास तौर से मुफ़्त पढ़ाई और मुफ़्त इलाज या फिर ग़रीबों को मिलने वाली सब्सिडी में किसी बदलाव करने को लेकर वे कठिन स्थिति में भी तैयार नहीं हुए।


दुनिया भले ही फिदेल कास्त्रो को घोर साम्यवादी कहे लेकिन वे यह भलीभांति जानते थे कि मार्क्सवाद एक विचारधारा है,राजनीतिक सिद्धांत नहीं। फिदेल कास्त्रो और उनके भाई राउल कास्त्रो ने क्यूबा में उनके छह दशक के शासनकाल में साम्यवादी विचारधारा का वैश्विक प्रदर्शन तो किया गया लेकिन जनता पर उसे थोपने की वैसी कोशिशें नहीं की गई जिसके माओ समर्थक थे।  माओ ने एक निरंतर क्रांति का सिद्धांत देते हुए कहा था कि समाजवादी क्रांति के बाद जब आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद स्थापित कर दिया जाता है,तब भी जन साधारण के मन में पूंजीवादी संस्कार बने रहते है। उन्हें मिटाने के लिए क्रांतिकारियों को निरंतर क्रियाशील रहना चाहिए अन्यथा समाजवाद कि नींव सुदृढ़ नहीं हो पाएगी और क्रांति का काम अधूरा रहेगा। हालांकि उनकी सोच कुछ अलग थी। करीब एक दशक पहले एक कार्यक्रम में क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो ने कहा था कि अब वह महसूस करते हैं कि यह सोचना एक भूल थी कि समाजवाद सभी आर्थिक समस्याएं सुलझा सकता है।


फिदेल कास्त्रो और उनके भाई राउल कास्त्रो को गुरिल्ला युद्द का लंबा अनुभव था लेकिन शासन व्यवस्था को लेकर उनकी सोच जनता को प्रभावित करती रही। मार्क्स ने धर्म को अफीम बताया था लेकिन क्यूबा और अमेरिका के संबंध सामान्य करने में वेटिकन सिटी के पोप का गहरा योगदान रहा। ओबामा के रूप में किसी अमेरिकन राष्ट्रपति ने आठ दशक बाद क्यूबा की जो यात्रा की थी,उसका प्रमुख कारण कैथोलिक बाहुल्य क्यूबा पर पोप का प्रभाव ही था। जाहिर है फिदेल कास्त्रो धार्मिक आस्थाओं को लेकर साम्यवादी विचारधाराओं जैसे उग्र नहीं थी और न ही जनता से उनका व्यवहार ऐसा था।

हाल ही में क्यूबा में राउल कास्त्रो ने कहा वह क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व युबा पीढ़ी को सौंप रहे है।  कम्युनिस्ट पार्टी क्यूबा में एकमात्र दल है और लोगों की आशाओं का केंद्र भी है। इन सबके बीच क्यूबा के लोग अमेरिका से बेहतर सम्बन्धों को देश के भविष्य के लिए बेहतर तरीके से देख रहे है। क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी यह बखूबी जानती है कि अमेरिका से बेहतर सम्बन्धों का फायदा उसकी अर्थव्यवस्था को मिलेगा। देश में पर्यटन और रोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी जिससे देश में बढ़ती गरीबी और असमानता को रोकने में बड़ी मदद मिल सकती है।

हालांकि अमरीका को लेकर क्यूबा की साम्यवादी सरकार आशंकित रही है।  1961 में क्यूबा के निर्वासितों ने सीआईए के समर्थन के बूते क्यूबा के एक द्वीप पर कब्जे की कोशिश की थी। इसके साथ ही ऐसे तथ्य भी सामने आये है जिसके अनुसार सीआईए ने कई मर्तबा फिदेल कास्त्रो की हत्या की कोशिशें की थी। यह अविश्वास क्यूबा के नए नेतृत्व को परेशान कर सकता है और ऐसे में वे कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता को मजबूत रखने के लिए चीन और रूस की ओर देख सकते है। क्यूबा से चीन और रूस के मजबूत सम्बन्ध है और ये दोनों देश लातिन अमेरिकी देशों से संबंध बेहतर करने का कोई भी मौका नहीं खोना चाहते। लातिन अमेरिकी देशों में गरीबी और अस्थिरता रही है। कोरोना महामारी के बाद कई देश संकट में है।  कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ वैक्सीन तैयार कर इन देशों ने कई देशों का इसका आयात किया है,इनमें से कई देश तो लातिन अमेरिका के ही है।  वैसे बाइडेन प्रशासन की पूरी कोशिश होगी की वह क्यूबा के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का फायदा उठायें और चीन और रूस जैसे देशों को वहां से दूर रखें। 


यह भी संभावना है कि क्यूबा चीन का वह मॉडल अपना सकता है जिसके अनुसार देश की राजनीति पर तो कम्युनिस्ट पार्टी का ही आधिपत्य होगा लेकिन अर्थव्यवस्था को लेकर खुलापन आ सकता है और यह मुक्त बाज़ार व्यवस्था की ओर जा सकती है। ऐसी संभावनाओं के द्वार 2011 में ही खुल गए थे जब राउल कास्त्रो क्यूबा के राष्ट्रपति थे और उन्होंने लोगों को व्यापार के कुछ सीमित अधिकार दे दिए थे। इस साल क्यूबा की सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था में एक बड़ा सुधार देखा गया है और सरकार द्वारा यह घोषणा कि गई है कि सरकार केवल कुछ क्षेत्रों से संबंधित उद्योगों का संचालन करेगी,बाक़ी क्षेत्रों में निजी व्यवसायों को बढ़ावा दिया जाएगा। सरकार के इस क़दम से क्यूबा में होने वाली लगभग सभी आर्थिक गतिविधियों में निजी भागीदारी का रास्ता खुल जाएगा और इसका फायदा पड़ोसी देश अमेरिका को मिल सकता है। हालांकि इसे लेकर अमेरिका की ओर से अभी तक कोई महत्वपूर्ण घोषणा नहीं हुई है। 


अमेरिका का क्यूबा में प्रभाव बढ्ने का मतलब यह होगा कि इस देश में बहुदलीय लोकतंत्र और निजी निवेश कि संभावनाएं जागेगी,इसके साथ ही पूंजीवाद को बढ़ावा मिलेगा। क्यूबा का मध्यमवर्ग ऐसी ही नीतियां चाहता है और अब वह इसका इजहार भी करने लगा है। फिदेल कास्त्रो और राउल कास्त्रो के प्रति क्यूबा के लोगों में गहरा सम्मान रहा है लेकिन नए नेतृत्व के प्रति भी वह बना रहे,इसकी संभावना कम ही है। क्यूबा का नया नेतृत्व अमेरिका से संबंध बेहतर करके अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। बाइडेन को लंबा राजनीतिक अनुभव है और वे यह जानते है कि शक्ति संतुलन किसी विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्था का आवश्यक लक्षण नहीं है। लोकतांत्रिक और सर्वाधिकारवादी दोनों  प्रकार के राज्य इसका प्रयोग कर सकते है। अत: उन्हें क्यूबा के वर्तमान साम्यवादी नेतृत्व से बात करने में कोई परेशानी नहीं होगी।  बहरहाल क्यूबा को अपनी आर्थिक स्थिति को बेहतर करने की ओर तेजी से आगे बढ़ना है वहीं अमेरिका अपने पड़ोस से साम्यवाद को संतुलित करना चाहता है। ऐसे में दोनों देशों के बीच रिश्तों की नई शुरुआत की मजबूत संभावनाएं बनती दिख रही है। 

brahmadeep alune

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