शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

क्या संविधान ख़तरे में है,sanvidhan khtre men hai

 

पॉलिटिक्स

                              


संविधान के लिए सिर्फ यह काफी नहीं है कि उसमें लिखा क्या गया है,बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि संविधान को आप किस तरह पढ़ रहे है,समझ रहे है और उसे किस तरह पढ़ाया जा रहा है। यहां तक की उसकी व्याख्या किस तरह की जा रही है,यह भी अहम हो जाता है। डॉ.आंबेडकर इस बात को भलीभांति जानते भी थेउन्होंने कहा भी था कि संविधान पर अमल केवल संविधान के स्वरूप पर निर्भर नहीं करता,बल्कि व्यवस्थाओं का संचालन करने वाले लोगों तथा अपनी राजनीति की पूर्ति के लिए बनाये जाने वाले राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है


आज़ाद भारत के लोकतांत्रिक जीवन में संविधान को अलग अलग तरीके से समझने और समझाने की कोशिशें बेहद आम है  वैसे देश का संविधान इतना उदार और वृहत है की न्यायालय के इतर भी लोग और राजनीतिक पार्टियां अपनी पसंद के अनुसार संविधान को देखने और समझने की कोशिश करते रहते है।  संविधान लागू ही हुआ था कि 1951 में रोमेश थापर बनाम राज्य मद्रास के मामले में न्यायालय की एक संविधान पीठ द्वारा यह कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय का गठन  लोगों के मौलिक अधिकारों के रक्षक और संरक्षक के तौर पर किया गया है।  जाहिर है इससे यह साफ हो जाता है कि कोई अन्य संस्था या निकाय आम जनमानस के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकती। आज़ादी के बाद सैंकड़ों ऐसे मामले मिल जाएंगे जब राजनीतिक या सामाजिक द्वेषवश लोगों को कानूनी मामलों में फंसा दिया जाता है। वे दसों साल जेल कि सजा काट चुके होते है,तब यह तथ्य सामने आता है कि वे निर्दोष है। इस दौरान कथित मुलजिम का परिवार बर्बाद हो चूका होता है,जवान बेटे कि रिहाई का इंतजार करते बूजुर्ग माँ बाप मर जाते है। पत्नी और कहीं चली जाती है और जेल से निकलने के बाद जिंदगी में सब कुछ लूट चूका होता है। ऐसे मामलों में पुलिस की जांच और न्यायालय का निर्णय का फैसला सब कुछ तय कर देता है लेकिन इन गंभीर गलतियों को व्यवस्था का एक अंग स्वीकार कर लिया गया है। 


1973 में सुप्रीम कोर्ट ने  केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ़ केरला केस में कहा था कि संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को नहीं बदला जा सकता है। कोई भी संशोधन प्रस्तावना की भावना के खिलाफ़ नहीं हो सकता है। यह देखा गया है कि कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के लिए ऐसी कोई व्यवस्था स्वीकार्य करना मुश्किल हो जाता है जहां उनकी सर्वोच्चता को चुनौती मिले।  ऐसे में संविधान में इच्छा के अनुसार बदलाव भी हुए,समीक्षा करने का दुस्साहस भी किया गया और इसके साथ ही संवैधानिक पदों पर बैठे जिम्मेदार नेता चुनावी सभाओं में प्रस्तावना की भावना की सरेआम धज्जियां उड़ाने से नहीं चूकते है। यह बात और है कि चुनाव आयोग किस पर संज्ञान ले और किस पर खामोशी ओढ़ ले,इसे लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने 703 पन्नों का फैसला दिया था और यह  साफ किया था की संसद की शक्तियां अनियंत्रित नहीं हैं। लेकिन सरकार,उनके नुमाइंदों और बहुमत को कैसे नियंत्रित करें,यह संकट भी बना रहता है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में रिकार्ड लोकसभा सीटें जीतकर बनने वाली राजीव गांधी की सरकार ने शाहबानों के केस में समानता के अधिकार के कानूनी ढांचे को ही निशाना बनाने से गुरेज नहीं किया,तो कर्नाटक के एक दिग्गज नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री अनंतकुमार हेगड़े ने भारत के संविधान से 'सेक्युलर' शब्द को हटाने कि बात कह दी।


 

अटल बिहारी वाजपेई की सरकार ने संविधान  से उत्पन्न विसंगतियों को दूर करने के लिए एक समीक्षा आयोग बनाया और उसकी कमान एक पूर्व न्यायधीश को सौंप दी। इस पर तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने तल्ख टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि संविधान में परिवर्तनों के बजाय राजनेताओं को अपने आचरण में परिवर्तन करना चाहिए। क्योंकि संविधान निर्माताओं ने जिन आदर्शों का निर्माण किया था उनका खुला उल्लंघन हो रहा है।  इंदिरा बनाम राज नारायण 1975 के वाद में मुख्य न्यायाधीश ए.एन. रे मुक्त तथा निष्पक्ष चुनाव को संविधान के आधारभूत ढांचे का भाग नहीं माना। आस्टिन ग्रेनविले की किताब वर्किंग ए डेमोक्रेटिक कांस्टिट्यूशन- ए हिस्ट्री ऑफ द इंडियन एक्सपीरियंस में लिखा है  कि जस्टिस रे अक्सर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को फोन करके उनसे बात करते थे।  बल्कि कई बार वो मामूली बातों पर प्रधानमंत्री के निजी सचिव को भी फोन करके उनसे सलाह लिया करते थे। जस्टिस रे के ही कार्यकाल के दौरान देशभर में आपातकाल लगाया गया था। लेकिन भारत की राजनीतिक परंपरा का यह एकमात्र सिर्फ उदाहरण है, ऐसा भी नहीं है। पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई न्याय के देवता बनकर भी संतुष्ट नहीं हुए और न जाने किस ख्वाईश को लिए राज्यसभा में चले गए। राजनीतिक दृष्टि से भी तो यह निर्णय ठीक नहीं। और जहां तक संवैधानिक दृष्टि की बात है तो उसके लिए उन्मुक्त आसमान है। 


संविधान सभा के उच्च विद्वानों के बीच देश के निर्माण की समग्र दृष्टि के साथ  डॉ. आंबेडकर ने यह महत्वपूर्ण चेतावनी दी थी कि जनता को अपनी मांगों को पूरा करने के लिए संविधानेतर आंदोलनों से अब परहेज़ करना चाहिएइसे वे ग्रामर ऑफ एनार्की यानी अराजकता का रास्ता बताते हैं दिलचस्प बात है कि देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अपनी राजनीतिक हसरतों को पूरा करने के लिए संविधानेतर बातें करते है और उस आधार पर आंदोलन भी खड़ा करने से नहीं चूकते।


पूर्व राष्ट्रपति के.आर.नारायण ने राष्ट्रपति रहते अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा था कि,कई बार मैने खुद को बेहद दुखी और असहाय पाया। कई बार मैं अपने देश के नागरिकों के लिए कुछ न कर सका। सीमित शक्तियों के कारण मैं असमर्थ था। जाहिर है देश के राष्ट्रपति के तौर पर भी जब संविधान की भावना और लोकहित के अनुसार काम करना मुश्किल हो सकता है तो फिर आम आदमी की मुश्किलों का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह शब्द भले ही एक पूर्व राष्ट्रपति के हो लेकिन इसमें एहसास तो संविधान की उस किताब का है। जो कसमसाती रहती होगी अपनी लाचारियों और मजबूरियों पर। पर हकीकत तो यह भी है कि संविधान की उस किताब की कोई जुबान नहीं है इसीलिए उसे अलग अलग जुबानों से बोला जाता है। इन सबके बाद भी संविधान बना हुआ है और बरकरार भी है। यकीन मानिए,जब तक यह बरकरार है,इसे खतरे में मत समझिए।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

जांबाजों का मनोबल गिरने न पाए,naxsal crpf india

 राष्ट्रीय सहारा,हस्तक्षेप विशेषांक 





                                                                                                                                     

अपने शहीद जवानों के खून से सने कलश को शौर्य,साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानने वाला सीआरपीएफ को भारत की आंतरिक सुरक्षा का सबसे बड़ा पहरुआ समझा जाता है जिनसे  सुकमा के घने जंगलों समेत पूरे रेड कॉरिडोर में नक्सली खौफ खाते हैये जांबाज़ जटिल भौगोलिक परिस्थितियों में पृथकतावादी और अलगाववादी संगठनों से मुकाबला करते है और उनके निशाने पर भी होते है नक्सलवाद को देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है,इसका सबसे कठिन पहलू यह है कि यह ऐसी लड़ाई है जिसमें दुश्मन का बहुत कम पता चल पाता है। घने जंगलों की खाक छानते हुए नक्सल विरोधी अभियान का हिस्सा होना बेहद खतरनाक चुनौती होता है। एक बार किसी ऑपरेशन के लिए अपनी बटालियन के साथ रवाना होने के बाद यह पता ही नहीं होता की वापस कब लौटना है। कई बार जंगलों की खाक  छानते हुए 10-10 दिन तक हो जाते है। इस दौरान कड़ी सतर्कता के साथ सावधानी रखना होता है। कोबरा बटालियन के एक अधिकारी ने बताया,माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन पर जाते  हुए हम अपना सामान इकट्ठा कर कैंप में रख कर जाते थे और साथ में एक चिट्ठी भी छोड़ कर जाते थे की यदि मै लौट न पाया तो चिट्टी और सारा सामान हमारे घर तक पहुंचा दिया जाएँ।” वापस जिंदा न लौट पाने की आशंका के साथ माओवादियों का मुकाबला करना इन क्षेत्रों में काम करने वाले सुरक्षा और पुलिस जवानों की हकीकत मानी जाती है। ऑपरेशन के दौरान सुरक्षा बलों को अपने परिवार से बात करने की मनाही होती है और आमतौर पर इस अनुशासन का पालन सभी के द्वारा किया जाता है।


माओवाद के प्रभाव वाले इलाकों में सुरक्षाबलों को बेहद विषम परिस्थितियों में काम करना पड़ता है और ऐसे में उनके लिए स्वयं का मनोबल बनाएं रखना बेहद कठिन होता है।  महज साठ दिनों की छुट्टी हर साल मिलती है और विपरीत परिस्थितियों में वह कम या रद्द भी हो सकती है देश के अंदर भारतीय सेना जैसी चुनौतियों का सामना करने के बाद भी सीआरपीएफ़ अत्याधुनिक हथियारों की कमी,सैन्य साजो सामान का अभाव,मूलभूत सुविधाओं की कमी और उच्च स्तर के सेवा लाभों से महरूम हैरणक्षेत्र में सेवा के दौरान और मारे जाने के बाद भी इन जांबाजों को सेना के सभी लाभ नहीं मिल पाते,यहीं नहीं अफ़सोस उन्हें शहीद का दर्जा भी नहीं दिया जाता सातवें वेतन आयोग की सिफारिश स्वीकार कर अर्द्धसैनिक बलों को शहीद का दर्जा देने की केंद्र की घोषणा अभी तक साकार रूप नहीं ले सकी है। कैंटीन की सुविधा उस प्रकार नहीं मिलती जैसे आर्मी को मिलती है,उन्हें पेंशन की सुविधा भी नहीं है। जो सामान मंगाते है,उस पर जीएसटी देने को मजबूर है।  इनकम टैक्स में कोई  विशेष छूट नहीं और इन सबके साथ नक्सलियों से अग्रिम मोर्चों पर लड़ने को तत्पर और तैयार रहना पड़ता है नक्सली क्षेत्रों में काम करने वाले अन्य बलों के भी सीआरपीएफ़ जैसे ही हालात है


 

इन सबके बीच यह कडवी हकीकत है कि तमाम प्रशिक्षण के बाद भी जंगलों की जानकारी सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर नक्सलियों को होती है। वे स्थानीय परिवेश में घुले मिले होते है तथा इन परिस्थितियों का फायदा भी वे खूब उठाते है,जिससे सुरक्षाबलों को ज्यादा नुकसान होने की आशंका बनी रहती है माओवादियों और अन्य लोगों में पहचान कर पाना भी मुश्किल होता है सुरक्षा एजेंसियों के पास माओवादियों के कई नेताओं और उनके सहयोगियों की कोई पुख्ता जानकारी नहीं  होती कि वे  कौन हैं और किन इलाक़ों में रहते हैंऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते है जब जंगल में किसी के पास हथियार हो,अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है

घने जंगलों से गुजरते हुए सुरक्षा बल हमेशा सावधान रहते है की उन पर किसी की भी नजर न पड़ेमाओवादी आदिवासियों की गरीबी का फायदा उठाकर  उन्हें विकास से दूर रखे हुए हैसुरक्षाबल सभी की नजरों से बचने के लिए रात में पैदल सफर करते है जबकि दिन में उनके लिए छूपना ज्यादा बेहतर रहता हैखासतौर पर माओवादी गुरिल्ला पद्धति से युद्द करते है,जिसमे छूपकर तथा घात लगाकर हमला किया जाता है कोबरा बटालियन भी इसी पद्धति पर काम करना पसंद करती हैबदलते दौर में आधुनिक संचार के साधनों के आने से सुरक्षा बल अपने वरिष्ठ अधिकारियों के सम्पर्क में रह पाना काफी हद तक संभव हुआ है लेकिन कुछ  सालों पहले हालात ऐसे नहीं थे। कुछ वर्षों पहले एक बार घने वन में प्रवेश करने के बाद सभी से सम्पर्क टूट जाते थे


माओवादी एम्बुश लगाकर सुरक्षा बलों को घेर लेते है और इसके बाद  चारों और से हमला करते है,जिससे उन्हें ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सकेइस दौरान नक्सली बेहद घातक हथियारों का इस्तेमाल करते है और सुरक्षा बलों के लिए उनका सामना करना  बेहद मुश्किल होता हैखासकर बुलेटप्रूफ जैकेट पहनकर लड़ना नक्सली इलाकों में मुश्किल होता हैजम्मू कश्मीर जैसे इलाकों में आंतरिक शांति के लिए तुरत फुरत कार्रवाई करनी होती है जबकि नक्सली इलाकों में कब इसकी जरूरत पड़ेगी,यह भी पता नहीं होताबुलेट प्रूफ जैकेट का वजन करीब 4 किलो होता है और कड़े मौसम से इसे पहनकर कर रखना मुश्किल हो जाता है खासकर तब जबकि सुरक्षाबलों को कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। नक्सली इलाकों में आपरेशन शुरू होने का कोई निश्चित समय भी नहीं होता अत: सुरक्षा बल बिना बुलेट प्रूफ जैकेट के ही लड़ते है और इसीलिए हताहतों की संख्या बढ़ जाती है


छत्तीसगढ़ को नक्सल हमलों के लिए बेहद संवेदनशील माना जाता है और यहां पर काम करने के दौरान सुरक्षाबलों के अनुभव बेहद भयावह होते है यहां के कयी इलाकों में इतनी गरीबी है कि महज दस रूपये देकर बच्चों से भी नक्सली लैंड माईन के धमाके करवा देते हैसीआरपीएफ के अधिकारी  कंधे पर बैच  लगाकर ऑपरेशन नहीं करते क्योंकि ऐसे में नक्सलियों के लिए वे पहला निशाना बन सकते है नक्सली हमलों में यह भी देखा गया है कि इसमें महिलाओं की भी बड़ी भूमिका होती हैवहीं ऑपरेशन के दौरान सुरक्षाबलों में महिलाओं का होना ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाता हैनक्सली महिलाओं को लेकर सुरक्षाबलों के सामने कठिन चुनौती होती हैमध्य प्रदेश,छतीसगढ़ और महाराष्ट्र से लगे बालाघाट और आसपास कई महिला नक्सली काम कर रही है। नक्सलियों की पहचान दलम से होती है और बालाघाट के इलाके में इनका संगठन एमएमसी के नाम से जाना जाता है एम  का अर्थ मध्यप्रदेश,एम से महाराष्ट्र और सी से छतीसगढ़ होता है अभी बालाघाट इलाके में मलाजखंड दलम, टांडा दलम और दर्रे कसा दलम कार्य करते हैहर दलम में महिलाएं होती है,इन्हें सामाजिक न्याय के नाम पर इतना भ्रमित किया जाता है कि वे शोषण को भी समूह के प्रति सेवा का अनिवार्य हिस्सा समझने लगती है ऐसे में सुरक्षाबलों के लिए सावधानी रखने के साथ ही मानवीय पक्ष का पालन करना महत्वपूर्ण हो जाता है और अक्सर यह जानलेवा भी होता है


माओवादी प्रभाव के लिए कुख्यात रेड कॉरिडोर भौगोलिक जटिलताओं का क्षेत्र है। नेपाल से शुरू होकर भारत के कई राज्यों के सीमांत क्षेत्रों से गुजरने वाला यह इलाका गरीबी और पिछड़ेपन से अभिशिप्त है। इसमें से अधिकांश इलाकों में घने जंगल है,जहां माओवादी छूपे होते है और नक्सल विरोधी अभियानों से जुड़े सुरक्षाबलों की समस्या यहीं से गहरा जाती है। आंध्रप्रदेश में ग्रे-हाउंड्स की सफलता से उत्साहित केंद्र सरकार ने 2008 में स्पेशल एक्शन फ़ोर्स की स्थापना की जिसे कोबरा बटालियन नाम दिया गया। इसके लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के जांबाज़ जवानों को तरजीह दी गई। कड़े परीक्षण के बाद 150 जवानों का चयन किया गया और इन्हें बाद भी कठिन हालातों में रहने का प्रशिक्षण दिया गया। शुरूआती दौर में इनकी उम्र 35 साल से कम हो यह विशेष रूप से ध्यान रखा गया। इसके पीछे यह कारण बताया गया की जंगल की कठिन परिस्थितियों में ज्यादा  ऊर्जा से भरपूर युवा ही बेहतर काम कर सकते है


लेकिन अब हालात भी बदले है और सुरक्षा की चुनौतियां ज्यादा बढ़ गई है। इस समय नक्सली विरोधी ऑपरेशन में उन सभी को भाग लेना होता है जो बटालियन के सदस्य हो। ऑपरेशन के लंबा खींचने के दौरान 40 साल या इससे ज्यादा के जवान युवाओं के मुकाबले जल्दी  थक  जाते है और माओवादी अक्सर लौटते हुए जवानों को ही निशाना बनाते है। बहरहाल नक्सली इलाकों में काम करने वाले अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस को सेना की तरह सेवा और सामरिक सुविधाओं को देने की जरूरत है,जिससे न केवल इन जवानों का मनोबल ऊँचा बना रहे बल्कि वे माओवाद पर नकेल कसने के लिए और बेहतर तथा कारगर उपाय भी कर सके।

बुधवार, 7 अप्रैल 2021

माओवादियों से निपटने की नीति,maovad india

 

जनसत्ता                                                                                                      

                                                                         


छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर के जंगलों में माओवादी हमले में सुरक्षाबलों के 22 जवानों के मारे जाने से इन क्षेत्रों में माओवाद के प्रभाव के कमजोर पड़ने के सरकारी दावों की सच्चाई भयावह रूप में सामने आ गई है,वहीं आंतरिक सुरक्षा के लिए इस बड़ी समस्या से निपटने की नीति भी सवालों में है। दरअसल नेपाल से शुरू होकर देश के कई राज्यों की भौगोलिक जटिलताओं से गुजरने वाला रास्ता जिसे लाल गलियारा भी कहते है,माओवादियों के लिए कई कारणों से सुरक्षित पनाहगाह है। सीमाई इलाकों की सामाजिक और आर्थिक विषमताएं विद्रोह पनपने का मजबूत आधार बनती है। वहीं जातीय संरचना,पिछड़ापन,गरीबी,अशिक्षा और सामन्तवाद से संतप्त समूहों को लामबंद करके वैधानिक व्यवस्था को चुनौती मिलने की आशंकाएं बढ़ जाती है। नक्सलियों ने बुनियादी रूप से पिछड़े हुए सुदूरवर्ती और भौगोलिक रूप से कटे इलाकों पर अपना प्रभाव कायम किया हुआ है पिछले पांच दशकों से नक्सलवाद की विध्वंसकारी नीतियों को झेल रहा देश अब तक कोई ऐसी बहुआयामी मिश्रित रणनीति अपनाने में नाकाम रहा है जिससे आंतरिक शांति कायम करने में महती सफलता मिल सके।


पिछड़े इलाकों में विकास के लिए माओवादियों से बातचीत की जरूरत है, वे इन इलाकों में विकास को अवरुद्ध कर अपनी समांतर सत्ता स्थापित किए हुए है। इसे  स्थानीय स्तर पर राजनीतिक समर्थन ओर ज्यादा घातक बना देता है। आदिवासी युवाओं के पिछड़ेपन के कारण उनके दिग्भ्रमित होने और उनके द्वारा हिंसक रास्ते को अपनाने की आशंका बढ़ जाती है। माओवाद के इस अभियान को महज जंगल या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता। नक्सलवादी होने का आरोप कई बार ऐसे लोग झेलने को मजबूर होते है जो शांतिप्रिय जीवन जीना चाहते है। वे जंगल में रहकर माओवादियों की समांतर सत्ता के खिलाफ खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते,अत: उन्हें मजबूरी में नक्सलवादी समूहों का हिस्सा बनने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसे लोगों को नक्सलवादियों के चंगुल से आज़ाद करवाने की नीतियां प्रभावी नहीं  हो सकी है। आदिवासी इलाकों में गरीबी और रोजगार का बड़ा संकट रहा है, यह स्थिति माओवादी शक्तियों को मजबूत करने के लिए काफी है।



माओवाद से निपटने की नीतियों में आमतौर पर सुरक्षात्मक कदमों पर फोकस किया जाता है। नक्सलवादी समूहों में स्थानीय लोग शामिल होते है अत: इसके लिए सैन्य विकल्प को ज्यादा तरजीह देना समस्या को बढ़ाता रहा है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स इन कार्रवाइयों में अग्रणी भूमिका में होती है। स्थानीय परिस्थितियों,भाषा,रीति रिवाज और नक्सलियों की पहचान न कर पाने की कमियां न केवल आंतरिक संघर्ष को बढ़ा रही है बल्कि इससे लगातार बड़ी संख्या में सुरक्षाबल हताहत भी हो रहे है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के सुकमा के दुर्गम जंगलों में एसटीएफ,सीआरपीएफ,डीआरजी औऱ कोबरा बटालियन के लगभग दो हज़ार जवानों के नक्सल विरोधी साझा अभियान में कई ऐसी रणनीतिक खामियां सामने आई है जिसकी कीमत कई जवानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ीछत्तीसगढ़ के दक्षिणी जिलों बीजापुर,नारायणपुर  और दंतेवाड़ा के करीब 4 हजार किलोमीटर क्षेत्र में घने जंगल है।  सुकमा की सरहद आंध्रप्रदेश और ओडिशा से मिलती है,यह माओवादियों के एक राज्य से दूसरे राज्य में आवागमन का सुगम  रास्ता है। पुलिस के पास इस बात की जानकारी थी कि कुख्यात और इनामी नक्सली हिड़मा और उसकी पूरी टीम इस इलाके में मौजूद हैपुलिस  ने हिड़मा और उसके साथियों की तलाश में घने जंगलों में व्यापक तलाशी अभियान चलाया लेकिन यहां किसी भी माओवादी का पता नहीं चला। नक्सली इलाके में रास्तों को लेकर सुरक्षाबल बेहद सावधानी का प्रयोग करते है अत: उन्होंने बीजापुर के बासागुड़ा रोड पर वह रास्ता चुना जो बंद माना जाता है और यहीं पर नक्सलियों ने  सुरक्षाबलों पर चारों और से हमला कर दियाइसको लेकर नक्सली पहले ही तैयारी कर चुके थे,उन्होंने आसपास के जंगलों में पोजीशन ले रखी थी और  गांवों को खाली करवा लिया था 


माओवादी एम्बुश का इस्तेमाल कर पूरी बटालियन को चारो और से घेर लेते है और सुकमा में एक बार फिर यही देखा गया। नक्सली इलाकों को लेकर यह साफ है की सुरक्षाबलों से ज्यादा बेहतर तैयारी और जानकारी जंगलों की नक्सलियों को होती हैगुप्तचर एजेंसियों के पास माओवादियों के कई नेताओं की कोई जानकारी नहीं हैउन्हें ये भी नहीं पता कि उनके नेता और सदस्य कौन हैं और किन इलाक़ों में रहते हैंऐसे में सुरक्षाबल तभी हमला करते है जब जंगल में किसी के पास हथियार हो,अन्यथा सुरक्षा बलों को सामान्य नागरिकों के मारे जाने का डर बना रहता है। यहां यह तथ्य भी उभर कर आता है कि  विभिन्न एजेंसियों के साझा अभियान को अंजाम तक पहुंचाना आसान नहीं होता। अलग अलग ट्रूप्स की अपनी कमांड होती है और माओवादी हमलें से अप्रत्याशित परिस्थितियां उत्पन्न होने  पर समन्वय भंग होने की आशंका बढ़ जाती है 

देश में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र स्थापित करने और एनआईए  जैसी जाँच एजेंसी का प्रावधान तो किया गया है लेकिन नक्सलवाद पर अभी तक ऐसी कोई रणनीति नहीं बन सकी है।   एसटीएफ, सीआरपीएफ, डीआरजी औऱ कोबरा बटालियन के साझा खोजी अभियान के पहले गुप्तचर एजेंसियां नाकाम रहीजिस गांव में पहले से ही ताले लगे थे और नक्सली घरों के अंदर छुपे थे,इस योजना का पता न  कर पाना सुरक्षाबलों के लिए जानलेवा साबित हुआमार्च से लेकर मई तक खेती का समय नहीं होता,इसीलिए नक्सली केडर की भर्ती का यह मुफीद समय माना जाता है।  ऐसी जानकारियां सामने आई है की नक्सलियों के बड़े नेता कार्यक्रमों के जरिए युवाओं को अपने अभियान से जोड़ते है।  सुरक्षा एजेंसियां इस दौरान बड़े अभियानों की योजना बनाती है जिससे ज्यादा संख्या में माओवादियों को पकड़ा जा सके लेकिन भयावह  हकीकत यह है कि इन्हीं महीनों में ही नक्सली सुरक्षाबलों को बड़ा नुकसान पहुँचाने में कामयाब हो जाते है।


केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स भारत की सबसे बड़ी आर्म्ड पुलिस फोर्स है। यह पुलिस फोर्स भारत के केन्द्रीय  गृह मंत्रालय के प्रति जवाबदेह होती है। जंगल में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान नक्सलियों के लिए ओपन टारगेट होते है,जबकि जंगल में रहने वालों की पहचान करने और नक्सलियों को पहचानने के लिए स्थानीय पुलिस बेहतर तरीके से काम कर सकती है। नक्सल विरोधी फ्रंटलाइन फोर्स डीआरजी में अधिकतर स्थानीय युवा भर्ती किए जाते हैं, जिनमें नक्सली संगठनों को छोड़कर आत्मसमर्पण करने वाले युवा होते हैं।  स्थानीय होने का उन्हें फायदा मिलता है वे स्थानीय लोगों में आसानी से घुल मिल सकते है तथा  पूर्व नक्सली होने के चलते उनके तौर-तरीकों की जानकार होते है वे भौगोलिक और सामाजिक जानकारियों का फायदा उठाकर छिपकर निगरानी में सक्षम भी होते है जाहिर है माओवादी इलाकों में डीआरजी जैसे स्थानीय बलों को ज्यादा तरजीह देने और उन पर निर्भरता बढ़ाने की जरूरत है 


1967 में ही ऑल इंडिया कमेटी ऑन कम्यूनिस्ट रिवोल्यूशनरी का गठन किया गया था जिसमें पश्चिम बंगाल,उड़ीसा,आंध्रा,तमिलनाडु,उत्तरप्रदेश,केरल और जम्मू कश्मीर के नेता शामिल हुए थे और उन्होंने संगठन को मजबूत करने,सशस्त्र संघर्ष चलाने तथा गैर संसदीय मार्ग अपनाने का निर्णय लिया था। इससे यह साफ था कि वंचितों,गरीबों और शोषितों के हितों के नाम पर स्थापित संगठन ने लोकतंत्र की वैधानिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए हिंसक और अलोकतांत्रिक रास्ता चुना। लोकतांत्रिक देश में जहां व्यवस्था परिवर्तन के लिए व्यापक संविधानिक उपाय है,वहां आश्चर्यजनक रूप से माओवाद को मजबूत करने में बड़ी भूमिका स्थानीय राजनीति की भी रही है। यह देखा गया है कि राजनीतिक दल स्थानीय स्तर पर सत्ता हासिल करने के लिए नक्सलियों का समर्थन हासिल करने से भी आमतौर पर परहेज नहीं करते  है और यह समस्या को ज्यादा गंभीर बनाता है। बिहार के लंबे समय तक नक्सलग्रस्त सन्देश प्रखंड का मॉडल पूरे देश में अपनाने की जरूरत है। इस इलाके में नक्सलियों का प्रभाव खत्म करने के लिए पंचायत चुनावों का सहारा लिया गया,जिसमें अधिकतर मुखिया माओवादी चुने गए। लेकिन समय के साथ विकेंद्रीकरण का फायदा जनता को मिला और लोगों का मोह माओवादियों से भंग हो गया।  इस समय यह इलाका माओवाद के प्रभाव से मुक्त है। इससे साफ है कि राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर विकेन्द्रीकृत शासन व्यवस्था को मजबूत करने और छत्तीसगढ़ समेत देश के माओवाद ग्रस्त अन्य इलाकों में राजनीतिक दलों को अपना केडर बढ़ाने की जरूरत है। जिससे लोकतांत्रिक सहभागिता बढ़ सके और माओवादी शक्तियों की समांतर सत्ता को कमजोर किया जा सके। माओवादी को आदिवासियों के पिछड़ेपन और अशिक्षा का  खूब फायदा  मिलता है। वे रणनीतिक रूप से जंगल के इलाकों में विकास कार्य होने नहीं देना चाहते। सड़क,स्वास्थ्य सेवाओं और स्कूल से दूर गरीब नौनिहालों पर नक्सलवादियों की नजर होती है और उनका कम उम्र से ही ब्रेन वाश कर दिया जाता है। नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास के कार्य होने से युवाओं को नक्सलियों से जुड़ने से रोकने में मदद मिल सकती है। विकेन्द्रीकरण और लोकतंत्र सहभागिता को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक,आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में समन्वित प्रयासों की जरूरत है।


यूपीए शासनकाल में नक्सलियों पर त्वरित कार्रवाई और उन्हें समाप्त करने के लिए  के लिए  'इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान भी बनाया गया जिसे ख़त्म करके वर्तमान सरकार ने 'सिक्योरिटी रिलेटेड एक्स्पेंडीचर' यानी एसआरई योजना पर  फोकस किया हैइस योजना के तहत नक्सल विरोधी अभियान और नक्सल प्रभावित इलाक़ों के लिए संचार माध्यमों को विकसित करने और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के लिए भत्ते का प्रयोजन किया गया हैयह भत्ता केंद्र सरकार राज्यों को देती हैइसके तहत नक्सल प्रभावित इलाक़ों में तैनात सुरक्षा बलों और थानों के लिए भी धन का आवंटन किया जाता है

दरअसल केंद्र और राज्य में अलग अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने का असर नक्सलवाद से निपटने के तरीकों को भी प्रभावित करता है। छत्तीसगढ़ के माओवादी मांग करते रहे है की बस्तर से सुरक्षाबलों के कैम्प हटायें  जाएं और माओवादी नेताओं को रिहा कर दिया जाएं राज्य सरकार कहती है कि माओवादी पहले हथियार छोड़ें,फिर बातचीत की  पहल करें जबकि राज्य सरकारों को इस सम्बन्ध में दोहरी रणनीति पर काम करने की जरूरत है बातचीत के विकल्प खोलने से नक्सलियों की पहचान करने में सुगमता हो सकती है 


2017 में माओवादी हिंसा से प्रभावित दस राज्यों में एकीकृत कमान के गठन की पहल करते हुए सभी राज्यों की साझा रणनीति बनाकर एक आठ सूत्रीय समाधान तैयार किया गया था। इसके अंतर्गत कुशल नेतृत्व,आक्रामक रणनीति,अभिप्रेरणा  और प्रशिक्षण,कारगर ख़ुफ़िया तंत्र,कार्य योजना के मानक,कारगर प्रौद्योगिकी,प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना और वामपंथी आतंकियों के वित्त पोषण को विफल करने की रणनीति को शामिल करने की जरूरत बताई गई थी। वास्तव में नक्सलवाद से निपटने के लिए स्थानीय पुलिस,स्थानीय शासन,स्थानीय लोग,स्थानीय परिवेश और स्थानीय राजनीति में समन्वय स्थापित करने और स्थानीय व्यवस्थाओं को बेहतर करने की ज्यादा जरूरत है 

 

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

नया बांग्लादेश भारत से कहीं आगे,bangladesh bharat

 पॉलिटिक्स

                         


 90 के दशक में उदारीकरण,वैश्वीकरण और निजीकरण के बड़े बाज़ार में भारत ने स्वयं को बड़े ग्राहक के रूप में प्रस्तुत किया था और दुनिया भर की निगाहें भारत पर केन्द्रित हो गई थी।  यह वह समय था जब भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी से बूरी तरह जूझ रहा था। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर अस्तित्व में आएं बांग्लादेश को दुनिया के सबसे गरीब,पिछड़े और नाकाम देशों में शुमार किया जाता था। इस समय यह देश अपनी स्थापना के 50 साल पूरे होने का जश्न मना रहा है और जिसने इसकी सफलताओं ने तमाम आशंकाओं को धराशायी करते हुए दुनिया के सफल और खुशहाल देशों की सूची में अपने को शुमार कर कर लिया है। भारत की और सहायता के लिए देखने वाला यह देश अब कई मायनों में भारत से आगे निकल गया है। प्रति व्यक्ति आय,आर्थिक स्थिरता और मानव विकास को लेकर बांग्लादेश कि प्रगति से संयुक्त राष्ट्र भी हैरान है। पिछले साल की शुरुआत मे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने दावा किया था कि अगर भारत अपने यहां अवैध रूप से आने वाले हर व्यक्ति को नागरिकता देता है तो आधा बांग्लादेश खाली हो जाएगा। इसका जवाब देने में बांग्लादेश की सरकार ने देर नहीं की थी। उनका कहना  था कि जब उसकी अर्थव्यवस्था भारत से बेहतर है तो कोई देश छोड़कर भारत को जाना चाहेगा। बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज़मान ख़ान ने कहा था कि बांग्लादेश इतना गरीब नहीं है कि वहां के लोग भारत में जाएंगे। वास्तव में भारत और बांग्लादेश की तुलना की जाएं तो वैश्विक सूचकांक बांग्लादेश की बेहतरी की पुष्टि भी करते है।


भारत से कहीं बेहतर है बांग्लादेश

1971 में बांग्लादेश बनने के बाद वहां नकारात्मक जीडीपी वृद्धि थी जो बाद के सालों में बेहतर होती गई। पिछले दशक में बांग्लादेश के सकल घरेलू उत्पाद में तेजी से वृद्धि देखी गई है। एशियाई विकास बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश ने सबसे तेज़ी से बढ़ती दक्षिण एशियाई अर्थव्यवस्था बनकर भारत को पीछे छोड़ दिया है। 2019 में भारत की अनुमानित विकास दर 5.3 फीसदी थी जबकि बांग्लादेश की अनुमानित विकास दर 8 फीसदी थी। तेज़ी से होते इस विकास ने बांग्लादेश को सबसे कम विकसित देश के तमगे से आज़ाद कर दिया। बांग्लादेश ने अपने मानव विकास सूचकांकों में महत्वपूर्ण सुधार किया है,वह शिशु मृत्यु दर और जीवन प्रत्याशा दर में भारत से आगे है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2020

वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स) की 2020 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भूख के मामले में भारत 'गंभीर' स्थिति में है।107 देशों पर आधारित इस रिपोर्ट में भारत 94वें स्थान पर है। सूचकांक में भारत का स्थान बांग्लादेश से बहुत पीछे है और वह 75वें स्थान पर है।



ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2020

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स 2020 में दिखाया गया है कि भारत की महिलाओं से ज्यादा जिंदगी बांग्लादेश की महिलाएं जीती है। भारत इस सूची में 112वें स्थान पर है जबकि बांग्लादेश बेहतर रैंकिंग के साथ 50वें स्थान पर है। भारत की महिलाओं का जीवन काल 68.6 है वहीं इसकी तुलना में बांग्लादेश की महिलाएं 72.5 साल में ज़्यादा लंबा जीवन जीती हैं।

 

शिशु-मातृ मृत्यु दर

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 2019 में पांच साल से कम आयु के जिन बच्चों की मौत हुई। उनमें से आधे बच्चों की मौत नाइजीरिया,भारत, पाकिस्तान,कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और इथियोपिया में हुई। केवल नाइजीरिया और भारत में करीब एक तिहाई बच्चों की मौत हुई। जबकि बांग्लादेश ने मानव विकास के पैमाने पर भी महत्वपूर्ण सुधार देखे हैं। इस संबंध में बच्चों और माताओं का स्वास्थ्य महत्वपूर्ण है। 1974 में बांग्लादेश में पैदा हुए प्रत्येक 1000 शिशुओं में से 153 की मृत्यु हो जाती थी।  2018 में यह संख्या घटकर मात्र 22 रह गई है। कभी गरीबी और कुपोषण के लिए बदनाम बांग्लादेश में 1981 में मातृ मृत्यु दर 4.6  फीसदी थी जो अब महज डेढ़ फीसदी तक सिमट गई है।  


संसद में प्रतिनिधित्व

बांग्लादेश संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भी भारत से बेहतर है।  बांग्लादेश में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 22 प्रतिशत है जबकि भारत में 13 प्रतिशत ही है।

 

भारतीय अर्थव्यवस्था पाँच ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचने का सपना सच होना मुश्किल

 

दो साल पहले दावोस में वर्ल्ड इकॉनामिक फ़ोरम की बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया था कि  2024-25 तक भारतीय अर्थव्यवस्था पाँच ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच जाएगी। इसके पीछे 2018-19 का वह आर्थिक सर्वे का विजन था जिसमें उम्मीद जताई गई थी कि 2020-21 से लेकर 2024-25 तक भारत की अर्थव्यवस्था आठ प्रतिशत की रफ़्तार से बढ़ेगी। यह माना गया था कि जीडीपी में औसत वृद्धि दर 12 प्रतिशत के आसपास होगी जबकि महंगाई की दर चार प्रतिशत रहेगी। अगर भारत इस लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब होता है तो वह जर्मनी को पछाड़कर अमेरिका,चीन और जापान के बाद चौथे नंबर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। मौजूदा समय में भारत की अर्थव्यवस्था 2.7 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की है। राष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान (एनएसओ) की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2018-19 में जीडीपी 6.1 प्रतिशत से बढ़ रही थी जबकि 2019-20 में यह 4.2 प्रतिशत से बढ़ी। अप्रैल से जून, 2020 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में 23.9 प्रतिशत की गिरावट देखी गई।



इन आंकड़ों से साफ है कि आने वाले कई वर्षों तक भारत का पाँच ट्रिलियन डॉलर कि अर्थव्यवस्था तक पहुंचना मुश्किल है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी एनएसओ ने अपनी 20-2021 के लिए प्रस्तुत  रिपोर्ट में भारत कि अर्थव्यवस्था को लेकर यह अनुमान लगाया कि यह 1952 से भी बदतर स्थिति में पहुँचने कि ओर है।  जाने माने अर्थशास्त्री सुब्रमण्यम स्वामी के अनुसार चालू वित्त वर्ष में जीडीपी दर 2 प्रतिशत से भी कम रह सकती है। जबकि 1952 में देश की जीडीपी वृद्धि दर 2.6 फीसदी रही थी। कोरोना महामारी के दौरान भारत कि अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान हुआ जबकि बांग्लादेश की जीडीपी 5.24 फ़ीसद की दर से बढ़ी। इस देश के विकास कि दर इतनी तेज है रही है कि सत्तर के दशक की तुलना में आज प्रति व्यक्ति आय 18 गुना बढ़ चुकी है। साल 2020 में यह 2017 डॉलर तक पहुँच गई है। ग़रीबी की दर घटकर 20.5 हो गई है। हाल ही में सेंटर फ़ॉर इकोनॉमिक्स एंड बिज़नेस रिसर्च की आई रिपोर्ट में बांग्लादेश के बारे में ये अनुमान लगाया गया है कि साल 2035 तक वो दुनिया की 25वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।


भारत ने बाज़ार बन कर खुशियां ढूंढता है जबकि बांग्लादेश बड़ा निर्यातक बन गया है....

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत 2030 तक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार बनने के लिए तैयार है। इस रिपोर्ट को 'फ्यूचर ऑफ कंजम्पशन इन फास्ट-ग्रोथ कंज्यूमर मार्केट - इंडियानाम दिया गया है। वहीं बांग्लादेश ने अपनी उत्पादन दर बढ़ाने पर ज़ोर दिया। सत्तर के दशक में बांग्लादेश का उत्पादन दर महज साढ़े तीन फीसदी तक था और बांग्लादेश को निर्यात से होने वाली आमदनी केवल 29.7 करोड़ डॉलर थी।  आज, पचास साल बाद, बांग्लादेश निर्यात में अरबों डॉलर कमा रहा है। साल 2020 में बांग्लादेश ने 39.6 अरब डॉलर की कमाई की। पिछले एक दशक में बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था में हर साल औसतन छह से सात प्रतिशत की बढ़ोत्तरी देखने को मिली है। इस दौरान बांग्लादेश,चीन के बाद रेडिमेड कपड़ों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश बना है।

कोरोना महामारी के आने से ठीक पहले 2019 में बांग्लादेश ने क़रीब 34 अरब डॉलर के रेडिमेड कपड़ों का निर्यात किया था। इस सेक्टर में क़रीब 40 लाख लोगों को काम मिला हुआ है,जिनमें से अधिकांश महिलाएं हैं। बांग्लादेश में बनने वाले कपड़ों का निर्यात सालाना 15 से 17 फ़ीसदी की दर से आगे बढ़ रहा है। बांग्लादेश की सफलता में रेडिमेड कपड़ा उद्योग की सबसे बड़ी भूमिका मानी जाती है। कपड़ा उद्योग बांग्लादेश के लोगों को सबसे ज़्यादा रोज़गार मुहैया कराता है। कपड़ा उद्योग से बांग्लादेश में तकरीबन 41 लाख लोगों को रोज़गार मिला हुआ है। कृषि क्षेत्र ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन 1980 के दशक के बाद से उद्योग ने एक महत्वपूर्ण स्थान ले लिया है। विशेष रूप से रेडीमेड कपड़ा उद्योग ने रोज़गार सृजन और निर्यात दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बांग्लादेश की निर्यात आय का करीब 83 फ़ीसद इसी सेक्टर से आता है।



प्रोफ़ेसर  अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस का गहरा योगदान

1971 में पाकिस्तान से अलग होकर अस्तित्व में आया बांग्लादेश अव्यवस्थाओं से लम्बें समय तक जूझता रहा। बांग्लादेश के संस्थापक मुजीबुर्रहमान की कट्टरपंथियों ने 1975 में हत्या कर दी थी। इन चुनौतियों के बीच बांग्लादेश के एक प्रोफ़ेसर  अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस  ने अपने देश को बदहाली से उबारने के लिए महिलाओं की दशा सुधारने की ठानी और एक ऐसे बैंक का ख़ाका तैयार किया जिसकी पहुँच हर ज़रूरतमंद के दरवाज़े तक होवर्ष 1976 में प्रोफ़ेसर यूनुस ने चटगाँव विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रयोग के तौर पर कुछ गाँवों में इस योजना को लागू कियाधीरे-धीरे लोगों में जागरुकता बढ़ी और इस बैंक की मदद से स्वयं सहायता समूहों ने स्वरोजगार का रास्ता अपनाना शुरू कियाबैंक की सफलता को देखते हुए बांग्लादेश सरकार से वर्ष 1983 में इसे क़ानूनी तौर पर बैंक के रूप में मान्यता मिल गईअब यह बैंक समूचे बांग्लादेश के गाँव गाँव तक अपनी पहुंच बना चूकी हैलघु वित्त संगठन की तरह काम कर रहे इस बैंक की योजना बुनियादी स्तर पर बेहद सफल रही हैमहिलाओं को स्वरोजगार मिलने से देश की प्रगति ने रफ्तार पकड़ी है और अब यह मजबूती से अपने कदम आगे बढ़ा रही हैमोहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को “सामाजिक और लोकतांत्रिक विकास में योगदान’के लिए  साल 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार  से सम्मानित किया गया था। प्रख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन भारत और बांग्लादेश में बेहद सम्मानीय माने जाते है,उन्होंने एक कल्याणकारी राज्य का समर्थन करते हुए कहा है कि “राज्य का कार्य लोगों की क्षमताओं में वृद्धि व उनका मानवीय विकास करना है।भारत ने लगातार इस दिशा में काम किया है और बांग्लादेश की सरकार भी कल्याणकारी राज्य के रूप में पहचान बनाने को प्रतिबद्द नजर आती है।



बांग्लादेश धर्म निरपेक्ष मूल्यों को आगे बढ़ा रहा है

दुनिया भर के कई देशों में पिछले एक दशक से दक्षिणपंथी सरकारें अति राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा दे रही है वहीं  बांग्लादेश धर्म निरपेक्ष मूल्यों को लेकर लगातार आगे बढ़ा रहा है।  बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने ढाका में स्थित प्रसिद्द ढाकेश्वरी मंदिर को करीब 50 करोड़ टका की कीमत की जमीन देने की घोषणा कर यह संदेश दिया की तरक्की और स्थायित्व के लिए सभी का सर्वांगीण विकास होना चाहिए। प्रधानमंत्री के अनुसार समानता,सौहाद्रता और परस्पर धार्मिक सद्भाव से ही उनका देश मजबूत हो रहा है और सफलता की ओर बढ़ रहा हैइस्लामिक राष्ट्र होने के बाद भी बांग्लादेश में हिन्दूओं का भरोसा जीतने के लगातार सरकार के प्रयास जारी है और मौजूदा सरकार ने इस बार देशभर में 30 हजार से ज्यादा दुर्गा पंडालों में पूजा उत्सव के शांति प्रिय आयोजनों को सुनिश्चित कर यह संदेश देने की कोशिश भी की है कि धर्म किसी का भी व्यक्तिगत अधिकार है, लेकिन त्योहार का संबंध सबसे होता है



 

भारतीय उपमहाद्वीप में बहुसंस्कृतिवाद मजबूत रहा है और बांग्लादेश ने इसे ही अपनी ताकत बनाकर अपनी नीतियों में लागू करने का प्रयास किया है। दक्षिण एशिया के बाक़ी देशों को बांग्लादेश के समावेशी विकास और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बढ़ावा देने कि नीतियों को अपनाने की जरूरत है।

brahmadeep alune

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