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मत चुको चौहान...! shivraj singh chouhan,mat chuko chouahn politics

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  पॉलिटिक्स                                 शिवराजसिंह चौहान को अब तक के राजनीतिक जीवन में केवल एक बार हार का सामना करना पड़ा है । 2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने चौहान को तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के सामने   राघोगढ़ से खड़ा किया था । तब भाजपा ने उमा भारती को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था ।   इस चुनाव में शिवराजसिंह चौहान को हार का सामना करना पड़ा । हालांकि शिवराजसिंह चौहान को भी पता था कि राघोगढ़ से दिग्विजय सिंह को हराना संभव नहीं है , लेकिन उन्होंने पार्टी की बात मानी थी । वह दौर अटल आडवाणी का था,जिन पर शिवराजसिंह का अटूट भरोसा था । लेकिन अब दौर बदल गया है,जोड़ियाँ बदल गई है,हसरतें और ख्वाइश भी बदल गई है तथा दौर-ए-जज्बात भी जुदा नजर आते है। अटल आडवाणी के बारे में कहा जाता था कि वे सत्ता और शक्ति की अपेक्षा   विचार और विश्वास की राजनीति करते थे,लेकिन अब वह राजनीति पीछे छूट गई है । गुजरात को ही देखिये,विधानसभा चुनाव के पहले कुछ बदलने की चाहत में सब कुछ बदल डाला । मुख्यमंत्री के साथ पूरी केबिनेट को ही बदल दिया । बदले तो कर्नाटक में

तालिबान की महबूबा...! politics taliban mahbuba mufti

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  पॉलिटिक्स    अफगानिस्तान में तालिबान की आतंक की सत्ता के पक्ष में लामबंद होने वालों में महबूबा मुफ़्ती भी शुमार हो गई है । उन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान के हालिया कब्जे की मिसाल देते हुए भारत सरकार को ताकीद किया है कि वह कश्मीरियों के सब्र का और इम्तिहान न ले और अमेरिका से सबक सीखे कि उसे कैसे अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भागना पड़ा।   इसके पहले उन्होंने कुलगाम में एक जन सभा में कहा था कि   जैसी हालत अमेरिका की अफगानिस्तान में हुई वैसी ही कश्मीर में भारतीय सेना की होगी । दरअसल कश्मीर में चरमपंथ को सामाजिक स्वीकार्यता के साथ राजनीतिक समर्थन देने का काम महबूबा मुफ़्ती कई सालों से करती रही है। वह राजनीतिक सभाओं में राजनीतिक कैदियों को रिहा करने,सभी उग्रवादियों से वार्ता करने और आतंकवादियों के लिए कहर बने स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप को बंद करने की वकालत करती रही है। अपने स्वायत्तता प्रेम के कारण घाटी के अलगाववादियों एकमात्र पसंद महबूबा ही मानी जाती है । आतंक के खास केंद्र दक्षिणी कश्मीर में उनकी पार्टी पीडीपी का सिक्का चलता है ।   आतंकी गठजोड़   पर महबूबा की चुप्पी   पाकिस्तान,आईएसआई,त

संविधानिक सत्ता संभव नहीं,talibani stta afganistan rashtriya sahara

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  राष्ट्रीय सहारा                                                                      अफगानिस्तान में तालिबान सैन्य प्रशासन सशस्त्र सेनाओं का प्रबंधन तो कर सकता है , लेकिन लोकसेवा को लेकर उसकी स्थिति जटिल ही होगी। तीन दशक पहले अस्तित्व में आएं तालिबान का समूचा इतिहास गुरिल्ला युद्द और कबीलाई लड़ाइयों से भरा पड़ा है। तालिबान ने इस दौर में अफगानिस्तान में स्थापित वैधानिक व्यवस्था का समूचा ढांचा नष्ट कर दिया है। देश के विभिन्न प्रान्तों में स्थापित प्रशासनिक केंद्र , लोक कल्याणकारी संस्थान , पुलिस मुख्यालय और अन्य सभी सरकारी संस्थानों में काम करने वाले लोग भाग गये है , तालिबान उन्हें वापस बुलाने में क्या कामयाब हो पायेगा , इसे लेकर संदेह बना हुआ है। 2001 में सत्ता से बेदखल होने के पहले तालिबान का अफगानिस्तान में सत्ता पर बने रहने का तरीका रक्तरंजित होकर अमानवीयता से भरा पड़ा रहा। एक बार फिर तालिबान सत्ता के शीर्ष पर है और वह नये अफगानिस्तान के निर्माण को लेकर वैश्विक समुदाय को भरोसा दिला रहा है। लेकिन अफगानिस्तान की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताएं किसी लडाका संगठन के पक्ष में ल

अमेरिका का नया दांव,amerika afganistan janstta

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  जनसत्ता                  अमेरिका ने काबुल में अपना दूतावास बंद कर दिया है और इसे क़तर की राजधानी दोहा स्थानांतरित किया गया है । सभी अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़ चूके है । अमेरिकी विदेश मंत्री एंथनी ब्लिंकेन ने इसे अफ़ग़ानिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्तों का एक नया अध्याय बताया है, जिसमें सैनिक अभियान के   समाप्त होने और नए कूटनीतिक मिशन के शुरू होने की बात कही है । दरअसल अफगानिस्तान से आतंक समाप्त करने का अमेरिकी लक्ष्य भले ही पूरा न हुआ हो लेकिन उसके वैश्विक हित और उद्देश्य अवश्य बदल गए है। अमेरिका को लेकर यह धारणा रही है कि यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी नीतियां वहां की राजनीतिक पार्टियां या राष्ट्रपति तय नहीं करते , बल्कि तय वही होता है जो अमेरिकी हित में हो , चाहे सत्ता में कोई भी रहे। अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी अप्रत्याशित नहीं होकर कूटनीति का ऐसा दांव है जिससे मध्यपूर्व ,  दक्षिण एशिया ,  चीन ,  रूस सहित कई मोर्चों पर अमेरिका को निर्णायक बढ़त मिल सकती है। ऐसा लगता है कि अमेरिका और तालिबान ने आपसी गठजोड़ करके न केवल अपने हितों को सुरक्षित कर लिया बल्कि भविष्