लद्दाख पर अमेरिकी चिंता laddakh china amerika janstta

 

जनसत्ता


                            


 

दुर्गम हिमालयीन क्षेत्र में स्पष्ट सीमा रेखा का प्रश्न उठाकर वास्तविक नियंत्रण रेखा के अस्तित्व को ख़ारिज करने की चीनी रणनीति कई दशक पुरानी है एलएसी पर यथास्थिति बनाएं रखने को लेकर भारत के कूटनीतिक नजरिए से अलग चीन की सैन्य रणनीति रही है 1962 के बाद भारत और चीन में युद्ध भले ही नहीं हुआ हो लेकिन चीन की सैन्य महत्वकांक्षाओं में कोई कमी नहीं आईचीन ने उच्च स्तर पर भारत से राजनयिक और आर्थिक सम्बन्धों को मजबूत करने में दिलचस्पी दिखाई वहीं हिमालयी की दुर्गम वादियों में सड़के,रेल,हवाई पट्टियों का निर्माण,सैन्य बंकर और आधारभूत ढांचे को मजबूत कर भारत की सामरिक चुनौतियों को बढ़ा दिया हाल ही में अमेरिकी सेना के पैसिफिक कमांडिंग जनरल चार्ल्स ए फ़्लिन ने लद्दाख में चीनी गतिविधि पर जो चिंता जाहिर की है,उसे  ख़ारिज इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि पूर्वी लद्दाख में चीन का सैन्य व्यवहार बेहद असामान्य रहा है पिछलें दो तीन वर्षों में लद्दाख में भारत के रक्षामंत्री की मौजूदगी तथा सेना अध्यक्ष का दुर्गम सैन्य स्थलों पर निरीक्षण करना महज संयोग नहीं है चीन की इस क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों को भारत ने अब राजनयिक और सैन्य स्तर पर स्वीकार भी किया है 


 

हिमालयीन क्षेत्र में भारत का केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है,जहां से भारत के परम्परागत शत्रु चीन और पाकिस्तान पर नजर रखी जाती है। लद्दाख उत्तर में काराकोरम पर्वत और दक्षिण में हिमालय पर्वत के बीच में है। भारत लद्दाख की उस जमीन को वापस प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्धता जताता रहा है जो इस समय चीन और पाकिस्तान के कब्जें में है लद्दाख के अन्तर्गत पाक अधिकृत गिलगित बलतिस्तान,चीन अधिकृत अक्साई चीन और शक्सगम घाटी का क्षेत्र शामिल है 1963 में पाकिस्तान  ने एक समझौते के तहत् 5180 वर्ग किलोमीटर का शक्सगम घाटी क्षेत्र चीन को उपहार में दिया  था यह लद्दाख का ही हिस्सा है 


 

सामरिक दृष्टि से अहम होने के कारण पूर्वी लद्दाख से सटी अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर चीन अपनी सैन्य गतिविधियों को अप्रत्याशित विस्तार कर भारत और चीन के बीच हुए शांति बनाएं रखने के समझौतों की लगातार अनदेखी कर रहा है1962 के भारत चीन के बाद लंबे समय तक शांत रहा यह क्षेत्र अब सैन्यीकरण की ओर तेजी से बढ़ा हैचीन वास्तविक नियन्त्रण रेखा या एलएसी को विवादित मानता रहा है और उसने पूर्वी लद्दाख और अन्य इलाकों में बड़ी संख्या में सैनिकों और हथियारों के साथ मोर्चाबंदी की है  इसी के कारण गलवान घाटी,पैंगोंग त्सो और गोगरा-हॉट स्प्रिंग्स जैसे इलाकों में दोनों देशों की  सेनाएं कई बार आमने-सामने आ गईं है और युद्द जैसे हालात अभी भी बने हुए है 


 

भारत ने भी इन इलाकों युद्द जैसी तैयारियों के लिए सेना की संख्या में अच्छा खासा इजाफा किया है जिससे सेना को अग्रिम मोर्चों पर तेजी से मदद मिल सके। इसके लिए पुल,हवाई पट्टियों तथा रोड़ का निर्माण करने में तेजी दिखाई है। भारत का पूर्वी लद्दाख में सैन्यीकरण की जरूरत को चीन की असामान्य गतिविधियों ने पुख्ता किया है। चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की  पश्चिमी कमांड का मुख्यालय तिब्बत में स्थित है। चीनी सेना की यही कमांड भारत के लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैले वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर तैनात हैं। पिछले कुछ वर्षों में इस कमांड के उच्च सैन्य अधिकारी को बदलने में चीन के केंद्रीय सैन्य आयोग ने अभूतपूर्व तेजी दिखाई है पिछले साल चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बिना किसी पूर्व घोषणा के तिब्बत की यात्रा करके सबको हैरान कर दिया था इस यात्रा के दौरान वे न्यिंग्ची रेलवे स्टेशन गए थे  ये इलाका सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है,क्योंकि यहां से कुछ दूर पर ही अरुणाचल प्रदेश की सीमा लगती है  जिनपिंग चीन के पहले बड़े नेता हैं जिन्होंने कई दशकों के दौरान भारत और चीन की सीमा के पास बसे इस शहर का दौरा किया था 


चीन इस समय प्राथमिकता से अपने पूर्वी और पश्चिमी इलाकों को आपस में बेहतर तरीक़े से जोड़ने के लिए वृहद योजनाएं बना रहा है चीन नेपाल से सम्बन्ध और मजबूत करने के लिए  लहासा न्यिंग्ची-रेलमार्ग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है लहासा से न्यिंग्ची रेलमार्ग सिचुवान-तिब्बत रेल खंड का सामरिक रूप से  अतिमहत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है  भारत की सीमा से लगती हुई ये रेल योजना एक हजार सात सौ चालीस किलोमीटर की है जाहिर है भारत से लगी सीमा के इलाकों में चीन जिस तरह आधारभूत सुविधाएं विकसित कर रहा है,वह सामरिक रूप से चुनौतीपूर्ण है 


 

पिछले साल जून में भारत के विदेशमंत्री एस.जयशंकर ने क़तर इकनॉमिक फोरम में यह साफ कहा था कि चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव में दो सबसे अहम मुद्दे हैं पहला सीमा पर सेना की लगातार आमने-सामने तैनाती और दूसरा चीन बड़ी संख्या में सेना की तैनाती नहीं करने के लिखित वादे पर कायम रहेगा या नहीं  इससे साफ होता है कि भारत और चीन के बीच अविश्वास की खाई बहुत बढ़ गई है। दरअसल भारत का चीन की सैन्य गतिविधियों को लेकर यह अविश्वास उस यथास्थिति को बदलने की चीन की कोशिशों से बढ़ा है जिसने दोनों देशों के बीच तनाव को लगातार बढ़ाया है


 

चीन ने पश्चिमी थियेटर कमांड में आधारभूत ढांचे को बहुत मजबूत किया है जो भारत को सतर्क करने वाले और समस्या बढ़ाने वाले है इन क्षेत्रों में शांति की कोशिशें भी बेहतर परिणाम देती हुई नहीं दिख रही है। फरवरी 2021 में दोनों देशों ने पैंगोंग त्सो के उत्तरी और दक्षिणी किनारे पर चरणबद्ध और समन्वित तरीके से तनाव को कम करने की घोषणा की थी लेकिन ऐसा जमीन पर होता हुआ बिल्कुल भी नहीं दिखाई देता गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स,डेमचोक और डेपसांग जैसे इलाकों को लेकर चल रहा विवाद जारी है और इसका समाधान करने के लिए कई स्तर की बातचीत बेनतीजा रही है चीन पूर्वी लद्दाख से सटे इलाकों में में दूसरा पुल बना रहा है,इस पुल से चीन के सैनिकों को लद्दाख में जल्दी पहुँचने में मदद मिलेगीभारत से लगी सीमा पर चीन रोड के अलावा रहने के लिए घर भी बना रहा है 

 


अमेरिकी साइबर सिक्योरिटी फर्म की उस रिपोर्ट को भी भारत ने स्वीकार किया है जिसमें चीन के हैकर्स ने सितंबर 2021 में लद्दाख के पास बिजली वितरण केंद्रों पर कम से कम दो बार हमले की कोशिश की थीये सेंटर्स लद्दाख में भारत-चीन की सीमा के पास हैंइन सेंटर्स पर ग्रिड कंट्रोल और बिजली वितरण का काम होता हैचीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी के शिन्जियांग मिलिट्री कमान ने टाइप 15 श्रेणी के लाइट टैंक,हाउविटज़र,दूर तक मारक क्षमता रखने वाले रॉकेट लाँचर और एयर डिफेंस सिस्टम को,भारत से लगी सीमा पर तैनात करना किया है और इससे चीन के आक्रामक इरादों का पता चलता है


 

चीन अमेरिका के बीच व्यापारिक और सामरिक स्तर पर वैश्विक प्रतिद्वंदिता चल रही है,उसमें भारत से मजबूत सम्बन्धों को लेकर अमेरिका अपनी राय जाहिर करता रहा है इन सबके बीच अमेरिका के इस दावें में  दम नजर आता है कि भारत से चीन वार्ता भले ही करें पर उसका वास्तविक नियंत्रण सीमा पर जिस तरह का व्यवहार रहा है वो चिंताजनक है और इससे सबको चिंतित होना चाहिए

 


भारत के  थलसेना अध्यक्ष जनरल मनोज पांडे ने साफ कहा है कि भारत और चीन कजे बीच सबसे महत्वपूर्ण चुनौती अप्रैल-मई 2020 से चली आ रही सीमाओं की स्थितियों का समाधान करना और यहां अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति को बहाल करना है गौरतलब है कि 1 मई 2020 को दोनों देशों के सौनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख के पैगोन्ग त्सो झील के नॉर्थ बैंक में झड़प हुई थीइस झड़प में दोनों ही पक्षों के दर्जनों सैनिक घायल हो गए थेइसके बाद 15 जून 2020 को गलवान घाटी में एक बार फिर दोनों देशों के सैनिकों के बीच झड़प हुईइसमें दोनों तरफ के कई सैनिकों की मौत हुई थी पैंगोंग झील सामरिक,ऐतिहासिक और राष्ट्रीय सम्मान की दृष्टि से भारत के लिए अति महत्वपूर्ण मानी जाती है1962 तक भारतीय सेना पैंगोंग झील में फिंगर 8 तक गश्त किया करती थीभारत चीन युद्द के बाद सेना की गश्त इस इलाके में अनियमित हो गई और यहीं से सुरक्षा का बड़ा संकट खड़ा हो गयाइस समय भारत की सेना फिंगर 4 तक गश्त के लिए जाती है यहां चीन की सेना का भारी दबाव  बना हुआ है पैंगोंग से सटी पर्वतमालाओं के बीच एक फिंगर से दूसरे की दूरी सामान्यतया 2 से 3 किलोमीटर होती है,हालांकि यह इससे कम या ज्यादा भी हो सकती हैरणनीतिक तौर पर भी इस झील का काफ़ी महत्व है,क्योंकि ये झील चुशूल घाटी के रास्ते में आती हैचीन इस रास्ते का इस्तेमाल पर हमले के लिए कर सकता है1962 के युद्ध के दौरान यही इसी जगह से चीन ने भारत पर आक्रमण की शुरुआत की थीगालवन घाटी लद्दाख़ और अक्साई चीन के बीच भारत-चीन सीमा के नज़दीक स्थित है यहां पर वास्तविक नियंत्रण रेखा अक्साई चीन को भारत से अलग करती है ये घाटी चीन के दक्षिणी शिनजियांग और भारत के लद्दाख़ तक फैली हैभारत चीन के साथ तकरीबन साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सीमा रेखा साझा करता है,चीन इस रेखा को तकरीबन  दो हजार किलोमीटर की बताता है और भारत के कई इलाकों पर अवैधानिक दावा जताता रहता है।

 


बदलती वैश्विक परिस्थितियों में चीन का सीमा पर व्यवहार बेहद आक्रामक रहा हो गया है। भारत पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा पर सैन्य गतिविधियों और घुसपैठ का सामना कई दशकों से करता रहा है और अब यह स्थिति चीन से लगने वाली वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर भी बन गई है। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भारत का रूस जैसे देश से अलग होकर अमेरिका के साथ पूर्ण सामरिक  साझेदार बन जाना आसान तो नहीं है लेकिन भारत की चीन से मिलने वाली सुरक्षा चुनौतियों में अमेरिका की उपयोगिता को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। चीन की सैन्य और साम्राज्यवादी रणनीतिक महत्वाकांक्षाएं हिन्द प्रशांत क्षेत्र में वैश्विक सुरक्षा संकट बढ़ा रही है,ऐसे में भारत के यथार्थवादी हित अमेरिका के साथ ज्यादा सुरक्षित दिखाई पड़ते है।

 

 

 

कतर और भारत का इस्लाम katar bharat islam nupur shrama rashtriya sahara

 राष्ट्रीय सहारा


                           

                                                                     

खाड़ी के अधिकांश देशों में जन विरोध,प्रदर्शन और हड़ताल प्रतिबंधित हैइस जुमे की नमाज़ के बाद कुवैत में जिन 40-50 प्रवासियों ने भारत में पैगम्बर मोहम्मद पर कथित विवादित टिप्पणी को लेकर प्रदर्शन और नारेबाज़ी की थी उन्हें देश से निकाला जा रहा है और इस बात की पूरी संभावना है कि वे अब भविष्य में भी उनका इस देश में आना पूरी तरह से प्रतिबंधित होगा ये वहीं देश है जो भारत को इस्लामिक मूल्य सीखा रहे है, यहां के मुसलमानों को भड़काने के लिए लगातार बयानबाज़ी कर रहे है, इससे हिंसक प्रदर्शन भी हुए है और भारत में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी हद तक प्रभावित हुई है दरअसल पैगम्बर मोहम्मद पर नुपुर शर्मा की एक टीवी डिबेट के दौरान एक कथित टिप्पणी के बाद इस्लामिक देशों की जो प्रतिक्रिया सामने आई है,वह हैरान करने वाली है धार्मिक आज़ादी को लेकर भारत पर कभी सवाल खड़े नहीं किये जा सकते और किसी एक शख्स के विचार किसी भी सूरत में राष्ट्रीय विचारों या नीतियों को प्रतिबिम्बित नहीं कर सकते 


लोकतांत्रिक भारत में इस्लाम के मूल्यों और परम्पराओं की तुलना राजशाही से अभिशिप्त खाड़ी के देशों से तो की ही नहीं जा सकती। पैगम्बर मोहम्मद साहब की शिक्षाओं को सामने रखकर भारत के बहिष्कार की अपील करने वाले इस्लामिक देश कतर के बारे में जानना बेहद जरूरी है  इस्लामिक दुनिया में शिया सुन्नी विवाद को हवा देकर आतंक फ़ैलाने के लिए खाड़ी के देशों में कतर बेहद बदनाम रहा है पैगम्बर मोहम्मद की समावेशी विचारधारा के अनुरूप कतर को लोकतांत्रिक देश होना चाहिए लेकिन कतर अल-थानी खानदान की विरासत समझा जाता है,जहां इस खानदान का कतर पर पूरी तरह से कब्ज़ा है मोहम्मद साहब की सादगी पूर्ण जीवन से इतर कतर की मूल आबादी बेहद आधुनिक जीवन जीती है लंदन में अल-थानी खानदान के पास महारानी एलिजाबेथ द्वितीय से ज्यादा दौलत है 


दुनिया में दहशत फ़ैलाने वाले हमास,मुस्लिम ब्रदरहुड,अलकायदा,इस्लामिक स्टेट से लेकर कई आतंकी समूहों को मदद देने के लिए कतर इतना बदनाम रहा है कि इस देश से सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,मिस्र और बहरीन जैसे देश अपने राजनयिक संबंध तोड़  चूके है कतर से संचालित अल-जजीरा चैनल इस्लामिक चरमपंथी हमलों को लाइव दिखाने को लेकर चर्चित रहा है ऐसा माना जाता है कि अमेरिका की शह पर संचालित इस चैनल ने इस्लाम की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है कतर की अपनी कोई सेना नहीं है और यहां पर अमेरिका के सैन्य अड्डे है अमेरिका इस्लामिक दुनिया को रक्तरंजित करने के लिए क़तर का खूब इस्तेमाल करता है। अफगानिस्तान को तालिबान के हवाले कर अमेरिका के वहां से लौट जाने के पीछे भी कतर की भूमिका अहम मानी जाती है। 


इस्लाम धर्म की मान्यताओं में मानवता की रक्षा और समानता का प्रमुख स्थान है।  ऐसे में कतर में काम करने वाले अन्य देशों से आने वाले मुस्लिम कामगारों के बारे में जानना भी बेहद जरूरी है इस साल कतर में फीफा फुटबाल विश्व कप का आयोजन किया जा रहा है  इसकी तैयारी कतर में लगभग डेढ़ दशक से की जा रही है कतर के आधुनिकीकरण के लिए काम करने वाले अधिकांश मजदूर भारत से है और इसमें सबसे ज्यादा मुस्लिम ही है मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल का आरोप है कि कतर में निर्माण कार्यों में लगे मज़दूरों को अक्सर मज़दूरी न दिए जाने,ख़तरनाक स्थितियों में काम कराए जाने और घटिया आवास जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है इसे जानवरों जैसी जिंदगी कहा जाता है गुलामों जैसी बदतर स्थिति में रहने और काम करने के कारण हजारों मज़दूरों की मौत हो रही है मजदूरों को क़तर की गर्मी की बेहद तपते दिनों मे भी सप्ताह में एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती 2014 में एक रिपोर्ट आई थी जिसके अनुसार उस दौरान महज 1000 दिनों में 500 भारतीय मजदूरों की मौत हो गई थी,जिसमें अधिकांश मुसलमान थे 


भारत में रहने वाले  मुसलमानों से तुलना की जाएं तो क़तर में रहने वाले मुसलमान महज उसका 1 फीसदी भी नहीं हैगैस संसाधनों से समृद्द इस देश में इस्लामिक मूल्यों को बेहतर तरीके से सहजा जा सकता हैक़तर दुनिया का सबसे धनी देश है,इसकी औसत प्रति व्यक्ति आय एक लाख डॉलर है जो दुनिया में सर्वाधिक है इस्लाम में सामूहिक परिवारों की मान्यता से अलग कतर के माता पिता अपने बच्चों का ख्याल रखने के लिए भी नौकर का  इंतजाम करते है क़तर में अब क़रीब 40 फ़ीसदी शादियों का अंत तलाक में हो जाता है,काम न करने और आधुनिक जीवन शैली अपनाने के कारण यहां के दो तिहाई वयस्क और बच्चे मोटापे की चपेट में हैमोहम्मद साहब की मान्यताओं के अनुसार बिना मेहनत के रोटी खाना हराम हैवहीं क़तर के लोगों को मुफ़्त शिक्षा,मुफ़्त स्वास्थ्य,नौकरी की गारंटी,घर बनाने के लिए अनुदान और यहां तक कि पानी और बिजली भी मुफ़्त हैक़तर के परिवार बिखर रहे हैंयहां के बच्चों की परवरिश फिलीपींस,नेपाल और इंडोनेशिया आदि देशों से आने वाली आया कर रही हैं। इससे यहां की संस्कृति पर खतरा मंडरा रहा है। कतर,सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में राजशाही निजाम है जिसके खिलाफ प्रदर्शन करने की कल्पना भी नहीं की जा सकती और न ही किसी राजनीतिक दल का गठन किया जा सकता है


 

भारत में मुसलमान अल्पसंख्यक माने जाते है लेकिन इस्लामिक संस्कृति और मूल्यों को यहां बेहतर तरीके से सहेजा जाता है। प्रजातंत्र में राजनीतिक सौदेबाज़ी की ताकत को मुस्लिमों ने भी खूब आजमाया है राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर देश में मुस्लिम नेताओं की कमी नहीं है असम में बदरूद्दीन अजमल की असम यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट,उत्तरप्रदेश  में पीस पार्टी,केरल में मुस्लिम लीग और आंध्र प्रदेश में ऑल इंडिया इत्तेहादुल मुस्लिमीन जैसी पार्टियां आज़ादी के बाद से सक्रिय हैं कतर,सऊदी अरब,बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात में कोई सामान्य मुस्लिम उच्च पद की कल्पना भी नहीं कर सकता वहीं भारत में सामान्य परिवारों से निकलने वाले मुस्लिम राष्ट्रपति,मुख्य न्यायाधीश जैसे कई संविधानिक पदों पर काम करके देश का गौरव बढ़ा चूके है

 


भारत में स्थित दारुल उलूम देवबंद को इस्लामिक शिक्षा का विश्व में बड़ा केंद्र माना जाता रहा है। वह भारत में अब भी वैसे ही काम करता है जैसा सौ साल पहले करता था भारत की किसी भी सरकार ने उसे कभी बंद करने की बात नहीं की आज देवबन्द इस्लामी शिक्षा व दर्शन के प्रचार के व प्रसार के लिए संपूर्ण संसार में प्रसिद्ध है भारत में सरकारों ने इस संस्था को फलने फूलने में बड़ी मदद की है दारुल उलूम देवबन्द में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा,भोजन, आवास व पुस्तकों की सुविधा दी जाती है दुनिया की सबसे  बड़ी और भव्य जामा मस्ज़िद भारत में है भारत की सभी सरकारों ने इसके विकास और लोगों की सुख सुविधाओं का हमेशा ध्यान रखा है और यहां पर आने वाले नमाजियों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाती है 

 


इस्लामिक मूल्यों और आदर्शों को लेकर भारत का लोकतांत्रिक समाज ज्यादा सजग है। राजशाही वाले देश क़तर,सऊदी अरब और अमीरात जैसे अमीर देश विकासशील और गरीब देशों में रहने वाले मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं भड़काकर अपनी धार्मिक और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं  की पूर्ति करते है। भला इन देशों में मुसलमानों को भी विरोध या प्रदर्शन की इजाजत क्यों नहीं दी जाती। 


 

भारत के विभिन्नताओं वाले समाज में किसी एक शख्स की वैचारिक असहमति का मतलब व्यापक और बहुसंख्यक समाज द्वारा इस्लामिक विरोध कभी नहीं हो सकता। जाहिर है भारत की छवि खराब करने वाली वैदेशिक ताकतों का सभी के द्वारा मिलजुल कर मुकाबला किया जाना चाहिए। 

 

चीन पर अमेरिका का नया दांव indo pecific china amerika janstta

 जनसत्ता


                          

स्वतंत्र,खुले और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र की परिकल्पना अब चीन के भू रणनीतिक और भू आर्थिक प्रतिरोध का पर्याय बन गई हैअंतर्राष्ट्रीय राजनीति में सामूहिक सुरक्षा का सैद्धांतिक सम्बन्ध सैन्य सहयोग और शस्त्रीकरण पर आधारित रहा है,जहां आक्रमण,आक्रमण का प्रतिकार और अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष को रोकने की प्रतिबद्धताएं अहम रही है अब चीन के आर्थिक उभार ने रणनीतिक प्रतिद्वंदिता के प्रचलित सिद्धांतों को पूरी तरह से बदल दिया है। अमेरिका चीन के वैश्विक स्तर पर बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए मजबूत आर्थिक और कारोबारी नीतियों पर आधारित व्यवस्था को तरज़ीह दे रहा है। इसके केंद्र में हिन्द प्रशांत महासागर का क्षेत्र है जो व्यापारिक,आर्थिक,प्राकृतिक और मानव संसाधन  की दृष्टि से बेहद प्रभावकारी है।


 

भौगोलिक तौर पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिलाकर समुद्र का जो हिस्सा बनता है उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह व्यापारिक आवागमन का प्रमुख क्षेत्र है तथा इस मार्ग के बन्दरगाह सर्वाधिक व्यस्त बन्दरगाहों में शामिल है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लगे 38 देशों में दुनिया की करीब 65 फीसदी आबादी रहती है।   आसियान की आर्थिक महत्वाकांक्षी भागीदारियां,असीम खनिज संसाधनों पर चीन की नजर,कई देशों के बन्दरगाहों पर कब्जा करने की चीन की सामरिक नीति तथा क्वाड की रणनीतिक साझेदारी इस क्षेत्र के प्रमुख राजनैतिक और सामरिक प्रतिद्वंदिता से जुड़े मुद्दे रहे है।


 

इन सबके बीच दुनिया के बाज़ार में चीनी उत्पादों की आपूर्ति अबाध तरीके से हो रही है,एशिया,अफ्रीका और यूरोप के कई देश चीन की ब्रेड और बटर की नीति का भाग बन गए है।  वैश्वीकरण की दीर्घकालीन और प्रभावकारी आर्थिक नीतियों का फायदा उठाकर चीन ने अपनी सामरिक क्षमता का भी अभूतपूर्व विकास कर लिया है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने यूरोप के कई देशों को व्यापारिक और सहायता कूटनीति के जरिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावित किया है। इस समय दक्षिण पूर्वी यूरोप में चीन ने अपना आर्थिक प्रभाव तेजी से स्थापित किया है,यह क्षेत्र अमेरिका और यूरोप के लिए सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। बाल्कन प्रायद्वीप यहीं स्थित है जो पश्चिम में एड्रियाटिक सागर,भूमध्य सागर और दक्षिण में मरमरा सागर और काला सागर से घिरा हुआ है। चीन नए सिल्क रोड के जरिए इस क्षेत्र के देशों में न केवल अपना रुतबा बढ़ा रहा है बल्कि कर्ज कूटनीति से उसने कई देशों पर अपना प्रभाव भी जमा लिया है। कई देशों के बंदरगाह निर्माण में चीनी कम्पनियों की बड़ी भूमिका है।  कर्ज के नाम पर चीन इन देशों में अपने सैन्य अड्डे बना सकता है और यह यूरोप की सुरक्षा की एक बड़ी चुनौती के रूप में भी सामने आ सकता है।


चीनी प्रभाव के अभूतपूर्व वैश्विक खतरों से निपटने के लिए अमेरिका हिन्द प्रशांत क्षेत्र में संभावनाएं निरंतर तलाश रहा है। इस क्षेत्र में चीन को घेर कर वह उसकी आर्थिक और सामरिक क्षमता को कमजोर करना चाहता है। अमेरिका को लगता है कि चीन को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए एशिया को कूटनीति के केंद्र में रखना होगा और इस नीति पर बराक ओबामा,ट्रम्प के बाद अब बाइडेन भी आगे बढ़ रहे हैअमेरिका रणनीतिक भागीदारी के साथ आर्थिक और कारोबारी नीतियों पर आगे बढ़ना चाहता है। इसीलिए क्वाड के बाद अब अमेरिका ने इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क की रणनीति पर आगे बढ़ने की बात कहीं है जिसमें व्यापारिक सुविधाओं के साथ आपसी सहयोग को बढ़ाना है।


 

यह देखा गया है कि चीन रणनीतिक रूप से जहां भी मजबूत होता है,अमेरिका के लिए वह चुनौतीपूर्ण समझा जाता है और इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। ओबामा काल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान,दक्षिण कोरिया,थाईलैंड,फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम किया गया थाओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को जोड़ने की नीति पर भी काम किया जो चीन की विस्तारवादी नीति और अवैधानिक दावों से परेशान है इन देशों में भारत समेत इंडोनेशिया, ताइवान,मलेशिया,म्यांमार,ताजीकिस्तान,किर्गिस्तान,कजाकिस्तान,लाओस और वियतनाम जैसे देश शामिल है इनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते है और कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध है। चीन को  रोकने के लिए क्वाड का एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी के तौर पर विकास तो हुआ लेकिन इसके परिणाम अभी तक प्रभावकारी नहीं रहे है। क्वाड को लेकर चीन सख्त रहा है और वह इसे एशियाई नाटो कहता रहा है। वहीं चीन एशिया में अमेरिका के प्रभाव को कम करने के लिए आर्थिक मोर्चे पर मजबूत नजर आता है। अमेरिका की इंडो-पैसिफिक इकनॉमिक फ्रेमवर्क की नई रणनीति प्रभावकारी तो लगती है लेकिन इसमें विरोधाभास भी कम नहीं है। एशिया के विभिन्न देशों को लामबंद करके आर्थिक सहयोग को लेकर अमेरिका के प्रमुख सहयोगी ऑस्ट्रेलिया,जापान और दक्षिण कोरिया चीन के साथ पहले से ही मिलकर काम कर रहे है।

 


इसमें से एक है आरसीईपी आसियान देशों के मुक्त व्यापार समझौते आरसीईपी यानी रीजनल कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप को विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता कहा जाता  हैविश्व की 30 फ़ीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मंच एशियाई देशों के बीच निवेश बढ़ाने,आयात करों में कमी कर और सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था को साथ लाने को कृतसंकल्पित होकर लगातार सहयोग पर आधरित व्यवस्था को पुख्ता कर रहा है आरसीईपी चीन का पहला बहुपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता है जिसमें दक्षिण कोरिया और जापान शामिल हैं। इन दोनों देशों से सामरिक तौर पर चीन के गहरे विवाद है। पूर्वी चीन सागर में शेंकाकू आइलैंड को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद है,चीन ने इस आइलैंड में 2012  से अपने जहाज और विमान  भेजना शुरू किया और तब से ही जापान और चीन के बीच विवाद बढ़ गया है चीन जापान विवाद के बीच अमेरिका जापान को खुला और मुखर समर्थन दे रहा है,जापान और अमेरिका के बीच साल 2004 में प्रक्षेपात्र रक्षा प्रणाली के संबंध में समझौता भी हुआ था  जापान की नई रक्षा नीति में दक्षिणी द्वीपों को प्राथमिकता देते हुए वहां  सैनिकों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी की गई है,यह दक्षिणी द्वीप चीन के निकट है  अमेरिका के द्वारा जापान को भारत तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ बेहतर संबंध रखने को प्रेरित किया जा रहा है जिससे चीन को नियंत्रित किया जा सके चीन के उत्तर पूर्व में उत्तर कोरिया है तथा पूर्व में जापान है। कोरियाई प्रायद्वीप में चीन और उत्तर कोरिया को नियंत्रित करने के लिए अमेरिका सैन्य कार्रवाई के लिए तैयार हैदक्षिण कोरिया की 1953 से अमरीका के साथ रक्षा संधि है और दक्षिण कोरिया में अठ्ठाइस हजार से ज्यादा अमरीकी सैनिक और युद्धपोत नियमित रूप से वहां तैनात रहते हैं मिसाइलों से लैस यूएसएस मिशीगन विमानवाहक युद्धपोत कार्ल विंसन भी वहां खतरे से निपटने के लिए तैयार हैआरसीईपी में अमेरिका के मित्र देश न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है


अमेरिका की चुनौतियां कम नहीं है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप नाम का आर्थिक गठबंधन चीन का मुकाबला करने के लिए एशिया में शुरू किया गया था। 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को बेकार बताकर अमेरिका को बाहर निकाल लिया था। जिसके बाद जापान के नेतृत्व में इसे सीपीटीपीपी  का नाम दिया गया। इस व्यापक और प्रगतिशील ट्रांस पैसिफिक पार्टनरशिप में चीन शामिल होना चाहता हैव्यापारिक मुद्दों पर अमेरिका और जापान में  गहरें मतभेद सामने आते रहे हैचीन सीपीटीपीपी के सभी सदस्यों के साथ गहरे व्यापारिक संबंध साझा करता है और कई देशों के साथ उसके मुक्त व्यापार समझौते भी हैं। अधिकांश सदस्य आरसीईपी के माध्यम से भी चीन से जुड़े हुए हैं। 

 


अब अमेरिका यह विश्वास दिला रहा है कि एशिया के दो कारोबारी ब्लॉक सीपीटीपीपी और आरसीईपी के उलट आईपीईएफ़ में टैरिफ की दरें कम होंगी इस फ्रेमवर्क के तहत अमेरिका सप्लाई चेन की मज़बूती और डिजिटल इकोनॉमी पर रणनीतिक सहयोग चाहता है यह भी दिलचस्प है कि आईपीईएफ़ में सहयोग के खुलेपन को लेकर अमेरिका ने कोई स्पष्ट योजना नहीं रखी है  जबकि चीन मुक्त हस्त से सहयोग की नीति पर निरंतर काम कर रहा हैआईपीईएफ़ में कुल 13 देश है,जिसमे अमेरिका,ऑस्ट्रेलिया,ब्रूनेई,भारत, इंडोनेशिया,जापान,दक्षिण कोरिया,मलेशिया,न्यूज़ीलैंड,फिलीपींस,सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। इसमें से अधिकांश देशों के बाज़ार पर चीन का गहरा प्रभाव है। 

 


बाइडन प्रशासन यह स्वीकार कर चूका है कि चीन ही आर्थिक,राजनयिक,सैन्य और तकनीकी दृष्टिकोण से उसका संभावित प्रतिद्वंद्वी है जो स्थिर और खुली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की निरंतर चुनौती से पार पाने में सक्षम है। चीन रूस के मुकाबलें कही बेहतर प्रतिद्वंदी बनकर अमेरिका के सामने आ रहा है और  बाइडन इससे निपटने के लिए मुख्य रूप से यूरोप  के बाद हिंद प्रशांत क्षेत्र से जुड़े देशों की ओर देख रहे हैचीन को रोकने के लिए बनाया गया क्वाड में यूक्रेन को लेकर मतभेद सामने आ चूके है,यहां भारत रूस को लेकर क्वाड के अन्य सदस्यों से प्रभावित नहीं रहाभारत के इस रुख पर अमेरिका असहज रहा हैअब  बाइडन भारत को साथ रखकर आईपीईएफ़ में भागीदारी बढ़ाना चाहते हैयहां पर पर्यावरण और सब्सिडी जैसे मुद्दों पर भारत और अमेरिका के बीच सामंजस्य मुश्किल नजर आता है वहीं आईपीईएफ़ के सदस्य देश इंडोनेशिया,ऑस्ट्रेलिया,दक्षिण कोरिया और जापान सामरिक चुनौतियों के बाद भी चीन से आर्थिक सम्बन्ध खत्म कर दे यह न तो व्यावहारिक रूप से संभव है और न ही आर्थिक हितों की दृष्टि से मुमकिन है

 


जाहिर है चीन को रोकने के लिए दीर्घकालीन आर्थिक और सामरिक रणनीति पर काम करने की जरूरत है,इसके लिए अमेरिका को न केवल अपने मित्र और सहयोगी देशों का भरोसा जीतना होगा बल्कि समान हितों पर आधारित व्यवस्थाओं पर आगे बढना होगा। भारत अपनी सामरिक और भौगोलिक चुनौतियों के चलते न तो रूस का विरोध कर सकता है और न ही जापान अपने आर्थिक हितों को बलि चढ़ाकर चीन से आर्थिक संबंधों को खत्म कर सकता है। वैश्विक व्यवस्थाओं की जटिलता के बीच नाटो और अमेरिका चीन को यूरोप में नहीं रोक पा रहे है,ऐसे में एशिया में चीन को कमजोर करना एक दिवास्वप्न ही नजर आता है।

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